जलंधर के नाम से जुडी एक और कथा है! कथा ऐसी है कि जलंधर दैत्य अपनी सती पत्नी वृंदा के प्रभाववश सबल होता जा रहा था और शिवजी उसका वध नहीं कर पा रहे थे। विवश होकर उन्होंने विष्णुजी से सहायता की याचना की। विष्णुजी ने जब जलंधर का रूप धारण कर वृंदा की मर्यादा भंग कर दी तब जलंधर का दमन शिवजी ने किया। पति और सतीत्व से वंचित वृंदा ने आत्मदाह कर लिया पर इस बीच वृंदा पर मोहित विष्णुजी यह समाचार पाकर इतने क्षुब्ध हो गए कि देवताओं को तुलसी में वृंदा की आत्मा प्रतिष्ठित करनी पड़ी। अतः हर शाम वृंदा की आत्मा तुलसी पर उतरती है और विष्णु के साथ रमण कर प्रातः विदा हो जाती है। इसी कारण रात के समय तुलसी पत्र तोड़ना वर्जित है। तुलसी को वृंदा, विष्णु वल्लभा, विष्णु पत्नी, वैष्णवी, देव दुंदुभि आदि भी कहा जाता है।
(Link: http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/others/0711/21/1071121015_1.htm)
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जलंधर ===> पुं०
[सं० जल√धृ (धारण)+खच्, मुम्] १. एक प्रसिद्ध राक्षस जिसका जन्म
समुद्र से माना जाता है, और जिसका वध विष्णु ने किया था। २.
नाथपंथी एक सिद्ध। पुं=जलोदर (रोग)
Source: Pustak.org
On 3 मार्च, 06:42, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> कहानी के अनुसार तो ब्रह्मा ने इसलिए जलंधर नाम दिया क्योंकि उसकी वजह से उनके
> नेत्रों में जल आया। यानी उसके पास पान था।
> जल+धर से जलधर बनेगा जिसका अर्थ भी पानी को धारण करने वाला होता है। बादल,
> मेघ। आदि।
> जलम्+धर से जलंधर बना। भाव इसमें भी वही है। यह पौराणिक चरित्र भी है, हठयोग
> की मुद्रा भी है और एक नाथ योगी भी।
> युगंधर में अगर युग को धारण करने का अर्थ है उस तर्क से भी जलंधर में जल को
> धारण करने का अर्थ ही आएगा।
> मोनियर विलियम्स भी " water-bearer " ही कहते हैं।
>
> मुद्दा ब्रह्मा की आँखो से पानी आने से जुड़ा है। सभी कथाएँ तयशुदा निष्कर्षों
> पर गढ़ी जाती रहीं। मुद्दा जलंधर के अस्तित्व में आने का है। समुद्र गौण है।
> अगर कथा में थोड़ा परिवर्तन कर के देखें शिव की ऊर्जा पेड़ पर भी गिरती तो भी
> उर्जा का रूपान्तर दैत्य शिशु में ही होना था। बाकी कथा जस की तस रहती। वह
> शिशु ब्रह्मा का गला दबाता, ज़ाहिर है ब्रह्मा के आँसू ही निकलते। उस अनाम
> दैत्यशिशु को जलंधर कहने का तात्पर्य यही कि यह स्वयं जलधारक, जलसमृद्ध है।
> जन्म लेते ही जो संतान समृद्धि लाती है उसे लक्ष्मी या कुबेर जैसे नामों से
> पुकारने के पीछे यह तर्क होता था।
>
> 2013/3/3 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
>
>
> > क्या ये सम्भव है कि जलंधर का अर्थ जल के द्वारा धारण करने से हो? जैसे कि
> > कहानी संकेत कर रही है कि शिव की क्रोधाग्नि को समुद्र के जल 'ने' धारण किया-
> > जो बालक के रूप में जलंधर कहलाया.. ?
>
> > 2013/3/3 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
> >> ठीक वैसे ही जैसे युगंधर का अर्थ जुए को धारण करने से है। मूल आशय चाहे जो
> >> हो प्रतीक के माध्यम से इसमें कृष्ण, युगपुरुष, कालपुरुष जैसी व्यंजनाएँ
> >> स्पष्ट हैं।
>
> >> 2013/3/3 अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com>
>
> >>> बोधिभाई, जलंधर का सीधा सा अर्थ जल को धारण करने से ही है। चाहे यह जलधार
> >>> के अर्थ में हो या जलधर के रूप में। दोनो भाव इसमें हैं। धार, धारा जैसे
> >>> शब्दों में भी धारण करने का आशय ही है। कथाओं से कुछ हासिल नहीं होने वाला।
> >>> क्षेपकों का चलन तो आप जानते ही हैं।
>
> >>> 2013/3/3 Mukesh Tyagi <mukesh.conc...@gmail.com>
>
> >>>> जलंधर <http://dict.hinkhoj.com/words/meaning-of--in-english.html> ===> पुं०
> >>>> [सं० जल√धृ (धारण)+खच्, मुम्] १. एक प्रसिद्ध राक्षस जिसका जन्म समुद्र
> >>>> से माना जाता है, और जिसका वध विष्णु ने किया था। २. नाथपंथी एक सिद्ध।
> >>>> पुं=जलोदर (रोग)
>
> >>>> Source: Pustak.org
>
> >>>> (लिंक:
> >>>>http://dict.hinkhoj.com/hindi-dictionary.php?scode=dict_home&word=%E0%A
> >>>> 4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%B0)
>
> >>>> 2013/3/3 Mukesh Tyagi <mukesh.conc...@gmail.com>
>
> >>>>> जलंधर के नाम से जुडी एक और कथा है! कथा ऐसी है कि जलंधर दैत्य अपनी
> >>>>> सती पत्नी वृंदा के प्रभाववश सबल होता जा रहा था और शिवजी उसका वध नहीं कर पा
> >>>>> रहे थे। विवश होकर उन्होंने विष्णुजी से सहायता की याचना की। विष्णुजी
> >>>>> ने जब जलंधर का रूप धारण कर वृंदा की मर्यादा भंग कर दी तब जलंधर का दमन शिवजी
> >>>>> ने किया। पति और सतीत्व से वंचित वृंदा ने आत्मदाह कर लिया पर इस बीच वृंदा पर
> >>>>> मोहित विष्णुजी यह समाचार पाकर इतने क्षुब्ध हो गए कि देवताओं को तुलसी में
> >>>>> वृंदा की आत्मा प्रतिष्ठित करनी पड़ी। अतः हर शाम वृंदा की आत्मा तुलसी पर
> >>>>> उतरती है और विष्णु के साथ रमण कर प्रातः विदा हो जाती है। इसी कारण रात के
> >>>>> समय तुलसी पत्र तोड़ना वर्जित है। तुलसी को वृंदा, विष्णु वल्लभा, विष्णु
> >>>>> पत्नी, वैष्णवी, देव दुंदुभि आदि भी कहा जाता है।
>
> >>>>> (Link:
> >>>>>http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/others/0711/21/1071121015...
> >>>>> )
>
> >>>>> 2013/3/3 Bodhisatva <abod...@gmail.com>
>
> >>>>>> पुराण कथाओं में शिव के माथे वाली आँख से एक क्रोधाग्नि निकलती है। वह
> >>>>>> इंद्र को जलाए कि उसके पहले देव गुरु के निवेदन पर
> >>>>>> महादेव उसे समुद्र की ओर मोड़ देते हैं। समुद्र में जाकर वह अग्नि या
> >>>>>> ज्योति एक बालक का रूप ले लेती है। ब्रह्म देव उसे शिव का
> >>>>>> अंश मान कर उसके पास जाते हैं। उसे गोंद में उठाते हैं तो वह बालक
> >>>>>> ब्रह्मा जी का गला दबाने लगता है। ब्रह्मा जी के आँखों से जल
> >>>>>> गिरने लगता है, वे रोने लगते हैं, और उस बालक का नाम जलंधर रखते हैं।
> >>>>>> ब्रह्मा जी कहते हैं कि इसके कारण मेरे नेत्रों से जल निकला
> >>>>>> अतएव इसका नाम जलंधर होगा। मेरा सवाल है कि इस जलंधर का अर्थ क्या है।
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On 3 मार्च, 11:20, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> अंतर, अंदर के सिलसिले में शब्दों का सफ़र की इस कड़ी पर भी नज़र डाली जा सकती
> है-
> अंदरखाने की बात <http://shabdavali.blogspot.in/2010/05/blog-post_20.html>
मैंने दोनों बातें जानकारी हित ही दी हैं। यह तो मैं समझता हूँ कि 'जल
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On 3 मार्च, 12:05, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> प्राजी ,
> जंलधर ते जलंधर उत्ते लिखना मैं वी सालां से मुलतवी कीता होया । जलंधर दे
> टांडा उडमुड पिंड नाल मेरा वी रिशता रेहा है ।
> तुसी जाणदे ही हो । वधिया है इस चरचा से सानूं फायदा ही होणा है ।
>
> तुहाडी जै हो
>
> 2013/3/3 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>
>
>
>
>
> > मैंने दोनों बातें जानकारी हित ही दी हैं। यह तो मैं समझता हूँ कि 'जल
> > अन्दर' वाली बात का यहाँ कोई महत्व नहीं . नाथ परम्परा में जालंधर नाथ का
> > क्या मतलब लिया जाता है, यह जानना भी ज़रूरी है। दरअसल मैं बहुत देर से
> > जालंधर पर लिखना चाह रहा हूँ। यह चर्चा अगर किसे सिरे लगती है तो मुझे
> > लाभ ही है।जालंधर मेरे गाँव का जिला भी है, नज़दीक भी है , इसके साथ
> > भावुकता भी है। यह किसी वक्त नाथों का केंद्र रहा है। जालंधर नाथ का एक
> > नाम हडी-पा भी है . अब बहुत कुछ भूल गया हूँ . यहाँ मेरे पास भारती
> > श्रोतों की कमी रहती है।
>
> > On 3 मार्च, 11:20, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> > > अंतर, अंदर के सिलसिले में शब्दों का सफ़र की इस कड़ी पर भी नज़र डाली जा
> > सकती
> > > है-
> > > अंदरखाने की बात <http://shabdavali.blogspot.in/2010/05/blog-post_20.html
>
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जलम्+धर से जलंधर बना। भाव इसमें भी वही है। यह पौराणिक चरित्र भी है, हठयोग की मुद्रा भी है और एक नाथ योगी भी।