धाँसू

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Baljit Basi

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Aug 24, 2011, 8:56:56 AM8/24/11
to शब्द चर्चा
धाँसू शब्द का आज कल बहुत प्रचलन है. यह पंजाबी में भी आ गया है. इसका
जन्म स्थान कहाँ है?

Umesh Vats

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Aug 24, 2011, 10:33:17 AM8/24/11
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बलजीत जी , धाँसू शब्द बाँगर अर्थात् हिसार में पैदा हुआ जिसका अर्थ रहा कि  जो हर किसी को धंसाने की ताकत रखे। अर्थात् हराने की शक्ति रखे।

2011/8/24 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

धाँसू शब्द का आज कल बहुत प्रचलन है. यह पंजाबी में भी आ गया है. इसका
जन्म स्थान कहाँ है?



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भवदीय:
उमेश प्रताप वत्स
9416966424

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 11:55:13 AM8/24/11
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बलजीत प्राजी,
इस शब्द पर सफ़र की पोस्ट कतार में हैं। इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के ध्वंस् से हुई है।
धाँसू शब्द की विभिन्न अर्थछटाएँ हैं जिनमें छा जाना, नष्ट कर देना, छेद देना, गाड़ देना, धंसना, तबाह करना, तबाह होना, बर्बाद करना आदि अनेक भाव हैं।

धाँसू शब्द हिन्दी की विभिन्न शैलियों में प्रचलित है। इसके अलावा गुजराती और मराठी में भी इसके धासू और धासने जैसे रूप हैं जिसमें अनुनासिकता नहीं है।
धाँसू मालवी की पुराना शब्द है। जैसा कि माना  जा रहा है, बोलचाल की हिन्दी का यह नया पद नहीं है। टर्नर के कोश में भी इसका उल्लेख है।

आज की हिन्दी में समा चुका बिन्दास शब्द जिस तरह मराठी के बिनधास्त का रूपांतर है उसी तरह धाँसू का मूल क्षेत्र नहीं बताया जा सकता क्योंकि ध्वंस् से यह अलग अलग बोलियों में अलग अलग रूपों में विकसित हुआ है।

बड़े धाँसू लग रहे हो, क्या धाँसू चीज़ है, धाँसू डायलॉग हैं, धाँस काम किया है वगैरह वगैरह वाक्यों में कुल मिलाकर वर्तमान परिस्थिति में छा जाने का भाव ही उभर रहा है।
छा जाना सापेक्ष भाव है अर्थात धाँसू लगने के साथ ही किसी अन्य चीज़ या पद की हीनता भी स्पष्ट हुई है। किसी एक का धाँसुत्व दूसरे पर छा जाने के लिए ही है। किसी एक का प्रभाव दूसरे के निस्तेज ही करता है।

सादर,
अजित




2011/8/24 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

धाँसू शब्द का आज कल बहुत प्रचलन है. यह पंजाबी में भी आ गया है. इसका
जन्म स्थान कहाँ है?



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अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-
औरंगाबाद- 07507777230

  


ePandit | ई-पण्डित

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Aug 24, 2011, 12:00:13 PM8/24/11
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व्यंग्यकार आलोक पुराणिक जी का शब्द याद आ रहा है। किसी बेहतरीन लेख पर टिप्पणी में वे यह लिखते हैं।

धाँसू च फाँसू

२४ अगस्त २०११ ९:२५ अपराह्न को, भाई भोपाली <wadnerk...@gmail.com> ने लिखा:



--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.

ePandit: http://epandit.shrish.in/

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 12:01:18 PM8/24/11
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2011/8/24 Umesh Vats <umesh...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Aug 24, 2011, 12:02:15 PM8/24/11
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धंसना का पैठने के अलावा एक अर्थ 'मन में गहरा प्रभाव पैदा करना' भी है। धंसान
और धंसाव और धांस जैसे शब्द इसी धंसना से बने हैं। रसाल के कोश मे धांस का अर्थ
मिर्च आदि की गंध की तेजी लगना है। धांसू, धांस से ही बना मालूम देता है।

रसाल जी के अनुसार धंसना, दंश से बना है.. मुमकिन है.. श का ह निकलकर द के साथ
लगकर ध बन गया..

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 12:27:41 PM8/24/11
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अभय भाई,
धँसना को मैं धाँसू से नहीं जोड़ रहा बल्कि धाँसू की एक अर्थछटा के तौर पर उसका उल्लेख आया है।
दंश में काटना, चुभना, तीक्ष्णता जैसे भाव प्रमुख हैं।

आप बरास्ता धँसना,   धाँसू की व्युत्पत्ति खोज रहे हैं और रसाल जी धँसना को दंश से बताते हैं। मगर प्रश्न तब भी धाँसू का है। वे क्या कहते हैं इसके बारे में ?
हिन्दी शब्दसागर में धँसना के दो क्रिया रूप हैं जिसमें एक धँसना की व्युत्पत्ति दंश है और दूसरी क्रिया की व्युत्पत्ति ध्वंस् से मानी गई है। इस तरह यह सवाल भी है कि रसाल जी से कौन सा धँसना छूट रहा है? क्योंकि दंश वाले धँसना का धाँसू से रिश्ता मुझे अभी समझ नहीं आ रहा है।

ध्वंस् में निहित भावों का विस्तार धाँसू में हुआ है।
टर्नर ने भी ध्वंस से ही धाँसू की व्युत्पत्ति बताई है और मैं फ़िलहाल ध्वंस के साथ हूँ।

सादर,
अजित



2011/8/24 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Aug 24, 2011, 12:42:10 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
धंसना का पैठने के अलावा एक अर्थ 'मन में गहरा प्रभाव पैदा करना' भी है। धंसान और धंसाव और धांस जैसे शब्द इसी धंसना से बने हैं। रसाल के कोश मे धांस का अर्थ मिर्च आदि की गंध की तेजी लगना है। धांसू, धांस से ही बना मालूम देता है।

Abhay Tiwari

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Aug 24, 2011, 12:44:14 PM8/24/11
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धांसू शब्द रसाल जी के कोश में नहीं मिलता। शायद यह शब्द तब तक लोकप्रिय नहीं हुआ था।
----- Original Message -----
Sent: Wednesday, August 24, 2011 9:57 PM

Abhay Tiwari

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Aug 24, 2011, 12:50:40 PM8/24/11
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धंसना मोटे तौर पर ध्वंस से जुड़ता दिखाई देता है और धाँसू धाँस से.. अब सवाल धाँस का है.. ??
----- Original Message -----
Sent: Wednesday, August 24, 2011 9:57 PM

Rangnath Singh

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Aug 24, 2011, 12:58:58 PM8/24/11
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बनारस में अपने बचपन से मैं धांसू का प्रयोग शानदार,जबरदस्त इत्यादि के अर्थ में सुनते-करते आया हूँ. लोग किसी बहुत बढ़िया चीज को धांसू कहते हैं.  

Rangnath Singh

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Aug 24, 2011, 1:00:53 PM8/24/11
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बहुत ही आम है ये बनारस में ये कहना कि बहुत धांसू फिल्म थी, बहुत धांसू रैली थी, बहुत धांसू किताब थी.... मतलब, जिस चीज कि बात हो रही है वो बहुत अच्छी थी.

2011/8/24 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>

eg

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Aug 24, 2011, 1:04:24 PM8/24/11
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मुझे तो यह देसज भदेस प्रयोग लगता है जिसका सम्बन्ध सम्भोग के दौरान प्रवेश की गहराई से जुड़ता है। जितना धँसे उतना ही आनन्ददायी, माने इफेक्टिव। भद्र जनों को बुरा लगे तो मिटा दीजियेगा। 

2011/8/24 Rangnath Singh <rangna...@gmail.com>

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 1:11:54 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
अभय भाई,
धांसू शब्द रसाल जी के कोश में नहीं मिलता। शायद यह शब्द तब तक लोकप्रिय नहीं हुआ था।
बात गले नहीं उतरती। रसालजी और टर्नर लगभग समकालीन थे, समवयस्क अलबत्ता नहीं थे।
टर्नर रसालजी से कुछ वर्ष बड़े ही थे। टर्नर जहाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके थे वहीं
रसालजी ने सागर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया था।

उम्र में बड़े होने के बावजूद जब टर्नर धाँसू की उपस्थिति को तत्कालीन ब्रज, मालवी, गुजराती और मराठी में देखते हैं ठीक उसी समय
रसाल जी को धाँसू शब्द न मिलना आश्चर्यजनक है। ऐसे में आपका यह कहना कि- शायद तब तक यह शब्द लोकप्रिय नहीं हुआ था, सरलीकरण है।

टर्नर ध्वंस् से धाँसू को सौदाहरण जोड़ रहे हैं।


सादर,
अजित




2011/8/24 eg <girij...@gmail.com>

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 1:14:27 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
पुनश्चः
काशी में रहने की वजह से पुरबिया बोलियों में भी धाँसू की मौजूदगी उन्हें मिली ही होगी, यह कहने की ज़रूरत नहीं है। रसाल जी तो शायद पूरब के ही थे।
निश्चित ही यह शब्द उनसे छूटा होगा या इसके बारे में उन्होंने कोई राय नहीं बनाई होगी।

2011/8/24 भाई भोपाली <wadnerk...@gmail.com>

Abhay Tiwari

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Aug 24, 2011, 1:28:31 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
मैंने तो शायद ही कहा.. सरलीकरण तो तब होता जब मैं निश्चय से कहता..
 
दूसरी बात यह कि मेरी सूचना के अनुसार टर्नर साहब का कोश 1962 का है जबकि रसाल जी का कोश 1936 का..

अभय तिवारी

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Aug 24, 2011, 1:39:27 PM8/24/11
to शब्द चर्चा
1962 भी नहीं 1966 में .. मतलब दोनों कोशों के प्रकाशन में तीस सेल का
अन्तर है..

http://en.wikipedia.org/wiki/Ralph_Lilley_Turner

भाई भोपाली

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Aug 24, 2011, 1:39:44 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
मैं कन्फ्यूज़ हूं अभय भाई और जल्दबाज भी।

इत्मीनान से देख भाल कर ही  कुछ कहना चाहिए,
और इस मंच पर अक्सर मैं जल्दबाजी कर जाता हूँ।
खैर, मैने भी कोई ठोस राय नहीं बनाई है। ऐसा होता तो
सफ़र में अपनी पोस्ट पूरी कर चुका होता।
कड़ियां अधूरी हैं।
खोज जारी रहे।

शुभरात्रि



2011/8/24 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

ई-स्वामी

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Aug 24, 2011, 2:03:37 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
सज्जनों, 
व्युत्पत्ति और इटिमोलोजी का डिपार्टमेंट एक तरफ़ रख कर बता रहा हूं कि सटीक भदेस प्रयोग और प्रयोगकर्ता के निहितार्थ के आधार पर 
धांसू lachrymatory agent  जो होता है वो है. 
फ़ांसू का संबंध zootoxin से है. 

(अंग्रेजी की विकी देखेंगे आपको भदेसी क्लियर होगा.)

धांसू और फ़ांसू दोनो शुरुआती तौर पर नकारात्मक विशेषण हैं.
धांसू धमाकेदार नही है यह स्पष्ट हो! 
धांसू-च-फ़ांसू कैमिकल वैपन हैं न्यूक्लियर वैपन नही हैं.  धांसू परिवेश को प्रभावित करता है - फ़ांसू न्यूरोटॉक्सिन सा है जिस दिमाग के संपर्क मे आता है उसे प्रभावित करता है. 
जैसे हनुमानाष्टक में है "नाग की फ़ांस सबै सिर डारौ" 

उत्तरकान्वेंटकालीन भदेसियों से लेकर टर्नर गलत हो सकते हैं हम जिन मुहल्लों में पले-बढे उनका सहज-ज्ञान और सटीक प्रयोग सब पर हावी लग रहा है. 
धांसू को धंसाने के अर्थ में या ध्वंस के अर्थ में प्रयोग करना एक भदेसी गलती है. :)

धांसू का मूल धांस मे है फ़ांसू का मूल फ़ांस में है. अब धांस और फ़ांस की व्युत्पत्तियां कहां से हैं गुणीजन जानें.


2011/8/24 भाई भोपाली <wadnerk...@gmail.com>

Rangnath Singh

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Aug 24, 2011, 5:58:06 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
लगता है कि विद्वानों कि मंडली इस शब्द के बनारसी अर्थ को बिलकुल ही ख़ारिज कर देगी :-) क्या इसलिए कि ये यहाँ मौजूद 'संतजनों' के मनुकूल नही है :-) 

2011/8/24 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

ई-स्वामी

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Aug 24, 2011, 7:00:29 PM8/24/11
to shabdc...@googlegroups.com
लगता है कि विद्वानों कि मंडली इस शब्द के बनारसी अर्थ को बिलकुल ही ख़ारिज कर देगी :-) क्या इसलिए कि ये यहाँ मौजूद 'संतजनों' के मनुकूल नही है :-) 
 
अरे नहीं! अलबत्ता जैसा आपने कहा धांसू का अभिप्राय आज जानदार या शानदार के रूप मे लिया जाता है. पॉज़िटिव सेंस में ही लिया जाता है- हर जगह! 
मैं तो बस उसके उस नकारात्मक पक्ष को उभार रहा हूं जो मूलभूत रूप से इन्टेंडेड था. 

मसलन - सचिन तेंडूलकर की ने क्या धांसू बैटिंग की आज! अगर इस बैटिंग की वजह भारत जीता तो कोई और हारा. यहां बैटिंग का धांसू होना किसी और के लिये परेशानी का सबब भी बना या हार का कारण भी बना. तो कहने वाले को किसी की हार में आनन्द आ रहा है. 

बैटिंग करने पर कोई धांस नही उडती - कोई मिर्ची की फ़ैक्टरी नहीं खुलती.. यहां पर वो सेंस ही गायब है - उसका स्थान जरबदस्त वाले भावार्थ ने ले लिया है लेकिन किसी और को उस बैटिंग की प्रोवर्बियल "धांस" लग गई ये कहने का निहितार्थ है, कहने वाले के लिये आनन्द की बात है.

इस बात को हाईलाईट करने की कोशिश कर रहा था. 

Abhishek Avtans

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Aug 25, 2011, 1:46:11 AM8/25/11
to shabdc...@googlegroups.com
जिस तरह धांसू का शाब्दिक अर्थ नकारात्मक होते हुए भी उसका इस्तेमाल सकारात्मक होता है...वैसा ही प्रयोग बांग्ला भाषी "भयंकर" शब्द का करते हैं।
जैसे भयंकर बल्लेबाजी, भयंकर मकान।
इसी तरह का इस्तेमाल बंगाल के सीमावर्ती हिंदी भाषी क्षेत्रों में देखा गया है।
सादर


2011/8/25 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>



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Abhishek Avtans अभिषेक अवतंस

Central Institute of Hindi केंद्रीय हिंदी संस्थान

Agra - 282005, UP, India आगरा -२८२००५, उ.प्र. भारत

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