... सीट यानी बैठने के आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण हुआ है ... ![]()
... संसद के दो सदन हैं जिन्हें राज्यसभा और लोकसभा नाम मिले हैं ...

On 16 दिस., 06:42, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> *करीब ढाई साल पहले चुनावों के दौरान लोकतंत्र से सम्बधित शब्दावली पर एक
> शृंखला लिखी थी। उसी दौरान संसद शब्द पर एक आलेख लिखा था।
> सृजनजी ने उल्लेख किया तो वह पोस्ट यहाँ पेश है। *
> Thursday, May 14, 2009 संसद में सीटों का बंटवारा
> [लोकतंत्र-6]<http://shabdavali.blogspot.com/2009/05/7.html>
>
> [image: 32122791vUpWpAKONu_fs]<http://lh4.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLCbTnUzI/AAAAAAAAH3E/zv7bAHjOd7k...>
> ज नसमूह के लिए जब भी व्यवस्था की बात चलती है तो उसका आशय ऐसे स्थान से होता
> है जहां सब लोग सुविधा के साथ स्थिर हो सकें। किसी भी जीव के लिए स्थिर होने
> की सबसे सुविधाजनक अवस्था वही है जब वह बैठता है। सामूहिक उपस्थिति किसी
> परिणाम तक पहुंचने के उद्धेश्य या प्रयोजन से ही होती है। *ग्राम, पंचायत,
> संसद, सभा, परिषद* जैसे शब्द समूहवाची शब्द हैं और इनके मूल में साथ साथ बैठने
> का भाव ही है। समूह की उपस्थिति से बहुधा रचनात्मक निष्कर्ष हासिल होता है, कई
> बार यह संग्राम की वजह भी बनती है।
> *ब*साहट के अर्थ में जन समूहों की सबसे छोटी इकाई *ग्राम* कहलाती है। संस्कृत
> का ग्राम शब्द *ग्रस् *धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव है। इसमें पोषण
> का अर्थ भी है। पोषण के लिए जो भोजन का निवाला भी पदार्थों का समुच्चय ही होता
> है और उसे मुंह में चबाने की क्रिया के जरिये पिंड बनाया जाता है फिर उसे
> उदरस्थ किया जाता है। *ग्राम* शब्द में भी जन-समूह का संकेत स्पष्ट है।
> प्राचीनकाल में एक ही जातिसमूहों के ग्राम होते थे, ये आज भी नज़र आते हैं।
> प्रायः विभिन्न ग्रामों के विवादों का
>
> ... *सीट यानी* बैठने के आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख
> संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण हुआ है ... [image:
> Folketing]<http://lh6.ggpht.com/_RZzdL9so394/Sgt24IKWdoI/AAAAAAAAH24/k12MCeTl4Og...>
> निपटारा पंचायत जैसी एक सभा में होता था जिसमें विभिन्न ग्राम एक साथ जुटते
> थे। यह *सम+ग्राम* होता था अर्थात सभी ग्रामों का साथ साथ जुटना। इसे
> *संग्राम<http://shabdavali.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html>
> * कहा जाता था। अक्सर विवाद बातचीत से सुलझते थे, वर्ना युद्ध की नौबत आती थी।
> कालांतर में संग्राम ही युद्ध का पर्याय हो गया। जाहिर है समूह की समरसता
> सप्रयास होती है जबकि कर्कशता तो अनिवार्य तत्व है।
> *लो*कतात्रिक संस्थाओं की संयुक्त सभा में निर्वाचित जनप्रतिनिधि बैठते हैं जो
> एक विशिष्ट क्षेत्र के जन का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका आसन *सीट
> seat*कहलाता है। प्रकारान्तर से सीट का अर्थ निर्वाचन क्षेत्र या चुनाव
> क्षेत्र
> होता चला गया। अंग्रेजी का सीट शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का है जिसके
> मूल में सेड *sed* धातु खोजी गई है जिसका अर्थ आसन या स्थिर होने से है। यूरोप
> की कई भाषाओं में इसी धातु से आसन के संदर्भ में सीट या इससे मिलते जुलते शब्द
> प्रचलित हैं जैसे स्पैनिश में *सेड* sede, फ्रैंच में *सीज़* siege, जर्मन में
> *सिज़* Sitz, पोलिश में *सिद्जिबा* siedziba आदि। संस्कृत में भी *सद् *का
> अर्थ होता है बैठना, आसीन होना, वास करना आदि। पार्लियामेंट के लिए हिन्दी में
> *संसद* शब्द है। यह नया शब्द है और इसे बनाया गया है। आश्चर्य होता है कि
> हिन्दी में जो शब्द गढ़े गए हैं, सरकारी संदर्भों और वेबसाईटों पर भी उनका
> कहीं अर्थ नहीं मिलता। दुनियाभर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सर्वोच्च सभा
> के लिए कोई न कोई नाम है मसलन *सीनेट* (अमेरिका), *पार्लियामेंट* (ब्रिटेन), *
> ड्यूमा* (रूस) उसी तरह भारतीय जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च सभा के लिए संसद नाम
> रखा गया। संसद अर्थात जहां सभी साथ साथ बैठें। *सम+सद्=संसद*। यूं संस्कृत में
> *सद्* के कुछ अन्य अर्थ भी हैं जो आज की संसद के संदर्भ में सटीक बैठते हैं
> मसलन विघ्नयुक्त होना, खिन्न होना, हताश होना, आराम करना, पथभ्रष्ट होना,
> भुगतना, उपेक्षित होना आदि। इन शब्दार्थों के निहितार्थ का विवेचन करना किसी
> भी नागरिक के लिए कठिन नहीं है।
> *स*दस्य शब्द संस्कृत का है जिसमें आसीन या बैठनेवाले का भाव है। मूलतः यह
> धार्मिक कर्मकांड से आया शब्द है। प्राचीनकाल में यज्ञ में बैठनेवाले ऋत्विज,
> ब्राह्मण या याजक को* सदस्य* कहते थे। मेंबर या उपस्थित गण के लिए भी सदस्य
> शब्द का प्रयोग लोकप्रिय हुआ। सद् के साथ जब इकारान्त या उकारान्त उपसर्ग लगता
> है तो *स्* वर्ण *ष्* में बदल जाता है जैसे *परि+सद् = परिषद*। काउन्सिल के
> अर्थ में *परिषद* शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है। इसका एक पर्याय मंडल भी है
> जैसे मंत्रिपरिषद।
>
> ... संसद के दो सदन हैं जिन्हें *राज्यसभा* और *लोकसभा* नाम मिले हैं
> ...[image:
> in-parl-002]<http://lh6.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLJV15VFI/AAAAAAAAH2o/LngpXQugmU4...>
> रिषद का सदस्य पार्षद कहलाता है। हिन्दी में आमतौर पर *पार्षद* शब्द
> म्युनिसिपल या मेट्रोपॉलिटन काऊंसिल के सदस्यों के लिए रूढ़ हो गया है।
> *सद्*में शामिल निवास, बैठन या स्थिर होने के अर्थ में इसी मूल से बने
> *सदनम्* शब्द का मतलब होता है आवास, निवास, घर आदि। इसका हिन्दी रूप *सदन *है।
> कई आवासीय इमारतों के नाम के साथ सदन शब्द लगता हैं जैसे सेवासदन, यात्रीसदन
> आदि। भारतीय संसद के दो सदन हैं जिन्हें *राज्यसभा* और *लोकसभा* नाम मिले
> हैं।
> *स*भा का अर्थ होता है गोष्ठी, बैठक, न्यायकक्ष या संघ। अरबी-फारसी में इसे *
> मजलिस* कहा जाता है जो अरबी की *ज-ल-स* धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव
> है। *जुलूस, जलसा, मजलिस* और *इजलास* अर्थात कोर्ट जैसे शब्द इससे ही बने हैं।
> अरबी के जमात में भी यही भाव है। यह ज-म धातु से बना है जिसमें एकत्र होने का
> भाव है। शुद्ध रूप में यह *जमाअत* है। वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में सभा शब्द
> की व्युत्पत्ति *–सह भान्ति अभीष्ठनिष्चयार्थमेकत्र यत्र गृहे- *बताई गई है
> यानी किसी खास प्रयोजन के लिए एक स्थान पर बैठे लोगों की जमात ही सभा है।
> सदस्य को *सभासद* भी कहा जाता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में सभा का अर्थ जुए
> का अड्डा भी होता है। *सभिक* या* सभापति* उसे कहते थे जो जुआ खिलाता था अर्थात
> द्यूतशाला का प्रधान। किसी भी संस्था का प्रमुख या अध्यक्ष भी सभापति कहलाता
> है। कुल मिलाकर जनतंत्र में सामूहिक संवाद-सम्भाषण ज़रूरी है। इसके लिए जितनी
> भी शब्दावली है उनमें बैठने का भाव और आसन ही प्रमुख है, यानी *सीट*। बैठने के
> आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण
> हुआ है। बैठ कर चर्चा करना जैसा भाव आज तिरोहित हो गया है। लोग अब संसद में
> संग्राम भी करते हैं जो आदिम युग में होता था। [image: SR
> pix]<http://lh4.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLMXZr9VI/AAAAAAAAH3U/LizCbBIBCng...>
>
> --
>
> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/



बहुत बढ़िया है यह संकलन !१७ दिसम्बर २०११ ७:३९ अपराह्न को, सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijan...@gmail.com> ने लिखा:
On 17 दिस., 09:36, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> शुक्रिया सृजनजी।
> संसद के आशय को स्पष्ट करते ये सन्दर्भ बहुत उपयोगी हैं।
>
> 2011/12/17 सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijanshi...@gmail.com>
>
>
>
> > [image: image.png]
>
> > बहुत बढ़िया...
>
> > मैं संसद भवन के भीतरी गुम्बदों और दीवारों पर उत्कीर्ण प्राचीन ग्रंथों से
> > उद्धृत कुछ बातें इस प्रसंग में पेश कर रहा हूं, जो शायद इस चर्चा के संदर्भ
> > को व्यापकता दे।
>
> > 1. ऊपर की फोटो में दिख रहा लोक सभा के भीतरी गुम्बद पर उत्कीर्ण मनुस्मृति
> > का यह श्लोक:
>
> > *सभा वा न प्रवेष्टया, वक्तव्यं वा समंजसम्। अब्रुवन विब्रुवन वापि, नरो
> > भवति किल्विषी।*
>
> > (या तो व्यक्ति सभा भवन में प्रवेश न करे या फिर सभा भवन में प्रवेश करने के
> > बाद वहां वह पूरे सदाचार के साथ बोले। जो व्यक्ति वहां नहीं बोलता है या फिर
> > असत्य बोलता है, वह पाप में बराबर का भागी होता है।)
>
> > 2. एक मीटिंग हॉल की दीवार पर ऋग्वेद की यह ऋचा देखें:
>
> > *संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।*
> > *समानो मंत्र: समिति: समानी।*
> > *समानं मन: सह चित्तमेषाम्।*
> > *समानी व आकूति: समाना हृदयानि व।*
> > *समानवस्तु वो मनो यथा व: सुहासति।*
>
> > (मिल-जुलकर बैठो, मिल-जुलकर बात करो, तुम्हारे मन एक जैसा सोचें, एकत्रित
> > जनों का परामर्श साझा हो, संघ साझा हो, उद्दे्श्य साझा हो, इच्छा परस्पर जुड़ी
> > हो, तुम्हारा मंतव्य साझा हो, तुम्हारे हृदय की अभिलाषाएं भी साझी हों,
> > तुम्हारे विचार भी साझे हों जिससे कि तुम्हारे बीच पूर्ण एकता हो सके।)
>
> > 3. महाभारत से उद्धृत यह श्लोक भी एक हॉल में उत्कीर्ण है:
>
> > *न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते यो न वदति धर्मम्।*
> > *धर्म: स नो यत्र सत्यमस्ति, सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति। *
>
> > (वह सभा, सभा नहीं है जिसमें गुरुजन न हों; वे गुरुजन, गुरुजन नहीं हैं जिनकी
> > वाणी में सदाचार न हो; वह सदाचार, सदाचार नहीं है जिसमें सत्य न हो; वह सत्य,
> > सत्य नहीं है जो किसी को कपट के लिए प्रेरित करे।)
>
> > 2011/12/16 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
> >> बहुत शुक्रिया बलजीत भाई,
> >> यह आलेख सफ़र के दूसरे पड़ाव में जा रहा है। इन दिनों पब्लिशर द्वारा भेजी
> >> प्रूफ़ कॉपी सम्पादित कर रहा हूँ।
> >> इस आलेख को संशोधित करने का अच्छा योग रहा। यह काम आज करता हूँ।
> >> जै हो
>
> >> 2011/12/16 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> ...
>
> और पढ़ें »
>
> image.png
> 666Kदेखेंडाउनलोड करें- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए