हरे राम हरे कृष्ण

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Rohit Gurjar

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Feb 14, 2012, 7:24:52 AM2/14/12
to शब्द चर्चा
हरे राम हरे कृष्ण में हरे का क्या मतलब है ?

anamika ghatak

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Feb 14, 2012, 7:26:39 AM2/14/12
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हरि हे  का  अपभ्रंश  लगता  है 

2012/2/14 Rohit Gurjar <rohit...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

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Feb 14, 2012, 7:31:48 AM2/14/12
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हरि यानी विष्णु । हरि परमसत्ता का प्रतीक है ।
राम और कृष्ण दोनों ही वैषण्व भक्तिधारा में आते हैं ।
हरिराम या हरिकृष्ण यानी जो हरि तक ले जाएँ, जो परम से मिला दें ।

वैसे हरि सूर्य का प्रतीक भी हो । कहने की ज़रूरत नहीं कि सूर्य ही हमारे आदिम सर्वशक्तिमान प्रतीक हैं ।
विष्णु भी सूर्य ही हैं ।

2012/2/14 Rohit Gurjar <rohit...@gmail.com>
हरे राम हरे कृष्ण में हरे का क्या मतलब है ?



--

सादर, साभार
अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल
07507777230


  


Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Feb 14, 2012, 10:20:27 AM2/14/12
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संस्कृत का थोड़ा ज्ञान हिन्दी की कुछ समस्यायों के समाधान में बड़ा सहायक होता है. हरे राम हरे कृष्ण के सन्दर्भ में यह बात लागू
हो रही है. हरे 'हरि' का संबोधन कारक है. हे राम की तरह हे हरे. संक्षेप में 'हरे'. मुरारी का 'मुरारे' भी वैसे ही बनता है.
.

 
.

2012/2/14 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
Dr. S S Jaiswal

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Feb 14, 2012, 10:23:07 AM2/14/12
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क्षमा करें, समस्यायों नहीं, समस्याओं.



2012/2/14 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

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Feb 14, 2012, 10:52:04 AM2/14/12
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हरे यानी हरि

( मैं भी यह लिखना भूल गया था )
राम और कृष्ण स्वयं भगवान नहीं थे, वे माध्यम थे ।
हरि नाम जुड़ने से वे खुद हरिस्वरूप हो गए ।
हरे राम और हरे कृष्ण में उनका यह माध्यम-स्वरूप ही प्रमुख है और
हरे राम कहने के पीछे यही अभिप्राय है कि "ऐसे राम जो प्रभु से मिलवा दें"

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Feb 14, 2012, 9:04:44 PM2/14/12
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मुझे लगता है 'हरे राम हरे कृष्ण' और कुछ नहीं, हरि, राम और कृष्ण नाम का जप है. इसे मैंने कीर्त्तन की पंक्ति के रूप में लगातार दोहराए जाते सुना है. इसमें भगवान को उनके विभिन्न स्वरूपों में संबोधित किया जाता है, गाँधी जी के मुंह से निकले 'हे राम' की तरह.

Mukesh Tyagi

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Feb 17, 2012, 8:23:02 AM2/17/12
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The word Hare has come from 'Haran' which means to take way or to end. So when one says hare Krishna, he requests the God (the supreme consciousness) to take away his sorrows, his shortcomings, his failures and pains. This Hare Krishna Mantra is actually a little prayer to God for taking away all the sorrows, pains and shortcomings of the chanter and provides him bliss and joy. 

       "Hare Krishna, Hare Krishna, Krishna Krishna, Hare Hare
           Hare Rama, Hare Rama, Rama Rama, Hare Hare"

Whenever you chant this mantra, always keep its meaning in mind. Chant this mantra with devotion and fait. While repeating his mantra request the God almighty to take away all your sorrows, pains and failures and give you joy and bliss. 

 


2012/2/15 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>



--

(¨`•.•´¨)Always           
`•.¸(¨`•.•´¨)Keep
(¨`•.•´¨)¸.•´smiling!
`•.¸.•´
A smiling face doesn’t mean there is no sorrow.
It rather means that they have the courage to deal with it.
So wear a smile always.

 Please don't print this e-mail unless you really need to. SAVE PAPER TO SAVE TREES

Anil Janvijay

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Feb 17, 2012, 8:26:14 AM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
यह है एक नई और दिलचस्प व्याख्या, जो कृष्ण चेतना संघ अपने सदस्य को समझाता है। 

2012/2/17 Mukesh Tyagi <mukesh....@gmail.com>



--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें


Moscow, Russia
+7 495 422 66 89 ( office)
+7 916 611 48 64 ( mobile)

Pratibha Saksena

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Feb 17, 2012, 10:09:19 AM2/17/12
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यह  बिलकुल  संगत व्याख्या है .
'हरे' शब्द से तात्पर्य हरि के अतिरिक्त  हरने ,हरण करने ,से भी जोड़ सकते हैं .मैथिली शरण गुप्त की एक पंक्ति है 'राधा के सब कष्ट हरे ' यहाँ हरे का मतलब दूर करना है .प्रचलित आरतियों में यह शब्द दूर करने के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है 'पाप हरो देवा' ,- मोह आदि की विथा जगत से नाथ हरो , दुख हर्ता (हरने वाला ),शोणित बीज हरे.
और 'गोविन्द माधव हरे मुरारे ,हे कृष्ण' में हरि के संबोधन कारकके  रूप में  .

-एक शब्द के अनेक अर्थ (यमक अलंकार)काव्य आदि में  हमेशा से चलते हैं . 


2012/2/17 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com> में 

Baljit Basi

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Feb 17, 2012, 10:33:32 AM2/17/12
to शब्द चर्चा
क्या किसी को मालूम है कि मशहूर आरती, जिस के बोल हैं "हरी ओम जय जगदीश
हरे" किस ने लिखी?

Baljit Basi

Pratibha Saksena

unread,
Feb 17, 2012, 10:51:18 AM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
इस आरती के अतिरिक्त और भी बहुत सी आरतियों की अंतिम पंक्तियों में 'कहत शिवानंद स्वामी 'होता है .रचयिता  प्रायः इसी प्रकार  अपने नाम का अपनी रचना में उल्लेख करता रहा है.'कहत कबीर सुनो भई साधो ''कह गिरिधर कविराय'आदि-आदि. इससे प्रतीत होता है कि यह  शिवानंद स्वामी की कृति है.   



2012/2/17 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

अजित वडनेरकर

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Feb 17, 2012, 11:00:50 AM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
फिल्लौरी जी पर बहुत कुछ छप चुका है।
बलजीत भाई, इस विषय को कृपया यहाँ न छेड़ें :)

2012/2/17 Pratibha Saksena <pratibha...@gmail.com>

Baljit Basi

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Feb 17, 2012, 11:12:01 AM2/17/12
to शब्द चर्चा
अजित जी, मैं बहाने से थोड़ी गर्व वाली बात करनी चाहता था. शर्धा राम
फिलौरी जी पंजाब में जालंधर जिले के फिल्लौर कसबे के रहने वाले थे जो
मेरे गाँव के बहुत पास ही है. फिल्लौर हमारी तहसील भी है. फिलौरी जी ने
पंजाबी में भी दो किताबें लिखी. खैर आप तो सब जानते हैं. मेरी ज़िंदगी में
बहुत खाहिश रही है कि इस विद्वान् का घर ढूँढू और इसके बारे और खोज करूँ.
पता नहीं यह हो सकेगा कि नहीं.

On 17 फरवरी, 11:00, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> फिल्लौरी जी पर बहुत कुछ छप चुका है।
> बलजीत भाई, इस विषय को कृपया यहाँ न छेड़ें :)
>

> 2012/2/17 Pratibha Saksena <pratibha.saks...@gmail.com>


>
>
>
>
>
> > इस आरती के अतिरिक्त और भी बहुत सी आरतियों की अंतिम पंक्तियों में 'कहत
> > शिवानंद स्वामी 'होता है .रचयिता  प्रायः इसी प्रकार  अपने नाम का अपनी रचना
> > में उल्लेख करता रहा है.'कहत कबीर सुनो भई साधो ''कह गिरिधर कविराय'आदि-आदि.
> > इससे प्रतीत होता है कि यह  शिवानंद स्वामी की कृति है.
>

> > 2012/2/17 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
> >> क्या किसी को मालूम है कि मशहूर आरती, जिस के बोल हैं "हरी ओम जय जगदीश
> >> हरे" किस ने लिखी?
>
> >> Baljit Basi
>
> --
>

> *सादर, साभार
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/


> औरंगाबाद/भोपाल

> 07507777230- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Feb 17, 2012, 12:06:54 PM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव! --इस पंक्ति के तमाम शब्द संबोधन हैं. वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ.
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येशु सर्वदा. इसमें भी आरम्भ के तीन शब्द/पद  तथा देव संबोधन हैं. सर्वमंगलमांगल्ये सर्वार्थसाधिके!
शरण्ये त्रयम्बिके गौरि नारायणि नमोस्तुते. इसके समस्त छः पद संबोधन हैं. विवाह के निमंत्रण पत्रों में कई बार सूर्यकोटिसमप्रभः,  गौरी और नारायणी लिखा मिलता है. ये अशुद्ध हैं क्योंकि संबोधन कारक में इनके रूप क्रमशः सूर्यकोटिसमप्रभ, गौरि और नारायणि होते हैं. हरे राम/कृष्ण का अर्थ हे राम/कृष्ण, हमारी व्यथा हरें, यह बताना मेरी समझ में बड़ी दूर की कौड़ी लाना है.   

2012/2/17 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Avinash Vachaspati

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Feb 17, 2012, 12:15:38 PM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
Jahan tak main sich pa raha ise kisi kalam ne hi likkha hoga

http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/avinashvachaspati/

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Feb 17, 2012, 12:10:45 PM2/17/12
to shabdc...@googlegroups.com
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके............  

2012/2/17 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>

Rajendra Gupta राजेंद्र गुप्ता

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Feb 21, 2012, 7:20:09 AM2/21/12
to शब्द चर्चा
मुझे लगता है कि हरे राम, हरे कृष्ण में 'हरे' या फिर शिव जी के लिए
'हर' और विष्णु जी के लिए 'हरि' शब्द भी आदर-सूचक 'श्री' शब्द के
परिवर्तित रूप हैं जिनमें (1) श > ह बना, (2) मात्राएँ बदली। सब कुछ
उच्चारण-भेद का खेल लगता है। अर्थात हरे राम = श्री राम, हरे कृष्ण =
श्री कृष्ण, श्री हरि = श्री श्री।
श्री > शरी > हरी > हरि > हरे > हर
किन्तु यदि धार्मिक भावना से सोचना है, तब तो बात और ही हैं। किन्तु,
वहाँ भी 'हरे' शब्द के विषय में कोई एक मत तो है नहीं। विभिन्न साधु-
संतों ने अपनी-अपनी श्रद्धा से बीसियों व्याख्याएं की हैं, जो अच्छी लगे
या जिनमें श्रद्धा हो उनकी बात मान लीजिये।

राजेंद्र गुप्ता
दिल्ली 09212204551
DNA of Words शब्दों का डीएनए http://dnaofwords.blogspot.com/


On Feb 17, 10:10 pm, "Dr. Sheo Shankar Jaiswal" <jaiswa...@gmail.com>
wrote:


> सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके............
>

> 2012/2/17 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jaiswa...@gmail.com>


>
>
>
>
>
>
>
>
>
> > हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव! --इस पंक्ति के तमाम
> > शब्द संबोधन हैं. वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ.
> > निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येशु सर्वदा. इसमें भी आरम्भ के
> > तीन शब्द/पद  तथा देव संबोधन हैं. सर्वमंगलमांगल्ये सर्वार्थसाधिके!
> > शरण्ये त्रयम्बिके गौरि नारायणि नमोस्तुते. इसके समस्त छः पद संबोधन हैं.
> > विवाह के निमंत्रण पत्रों में कई बार सूर्यकोटिसमप्रभः,  गौरी और नारायणी लिखा
> > मिलता है. ये अशुद्ध हैं क्योंकि संबोधन कारक में इनके रूप क्रमशः
> > सूर्यकोटिसमप्रभ, गौरि और नारायणि होते हैं. हरे राम/कृष्ण का अर्थ हे
> > राम/कृष्ण, हमारी व्यथा हरें, यह बताना मेरी समझ में बड़ी दूर की कौड़ी लाना
> > है.
>

> > 2012/2/17 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

Rajesh Karmahe

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Mar 1, 2012, 9:20:43 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
भाइयों, आपके ग्रुप में नया शामिल हुआ हूँ, अतएव अनुशासन से सम्बन्धी कोई चूक हो तो कृपया बताएँगे| भक्ति कालीन दोहा है - "मेरी भवबाधा हरे राधा नागरी सोई ..." | स्पष्ट है कि ' हरे राम हरे कृष्ण ' में भी हरे का तात्पर्य है कि श्री राम और श्री कृष्ण भवबाधा यानी सांसारिक कष्ट का हरण करें अर्थात् भक्त की भवबाधा को हरें या दूर करें| अन्य तर्कों में उलझना व्यर्थ प्रतीत होता है|


On Tuesday, 14 February 2012 17:54:52 UTC+5:30, Rohit Gurjar wrote:
हरे राम हरे कृष्ण में हरे का क्या मतलब है ?

eg

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Mar 1, 2012, 9:24:07 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
Bhai ji! That is 'haro' not 'Hare'.

Rajesh Karmahe

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Mar 1, 2012, 9:50:53 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
संस्कृत में दो शब्द हैं - ' हर:' और ' हरि:' | हर: की व्युत्पत्ति है हरति पापनोति , ह्र +अच्  शिव:| हरि: की व्युत्पत्ति है हरति पापनोति, ह्र + उणा. विष्णु: | अब हरे राम हरे कृष्ण में 'हरे' का अर्थ भवबाधा हरण या पाप हरण नहीं है तो फिर क्या है?

Rajesh Karmahe

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Mar 1, 2012, 9:54:39 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
संस्कृत में दो शब्द हैं - ' हर:' और ' हरि:' | हर: की व्युत्पत्ति है हरति पापनोति , ह्र +अच्  शिव:| हरि: की व्युत्पत्ति है हरति पापनोति, ह्र + उणा. विष्णु: | अब हरे राम हरे कृष्ण में 'हरे' का अर्थ भवबाधा हरण या पाप हरण नहीं है तो फिर क्या है? 

2012/3/1 eg <girij...@gmail.com>

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Mar 1, 2012, 10:44:03 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
"यह सब द्रविण प्राणायाम करने की ज़रुरत नहीं है. शुद्ध रूप से चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन में संबोधन के रूप में 'हरे' शब्द का प्रयोग किया गया है. कलि संतरण उपनिषद् में इसे महामंत्र कहा गया है." यह कहना है हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, विद्वान एवं भाषाविद आचार्य विष्णु दत्त राकेश का. मैंने आरम्भ में कुछ ऐसा ही कहा था.    

2012/3/1 Rajesh Karmahe <karmahe...@gmail.com>

Rajesh Karmahe

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Mar 1, 2012, 11:20:24 AM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
अगर शब्द की व्युत्पत्ति करना आपको प्राणायाम या दण्ड - बैठक लग रहा है, तो 'शब्द चर्चा' वृथा है| किसी साहित्यकार के कहने मात्र से शब्दों की व्युत्पत्ति नहीं बदल जायेगी| मैंने आपके आचार्य जी से भी प्राचीन अमरकोश एवं शब्दकल्पद्रुम जैसे ग्रंथों के आधार पर कहा है| अब इसे क्या मल्ल युद्ध करना कहेंगे| :-)

2012/3/1 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Mar 1, 2012, 1:14:47 PM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय राजेश जी, मैंने केवल आचार्य जी को शब्दशः उधृत किया था. द्रविड़ प्राणायाम भी उन्हीं का शब्द है. आपकी व्युत्पत्ति निःसंदेह पांडित्यपूर्ण है. मैं संस्कृत बहुत नहीं जानता. इसलिए मैंने उनसे पूछा था. उन्होंने जो बताया, मैंने लिख दिया. लेकिन एक बात मुझे भी लगती है कि हरे को हरि का संबोधन रूप मानना इतना कठिन नहीं होना चाहिए. 'हरे राम' में हरे का अर्थ भव बाधा हरण या पाप हरण तो शायद नहीं है. हरण संज्ञा है, हरे संज्ञा नहीं है. हरे का अर्थ हरो भी नहीं लगता. कीर्तन ही लगता है हरे राम हरे कृष्ण. बाकी तो आप विद्वानों पर ही छोड़ना चाहिए. मैंने तो थोड़ी-बहुत अंग्रेजी पढ़ी है. हिन्दी मातृभाषा है, इसलिए उस पर हक़ लगता है. संस्कृत में अपनी गति बहुत मामूली है. अगर मेरी बात बुरी लगी हो तो कृपया क्षमा कीजियेगा. 

Rajesh Karmahe

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Mar 1, 2012, 11:13:04 PM3/1/12
to shabdc...@googlegroups.com
जायसवाल साहब,

आप सही हैं | 'हरे' संबोधन है 'हरि' का किंतु यह तो शब्दानुवाद हो गया; अगर 'हरि' शब्द की व्युत्पत्ति [ हरति पापनोति, ह्र + उणा. विष्णु: यानी जो पाप का हरण करें] भी हम जान लें तो मन्त्र का भावानुवाद स्पष्ट हो जाता है| क्या हम 'हरे राम हरे कृष्ण' की जगह 'त्रिपुरारे राम त्रिपुरारे कृष्ण' कर सकते हैं ? शब्दानुवाद तो वही होगा पर मूल बदल जाने से भाव भी बदल जायेगा या नहीं? व्युत्पत्तिशास्त्र में हम पूर्वाग्रह रहित होकर शब्दों के मूल तक जाते हैं| कोई त्रुटि होने पर भी हम 'हरे राम, हरे राम' कहते हैं तो क्या राम को त्रुटि दिखाने के लिए आह्वान करते हैं या 'राम मेरी त्रुटि, मेरे पापों को हरें' का भाव होता है| चलिए विवाद को यह कहकर समाप्त करते हैं - " हरि तुम हरौ जन की पीर" |

सादर,
राजेश करमहे

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Mar 3, 2012, 1:20:08 PM3/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
माना कि 'त्रिपुरारे कृष्ण' नहीं कहेंगे. किन्तु 'हरे कृष्ण' की जगह 'राधे कृष्ण' 'राधे श्याम' तो कहते हैं. इसे दुराग्रह न समझें तो कहना चाहूँगा जिस सन्दर्भ में बात हो रही है, उसमें 'हरे' संबोधन है, और कुछ नहीं. मेरे एक सम्बन्धी हैं. पत्नी से विवाद होने की दशा में मामले को टालते हुए 'राधे कृष्ण राधे कृष्ण' कहना शुरू कर देते हैं. एक अपने अनुभव की बात भी कहूँगा. अग्रेजी भाषा विज्ञान में 'रजिस्टर' पहचानने का एक अभ्यास हो रहा था. रजिस्टर यानी क्षेत्र विशेष जैसे व्यापार, विज्ञान, साहित्य, कानून आदि में प्रयुक्त भाषा का विशिष्ट रूप. मेरे एक मित्र ने एक गद्यांश की पहचान आधुनिक कविता के रूप में की और उसका रजिस्टर साहित्य बताया. कल्पना कीजिये उनकी क्या दशा हुई होगी जब हमारे प्रोफ़ेसर ने बताया कि वह गद्यांश एक व्यापारी के टेलिग्राम का हिस्सा था. इसके साथ मैं राजेश जी की बात स्वीकार करता हूँ.     

2012/3/2 Rajesh Karmahe <karmahe...@gmail.com>

Rajesh Karmahe

unread,
Mar 3, 2012, 2:01:29 PM3/3/12
to shabdc...@googlegroups.com
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हम लैटिन और ग्रीक को समझे बिना अंग्रेजी शब्दों की व्युत्पत्ति करें और संस्कृत के धातुओं और प्रत्ययों को जाने बिना हिन्दी शब्द की व्याख्या करें? 

2012/3/3 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

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Mar 4, 2012, 11:05:29 PM3/4/12
to shabdc...@googlegroups.com
अजित वडनेरकर का उदाहरण हमारे सामने हैं. "हम सन्दर्भों का उल्लेख क्यों नहीं करते ? मेरे जैसे कई लोग संस्कृत नहीं जानते, सो संस्कृत उद्धरणों का सरल अनुवाद भी दिया जाना चाहिए." यह अजित जी ने कहा है. उनका 'शब्दों का सफ़र' आपकी मान्यता को झुठला रहा है. जहां तक मेरा सवाल है, इतनी संस्कृत आती है जितने से हिन्दी भाषा से जुड़ी छोटी-मोटी बातें समझी जा सकें. इस चर्चा के आरम्भ में ही मैंने कहा था कि संस्कृत का थोड़ा ज्ञान हो तो हिन्दी की कुछ समस्याएं आसानी से सुलझाई जा सकती हैं. जिस तरह से आपने ग्रीक और लैटिन को अंग्रेजी से तथा संस्कृत को हिन्दी से जोड़ा है, उससे मैं सहमत हूँ, किन्तु उस हद तक नहीं. शेक्सपियर पर टिप्पणी की गई है कि उसे ग्रीक और लैटिन भाषाएँ नहीं आती थीं. फिर भी वह शेक्सपियर था. ऐसे अनेक उदाहरण आपको हिन्दी साहित्य में भी मिलेंगे. मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि 'हरे राम.. ' में 'हरे' का अर्थ समझने के लिए बहुत गहन संस्कृत ज्ञान की आवश्यकता नहीं है. मेरी-आपकी सहमति इस अंतिम वाक्य पर भी बने तो काम चलेगा.    

2012/3/4 Rajesh Karmahe <karmahe...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 5, 2012, 3:27:37 AM3/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
आपने मेरे मन की बात कह दी डॉक्टसाब....
मैं ऐसे कई विद्वानों के बारे में जानता हूँ जिन्होंने व्युत्पत्ति-विवेचना के क्षेत्र में अच्छा काम किया है मगर वे सम्बन्धित भाषा परिवार की भाषाओं में निष्णात नहीं थे ।

2012/3/5 Dr. Sheo Shankar Jaiswal <jais...@gmail.com>



--

सादर, साभार
अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल
07507777230


  


Dr. Sheo Shankar Jaiswal

unread,
Mar 5, 2012, 8:29:50 AM3/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
चर्चा इस मोड़ पर पहुंची, अजित जी, कि मुझे आपका उदाहरण देना पड़ा. जो बात आप कह रहे हैं, वह शत प्रतिशत सही है. सम्बंधित भाषा परिवार की भाषाओँ का ज्ञान सोने में सुहागा हो सकता है, लेकिन व्युत्पत्ति-विवेचना के कार्य की कोई अनिवार्य शर्त नहीं. 

2012/3/5 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>

Rajesh Karmahe

unread,
Mar 5, 2012, 9:26:07 AM3/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
मैंने अपनी राय दी| अब प्रजातांत्रिक व्यवस्था में बहुमत स्वीकार्य है| :-) आपकी बात अच्छी लगी ,सम्बन्धित भाषा ज्ञान सुहागा या कसौटी की तरह इस्तेमाल होने चाहिए|

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 5, 2012, 9:41:56 AM3/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
कोई भाषा आती है से तात्पर्य यही होता है कि व्याकरणसम्मत उस भाषा को आप लिख-बोल लेते हैं या नहीं ।
संस्कृत में मैं इस कसौटी पर शून्य हूँ । शायद संस्कृत पढ़ाने वालो का बहुतांश भी होगा ।

धातु और प्रत्ययों का ज्ञान बहुत आसान बात है भाषा में दिलचस्पी रखने वाले के लिए । पर इसका ज्ञान होने मात्र को संस्कृत का ज्ञान होना कैसे कहा जा सकता है ?

मैं तो ईमानदारी से हमेशा कहता हूँ कि मेरी कसौटी पर मुझे सिवाय हिन्दी के और कोई भाषा नहीं आती । तो भी स्वान्त सुखाय जो करना है , कर रहा हूँ । यह तो वही बात हुई कि उपन्यास या कहानी लेखन भी वही कर सकता है जिसने हिन्दी में आचार्य की उपाधि ली हो :)

2012/3/5 Rajesh Karmahe <karmahe...@gmail.com>

Dr. Sheo Shankar Jaiswal

unread,
Mar 5, 2012, 8:48:58 PM3/5/12
to shabdc...@googlegroups.com
आपकी बात को पूरे प्रकरण का एक ख़ूबसूरत मोड़ पर समापन मान लिया जाना चाहिए. राजेश जी ने विद्वानसुलभ उदारता दिखाई है. उनके प्रति आभार.   
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