संसद

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अजित वडनेरकर

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Dec 16, 2011, 6:42:44 AM12/16/11
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करीब ढाई साल पहले चुनावों के दौरान लोकतंत्र से सम्बधित शब्दावली पर एक शृंखला लिखी थी। उसी दौरान संसद शब्द पर एक आलेख लिखा था।
सृजनजी ने उल्लेख किया तो वह पोस्ट यहाँ पेश है।

Thursday, May 14, 2009

संसद में सीटों का बंटवारा [लोकतंत्र-6]

32122791vUpWpAKONu_fs

नसमूह के लिए जब भी व्यवस्था की बात चलती है तो उसका आशय ऐसे स्थान से होता है जहां सब लोग सुविधा के साथ स्थिर हो सकें। किसी भी जीव के लिए स्थिर होने की सबसे सुविधाजनक अवस्था वही है जब वह बैठता है। सामूहिक उपस्थिति किसी परिणाम तक पहुंचने के उद्धेश्य या प्रयोजन से ही होती है। ग्राम, पंचायत, संसद, सभा, परिषद जैसे शब्द समूहवाची शब्द हैं और इनके मूल में साथ साथ बैठने का भाव ही है। समूह की उपस्थिति से बहुधा रचनात्मक निष्कर्ष हासिल होता है, कई बार यह संग्राम की वजह भी बनती है।
साहट के अर्थ में जन समूहों की सबसे छोटी इकाई ग्राम कहलाती है। संस्कृत का ग्राम शब्द ग्रस् धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव है। इसमें पोषण का अर्थ भी है। पोषण के लिए जो भोजन का निवाला भी पदार्थों का समुच्चय ही होता है और उसे मुंह में चबाने की क्रिया के जरिये पिंड बनाया जाता है फिर उसे उदरस्थ किया जाता है। ग्राम शब्द में भी जन-समूह का संकेत स्पष्ट है। प्राचीनकाल में एक ही जातिसमूहों के ग्राम होते थे, ये आज भी नज़र आते हैं। प्रायः विभिन्न ग्रामों के विवादों का

... सीट यानी बैठने के आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण हुआ है ... Folketing

निपटारा पंचायत जैसी एक सभा में होता था जिसमें विभिन्न ग्राम एक साथ जुटते थे। यह सम+ग्राम होता था अर्थात सभी ग्रामों का साथ साथ जुटना। इसे संग्राम कहा जाता था। अक्सर विवाद बातचीत से सुलझते थे, वर्ना युद्ध की नौबत आती थी। कालांतर में संग्राम ही युद्ध का पर्याय हो गया। जाहिर है समूह की समरसता सप्रयास होती है जबकि कर्कशता तो अनिवार्य तत्व है।
लोकतात्रिक संस्थाओं की संयुक्त सभा में निर्वाचित जनप्रतिनिधि बैठते हैं जो एक विशिष्ट क्षेत्र के जन का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका आसन सीट seat कहलाता है। प्रकारान्तर से सीट का अर्थ निर्वाचन क्षेत्र या चुनाव क्षेत्र होता चला गया। अंग्रेजी का सीट शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का है जिसके मूल में सेड sed धातु खोजी गई है जिसका अर्थ आसन या स्थिर होने से है। यूरोप की कई भाषाओं में इसी धातु से आसन के संदर्भ में सीट या इससे मिलते जुलते शब्द प्रचलित हैं जैसे स्पैनिश में सेड sede, फ्रैंच में सीज़ siege, जर्मन में सिज़ Sitz, पोलिश में सिद्जिबा siedziba  आदि। संस्कृत में भी सद् का अर्थ होता है बैठना, आसीन होना, वास करना आदि। पार्लियामेंट के लिए हिन्दी में संसद शब्द है। यह नया शब्द है और इसे बनाया गया है। आश्चर्य होता है कि हिन्दी में जो शब्द गढ़े गए हैं, सरकारी संदर्भों और वेबसाईटों पर भी उनका कहीं अर्थ नहीं मिलता। दुनियाभर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सर्वोच्च सभा के लिए कोई न कोई नाम है मसलन सीनेट (अमेरिका), पार्लियामेंट (ब्रिटेन), ड्यूमा (रूस) उसी तरह भारतीय जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च सभा के लिए संसद नाम रखा गया। संसद अर्थात जहां सभी साथ साथ बैठें। सम+सद्=संसद। यूं संस्कृत में सद् के कुछ अन्य अर्थ भी हैं जो आज की संसद के संदर्भ में सटीक बैठते हैं मसलन विघ्नयुक्त होना, खिन्न होना, हताश होना, आराम करना, पथभ्रष्ट होना, भुगतना, उपेक्षित होना आदि। इन शब्दार्थों के निहितार्थ का विवेचन करना किसी भी नागरिक के लिए कठिन नहीं है।
दस्य शब्द संस्कृत का है जिसमें आसीन या बैठनेवाले का भाव है। मूलतः यह धार्मिक कर्मकांड से आया शब्द है। प्राचीनकाल में यज्ञ में बैठनेवाले ऋत्विज, ब्राह्मण या याजक को सदस्य कहते थे। मेंबर या उपस्थित गण के लिए भी सदस्य शब्द का प्रयोग लोकप्रिय हुआ। सद् के साथ जब इकारान्त या उकारान्त उपसर्ग लगता है तो स् वर्ण ष् में बदल जाता है जैसे परि+सद् = परिषद। काउन्सिल के अर्थ में परिषद शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है। इसका एक पर्याय मंडल भी है जैसे मंत्रिपरिषद।

... संसद के  दो सदन  हैं जिन्हें राज्यसभा और लोकसभा  नाम मिले हैं ...in-parl-002

रिषद का सदस्य पार्षद कहलाता है। हिन्दी में आमतौर पर पार्षद शब्द म्युनिसिपल या मेट्रोपॉलिटन काऊंसिल के सदस्यों के लिए रूढ़ हो गया है। सद् में शामिल निवास, बैठन या स्थिर होने के अर्थ में इसी मूल से बने सदनम् शब्द का मतलब होता है आवास, निवास, घर आदि। इसका हिन्दी रूप सदन है। कई आवासीय इमारतों के नाम के साथ सदन शब्द लगता हैं जैसे सेवासदन, यात्रीसदन आदि। भारतीय संसद के दो सदन हैं जिन्हें राज्यसभा और लोकसभा  नाम मिले हैं।
भा का अर्थ होता है गोष्ठी, बैठक, न्यायकक्ष या संघ। अरबी-फारसी में इसे मजलिस कहा जाता है जो अरबी की ज-ल-स धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव है। जुलूस, जलसा, मजलिस और इजलास अर्थात कोर्ट जैसे शब्द इससे ही बने हैं। अरबी के जमात में भी यही भाव है। यह ज-म धातु से बना है जिसमें एकत्र होने का भाव है। शुद्ध रूप में यह जमाअत है। वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में सभा शब्द की व्युत्पत्ति –सह भान्ति अभीष्ठनिष्चयार्थमेकत्र यत्र गृहे- बताई गई है यानी किसी खास प्रयोजन के लिए एक स्थान पर बैठे लोगों की जमात ही सभा है। सदस्य को सभासद भी कहा जाता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में सभा का अर्थ जुए का अड्डा भी होता है। सभिक या सभापति उसे कहते थे जो जुआ खिलाता था अर्थात द्यूतशाला का प्रधान। किसी भी संस्था का प्रमुख या अध्यक्ष भी सभापति कहलाता है। कुल मिलाकर जनतंत्र में सामूहिक संवाद-सम्भाषण ज़रूरी है। इसके लिए जितनी भी शब्दावली है उनमें बैठने का भाव और आसन ही प्रमुख है, यानी सीट। बैठने के आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण हुआ है। बैठ कर चर्चा करना जैसा भाव आज तिरोहित हो गया है। लोग अब संसद में संग्राम भी करते हैं जो आदिम युग में होता था।  SR pix


--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-
औरंगाबाद- 07507777230

  


Baljit Basi

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Dec 16, 2011, 7:59:22 AM12/16/11
to शब्द चर्चा
बहुत खूब है अजित भाई!
कुछ खाली जगह भी भर लें . अंग्रेज़ी session भी बैठने के अर्थ वाले *sed
धातु से ही बना है ( लातीनी sedere "to sit" से) . फिर बैठक में बैठना तो
है ही. मतलब यह हुआ कि उमीदवार ने एक वार इलेक्शन में खड़ा होना है फिर तो
बैठना ही बैठना है, जीतने वाले ने संसद की सीट पर और हारने वाले ने घर
की बैठक में रखी settee ( अन्तम तौर पर लातीनी sedere "to sit" से) इसी
लिए हमारे मसले settle (वही लातीनी sedere से) नहीं होते.


On 16 दिस., 06:42, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> *करीब ढाई साल पहले चुनावों के दौरान लोकतंत्र से सम्बधित शब्दावली पर एक


> शृंखला लिखी थी। उसी दौरान संसद शब्द पर एक आलेख लिखा था।

> सृजनजी ने उल्लेख किया तो वह पोस्ट यहाँ पेश है। *


> Thursday, May 14, 2009  संसद में सीटों का बंटवारा

> [लोकतंत्र-6]<http://shabdavali.blogspot.com/2009/05/7.html>
>
> [image: 32122791vUpWpAKONu_fs]<http://lh4.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLCbTnUzI/AAAAAAAAH3E/zv7bAHjOd7k...>


> ज नसमूह के लिए जब भी व्यवस्था की बात चलती है तो उसका आशय ऐसे स्थान से होता
> है जहां सब लोग सुविधा के साथ स्थिर हो सकें। किसी भी जीव के लिए स्थिर होने
> की सबसे सुविधाजनक अवस्था वही है जब वह बैठता है। सामूहिक उपस्थिति किसी

> परिणाम तक पहुंचने के उद्धेश्य या प्रयोजन से ही होती है। *ग्राम, पंचायत,
> संसद, सभा, परिषद* जैसे शब्द समूहवाची शब्द हैं और इनके मूल में साथ साथ बैठने


> का भाव ही है। समूह की उपस्थिति से बहुधा रचनात्मक निष्कर्ष हासिल होता है, कई
> बार यह संग्राम की वजह भी बनती है।

> *ब*साहट के अर्थ में जन समूहों की सबसे छोटी इकाई *ग्राम* कहलाती है। संस्कृत
> का ग्राम शब्द *ग्रस् *धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव है। इसमें पोषण


> का अर्थ भी है। पोषण के लिए जो भोजन का निवाला भी पदार्थों का समुच्चय ही होता
> है और उसे मुंह में चबाने की क्रिया के जरिये पिंड बनाया जाता है फिर उसे

> उदरस्थ किया जाता है। *ग्राम* शब्द में भी जन-समूह का संकेत स्पष्ट है।


> प्राचीनकाल में एक ही जातिसमूहों के ग्राम होते थे, ये आज भी नज़र आते हैं।
> प्रायः विभिन्न ग्रामों के विवादों का
>

> ... *सीट यानी* बैठने के आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख


> संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण हुआ है ... [image:

> Folketing]<http://lh6.ggpht.com/_RZzdL9so394/Sgt24IKWdoI/AAAAAAAAH24/k12MCeTl4Og...>


> निपटारा पंचायत जैसी एक सभा में होता था जिसमें विभिन्न ग्राम एक साथ जुटते

> थे। यह *सम+ग्राम* होता था अर्थात सभी ग्रामों का साथ साथ जुटना। इसे
> *संग्राम<http://shabdavali.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html>
> * कहा जाता था। अक्सर विवाद बातचीत से सुलझते थे, वर्ना युद्ध की नौबत आती थी।


> कालांतर में संग्राम ही युद्ध का पर्याय हो गया। जाहिर है समूह की समरसता
> सप्रयास होती है जबकि कर्कशता तो अनिवार्य तत्व है।

> *लो*कतात्रिक संस्थाओं की संयुक्त सभा में निर्वाचित जनप्रतिनिधि बैठते हैं जो
> एक विशिष्ट क्षेत्र के जन का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका आसन *सीट
> seat*कहलाता है। प्रकारान्तर से सीट का अर्थ निर्वाचन क्षेत्र या चुनाव


> क्षेत्र
> होता चला गया। अंग्रेजी का सीट शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का है जिसके

> मूल में सेड *sed* धातु खोजी गई है जिसका अर्थ आसन या स्थिर होने से है। यूरोप


> की कई भाषाओं में इसी धातु से आसन के संदर्भ में सीट या इससे मिलते जुलते शब्द

> प्रचलित हैं जैसे स्पैनिश में *सेड* sede, फ्रैंच में *सीज़* siege, जर्मन में
> *सिज़* Sitz, पोलिश में *सिद्जिबा* siedziba  आदि। संस्कृत में भी *सद् *का


> अर्थ होता है बैठना, आसीन होना, वास करना आदि। पार्लियामेंट के लिए हिन्दी में

> *संसद* शब्द है। यह नया शब्द है और इसे बनाया गया है। आश्चर्य होता है कि


> हिन्दी में जो शब्द गढ़े गए हैं, सरकारी संदर्भों और वेबसाईटों पर भी उनका
> कहीं अर्थ नहीं मिलता। दुनियाभर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सर्वोच्च सभा

> के लिए कोई न कोई नाम है मसलन *सीनेट* (अमेरिका), *पार्लियामेंट* (ब्रिटेन), *
> ड्यूमा* (रूस) उसी तरह भारतीय जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च सभा के लिए संसद नाम
> रखा गया। संसद अर्थात जहां सभी साथ साथ बैठें। *सम+सद्=संसद*। यूं संस्कृत में
> *सद्* के कुछ अन्य अर्थ भी हैं जो आज की संसद के संदर्भ में सटीक बैठते हैं


> मसलन विघ्नयुक्त होना, खिन्न होना, हताश होना, आराम करना, पथभ्रष्ट होना,
> भुगतना, उपेक्षित होना आदि। इन शब्दार्थों के निहितार्थ का विवेचन करना किसी
> भी नागरिक के लिए कठिन नहीं है।

> *स*दस्य शब्द संस्कृत का है जिसमें आसीन या बैठनेवाले का भाव है। मूलतः यह


> धार्मिक कर्मकांड से आया शब्द है। प्राचीनकाल में यज्ञ में बैठनेवाले ऋत्विज,

> ब्राह्मण या याजक को* सदस्य* कहते थे। मेंबर या उपस्थित गण के लिए भी सदस्य


> शब्द का प्रयोग लोकप्रिय हुआ। सद् के साथ जब इकारान्त या उकारान्त उपसर्ग लगता

> है तो *स्* वर्ण *ष्* में बदल जाता है जैसे *परि+सद् = परिषद*। काउन्सिल के
> अर्थ में *परिषद* शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है। इसका एक पर्याय मंडल भी है


> जैसे मंत्रिपरिषद।
>

> ... संसद के  दो सदन  हैं जिन्हें *राज्यसभा* और *लोकसभा*  नाम मिले हैं
> ...[image:
> in-parl-002]<http://lh6.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLJV15VFI/AAAAAAAAH2o/LngpXQugmU4...>
> रिषद का सदस्य पार्षद कहलाता है। हिन्दी में आमतौर पर *पार्षद* शब्द


> म्युनिसिपल या मेट्रोपॉलिटन काऊंसिल के सदस्यों के लिए रूढ़ हो गया है।

> *सद्*में शामिल निवास, बैठन या स्थिर होने के अर्थ में इसी मूल से बने
> *सदनम्* शब्द का मतलब होता है आवास, निवास, घर आदि। इसका हिन्दी रूप *सदन *है।


> कई आवासीय इमारतों के नाम के साथ सदन शब्द लगता हैं जैसे सेवासदन, यात्रीसदन

> आदि। भारतीय संसद के दो सदन हैं जिन्हें *राज्यसभा* और *लोकसभा*  नाम मिले
> हैं।
> *स*भा का अर्थ होता है गोष्ठी, बैठक, न्यायकक्ष या संघ। अरबी-फारसी में इसे *
> मजलिस* कहा जाता है जो अरबी की *ज-ल-स* धातु से बना है जिसमें समुच्चय का भाव
> है। *जुलूस, जलसा, मजलिस* और *इजलास* अर्थात कोर्ट जैसे शब्द इससे ही बने हैं।


> अरबी के जमात में भी यही भाव है। यह ज-म धातु से बना है जिसमें एकत्र होने का

> भाव है। शुद्ध रूप में यह *जमाअत* है। वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में सभा शब्द
> की व्युत्पत्ति *–सह भान्ति अभीष्ठनिष्चयार्थमेकत्र यत्र गृहे- *बताई गई है


> यानी किसी खास प्रयोजन के लिए एक स्थान पर बैठे लोगों की जमात ही सभा है।

> सदस्य को *सभासद* भी कहा जाता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में सभा का अर्थ जुए
> का अड्डा भी होता है। *सभिक* या* सभापति* उसे कहते थे जो जुआ खिलाता था अर्थात


> द्यूतशाला का प्रधान। किसी भी संस्था का प्रमुख या अध्यक्ष भी सभापति कहलाता
> है। कुल मिलाकर जनतंत्र में सामूहिक संवाद-सम्भाषण ज़रूरी है। इसके लिए जितनी

> भी शब्दावली है उनमें बैठने का भाव और आसन ही प्रमुख है, यानी *सीट*। बैठने के


> आसन से जुड़ी शब्दावली से ही जनतंत्र की प्रमुख संस्थाओं-व्यवस्थाओं का नामकरण
> हुआ है। बैठ कर चर्चा करना जैसा भाव आज तिरोहित हो गया है। लोग अब संसद में
> संग्राम भी करते हैं जो आदिम युग में होता था।  [image: SR

> pix]<http://lh4.ggpht.com/_RZzdL9so394/SgtLMXZr9VI/AAAAAAAAH3U/LizCbBIBCng...>
>
> --
>
> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/

अजित वडनेरकर

unread,
Dec 16, 2011, 8:32:07 AM12/16/11
to shabdc...@googlegroups.com
बहुत शुक्रिया बलजीत भाई,
यह आलेख सफ़र के दूसरे पड़ाव में जा रहा है। इन दिनों पब्लिशर द्वारा भेजी प्रूफ़ कॉपी सम्पादित कर रहा हूँ।
इस आलेख को संशोधित करने का अच्छा योग रहा। यह काम आज करता हूँ।
जै हो

2011/12/16 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--


अजित

सृजन शिल्पी Srijan Shilpi

unread,
Dec 17, 2011, 9:09:54 AM12/17/11
to shabdc...@googlegroups.com
image.png

बहुत बढ़िया...

मैं संसद भवन के भीतरी गुम्बदों और दीवारों पर उत्कीर्ण प्राचीन ग्रंथों से उद्धृत कुछ बातें इस प्रसंग में पेश कर रहा हूं, जो शायद इस चर्चा के संदर्भ को व्यापकता दे।

1. ऊपर की फोटो में दिख रहा लोक सभा के भीतरी गुम्बद पर उत्कीर्ण मनुस्मृति का यह श्लोक:

सभा वा न प्रवेष्टया, वक्तव्यं वा समंजसम्। अब्रुवन विब्रुवन वापि, नरो भवति किल्विषी।

(या तो व्यक्ति सभा भवन में प्रवेश न करे या फिर सभा भवन में प्रवेश करने के बाद वहां वह पूरे सदाचार के साथ बोले। जो व्यक्ति वहां नहीं बोलता है या फिर असत्य बोलता है, वह पाप में बराबर का भागी होता है।)    

2. एक मीटिंग हॉल की दीवार पर ऋग्वेद की यह ऋचा देखें:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
समानो मंत्र: समिति: समानी।
समानं मन: सह चित्तमेषाम्।
समानी व आकूति: समाना हृदयानि व।
समानवस्तु वो मनो यथा व: सुहासति।

(मिल-जुलकर बैठो, मिल-जुलकर बात करो, तुम्हारे मन एक जैसा सोचें, एकत्रित जनों का परामर्श साझा हो, संघ साझा हो, उद्दे्श्य साझा हो, इच्छा परस्पर जुड़ी हो, तुम्हारा मंतव्य साझा हो, तुम्हारे हृदय की अभिलाषाएं भी साझी हों, तुम्हारे विचार भी साझे हों जिससे कि तुम्हारे बीच पूर्ण एकता हो सके।) 

3. महाभारत से उद्धृत यह श्लोक भी एक हॉल में उत्कीर्ण है:

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते यो न वदति धर्मम्।
धर्म: स नो यत्र सत्यमस्ति, सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति। 

(वह सभा, सभा नहीं है जिसमें गुरुजन न हों; वे गुरुजन, गुरुजन नहीं हैं जिनकी वाणी में सदाचार न हो; वह सदाचार, सदाचार नहीं है जिसमें सत्य न हो; वह सत्य, सत्य नहीं है जो किसी को कपट के लिए प्रेरित करे।)


2011/12/16 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
सृजन शिल्पी
Welcome to http://srijanshilpi.com
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सृजन शिल्पी Srijan Shilpi

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Dec 17, 2011, 9:31:57 AM12/17/11
to शब्द चर्चा
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इस फोटो में कैमरे का फोकस दीवार पर उत्कीर्ण ऋग्वेद की उस ऋचा पर नहीं है, जिसका जिक्र पिछली टिप्पणी में मैंने किया है। 
  
2011/12/17 vijayasati <vijayas...@gmail.com>
बहुत बढ़िया है यह संकलन !

१७ दिसम्बर २०११ ७:३९ अपराह्न को, सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijan...@gmail.com> ने लिखा:
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अजित वडनेरकर

unread,
Dec 17, 2011, 9:36:32 AM12/17/11
to shabdc...@googlegroups.com
शुक्रिया सृजनजी।
संसद के आशय को स्पष्ट करते ये सन्दर्भ बहुत उपयोगी हैं।

2011/12/17 सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijan...@gmail.com>
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Baljit Basi

unread,
Dec 17, 2011, 10:10:18 AM12/17/11
to शब्द चर्चा
अच्छी जानकारी . शुक्रिया

On 17 दिस., 09:36, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> शुक्रिया सृजनजी।
> संसद के आशय को स्पष्ट करते ये सन्दर्भ बहुत उपयोगी हैं।
>

> 2011/12/17 सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijanshi...@gmail.com>


>
>
>
> > [image: image.png]
>
> > बहुत बढ़िया...
>
> > मैं संसद भवन के भीतरी गुम्बदों और दीवारों पर उत्कीर्ण प्राचीन ग्रंथों से
> > उद्धृत कुछ बातें इस प्रसंग में पेश कर रहा हूं, जो शायद इस चर्चा के संदर्भ
> > को व्यापकता दे।
>
> > 1. ऊपर की फोटो में दिख रहा लोक सभा के भीतरी गुम्बद पर उत्कीर्ण मनुस्मृति
> > का यह श्लोक:
>

> > *सभा वा न प्रवेष्टया, वक्तव्यं वा समंजसम्। अब्रुवन विब्रुवन वापि, नरो
> > भवति किल्विषी।*


>
> > (या तो व्यक्ति सभा भवन में प्रवेश न करे या फिर सभा भवन में प्रवेश करने के
> > बाद वहां वह पूरे सदाचार के साथ बोले। जो व्यक्ति वहां नहीं बोलता है या फिर
> > असत्य बोलता है, वह पाप में बराबर का भागी होता है।)
>
> > 2. एक मीटिंग हॉल की दीवार पर ऋग्वेद की यह ऋचा देखें:
>

> > *संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।*
> > *समानो मंत्र: समिति: समानी।*
> > *समानं मन: सह चित्तमेषाम्।*
> > *समानी व आकूति: समाना हृदयानि व।*
> > *समानवस्तु वो मनो यथा व: सुहासति।*


>
> > (मिल-जुलकर बैठो, मिल-जुलकर बात करो, तुम्हारे मन एक जैसा सोचें, एकत्रित
> > जनों का परामर्श साझा हो, संघ साझा हो, उद्दे्श्य साझा हो, इच्छा परस्पर जुड़ी
> > हो, तुम्हारा मंतव्य साझा हो, तुम्हारे हृदय की अभिलाषाएं भी साझी हों,
> > तुम्हारे विचार भी साझे हों जिससे कि तुम्हारे बीच पूर्ण एकता हो सके।)
>
> > 3. महाभारत से उद्धृत यह श्लोक भी एक हॉल में उत्कीर्ण है:
>

> > *न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते यो न वदति धर्मम्।*
> > *धर्म: स नो यत्र सत्यमस्ति, सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति। *


>
> > (वह सभा, सभा नहीं है जिसमें गुरुजन न हों; वे गुरुजन, गुरुजन नहीं हैं जिनकी
> > वाणी में सदाचार न हो; वह सदाचार, सदाचार नहीं है जिसमें सत्य न हो; वह सत्य,
> > सत्य नहीं है जो किसी को कपट के लिए प्रेरित करे।)
>

> > 2011/12/16 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>


>
> >> बहुत शुक्रिया बलजीत भाई,
> >> यह आलेख सफ़र के दूसरे पड़ाव में जा रहा है। इन दिनों पब्लिशर द्वारा भेजी
> >> प्रूफ़ कॉपी सम्पादित कर रहा हूँ।
> >> इस आलेख को संशोधित करने का अच्छा योग रहा। यह काम आज करता हूँ।
> >> जै हो
>

> >> 2011/12/16 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> ...
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Hansraj sugya

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Dec 17, 2011, 10:12:50 AM12/17/11
to शब्द चर्चा
निश्चित ही सारगर्भित जानकारी है, सृजन जी, आभार


सस्नेह,
हंसराज "सुज्ञ"


'सुज्ञ' ब्लॉग





> Date: Sat, 17 Dec 2011 07:10:18 -0800
> Subject: [शब्द चर्चा] Re: संसद
> From: balji...@yahoo.com
> To: shabdc...@googlegroups.com

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Dec 17, 2011, 12:10:26 PM12/17/11
to shabdc...@googlegroups.com
ऋग्वेद काल के उक्त सुभाषित उस समाज के हैं जिस में वर्ग उत्पन्न ही नहीं हुए थे। वहाँ व्यक्ति महत्वहीन था। जो कुछ था सब कुछ साँझा था। यह अच्छी बात है कि हमारा संसद भवन अभी उन सुभाषितों को उत्कीर्ण किए हुए है। 

2011/12/17 Hansraj sugya <hansra...@msn.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

Madhusudan H Jhaveri

unread,
Dec 17, 2011, 1:48:14 PM12/17/11
to shabdc...@googlegroups.com
Srijan ji
Bahut bahut Dhanyavad.

Alag sanganak  par hun.Roman lipi ke upayog ke lie,kshamaswa,
saari uktiyan sanskrut men dekhakar harshit hun.
Madhusudan.

सृजन शिल्पी Srijan Shilpi

unread,
Dec 19, 2011, 7:09:59 AM12/19/11
to shabdc...@googlegroups.com
धन्यवाद के लिए आप सभी का आभारी हूं। 

2011/12/18 Madhusudan H Jhaveri <mjha...@umassd.edu>



--
सृजन शिल्पी

Rangnath Singh

unread,
Dec 23, 2011, 12:53:07 AM12/23/11
to shabdc...@googlegroups.com
hamara bhi dhanyvad svikar karen (der se dekha) :-)

2011/12/19 सृजन शिल्पी Srijan Shilpi <srijan...@gmail.com>
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