जघन्य और नृशंस

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eg

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Dec 29, 2012, 10:12:05 PM12/29/12
to shabdc...@googlegroups.com
कृपया 'जघन्य' और 'नृशंस' शब्दों के उत्स और प्रयोग पर प्रकाश डालें। 

धन्यवाद। 

Baljit Basi

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Dec 30, 2012, 2:49:43 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
जघन्य' का सम्बन्ध 'जाँघ' से हो सकता है? जघन्य के मुख्य अर्थ अंतिम;
अत्यंत बुरा और नीच जाती अथवा शूद्र है। जांघ को शरीर का निचला भाग
माना गया है इस लिए इसका अर्थ अंतिम बना । आगे इसका अर्थ बना जो जांघ
से पैदा हुआ। नीचे से पैदा होने के कारण वह शूद्र है और शूद्र को करूर
माना जाता है इसलिए इसका अर्थ करूर है। यह मेरा अनुमान है।

दिनेशराय द्विवेदी

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Dec 30, 2012, 3:03:15 AM12/30/12
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जघन्य का अर्थ आप्टे ने सब से पिछला, अंतिम, सब से बुरा, अत्यन्त दुष्ट, कमीना, अधम, निन्द्य और शूद्र ही दिया है।

2012/12/30 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

अजित वडनेरकर

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Dec 30, 2012, 3:06:26 AM12/30/12
to shabdc...@googlegroups.com
यही है ।


2012/12/30 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

दिनेशराय द्विवेदी

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Dec 30, 2012, 3:14:09 AM12/30/12
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नृशंस का अर्थ भी लगभग वही है जो जघन्य का है नृ का अर्थ एक नर या मादा मनुष्य, शस् का अर्थ काटना, मारना, नष्ट करना है और अण् का अर्थ तुच्छ है। नृ+शस्+अण् से यह शब्द बना है। इस का अर्थ मनुष्य को काटना, मारना या नष्ट करना होना चाहिए।

2012/12/30 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

Baljit Basi

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Dec 30, 2012, 3:19:22 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
अजित जी आप कुछ और व्याख्या करें . निषाद भी एक नीच अनार्य जाती मानी गई
है और इसको भी जांघ से उत्पन्न माना गया है।मिताक्षरा में यह जाति क्रूर
और पापी कही गई है। संगीत के सात स्वरों में यह अंतिम है।


On 30 दिस., 03:06, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> यही है ।
>

> 2012/12/30 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > जघन्य का अर्थ आप्टे ने सब से पिछला, अंतिम, सब से बुरा, अत्यन्त दुष्ट,
> > कमीना, अधम, निन्द्य और शूद्र ही दिया है।
>

> > 2012/12/30 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
> >> जघन्य' का सम्बन्ध 'जाँघ'  से हो सकता है? जघन्य के मुख्य अर्थ अंतिम;
> >> अत्यंत बुरा और  नीच जाती अथवा शूद्र है। जांघ  को शरीर का निचला भाग
> >> माना गया है इस लिए इसका अर्थ अंतिम बना । आगे  इसका अर्थ   बना जो जांघ
> >> से पैदा हुआ। नीचे से पैदा होने के कारण वह शूद्र है और शूद्र को करूर
> >> माना  जाता है इसलिए इसका अर्थ करूर है। यह मेरा अनुमान है।
>
> >> On 29 दिस., 22:12, eg <girijesh...@gmail.com> wrote:
> >> > कृपया 'जघन्य' और 'नृशंस' शब्दों के उत्स और प्रयोग पर प्रकाश डालें।
>
> >> > धन्यवाद।
>
> > --

> > *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
> > Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
> > *क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत <http://anvarat.blogspot.com/>    तीसरा
> > खंबा <http://teesarakhamba.com/>*
>
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> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
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Baljit Basi

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Dec 30, 2012, 3:26:37 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
शस् का अर्थ काटना, मारना, नष्ट करना तो है लेकिन मुख्य अर्थ सिफत करना
है (प्रशंसा में यह अंश झलक रहा है।) मैं दोनों का जोड़ नहीं बैठा पा
रहा।

On 30 दिस., 03:14, दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com> wrote:
> नृशंस का अर्थ भी लगभग वही है जो जघन्य का है नृ का अर्थ एक नर या मादा
> मनुष्य, शस् का अर्थ काटना, मारना, नष्ट करना है और अण् का अर्थ तुच्छ है।
> नृ+शस्+अण् से यह शब्द बना है। इस का अर्थ मनुष्य को काटना, मारना या नष्ट
> करना होना चाहिए।
>

> 2012/12/30 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


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> > जघन्य का अर्थ आप्टे ने सब से पिछला, अंतिम, सब से बुरा, अत्यन्त दुष्ट,
> > कमीना, अधम, निन्द्य और शूद्र ही दिया है।
>

> > 2012/12/30 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
> >> जघन्य' का सम्बन्ध 'जाँघ'  से हो सकता है? जघन्य के मुख्य अर्थ अंतिम;
> >> अत्यंत बुरा और  नीच जाती अथवा शूद्र है। जांघ  को शरीर का निचला भाग
> >> माना गया है इस लिए इसका अर्थ अंतिम बना । आगे  इसका अर्थ   बना जो जांघ
> >> से पैदा हुआ। नीचे से पैदा होने के कारण वह शूद्र है और शूद्र को करूर
> >> माना  जाता है इसलिए इसका अर्थ करूर है। यह मेरा अनुमान है।
>
> >> On 29 दिस., 22:12, eg <girijesh...@gmail.com> wrote:
> >> > कृपया 'जघन्य' और 'नृशंस' शब्दों के उत्स और प्रयोग पर प्रकाश डालें।
>
> >> > धन्यवाद।
>
> > --

> > *दिनेशराय द्विवेदी, *कोटा, राजस्थान, भारत
> > Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,


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> > खंबा <http://teesarakhamba.com/>*
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> खंबा <http://teesarakhamba.com/>*- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

अजित वडनेरकर

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Dec 30, 2012, 3:27:58 AM12/30/12
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जी कोशिश करता हूँ ।। कुछ वक़्त दीजिए । वर्षान्त की अतिव्यस्तता है फ़िलहाल ।

2012/12/30 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Baljit Basi

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Dec 30, 2012, 3:35:18 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
वर्षान्त* में भी अंतिम होने का भाव झलक रहा है। क्या इसको शुभ माना
जाये या जघन्य अथवा निषाद? (मैं शब्दों से खेल ही रहा हूँ, कुछ और अर्थ
मत लेना।)


On 30 दिस., 03:27, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> जी कोशिश करता हूँ ।। कुछ वक़्त दीजिए । वर्षान्त की अतिव्यस्तता है फ़िलहाल ।
>

> 2012/12/30 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

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Dec 30, 2012, 3:48:46 AM12/30/12
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मेरे हिसाब से अन्त एक नैसर्गिक क्रिया है सो शुभ ही है ।
किसी दुष्ट के हाथों ऋषि का अन्त नैसर्गिक नहीं है
पर वीर के हाथों दुष्ट का अन्त नैसर्गिक है ।
सो यह वाक्य प्रयोग कि दुष्ट ने ऋषि का अन्त कर दिया ग़लत होगा यहाँ ऋषि की हत्या ज्यादा उचित होगा ।
हाँ वीर ने दुष्ट का अन्त कर दिया प्रयोग भी सही है ।

हम सबके लिए वर्षान्त हमेशा ही शुभ लक्षण है:)


2012/12/30 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



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अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Baljit Basi

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Dec 30, 2012, 4:01:39 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
बहस का कोई अंत नहीं होता . आपकी बातों से हम कुछ सीखते हैं ... शुभ
वर्षान्त


On 30 दिस., 03:48, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> मेरे हिसाब से अन्त एक नैसर्गिक क्रिया है सो शुभ ही है ।
> किसी दुष्ट के हाथों ऋषि का अन्त नैसर्गिक नहीं है
> पर वीर के हाथों दुष्ट का अन्त नैसर्गिक है ।
> सो यह वाक्य प्रयोग कि दुष्ट ने ऋषि का अन्त कर दिया ग़लत होगा यहाँ ऋषि की
> हत्या ज्यादा उचित होगा ।
> हाँ वीर ने दुष्ट का अन्त कर दिया प्रयोग भी सही है ।
>
> हम सबके लिए वर्षान्त हमेशा ही शुभ लक्षण है:)
>

> 2012/12/30 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

Abhay Tiwari

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Dec 30, 2012, 8:33:18 AM12/30/12
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श्रीमद् भागवत में ध्ुव वंशीय राजा वेन की कथा आती है- राजा वेन वीर और पराक्रमी तो था मगर यज्ञविरोधी भी। तब मुनियों में मिलकर अपनी हुंकार से उसे मार डाला। किसी राजा के न रहने से सब तरफ अराजकता फैल गई। तो मुनियों ने मिलकर राजा वेन के शव (उसकी माँ शव की रक्षा कर रही थी) की जंघा को मथा तो एक बौना और काला पुरुष पैदा हुआ। उसने दीन भाव से ऋषियों से पूछा - मैं क्या करूं? तो ऋषियों ने कहा- निषीद! यानी बैठ जा। इसलिए वो और उसके वंशज निषाद कहलाए।  ऋषियों ने उसे राजा नहीं बनाया। वेन राजा के शव की भुजा को मथा तो एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा पैदा हुआ। पुरुष अागे चलकर कृषिक्रांति करने का श्रेय रखने वाला राजा पृथु हुआ और स्त्री उसकी पत्नी अर्चि। 

निषाद का सम्बंध भी जंघा से निकल रहा है हालांकि ये व्युत्पत्ति बहुत विश्वसनीय नहीं लगती। सम्भव है इस नाम का कोई और स्रोत हो और ब्राह्मणों ने उसे अपनी सुविधानुसार ढाल लिया है।  

2012/12/30 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

हंसराज सुज्ञ

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Dec 30, 2012, 11:30:14 AM12/30/12
to शब्द चर्चा

जैन पारिभाषिक शब्दावली में जघन्य का अर्थ "सब से बुरा, अत्यन्त दुष्ट, कमीना, अधम, निन्द्य और शूद्र" नहीं है. यहाँ जघन्य का अर्थ न्यूनतम है. कम से कम के लिए जघन्य और उच्चतम  या अधिक से अधिक के लिए उत्कृष्ट शब्द बहु-प्रचलित है. प्रचीन जैन साहित्य में यही प्रयोग हुआ है. और यह अंतिम के निकट हो सकता है. लेकिन जंघा से इसका कोई सम्बंध दृऋष्टिगोचर नहीं होता. जैन शब्दावली में देवो की अथवा तीर्थंकरो आदि की न्यूनत सँख्या दर्शाने के लिए इस रह  वाक्य प्रयोग हुआ है. अतः मेरा अनुमान है कि जघन्य का प्रारम्भिक अर्थ तो न्यूनतम ही है किंतु अर्थ विस्तार हल्के से हल्का, बुरे से बुरा, ओछे से ओछा में हुआ है. और यहीँ से आगे चलकर "सब से बुरा, अत्यन्त दुष्ट, कमीना, अधम, निन्द्य और शूद्र के अभिप्राय की तरफढा है.


 सविनय,
हंसराज "सुज्ञ"

&#2360;&#2369;&#2332;&#2381;&#2334;



दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 30, 2012, 11:36:22 AM12/30/12
to shabdc...@googlegroups.com
जघन्य शब्द संस्कृत से आता है। जैन शब्दावली में संस्कृत कहाँ है। पालि में वह अर्थ हो सकता है जो आप ने बताया है।


2012/12/30 हंसराज सुज्ञ <hansra...@msn.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
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devendra pandey

unread,
Dec 30, 2012, 11:39:43 AM12/30/12
to shabdc...@googlegroups.com
हम्म...

2012/12/30 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>



--
Dk

हंसराज सुज्ञ

unread,
Dec 30, 2012, 11:58:04 AM12/30/12
to शब्द चर्चा
जैन साहित्य पालि में नहीं, बल्कि प्राकृ प्रमुख 'अर्ध-माधी' में है. और प्राकृत व संस्कृत होने से शब्दावली अलग नहीं हो जाती. मात्र लोक-भाषा और संस्कारित भाषा का ही अंतर है.

From: drdwi...@gmail.com
Date: Sun, 30 Dec 2012 22:06:22 +0530
Subject: Re: [शब्द चर्चा] Re: जघन्य और नृशंस
To: shabdc...@googlegroups.com

दिनेशराय द्विवेदी

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Dec 30, 2012, 11:59:55 AM12/30/12
to shabdc...@googlegroups.com
मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि जघन्य शब्द जैन साहित्य से अधिक पुराना हो सकता है।

हंसराज सुज्ञ

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Dec 30, 2012, 12:12:18 PM12/30/12
to शब्द चर्चा

शब्द को नया पुराना साबित करने के साक्ष्यों में अपना हाथ तंग है :)

From: drdwi...@gmail.com
Date: Sun, 30 Dec 2012 22:29:55 +0530

Abhay Tiwari

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Dec 30, 2012, 10:10:23 PM12/30/12
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जघन और जंघा दो भिन्न शब्द मिलते हैं शब्दकोष में.. जघन का अर्थ दिया है कूल्हा या पुट्ठा- जो शरीर का सबसे पिछला भाग है- और सेना का पिछला भाग; जंघा का अर्थ मिलता है टखने से घुटने तक का भाग यानी पिण्डली। हालांकि ये जंघा के लोकप्रिय अर्थ से अलग है। 

जघन्य जो जघन से बना है, का अर्थ 'अन्तिम', सबसे पिछला होने के कारण से ही है।  


अजित वडनेरकर

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Dec 31, 2012, 1:27:19 AM12/31/12
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प्राकृतों के अनेक रूप रहे हैं । वैदिक भाषा के वक़्त भी प्राकृतें थीं । कई शब्द हैं जो प्राकृत और छांदस में एक समान हैं । इसी तरह एक ही शब्द के कई रूप संस्कृत में भी मिलते हैं ।

2012/12/31 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

जघन और जंघा दो भिन्न शब्द मिलते हैं शब्दकोष में.. जघन का अर्थ दिया है कूल्हा या पुट्ठा- जो शरीर का सबसे पिछला भाग है- और सेना का पिछला भाग; जंघा का अर्थ मिलता है टखने से घुटने तक का भाग यानी पिण्डली। हालांकि ये जंघा के लोकप्रिय अर्थ से अलग है। 

जघन्य जो जघन से बना है, का अर्थ 'अन्तिम', सबसे पिछला होने के कारण से ही है।  





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अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

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