विज्ञान के अनुसार चार है -ऐतमोस्फ़ेअर , तोपोस्फेअर , स्त्रैतोस्फ़ेअर. आयनोस्फ़ेअर.
बातन ही असमानु गिरावहि
ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ
-बलजीत बासी
On 18 अग, 16:40, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> एक नज़र इधर भी डाल लिया जाए-
> लोक क्या है ? <http://shabdavali.blogspot.com/2008/01/blog-post_25.html>
>
> 2010/8/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
>
>
>
>
>
> > मेरी जानकारी में, सात आसमान सात स्वर्गों (सात लोकों) को कहते हैं.
> > हिन्दू धर्म समेत अलग अलग धर्मों मे ये इस प्रकार हैं.
> > हिन्दू धर्म -
> > तीन कृतक लोक -
> > १) भू लोक
> > २) भुवर्लोक
> > ३) स्वर्लोक
> > चार अकृतक लोक -
> > ४) महर्लोक
> > ५) जनलोक
> > ६) तपलोक
> > ७) सत्यलोक
>
> > इस्राईल की धरती के आसपास से उभरे तीनो प्रमुख धर्मों में उनके इन सेवन हैवन्स
> > का अलग अलग नामों और गुणों से उल्लेख मिलता है. अधिक जानकारी के लिये ये
> > देखें <http://en.wikipedia.org/wiki/Seven_Heavens>
>
> > 2010/8/17 Bodhisatva <abod...@gmail.com>
>
> > सात आसमान तो मैं नहीं जानता लेकिन पाँच आकाश से परिचित हूँ।
> >> तांत्रिक वांग्मय में पाँच आकाश इस तरह हैं-
> >> श्वेत वर्ण ज्योति रूप आकाश, रक्त वर्ण परारूप आकाश, धूम्र वर्ण ज्योति
> >> रूप महाकाश, नील वर्ण ज्योति रूप तत्वाकाश और विद्युत वर्णज्योति रूप
> >> सूर्याकाश।
> >> कहीं-कही इन पाँच आकाशों का का भी वर्णन मिलता है-
> >> घटाकाश, मठाकाश, महदाकाश, चिदाकाश, निराकाश।
> >> योग वासिष्ठ के अनुसार तीन प्रकार के आकाश हैं-
> >> भूताकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश-
> >> चित्ताकाशं,टिदाकाशमाकाशं, च तृतीयकम।।
> >> वहीं बाल्मीकि जी ने किष्किन्धा काण्ड में सात आकाश मार्गों की बात की
> >> है। और उनके स्तर भी बताए हैं तो क्या इसी तरह सात आसमान भी होंगे।
>
> > --
> >http://hindini.com
> >http://hindini.com/eswami
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> अजितhttp://shabdavali.blogspot.com/- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए
इन सात आसमानों की तरह धरती की सात सतह बताईं गईं है जिन्हे क़ुरान में
तबक़ा कहा गया है। उनके बारे में इस से अधिक और कोई विवरण नहीं मिलता। इन
सात आसमानों और धरती की सात सतहों को ले कर क़ुरान के दीवाने दावा करते
हैं कि देखिये क़ुरान में सब पहले से ही लिखा है। हालांकि मामला उलटा है।
पहले शास्त्र ही प्रमाण होते थे। जो बात वेदादि शास्त्रों में मिल जाय,
या क़ुरान में मिल जाय, वो उस परम्परा में प्रमाण मान लिया जाता था। अब
क्या है? विज्ञान ही सब को प्रमाणित करता है। वेद वाले भी विज्ञान की
बातों को लेकर अपने शास्त्र के श्लोक लहराते रहते हैं कि देखो हमारे यहाँ
सब कुछ पहले ही कह दिया गया है और क़ुरान वाले भी यही करते हैं।
अपने-अपने शास्त्रों में आँखें गड़ाये ये दोनों समूह दीवार पर मोटे
अक्षरों में लिखा सच पढ़ने से रह जाते हैं - अब विज्ञान ही प्रमाण है।
(जबकि विज्ञान अभी भी तमाम सारी बातों को लेकर संशकित है और किसी भी बात
को पूरी तरह से सत्य कहने से अब कतराने लगा है, मगर जो एक चीज़ को सच और
दूसरी को झूठ कहने के आदी हो गए हैं वो संशय का मार्ग नहीं अपना सकते ,
उन्हे आस्था की बीमारी जो है।
On Aug 19, 2:37 am, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> क्या कहिए बलजीत भाई[?]
>
> 2010/8/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> > > अजितhttp://shabdavali.blogspot.com/-उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> > > उद्धृत पाठ दिखाए
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> अजितhttp://shabdavali.blogspot.com/
>
> 330.gif
> < 1KViewDownload
> आकाश का तो पता नहीं पर बादल नौ की संख्या तक तो हैं ही. सबसे ऊंचाई वाले बादल को
> "cumulonimbus" बादल कहते हैं जिसका नम्बर नौ है. अंग्रेजी phrase है - "to be at
> cloud number nine" यानि ऐसी परम प्रसन्न अवस्था में होना जहां और कोई चाहत बाकी
> न रहे.
हिन्दी में सात आसमान की एक ही कहावत ध्यान आ रही है, "उसका दिमाग़ सातवें आसमान
पर रहता है (या पहुँच गया)"
इतने सारे आसमान, इतनी बड़ी धारणा, और इसका उपयोग केवल एक मुहावरे में? बहुत
नाइंसाफ़ी है ठाकुर।
रावत
>
> और वहां तक पहुंचने का मार्ग ’ब्रायन एड्म्स’ बतला रहे हैं, इधर:
>
> http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e
> <http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e>
>
>
>
> 2010/8/18 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com
> <mailto:ashuv...@gmail.com>>
बस उनसे थोड़ी सी जल्दी हो गई,
1. "दर्शन सत्ता नहीं बनता, धर्म सत्ता बन जाता है।"
रूस में मार्क्स के दर्शन के कारण ही सत्ता परिवर्तन हुआ, चीन में माओ के दर्शन कारण
सत्ता परिवर्तन हुआ, फ़्रांस में भी वोल्टेयर के दर्शन से आई जागरूकता का बहुत बड़ा हाथा
था वहाँ की क्रांति में।
इसलिए, दर्शन से सत्ता परिवर्तन होता है, और सत्ता किसी न किसी दर्शन को अपनाती है,
2. दर्शन विचार के जगत में रहता है, और धर्म कर्मकाण्ड मात्र बन जाता है।
तमिलनाडु में जयाअम्मा की जो भक्ति दिखाई जाती है, वो किसी भी धार्मिक कर्मकांड से
कम नहीं कही जा सकती। बहुत जगहों पर बहुत उदाहरण हैं ऐसे। मार्क्सवादियों ने क्या
मार्क्सवाद लाया भारत में? वो एक दूसरा राजनीतिक दल भर बन के रह गए। परंतु फिर भी
वो मार्क्स की कही बातों को किसी कर्मकांड के समान ही करते हैं। इसका सही शब्द ढोंग है।
--
रावत
On 8/20/2010 5:00 PM India Time, _Abhay Tiwari_ wrote:
> किसी धर्म में दर्शन हो सकता है, और कोई दर्शन धर्म में तब्दील भी हो सकता है। लेकिन हर
> दर्शन धर्म नहीं बनता, जैसे हेगेल या नीत्शे या लोहिया का दर्शन। वैसे तो हर धर्म में एक
> अन्तर्निहित दर्शन होता ही है लेकिन उसके मानने वाले उसे मात्र अनुष्ठान की तरह वापरते हैं।
> दर्शन सत्ता नहीं बनता, धर्म सत्ता बन जाता है।
> दर्शन विचार के जगत में रहता है, और धर्म कर्मकाण्ड मात्र बन जाता है।
>
> ----- Original Message -----
> *From:* संजय | sanjay <mailto:sanjay...@gmail.com>
> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> *Sent:* Friday, August 20, 2010 4:52 PM
> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
> विषयांतर हो रहा है, मगर जानना चाहुंगा दर्शन और धर्म कैसे अलग हैं? दर्शन ही धर्म का
> ढ़ांचा है. नहीं? या फिर मैं चुक कर रहा हूँ?
हम भारतीयों का धर्म सॉलिड दर्शन पर आधारित है, परंतु हर धर्म के मूल में दर्शन नहीं है।
इसाइयत और इस्लाम में कोई दर्शन नहीं है, वो उनके एक-एक पैगंबर की कही और करी गई
बातों का पालन है। इस्लाम का आधार इस बात पर है कि अल्लाह ने इंसान को अपनी
इबादत करने के लिए बनाया। अब आप ही बताइए कि ये कोई उद्देश्य, कोई प्रयोजन हुआ? ये
तो नारसीसस जैसी बात हुई कि कोई अपने ही इश्क में पड़ जाए।
इस तरह के लाखो धर्म दुनिया के अनगिनत कबीलों में चल रहे हैं जिनके पीछे कोई दर्शन नहीं
होता, सिर्फ़ किसी ताकत वाले, पैसे वाले का अनुसरण होता है - साम,दाम,दंड,भेद के कारण।
ये आपका सौभाग्य है कि आप एक दर्शन आधारित हिन्दू धर्म है, परंतु हर धर्म को ये
सौभाग्य मिला हुआ न मानें।
रावत
>
> २० अगस्त २०१० ४:४४ अपराह्न को, Abhay Tiwari <abha...@gmail.com
> <mailto:abha...@gmail.com>> ने लिखा:
>
> दर्शन में संशय को स्थान है धर्म में नहीं। जैन दर्शन के स्यादवाद की अच्छी याद दिलाई।
> वो बहुत कुछ उत्तरआधुनिकता जैसा है।
>
> ----- Original Message -----
> *From:* संजय | sanjay <mailto:sanjay...@gmail.com>
> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> *Sent:* Friday, August 20, 2010 4:34 PM
> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
>
> जैनों में संशय के लिए स्यातवाद जैसी चीज है. वहीं एक शब्द जो अद्भूत है और किसी
> भाषा में शायद ही मिले वह है "पुद्गल". ऐसा पदार्थ जो बनता है और उसी क्षण
> नष्ट भी होता है और बनता है. हमारा ब्रह्मांड ऐसा ही है. दर्शन में संशय को भी
> स्थान है. जैन साधू असत्य कहे जाने से लगने वाले "पाप" से बचने के लिए "लखाव'ह"
> जैसा शब्द प्रयोग करते है यानी "मुझे लगता है (शायद)ऐसा हो रहा है". जैसे यह
> मेल सभी सदस्यों को जाती हुई लखाव'ह.
>
> यह बातें अस्थान हो सकती है मगर कुछ शब्दों से परिचय तो हो गया ना :)
>
> २० अगस्त २०१० ४:२३ अपराह्न को, अभय तिवारी <abha...@gmail.com
> <mailto:abha...@gmail.com>> ने लिखा:
>
> इस्लाम में भी सात आसमानों की बात है मगर वे आसमान हमारे सौर मण्डल के
> ग्रहों की कक्षा पर आधारित हैं, वो भी भूकेन्द्रित ब्रह्माण्ड की कल्पना
> के अनुसार। यानी कि पहले चन्द्रमा का आसमान है, फिर बुध का आसमान है, फिर
> शुक्र, उसके बाद सूर्य का, फिर मंगल, गुरु और शनि का। इन्ही आसमानों में
> पैग़म्बरों का निवास भी है। जैसे मुहम्मद साहब का निवास शनि पर बताया गया
> है।
>
> इन सात आसमानों की तरह धरती की सात सतह बताईं गईं है जिन्हे क़ुरान में
> तबक़ा कहा गया है। उनके बारे में इस से अधिक और कोई विवरण नहीं मिलता। इन
> सात आसमानों और धरती की सात सतहों को ले कर क़ुरान के दीवाने दावा करते
> हैं कि देखिये क़ुरान में सब पहले से ही लिखा है। हालांकि मामला उलटा है।
> पहले शास्त्र ही प्रमाण होते थे। जो बात वेदादि शास्त्रों में मिल जाय,
> या क़ुरान में मिल जाय, वो उस परम्परा में प्रमाण मान लिया जाता था। अब
> क्या है? विज्ञान ही सब को प्रमाणित करता है। वेद वाले भी विज्ञान की
> बातों को लेकर अपने शास्त्र के श्लोक लहराते रहते हैं कि देखो हमारे यहाँ
> सब कुछ पहले ही कह दिया गया है और क़ुरान वाले भी यही करते हैं।
>
> अपने-अपने शास्त्रों में आँखें गड़ाये ये दोनों समूह दीवार पर मोटे
> अक्षरों में लिखा सच पढ़ने से रह जाते हैं - अब विज्ञान ही प्रमाण है।
>
> (जबकि विज्ञान अभी भी तमाम सारी बातों को लेकर संशकित है और किसी भी बात
> को पूरी तरह से सत्य कहने से अब कतराने लगा है, मगर जो एक चीज़ को सच और
> दूसरी को झूठ कहने के आदी हो गए हैं वो संशय का मार्ग नहीं अपना सकते ,
> उन्हे आस्था की बीमारी जो है।
>
> On Aug 19, 2:37 am, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com
> <mailto:wadnerkar.a...@gmail.com>> wrote:
> > क्या कहिए बलजीत भाई[?]
> >
> > 2010/8/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com
> <mailto:baljit_b...@yahoo.com>>
> >
> >
> >
> > > भाई जान किसी नतीजे पर भी पहुंचें, नहीं तो कबीर जी की बात आप
> पर लागू
> > > होगी:
> >
> > > बातन ही असमानु गिरावहि
> > > ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ
> > > -बलजीत बासी
> >
> > > On 18 अग, 16:40, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com
> <mailto:wadnerkar.a...@gmail.com>> wrote:
> > > > एक नज़र इधर भी डाल लिया जाए-
> > > > लोक क्या है ?
> <http://shabdavali.blogspot.com/2008/01/blog-post_25.html>
> >
> > > > 2010/8/19 ई-स्वामी <esw...@gmail.com
> <mailto:esw...@gmail.com>>
> >
> > > > > मेरी जानकारी में, सात आसमान सात स्वर्गों (सात लोकों) को कहते हैं.
> > > > > हिन्दू धर्म समेत अलग अलग धर्मों मे ये इस प्रकार हैं.
> > > > > हिन्दू धर्म -
> > > > > तीन कृतक लोक -
> > > > > १) भू लोक
> > > > > २) भुवर्लोक
> > > > > ३) स्वर्लोक
> > > > > चार अकृतक लोक -
> > > > > ४) महर्लोक
> > > > > ५) जनलोक
> > > > > ६) तपलोक
> > > > > ७) सत्यलोक
> >
> > > > > इस्राईल की धरती के आसपास से उभरे तीनो प्रमुख धर्मों में उनके
> इन सेवन
> > > हैवन्स
> > > > > का अलग अलग नामों और गुणों से उल्लेख मिलता है. अधिक जानकारी
> के लिये ये
> > > > > देखें <http://en.wikipedia.org/wiki/Seven_Heavens>
> >
> > > > > 2010/8/17 Bodhisatva <abod...@gmail.com
> <mailto:abod...@gmail.com>>
> web : www.chhavi.in <http://www.chhavi.in>
> www.tarakash.com <http://www.tarakash.com>
> www.pinaak.org <http://www.pinaak.org>
> blog: www.tarakash.com/joglikhi <http://www.tarakash.com/joglikhi>
> site: www.sanjaybengani.in <http://www.sanjaybengani.in>
>
>
>
>
> --
> ---------------------------------------------------------------
> संजय बेंगाणी | sanjay bengani | 09601430808
> छवि मीडिया एण्ड कॉम्यूनिकेशन
> web : www.chhavi.in <http://www.chhavi.in>
> www.tarakash.com <http://www.tarakash.com>
> www.pinaak.org <http://www.pinaak.org>
> blog: www.tarakash.com/joglikhi <http://www.tarakash.com/joglikhi>
> site: www.sanjaybengani.in <http://www.sanjaybengani.in>
>
ये बात भी ठीक है कि राजनीतिक दर्शन तो ज़रूर ही सत्ता हासिल करने की कोशिश
करेगा। जैसे कि वालतेयर, रूसो आदि के दर्शन के साथ हुआ।
मेरी उक्त बात को सूत्र न समझा जाय। उसमें पोल हैं।
----- Original Message -----
From: "V S Rawat" <vsr...@gmail.com>
To: <shabdc...@googlegroups.com>
> धर्म तो नैतिक कर्तव्य हैं जबकि दर्शन सम्यक चिन्तन दृष्टि है। इसमें पार्थिव अपार्थिव,
> पदार्थ प्रकृति सब कुछ है। दर्शन दरअसल मौलिक चिन्तन ही है।
नैतिकता स्वैच्छिक होती है, और बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के प्रयोजन के लिए मनुष्य की
आधारभूत प्रकृ्ति से परे जाना होती है। जब नैतिकता को किसी पर बाध्य कर दिया जाए,
तो वह धर्म हो जाती है।
धर्म का मूल वहीं से हुआ कि किसी भौगोलिक क्षेत्र की मान्यताओं में लागू होने वाले
नैतिकता के सर्वसम्मत मुद्दों को एक धर्म का नाम दे कर सब पर बाध्य कर दिया जाए। और
फिर स्वार्थी लोगों ने धर्म के नाम पर अपनी रोटियाँ सेकीं, और धर्म और नैतिकता का
कोई संबंध न रह गया।
रावत
>
> 2010/8/20 V S Rawat <vsr...@gmail.com <mailto:vsr...@gmail.com>>
>
> On 8/18/2010 8:43 PM India Time, _Ghost Buster_ wrote:
>
> आकाश का तो पता नहीं पर बादल नौ की संख्या तक तो हैं ही. सबसे ऊंचाई वाले
> बादल को
> "cumulonimbus" बादल कहते हैं जिसका नम्बर नौ है. अंग्रेजी phrase है - "to
> be at
> cloud number nine" यानि ऐसी परम प्रसन्न अवस्था में होना जहां और कोई
> चाहत बाकी
> न रहे.
>
>
> हिन्दी में सात आसमान की एक ही कहावत ध्यान आ रही है, "उसका दिमाग़ सातवें
> आसमान पर रहता है (या पहुँच गया)"
>
> इतने सारे आसमान, इतनी बड़ी धारणा, और इसका उपयोग केवल एक मुहावरे में? बहुत
> नाइंसाफ़ी है ठाकुर।
>
> रावत
>
>
> और वहां तक पहुंचने का मार्ग ’ब्रायन एड्म्स’ बतला रहे हैं, इधर:
>
> http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e
> <http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e>
> <http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e
> <http://www.youtube.com/watch?v=QhO-4cCQSUU&feature=av2e>>
>
>
>
> 2010/8/18 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com
> <mailto:ashuv...@gmail.com>
> <mailto:ashuv...@gmail.com <mailto:ashuv...@gmail.com>>>
----- Original Message -----
From: "V S Rawat" <vsr...@gmail.com>
To: <shabdc...@googlegroups.com>
बहुत बढ़िया विषय है। अभय जी का उत्तर भी पसंद आया।
> अल्लाह ने इंसान को अपनी इबादत के लिए बनाया- यह भी दर्शन है।
जी नहीं, ये दर्शन नहीं है, ये दर्शन की बेइज्जती है।
> आप को भले तार्किक न लगे पर है तो दर्शन ही।
दर्शन का तार्किक होना पहली दशा है।
> दर्शन का अर्थ सिर्फ़ एक नज़रिया है। आजकल
> ईमानदारी की कोई पूछ नहीं है, ईमानदार आदमी भूखा मरता है, यह भी दर्शन ही तो
> है!
दर्शन और नज़रिया पर्यायवाची नहीं हैं।
नज़रिया व्यक्तिकेंद्रित होता है, इसके लिए व्यक्ति जवाबदेह, ज़िम्मेदार, दायित्वपूर्ण नहीं
होता है। किसी भी व्यक्ति का कोई भी नज़रिया हो सकता है। किसी व्यक्ति पर आप उसके
किसी भी नज़रिए के लिए एफ़ आई आर नहीं कर सकते, मानहानि या अवमानना का मुक़दमा
नहीं चला सकते।
"ईमानदार आदमी भूखा मरता है" यह किसी एक या कुछ ही व्यक्तियों की प्रवृत्ति और उनके
अंजाम को लेकर निकाला गया एक अधकचरा निष्कर्ष है। दुनिया में 600 करोड़ इंसान हैं।
प्रायिकता के कुछ सिद्धांत हैं कि 600 करोड़ के आकार के लिए कोई तथ्यपरक वैज्ञानिक
निष्कर्ष निकालने के लिए कम से कम कितने लाखों या करोड़ों इंसानों की प्रवृत्तियों और
उसके अंजामों को कितने वर्षों तक ध्यान में लिया जाना चाहिए। जो कि इस निष्कर्ष को
निकालने में नहीं किया गया है, इसलिए यह व्यक्तिगत कथन मात्र है, एकदम वैसा ही जैसा
"काली बिल्ली रास्ता काट जाए, तो काम बिगड़ जाता है।"
दर्शन में गहराई होती है।
दर्शन में गहरी लंबी सोच लगी होती है।
दर्शन या तो विचारोत्तेजक होता है या शंका को शांत करता है।
"बंदे, तू मेरी इबादत करेगा, तुझे इसीलिए बनाया गया है।" यह दर्शन नहीं है, नज़रिया
तक नहीं है, यह तुग़लक़ी फ़रमान है। इस कथन में और सरकार द्वारा "जनता, आज से तू
पैट्रॉल के लिए 3.50 रुपए अधिक देगी, इसीलिए तुझे बनाया गया है" हुक्म जारी करने मे
कोई अंतर नहीं है।
कितना उथला आधार है यह किसी धर्म के लिए।
रावत
> >> २० अगस्त २०१० ४:४४ अपराह्न को, Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com
> >> <mailto:abhay...@gmail.com>> ने लिखा:
>
> >> दर्शन में संशय को स्थान है धर्म में नहीं। जैन दर्शन के स्यादवाद की
> >> अच्छी याद दिलाई।
> >> वो बहुत कुछ उत्तरआधुनिकता जैसा है।
>
> >> ----- Original Message -----
> >> *From:* संजय | sanjay <mailto:sanjaybeng...@gmail.com>
> >> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> >> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> >> *Sent:* Friday, August 20, 2010 4:34 PM
> >> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
>
> >> जैनों में संशय के लिए स्यातवाद जैसी चीज है. वहीं एक शब्द जो
> >> अद्भूत है और किसी
> >> भाषा में शायद ही मिले वह है "पुद्गल". ऐसा पदार्थ जो बनता है और
> >> उसी क्षण
> >> नष्ट भी होता है और बनता है. हमारा ब्रह्मांड ऐसा ही है. दर्शन में
> >> संशय को भी
> >> स्थान है. जैन साधू असत्य कहे जाने से लगने वाले "पाप" से बचने के
> >> लिए "लखाव'ह"
> >> जैसा शब्द प्रयोग करते है यानी "मुझे लगता है (शायद)ऐसा हो रहा है".
> >> जैसे यह
> >> मेल सभी सदस्यों को जाती हुई लखाव'ह.
>
> >> यह बातें अस्थान हो सकती है मगर कुछ शब्दों से परिचय तो हो गया ना
> >> :)
>
> >> २० अगस्त २०१० ४:२३ अपराह्न को, अभय तिवारी <abhay...@gmail.com
> >> <mailto:abhay...@gmail.com>> ने लिखा:
> ...
>
> और पढ़ें »- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
> फिर विषयान्तर हो रहा है....
विषयान्तर ये हुआ है कि अब हम पाँच सात आकाश आसमानों पर नहीं, बल्कि दो शब्दों दर्शन
और धर्म पर चर्चा कर रहे हैं। फिर भी यह शब्द चर्चा ही है।
रावत
> *दर्शन* (Phylosphy) वह ज्ञान है जो परम सत्य और प्रकृति के सिद्धांतों और उनके कारणों
> की विवेचना करता है। दर्शन यथार्थता की परख के लिये एक दृष्टिकोण है।
उपरोक्त में "परम सत्य" निकाल दें, तब यह अधिक व्यापक बन जाता है। राजनीतिक दर्शनों
में किसी परम सत्य की विवेचना नहीं होती फिर भी वो दर्शन ही हैं।
> *धर्म* (मज़हब) किसी एक या अधिक परलौकिक शक्ति में विश्वास और इसके साथ-साथ उसके
> साथ जुड़ी रिति, रिवाज़, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह है ।
> दोनों उत्तर विकिपीडिया से हैं।
क्या इनका लिंक दीजिएगा?
रावत
>
> 2010/8/20 V S Rawat <vsr...@gmail.com <mailto:vsr...@gmail.com>>
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>>
> *Sent:* Friday, August 20, 2010 4:52 PM
> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
>
> विषयांतर हो रहा है, मगर जानना चाहुंगा दर्शन और धर्म कैसे अलग हैं? दर्शन
> ही धर्म
> का ढ़ांचा है. नहीं? या फिर मैं चुक कर रहा हूँ?
>
>
>
>
>
> --
> दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
> Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
> *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ... अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/> तीसरा खंबा
> <http://teesarakhamba.blogspot.com/>*
>
> बात शब्द चर्चा से बहुत दूर चले गई, ऐसा अक्सर होता है. थोडा दूर जाना तो
> स्वभावक है लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि बहस आखिर शब्दों पर ही ख़त्म
> हो. धर्म और दर्शन की बातें का अन्त नहीं हो सकता, और यह धर्म और दर्शन
> का फोरम नहीं है.
> बलजीत बासी
बलजीत जी,
दो शब्दों "धर्म" और "दर्शन" पर शब्द चर्चा हो रही है। इसमें क्या ग़लत हो गया?
रावत
पाले को न पालें तो ही बेहतर!
----- Original Message -----
From: "V S Rawat" <vsr...@gmail.com>
To: <shabdc...@googlegroups.com>
Sent: Friday, August 20, 2010 6:17 PM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश

On 20 अग, 09:23, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> हां, है तो यह भी शब्दचर्चा ही।
> एक नया शब्द* हंगालाना *
> मिला।
> क्या बासीजी *खंगालना *लिखना चाहते थे[?]
> कृपया इसे नुक्ताचीनी न समझें।
>
> 2010/8/20 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
>
>
>
>
> > बात इतनी सी है कि धर्म और दर्शन के अर्थ पर नहीं हम उसके परिभाषाओं पर बात कर
> > रहे हैं.. और उसमें भी चर्चा से अधिक तर्क-वितर्क हो रहा है, बहस हो रही है।
> > बहसबाज़ी करने वाले मोहल्ले दूसरे हैं भाई, बहस में पाले तय रहते हैं। यहाँ कोई
> > पाला नहीं है। शब्द हैं, अर्थ हैं और उनके बीच में हम हैं।
>
> > पाले को न पालें तो ही बेहतर!
>
> > ----- Original Message ----- From: "V S Rawat" <vsra...@gmail.com>
> > To: <shabdc...@googlegroups.com>
> > Sent: Friday, August 20, 2010 6:17 PM
>
> > Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
>
> > On 8/20/2010 6:13 PM India Time, _Baljit Basi_ wrote:
>
> >> बात शब्द चर्चा से बहुत दूर चले गई, ऐसा अक्सर होता है. थोडा दूर जाना तो
> >>> स्वभावक है लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि बहस आखिर शब्दों पर ही ख़त्म
> >>> हो. धर्म और दर्शन की बातें का अन्त नहीं हो सकता, और यह धर्म और दर्शन
> >>> का फोरम नहीं है.
> >>> बलजीत बासी
>
> >> बलजीत जी,
>
> >> दो शब्दों "धर्म" और "दर्शन" पर शब्द चर्चा हो रही है। इसमें क्या ग़लत हो
> >> गया?
>
> >> रावत
>
> --
> शुभकामनाओं सहित
> अजितhttp://shabdavali.blogspot.com/
>
> 360.gif
> < 1Kदेखेंडाउनलोड करें- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
> चर्चा में थोड़ा-बहुत आगे निकल जाना स्वाभाविक है, जायज़ और वांछित भी. अन्यथा सूखे शब्दों
> का पिटारा किसे रास आने वाला है?
>
> चर्चा-रत मानव मस्तिष्कों से इक्के/तांगे मे जुते घोड़ों (जिनकी आंखें दोनों तरफ़ से अवरुद्ध कर
> दी जाती हैं ताकि दृष्टि केवल आगे पथ तक ही सींमित रहे) जैसे व्यवहार की अपेक्षा करना
> ज्यादती है.
>
> चर्चा को वृहद और विस्तृत रूप में देखना ज्यादा रुचिकर होगा. बस कोई अप्रिय स्थिति न
> बनने पाए.
>
> मैं रावत जी का समर्थन करता हूं.
धन्यवाद।
हर शब्द का सरल अर्थ नहीं होता है जिसकी चर्चा करके हम उसको समझ सकें। प्रॉपर नाउन
को हम कह सकते हैं कि गंगा नदी का नाम है, हिमालय पहाड़ का नाम है, परंतु नाम के
अलावा किन्हीं भी शब्दों को समझने के लिए उनकी पूरी व्याख्याओं को समझना पड़ता है
अन्यथा ऐसे शब्दों की चर्चा पूरी नहीं हो सकती है।
जैसे विज्ञान में स्पीड के लिए चाल और वेलोसिटी के लिए वेग शब्द का प्रयोग किया जाता
है। अब, ये सब समानार्थक हैं परंतु भौतिकी में स्पीड या चाल वेक्टर नहीं है, जबकि
वेलोसिटी या वेग वेक्टर मात्राएँ या परिमाण हैं। इसलिए उस संदर्भ में इनके अंतर को समझने
के लिए पहले वेक्टर क्या होता है, यह समझना पड़ेगा।
परंतु, नेट का प्रयोग अधिकतर छोटी-मोटी चर्चाओं के लिए किया जाता है, उथली चर्चाएँ
होती हैं नेट पर, फिर जब लोग उस विषय अपना-अपना ज्ञान बधार चुके होते हैं तो वे उस
विषय से उकता जाते हैं, और किसी नए विषय को खोज लेते हैं जिस पर और ज्ञान बघारा जा
सकता है। ज़्यादातर यही हो रहा है। सात और पाँच आसमानों के नाम दे दिए, या अंग्रेज़ी
वाले चार स्फ़ीअरों के नाम दे दिए, तो कुछ लोगों के लिए चर्चा समाप्त हो गई। परंतु मेरे
लिए ये अधूरी जानकारी है जब तक मुझे नहीं पता चलता कि इन सात पाँच चार आसमानों के
गुण क्या हैं, इनको किस आधार पर एक दूसरे से पृथक किया गया है।
ख़ैर, यहाँ पर बहुमत "बपुरा बूढन" लोगों का है जो "रहे किनारे बैठ" में सुविधा अनुभव करते
हैं तो मैं किसी को मानस मंथन के लिए बाध्य तो नहीं कर सकता। जितनी चर्चा यहाँ हो
जाए, वो यहाँ से ले लेता हूँ, बाकी जिज्ञासा नेट पर दूसरी जगह जा कर शांत करूँगा।
इंदौर में एक कहावत है,"नहीं मामा से काना मामा अच्छा होता है", जिसका समीपतम
अंग्रेज़ी पर्याय है समथिंग इस बैटर दैन नथिंग। पता नहीं क्यों ये कहावत याद आ गई।
रावत
>
> 2010/8/20 Baljit Basi <balji...@yahoo.com <mailto:balji...@yahoo.com>>
>
> बात शब्द चर्चा से बहुत दूर चले गई, ऐसा अक्सर होता है. थोडा दूर जाना तो
> स्वभावक है लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि बहस आखिर शब्दों पर ही ख़त्म
> हो. धर्म और दर्शन की बातें का अन्त नहीं हो सकता, और यह धर्म और दर्शन
> का फोरम नहीं है.
> बलजीत बासी
>
>
> On 20 अग, 08:12, "Abhay Tiwari" <abhay...@gmail.com
> > >> <mailto:abhay...@gmail.com <mailto:abhay...@gmail.com>>> ने लिखा:
> >
> > >> दर्शन में संशय को स्थान है धर्म में नहीं। जैन दर्शन के स्यादवाद की
> > >> अच्छी याद दिलाई।
> > >> वो बहुत कुछ उत्तरआधुनिकता जैसा है।
> >
> > >> ----- Original Message -----
> > >> *From:* संजय | sanjay <mailto:sanjaybeng...@gmail.com
> <mailto:sanjaybeng...@gmail.com>>
> > >> *To:* shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>
> > >> <mailto:shabdc...@googlegroups.com
> <mailto:shabdc...@googlegroups.com>>
> > >> *Sent:* Friday, August 20, 2010 4:34 PM
> > >> *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश
> >
> > >> जैनों में संशय के लिए स्यातवाद जैसी चीज है. वहीं एक शब्द जो
> > >> अद्भूत है और किसी
> > >> भाषा में शायद ही मिले वह है "पुद्गल". ऐसा पदार्थ जो बनता है और
> > >> उसी क्षण
> > >> नष्ट भी होता है और बनता है. हमारा ब्रह्मांड ऐसा ही है. दर्शन में
> > >> संशय को भी
> > >> स्थान है. जैन साधू असत्य कहे जाने से लगने वाले "पाप" से बचने के
> > >> लिए "लखाव'ह"
> > >> जैसा शब्द प्रयोग करते है यानी "मुझे लगता है (शायद)ऐसा हो रहा है".
> > >> जैसे यह
> > >> मेल सभी सदस्यों को जाती हुई लखाव'ह.
> >
> > >> यह बातें अस्थान हो सकती है मगर कुछ शब्दों से परिचय तो हो गया ना
> > >> :)
> >
> > >> २० अगस्त २०१० ४:२३ अपराह्न को, अभय तिवारी
> <abhay...@gmail.com <mailto:abhay...@gmail.com>
> > >> <mailto:abhay...@gmail.com <mailto:abhay...@gmail.com>>> ने लिखा:
> > >> <mailto:wadnerkar.a...@gmail.com
> <mailto:wadnerkar.a...@gmail.com>>> wrote:
> > >> > क्या कहिए बलजीत भाई[?]
> >
> > >> > 2010/8/19 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com
> <mailto:baljit_b...@yahoo.com>
> > >> <mailto:baljit_b...@yahoo.com <mailto:baljit_b...@yahoo.com>>>
> रावतजी कृपया बताएं कि हिन्दू धर्म किस दर्शन पर आधारित है.
आपने ग़लत व्यक्ति को संबोधित कर दिया, आशुतोष जी।
मैं हिन्दू धर्म या किसी अन्य धर्म या किसी भी दर्शन को समझाने नहीं जा रहा था।
मैं केवल चर्चा कर रहा था कि धर्म शब्द का अर्थ या व्याख्या क्या है, दर्शन क्या है,
नैतिकता क्या है, ये सब शब्द किस प्रकार एक दूसरे से जुड़े और एक दूसरे से अलग हैं।
चर्चा में उदाहरण आते हैं, जो किसी मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए दिए जाते हैं। उन
उदाहरणों का अर्थ उस धर्म की बात करना नहीं है। जैसे यदि किसी को लगता है कि इंसान
को अल्लाह की इबादत करने के लिए बनाया जाना बहुत बड़ा दर्शन है, तो उस व्यक्ति को
जैन और बुध धर्मों के अपरिग्रह इत्यादि पाँच मौलिक सिद्धांतों की तुलना इस्लाम के चार
मौलित सिद्धांतों (कलमे पर विश्वास करना, रोज़ पाँचों नमाज़ें पढ़ना, ज़िंदग़ी में कम से कम
एक बार हज करना, दान ज़कात देना) से करें तो समझ जाएँगे कि दर्शन पर आधारित धर्म
कौन सा है।
मैं हिन्दू जैन बुध इसाई धर्मों पर चर्चा करने उनके समूहों में जाऊँगा। इस्लाम पर तो मैं बहुत
चर्चाएँ करता रहता हूँ विभिन्न समूहों में, मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद, गाँधीवाद, आदि पर
चर्चाएँ करने उन विषयों के समूह में जाऊँगा।
परंतु मुझे लगा था कि क्योंकि ये भी शब्द हैं इसलिए इनमें समानता और विभिन्नता और उनकी
व्याख्याओं पर चर्चा इस समूह में हो सकती है, इसलिए यहाँ करने लगा था, परंतु अब जब
बता दिया गया है कि यहाँ कहाँ तक चर्चा करनी है, तो अगर मैं उस लक्ष्मण रेखा को पार
करूँगा तो रावण मेरा अपहरण कर ले जाएगा।
रावत
----- Original Message -----From: ashutosh kumarSent: Friday, August 20, 2010 10:29 PMSubject: Re: [शब्द चर्चा] Re: सात आसमान और पाँच आकाश