पश्चाताप और पश्चात्ताप

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vinit utpal

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Mar 9, 2013, 1:19:54 AM3/9/13
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पश्चाताप और पश्चात्ताप, दोनों में कौन सही है। कृपया ज्ञानवर्धन करें।

Vinod Sharma

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Mar 9, 2013, 1:32:57 AM3/9/13
to shabdc...@googlegroups.com

दूसरा सही है

On Mar 9, 2013 11:49 AM, "vinit utpal" <vinit...@gmail.com> wrote:
पश्चाताप और पश्चात्ताप, दोनों में कौन सही है। कृपया ज्ञानवर्धन करें।

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Abhay Tiwari

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Mar 9, 2013, 2:05:17 AM3/9/13
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संस्कृत में पश्चात्ताप ही है.. मगर हिन्दी में पश्चाताप अधिक प्रचलित है.. 

Sandeep Tiwari

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Mar 9, 2013, 6:18:57 PM3/9/13
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हिंदी मैं पश्चात्ताप का प्रयोग पहली बार देख रहा हूँ। हिंदी के कुछ वर्तनी ठीक करने वाले साफ्टवेयर जो मात्र मानकियकरण के अनुसार ही काम करते है। वह पश्चात्ताप को अनुमति नहीं देते। उसमें तो पश्चाताप ही सही है। यह जाँच मैंने माइक्रोसाफ्ट अशुद्धि जाँच उपकरण २०१३ पर जाँचा है।  
धन्यवाद
 

narayan prasad

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Mar 9, 2013, 10:42:26 PM3/9/13
to shabdc...@googlegroups.com
पश्चात्ताप = पश्चात् + ताप
हिन्दी में पश्चा नहीं, बल्कि तत्सम शब्द पश्चात् ही चलता है । इसलिए तत्त्व (= तत् + त्व), महत्त्व = महत् + त्व, की तरह ही पश्चात्ताप । परन्तु यदि तत्व और महत्व को हिन्दी के लिए सही मान लिया जाता है तो पश्चाताप को भी सही माना जा सकता है ।
--- नारायण प्रसाद

2013/3/9 vinit utpal <vinit...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Mar 9, 2013, 10:49:30 PM3/9/13
to shabdc...@googlegroups.com
बिलकुल सही कहा है नारायणजी ने।
मुझे लगता है कि अब प्रश्न के उत्तर को दो श्रेणियों में विभाजित करना होगा।
1. सही 2. प्रचलित
आज हिंदी की जो स्थिति इसलिए प्रश्नकर्ता के सामने दोनों विकल्प हैं:
सही - पश्चात्ताप  (व्याकरण के अनुसार)
प्रचलित - पश्चाताप (चलन के अनुसार)

2013/3/10 narayan prasad <hin...@gmail.com>

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विनोद शर्मा

दिनेशराय द्विवेदी

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Mar 9, 2013, 11:44:41 PM3/9/13
to shabdc...@googlegroups.com
अपने तो सवाल ही समझ नहीं आया। पश्च और ताप के संयोजन में ये दूसरा त कहाँ से घुसा?


2013/3/10 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan,
क्लिक करें, ब्लाग पढ़ें ...  अनवरत    तीसरा खंबा

Vinod Sharma

unread,
Mar 10, 2013, 1:16:37 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
नारायणजी का आशय यह था कि
यहाँ संधि विच्छेद पश्चात् + ताप है।
पश्च + ताप नहीं।

2013/3/10 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>

दिनेशराय द्विवेदी

unread,
Mar 10, 2013, 3:07:00 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
भाई, हम तो संस्कृत के अल्पज्ञानी हैं, अल्पज्ञानी भी नहीं संगत वाले समझिए। पर हिन्दी में पश्च से सैंकड़ों शब्द बने हैं। स्ंस्कृत का पश्चात भी संभवतः पश्च + यात से निर्मित है। फिर पश्च् + तापः = पश्चाताप क्यों नहीं हो सकता?

Vinod Sharma

unread,
Mar 10, 2013, 4:15:12 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
होने को तो सब कुछ हो सकता है, और हो भी रहा है।
पश्चाताप खूब प्रचलन में है। किन्तु प्रश्नकर्ता का प्रश्न था कि दोनों में से सही कौनसा है?
आधुनिक हिंदी में अधिकतर शब्दों के दो रूप हैं-एक शुद्ध, दूसरा प्रचलित।
शुद्ध वर्तनी के लिए शब्दसागर का यह लिंक देखें-
अब बात आती है पश्च और पश्चात की, दोनों के अर्थ में अंतर है।
पश्च का अर्थ है- पीछे का, पीछे बैकसाइड, और 
पश्चात का अर्थ है - बाद में, आफ़्टर
क्रोध के गुजर जाने के बाद जो स्थिति होती है
पश्चात + ताप, वह कहलाती है पश्चात्ताप। किन्तु जिस प्रकार सरलीकरण के दौर में महत्त्व चलन में महत्व बन गया उसी प्रकार दो त् को अनावश्यक समझ उपयोगकर्ताओं ने पश्चाताप अपना लिया। देखा जाए तो पश्चाताप के प्रयोग का प्रतिशत लगभग दुगुना है।  
सादर,
विनोद शर्मा

Abhay Tiwari

unread,
Mar 10, 2013, 4:58:50 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी संस्कृत नहीं है.. जो संस्कृत में शुद्ध है उसी को हिन्दी का भी शुद्ध रूप माना जाय ये ज़िद छोड़ देनी चाहिये.. ऐसे अनेक शब्द हैं जो संस्कृत से हिन्दी में आए हैं मगर उनका थोड़ा बदला रूप हिन्दी में चलता है.. ये भी वैसे ही है..  

2013/3/10 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

Anil Janvijay

unread,
Mar 10, 2013, 8:00:01 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी में तीस-चालीस साल पहले तक 'पश्चात्ताप' ही चलता था। बचपन में मैंने हमेशा 'पश्चात्ताप' पढ़ा है। लेकिन बाद में जब हिन्दी के मानकीकरण की बात शुरू हुई और विद्वानों की एक समिति ने हिन्दी के मानकीकरण के लिए नियम बना दिए तो उनमें से एक नियम यह भी था कि 'त्त' की जगह इस तरह के शब्दों में सिर्फ़ 'त' लिखा जाए। अब  'पश्चाताप' ही चल रहा है।
 

 
2013/3/10 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>



--
anil janvijay
कृपया हमारी ये वेबसाइट देखें
www.rachnakosh.com

Moscow, Russia
+7 916 611 48 64 ( mobile)

Baljit Basi

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Mar 10, 2013, 8:03:25 AM3/10/13
to शब्द चर्चा
पंजाबी में इसे 'पछतावा' कहते हैं।

On 10 मार्च, 08:00, Anil Janvijay <aniljanvi...@gmail.com> wrote:
> हिन्दी में तीस-चालीस साल पहले तक 'पश्चात्ताप' ही चलता था। बचपन में मैंने
> हमेशा 'पश्चात्ताप' पढ़ा है। लेकिन बाद में जब हिन्दी के मानकीकरण की बात शुरू
> हुई और विद्वानों की एक समिति ने हिन्दी के मानकीकरण के लिए नियम बना दिए तो
> उनमें से एक नियम यह भी था कि 'त्त' की जगह इस तरह के शब्दों में सिर्फ़ 'त'
> लिखा जाए। अब  'पश्चाताप' ही चल रहा है।
>

> 2013/3/10 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>
>
> > हिन्दी संस्कृत नहीं है.. जो संस्कृत में शुद्ध है उसी को हिन्दी का भी शुद्ध
> > रूप माना जाय ये ज़िद छोड़ देनी चाहिये.. ऐसे अनेक शब्द हैं जो संस्कृत से
> > हिन्दी में आए हैं मगर उनका थोड़ा बदला रूप हिन्दी में चलता है.. ये भी वैसे
> > ही है..
>

> > 2013/3/10 Vinod Sharma <vinodjisha...@gmail.com>


>
> >> होने को तो सब कुछ हो सकता है, और हो भी रहा है।
> >> पश्चाताप खूब प्रचलन में है। किन्तु प्रश्नकर्ता का प्रश्न था कि दोनों में
> >> से सही कौनसा है?
> >> आधुनिक हिंदी में अधिकतर शब्दों के दो रूप हैं-एक शुद्ध, दूसरा प्रचलित।
> >> शुद्ध वर्तनी के लिए शब्दसागर का यह लिंक देखें-
>

> >>http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/search3advanced?dbname=da...


> >> अब बात आती है पश्च और पश्चात की, दोनों के अर्थ में अंतर है।
> >> पश्च का अर्थ है- पीछे का, पीछे बैकसाइड, और
> >> पश्चात का अर्थ है - बाद में, आफ़्टर
> >> क्रोध के गुजर जाने के बाद जो स्थिति होती है
> >> पश्चात + ताप, वह कहलाती है पश्चात्ताप। किन्तु जिस प्रकार सरलीकरण के दौर
> >> में महत्त्व चलन में महत्व बन गया उसी प्रकार दो त् को अनावश्यक समझ
> >> उपयोगकर्ताओं ने पश्चाताप अपना लिया। देखा जाए तो पश्चाताप के प्रयोग का
> >> प्रतिशत लगभग दुगुना है।
> >> सादर,
> >>  विनोद शर्मा
>

> >>  2013/3/10 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


>
> >>> भाई, हम तो संस्कृत के अल्पज्ञानी हैं, अल्पज्ञानी भी नहीं संगत वाले
> >>> समझिए। पर हिन्दी में पश्च से सैंकड़ों शब्द बने हैं। स्ंस्कृत का पश्चात भी
> >>> संभवतः पश्च + यात से निर्मित है। फिर पश्च् + तापः = पश्चाताप क्यों नहीं हो
> >>> सकता?
>

> >>> 2013/3/10 Vinod Sharma <vinodjisha...@gmail.com>


>
> >>>> नारायणजी का आशय यह था कि
> >>>> यहाँ संधि विच्छेद पश्चात् + ताप है।
> >>>> पश्च + ताप नहीं।
>

> >>>> 2013/3/10 दिनेशराय द्विवेदी <drdwive...@gmail.com>


>
> >>>>> अपने तो सवाल ही समझ नहीं आया। पश्च और ताप के संयोजन में ये दूसरा त
> >>>>> कहाँ से घुसा?
>

> >>>>> 2013/3/10 Vinod Sharma <vinodjisha...@gmail.com>


>
> >>>>>> बिलकुल सही कहा है नारायणजी ने।
> >>>>>> मुझे लगता है कि अब प्रश्न के उत्तर को दो श्रेणियों में विभाजित करना
> >>>>>> होगा।
> >>>>>> 1. सही 2. प्रचलित
> >>>>>> आज हिंदी की जो स्थिति इसलिए प्रश्नकर्ता के सामने दोनों विकल्प हैं:
> >>>>>> सही - पश्चात्ताप  (व्याकरण के अनुसार)
> >>>>>> प्रचलित - पश्चाताप (चलन के अनुसार)
>
> >>>>>> 2013/3/10 narayan prasad <hin...@gmail.com>
>
> >>>>>>> पश्चात्ताप = पश्चात् + ताप
> >>>>>>> हिन्दी में पश्चा नहीं, बल्कि तत्सम शब्द पश्चात् ही चलता है । इसलिए
> >>>>>>> तत्त्व (= तत् + त्व), महत्त्व = महत् + त्व, की तरह ही पश्चात्ताप । परन्तु
> >>>>>>> यदि तत्व और महत्व को हिन्दी के लिए सही मान लिया जाता है तो पश्चाताप को भी
> >>>>>>> सही माना जा सकता है ।
> >>>>>>> --- नारायण प्रसाद
>

> >>>>>>> 2013/3/9 vinit utpal <vinitut...@gmail.com>


>
> >>>>>>>> पश्चाताप और पश्चात्ताप, दोनों में कौन सही है। कृपया ज्ञानवर्धन करें।
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अजित वडनेरकर

unread,
Mar 10, 2013, 8:09:12 AM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
पश्चाताप का अपभ्रंश ही पछतावा है बलजीत भाई जो हिन्दी ज्यादा प्रचलित है।

2013/3/10 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
औरंगाबाद/भोपाल, 07507777230


  

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 10, 2013, 2:52:14 PM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
अब तक की चर्चा का सार तो यही लगता है कि 'पश्चाताप' और 'पश्चात्ताप' में से पहले को सही कहा जाना चहिये. यह हिंदी के मानकीकरण के नियमानुसार है। "जो संस्कृत में शुद्ध है उसी को हिन्दी का भी शुद्ध रूप माना जाय" यह ज़िद भी यहाँ नहीं है. लेकिन क्या प्रकारांतर से हम 'पश्चात्ताप' को गलत कह रहे हैं? मूल प्रश्न यही तो था कि "पश्चाताप और पश्चात्ताप, दोनों में कौन सही है?" संस्कृतज्ञों के कुछ अनावश्यक आग्रहों का परिणाम है कि हिंदी के कुछ लोग संस्कृत को कभी-कभी हिकारत की निगाह से देखते जान पड़ते हैं. मैं सोचता हूँ अगर सवाल उठे कि 'तदोपरांत' और 'तदुपरांत' में से कौन सही है, तो उसका जवाब क्या होगा? 'उपर्युक्त' उपरि +उक्त से बनता है. यह तो संस्कृत शब्द हुआ. हिंदी का उपरोक्त कैसे बना है? ऊपर+उक्त से? लेकिन फिर तो यह ऊपरोक्त होना चाहिये।  या यहाँ संधि के नियम को शिथिल करते हुए उपरोक्त बना दिया गया है? मेरी राय में 'पश्चाताप' और 'पश्चात्ताप' के सन्दर्भ में यह कहा जाना चाहिए कि शब्द मूलतः 'पश्चात्ताप' है जो हिंदी में 'पश्चाताप' हो गया है और वह वहां उसी रूप में प्रचलित है. चूंकि संस्कृत और हिंदी में गहरा नाता है, इसलिए हिंदी में संस्कृत के बहुत सारे शब्द शामिल हैं. कुछ अन्य संस्कृत शब्दों ने हिंदी में कुछ भिन्न रूप धारण कर लिए हैं और वे उस रूप में वहां अशुद्ध नहीं कहे जाएंगे। किन्तु इस कारण उनके संस्कृत रूप हिंदी में अस्वीकार्य नहीं हैं, न ही उन्हें अशुद्ध कहा जा सकता है. संस्कृत के नाम पर हिंदी के अधीर/असहज होने का कोई कारण नहीं है. न ही संस्कृत के सामने हिंदी में हीनभाव आने की कोई बात है. बेटी माँ नहीं है, किन्तु उसमें सहज-स्वाभाविक रूप से माँ की झलक दिखे तो दोनों में से किसी के लिए यह लज्जा या हीनता का विषय नहीं है. यह सही है कि भाषा एक प्रवाह है। किन्तु उसके बावजूद वह नियमों को स्वीकारती है. उसे अराजक या बाढ़ बनकर नहीं बहना होता है.                        

2013/3/10 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>



--
Dr. S. S. Jaiswal

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 10, 2013, 2:56:32 PM3/10/13
to shabdc...@googlegroups.com
एकदम सहमत। इसमे किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। बात वही है कुछ लोग प्रचलित रूप लिखते हैं, कुछ लोग शुद्ध। इसका यह अर्थ नहीं कि प्रचलित अशुद्ध हो गया, नहीं। प्रचलन ने उसे मान्यता दी है। इन दो उच्चारों या रूपों से हट कर कोई तीसरा रूप अशुद्ध होगा।


2013/3/11 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>

Vinod Sharma

unread,
Mar 11, 2013, 6:25:25 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय जायसवालजी,
आपका विवेचन निश्चय ही सराहनीय है।
इस सूत्र की शुरुआत में जब प्रश्नकर्ता ने यह पूछा कि दोनों में से सही कौनसा है
तो शब्दकोशों में पश्चात्ताप ही मिला, अतः वही प्रश्नकर्ता को संप्रेषित कर दिया गया।
यह बात अलग है कि पुराने शब्दकोशों को केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निर्देशानुसार
अद्यतित नहीं किया गया है, जिससे कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। अतः
हम लोगों के लिए यही ठीक रहेगा कि संदेह की स्थिति में किसी भी वर्तनी को
सही/गलत की बजाय अधिक प्रचलित/कम प्रचलित की श्रेणी में रखा जाए।
अभयजी का झिड़की से मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ।

सादर,
विनोद शर्मा
2013/3/11 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>
अब तक की चर्चा का सार तो यही लगता है कि 'पश्चाताप' और 'पश्चात्ताप' में से पहले को सही कहा जाना चहिये. यह हिंदी के मानकीकरण के नियमानुसार है। "जो संस्कृत में शुद्ध है उसी को हिन्दी का भी शुद्ध रूप माना जाय" यह ज़िद भी यहाँ नहीं है. लेकिन क्या प्रकारांतर से हम 'पश्चात्ताप' को गलत कह रहे हैं? मूल प्रश्न यही तो था कि "पश्चाताप और पश्चात्ताप, दोनों में कौन सही है?" संस्कृतज्ञों के कुछ अनावश्यक आग्रहों का परिणाम है कि हिंदी के कुछ लोग संस्कृत को कभी-कभी हिकारत की निगाह से देखते जान पड़ते हैं. मैं सोचता हूँ अगर सवाल उठे कि 'तदोपरांत' और 'तदुपरांत' में से कौन सही है, तो उसका जवाब क्या होगा? 'उपर्युक्त' उपरि +उक्त से बनता है. यह तो संस्कृत शब्द हुआ. हिंदी का उपरोक्त कैसे बना है? ऊपर+उक्त से? लेकिन फिर तो यह ऊपरोक्त होना चाहिये।  या यहाँ संधि के नियम को शिथिल करते हुए उपरोक्त बना दिया गया है? मेरी राय में 'पश्चाताप' और 'पश्चात्ताप' के सन्दर्भ में यह कहा जाना चाहिए कि शब्द मूलतः 'पश्चात्ताप' है जो हिंदी में 'पश्चाताप' हो गया है और वह वहां उसी रूप में प्रचलित है. चूंकि संस्कृत और हिंदी में गहरा नाता है, इसलिए हिंदी में संस्कृत के बहुत सारे शब्द शामिल हैं. कुछ अन्य संस्कृत शब्दों ने हिंदी में कुछ भिन्न रूप धारण कर लिए हैं और वे उस रूप में वहां अशुद्ध नहीं कहे जाएंगे। किन्तु इस कारण उनके संस्कृत रूप हिंदी में अस्वीकार्य नहीं हैं, न ही उन्हें अशुद्ध कहा जा सकता है. संस्कृत के नाम पर हिंदी के अधीर/असहज होने का कोई कारण नहीं है. न ही संस्कृत के सामने हिंदी में हीनभाव आने की कोई बात है. बेटी माँ नहीं है, किन्तु उसमें सहज-स्वाभाविक रूप से माँ की झलक दिखे तो दोनों में से किसी के लिए यह लज्जा या हीनता का विषय नहीं है. यह सही है कि भाषा एक प्रवाह है। किन्तु उसके बावजूद वह नियमों को स्वीकारती है. उसे अराजक या बाढ़ बनकर नहीं बहना होता है.                        



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Bodhi Sattva

unread,
Mar 11, 2013, 6:45:59 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
पछता के काम चला रहा हूँ। इसी का पछतावा है। लेकिन अब पछताए होत का 

2013/3/11 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>



--
Dr. Bodhisatva, mumbai
0-9820212573

Abhay Tiwari

unread,
Mar 11, 2013, 7:15:56 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
क्षमा चाहता हूँ विनोद जी, किसी को भी झिड़कने का मेरा आशय क़तई नहीं था.. भूलवश ऐसा भाव आ गया.. इसका अफसोस है. 

2013/3/11 Vinod Sharma <vinodj...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
Mar 11, 2013, 7:29:35 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
तो क्या महत्ता के स्थान पर महता लिखा जा सकता है ?
---नारायण प्रसाद

2013/3/10 Anil Janvijay <anilja...@gmail.com>

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 11, 2013, 7:33:31 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
नहीं विनोद जी, आपने शुरू से ही सही बात कही है. 'अभयजी की झिड़की' का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है. दो में से एक को सही बताना हो तो वही कहेंगे जो आपने कहा. सही/गलत की बजाय अधिक प्रचलित/कम प्रचलित वाला आपका सुझाव भी समझ में आता है. अंग्रेजी व्याकरण में अब किसी चीज़ को correct/incorrect की बजाय acceptable/unacceptable कहने का चलन देखने में आता है. .   


2013/3/11 Bodhi Sattva <abo...@gmail.com>

अजित वडनेरकर

unread,
Mar 11, 2013, 7:51:37 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
महत्ता को महता शायद ही कोई लिखता हो नारायणजी।
भाषा के क्षेत्र में सर्वस्वीकार्यता और प्रचलन को ही मान्यता मिलती है। शब्द का ध्वनितंत्र से गहरा रिश्ता है। महत्ता का त्त आसानी से उच्चरित है जबकि पश्चात्ताप में अन्त्य वर्ण प है। अन्त्य वर्ण त्ता होने से उच्चार में आसानी होती है। स्वर पर जब भी अन्त होगा वहाँ बदलाव कम होते हैं और व्यंजन पर जब भी अन्त होता है तो उससे पहले के स्वर और उच्चार बदलते हैं। यह स्वाभाविक सी बात है।

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 11, 2013, 7:54:16 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
आदरणीय नारायण प्रसाद जी,
आपने एक बात कही थी: "तत्व और महत्व को हिन्दी के लिए सही मान लिया जाता है तो पश्चाताप को भी सही माना जा सकता है।" तत्व और महत्व तो हिंदी में स्वीकार हो चुके हैं। महत्ता के स्थान पर महता को तो स्वीकृति नहीं मिली है. व्याकरण की जैसी पृष्ठभूमि आपकी लगाती है, महता को तो आप भी स्वीकार योग्य नहीं कहेंगे। भाषा के लिए मैंने कहा था कि वह एक प्रवाह है। किन्तु उसके बावजूद वह नियमों को स्वीकारती है. उसे अराजक या बाढ़ बनकर नहीं बहना होता है. ऐसा आप सरीखे लोगों की वज़ह से ही सम्भव होता है और उसमें अपेक्षित वैज्ञानिकता का अंश बचा रहता है.                     

narayan prasad

unread,
Mar 11, 2013, 8:38:28 AM3/11/13
to shabdc...@googlegroups.com
<<व्याकरण की जैसी पृष्ठभूमि आपकी लगाती है, महता को तो आप भी स्वीकार योग्य नहीं कहेंगे। >>

लगता है, बार-बार मुझे अपने सन्देश के पहले पूर्व सन्देश के अंश को ही उद्धृत करना पड़ेगा । मैंने किस बात पर यह टिप्पणी की थी, उस सन्देश को मैंने संलग्न कर दिया था । खैर, मैं इसे यहाँ अपने सन्देश में ही नीचे उद्धृत कर रहा हूँ -

<<हिन्दी में तीस-चालीस साल पहले तक 'पश्चात्ताप' ही चलता था। बचपन में मैंने हमेशा 'पश्चात्ताप' पढ़ा है। लेकिन बाद में जब हिन्दी के मानकीकरण की बात शुरू हुई और विद्वानों की एक समिति ने हिन्दी के मानकीकरण के लिए नियम बना दिए तो उनमें से एक नियम यह भी था कि 'त्त' की जगह इस तरह के शब्दों में सिर्फ़ 'त' लिखा जाए। अब  'पश्चाताप' ही चल रहा है।>>

---नारायण प्रसाद

Sheo S. Jaiswal

unread,
Mar 11, 2013, 1:03:00 PM3/11/13
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आदरणीय नारायण जी,
मैं अपनी बात शायद ठीक से नहीं कह पाया. मैंने तो आपकी बात का समर्थन किया था। आपने 'पश्चात्ताप' की 'पश्चाताप' तक की यात्रा को बहुत स्पष्ट समझाया है. महत्ता के बारे में आपके प्रश्न का उत्तर भी साफ़ है. भाषा परंपरा होती है, फिर भी उसके व्यवहार को समझा-समझाया जा सके, इसलिए वह कुछ नियमों के आधार पर चलती है. उन्हीं को व्याकरण कह दिया जाता है. संस्कृत अन्य भाषाओँ की तुलना में अधिक वैज्ञानिक है. इसलिए उसमें वर्तनी, उच्चारण, शब्द/वाक्य रचना, शब्दार्थ आदि में अपेक्षया अधिक सहूलियत महसूस होने की बात कही जाती है. अगर वर्तनी, उच्चारण आदि को लेकर हिंदी में भी नियमों की बात की जाय तो यह अस्वाभाविक नहीं है. बाकी प्रचलन तो अपनी जगह महत्वपूर्ण है ही. आपके व्याकरण की पृष्ठभूमि का उल्लेख मैंने प्रशंसा के रूप में किया था. कुछ संस्कृत मैंने भी पढ़ी थी। बाद में अंग्रेजी के चक्कर में काफी कुछ भूल-भाल गया. लेकिन आपकी शैली में बात करने वालों के प्रति आकर्षण बरकरार है.         

2013/3/11 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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narayan prasad

unread,
Mar 11, 2013, 2:17:11 PM3/11/13
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<<महत्ता के बारे में आपके प्रश्न का उत्तर भी साफ़ है.>>

"त्व" प्रत्यय या "ता" प्रत्यय लगभग एक ही अर्थ का सूचक होता है । हाँ, जबकि पहला पु॰ है तो दूसरा स्त्री॰ । लेकिन -
महत् + त्व = महत्त्व (importance)
महत् + ता = महत्ता (greatness) = महानता

"देवत्व" और "देवता" में भी स्पष्ट अन्तर हिन्दी में है ।
--- नारायण प्रसाद


2013/3/11 Sheo S. Jaiswal <jais...@gmail.com>
आदरणीय नारायण जी,

lalit sati

unread,
Mar 13, 2013, 1:51:51 AM3/13/13
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2.9.2 जिन तत्सम शब्दों में तीन व्यंजनों के संयोग की स्थिति में एक द्‍‌वित्वमूलक व्यंजन लुप्त हो गया है उसे न लिखने की छूट है। जैसे :– अर्द्‌ध > अर्ध, तत्‍त्व > तत्व आदि। (मानक हिंदी वर्तनी)


2013/3/11 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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