नारायण

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अभय तिवारी

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Sep 25, 2014, 10:02:40 AM9/25/14
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आप्टे संस्कृत हिंदी कोश में नारायण की यह व्युत्पत्ति दी है: 

" आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः , ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायणः स्मृतः " 

मोटा अर्थ समझ लेने के चक्कर में कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है इसलिए यहाँ पूछ रहा हूँ जो बता सकते हों, वे बताएं ! 

या कोई दूसरी निरुक्ति जानते हो तो बताएं ! 

narayan prasad

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Sep 25, 2014, 12:05:28 PM9/25/14
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आपको शंका किस बात की है, यह स्पष्ट नहीं हुआ । आप्टे कोश में सन्दर्भ मनु॰1.10 दिया है । विस्तृत विवेचन के लिए वहाँ भी देख सकते हैं ।
संक्षेप में -
नारायण = नार + अयन
नार = जल
आपः (बहु॰) = जल
नारायण --- जल ही अयन है जिसका ।
--- नारायण प्रसाद

--
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Abhay Tiwari

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Sep 25, 2014, 12:22:20 PM9/25/14
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वाक्य के पूरे अनुवाद में सहायता चाहता हूँ

अजित वडनेरकर

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Sep 25, 2014, 3:39:29 PM9/25/14
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अभय भाई,

मेरी खोज-बीन से कुछ शंका समाधान हो सके। संक्षेप में बात यूँ है-

 

'नारायण' शब्द में ही हमें नारी की व्युत्पत्ति का भी संकेत मिलता है। मनुस्मृति में नारायण की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा गया है-"आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः, ता यदस्यायनं पूर्व तेन नारायणः स्मृतः"। यानी "सृष्टिपूर्व ‘नार’ नामक जल ही ‘नर’ ( स्वयंभू पुरुष ) का आश्रय था। इसीलिए वह नारायण है।" पौराणिक ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर यही बात कही गई है कि सृष्टि का आरम्भ जल तत्व से हुआ है उसमें ही पितृत्व व मातृत्व  है। यहाँ नर को परमब्रह्म माना गया है अर्थात सृष्टि को उत्पन्न करने वाला नर ( पुरुष)। 'नार' अर्थात स्वयंभु परमब्रह्म की अन्तर्निहित विराट योनि यानी मातृतत्व। नारायण (नरसूनव- नरपुत्र या नारपुत्र)। सृष्टि निर्माण जल से हुआ है यह सर्वव्यापी परिकल्पना वैश्विक है। नारी की व्युत्पत्ति का एक अन्य आधार भी है। संस्कृत की एक धातु है नृ जिसका अर्थ होता है मानव, मनुष्य, मनुष्यजाति। इसमें स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। नृ से ही पुरुषवाची नर शब्द बना है और स्त्रीवाची नारी भी। कुल मिलाकर प्राचीन ज्ञान सृष्टिनिर्माण में जलतत्व का महत्व ही देखता रहा है। यही विज्ञान सम्मत भी है। अब कहीं पुरुष को महत्व मिला कहीं,स्त्री को। अम्ब का अर्थ भी जल है। अम्बा शब्द का मूलआधार संस्कृत धातु अम्ब् है। अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका आदि शब्द भी इससे ही बने हैं जिनका अर्थ भी माता या देवी है। अम्ब शब्द के मायने होते है पिता, आँख, जल आदि। सो स्पष्ट है कि जल सृष्टि का आदिआधार है। जल में ही स्त्रीवाची और पुरुषवाची सत्ता है। भारतीय मनीषा ने यथायोग्य दोनों को महत्व दिया है।  

Abhay Tiwari

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Sep 25, 2014, 4:12:52 PM9/25/14
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जै हो प्रभु! 

--

अजित वडनेरकर

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Sep 25, 2014, 4:49:21 PM9/25/14
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☺🔬

narayan prasad

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Sep 25, 2014, 8:03:57 PM9/25/14
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<<नारायण (नरसूनव- नरपुत्र या नारपुत्र)।>>

इस प्रकार प्रस्तुत करने से ऐसा भ्रम होता है कि नारायण ही नरपुत्र (या नारपुत्र) है । वस्तुतः जल को नरपुत्र कहा गया है (आपो वै नरसूनवः), नारपुत्र नहीं । नार का अर्थ है - नरपुत्र । नार = नर + अण् (प्रत्यय) । तस्यापत्यम् (उसका अपत्य अर्थात् पुत्र या संतति है, इस अर्थ में अण् प्रत्यय) ।
अण् प्रत्यय का केवल अ शेष रहता है । इसमें ण् जो पूँछ है, वह केवल व्याकरणिक कार्य सूचित करने के लिए है और वह है कि जिस मूल शब्द (प्रातिपदिक) से वह लगेगा उसके आदि स्वर की वृद्धि करेगा, अर्थात् अ को आ, इ एवं ई को ऐ, उ एवं ऊ को औ, ऋ एवं ॠ को आर् में बदल देगा । अतः नर + अण् = नर + अ = नार ।
--- नारायण प्रसाद

2014-09-26 1:09 GMT+05:30 अजित वडनेरकर <wadnerk...@gmail.com>:

--

अजित वडनेरकर

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Sep 26, 2014, 12:22:18 AM9/26/14
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जी। सही कह रहे हैं। रात को दुबारा पढ़ा तो गलती पकड़ में आ गयी थी।
धन्यवाद

Abhay Tiwari

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Sep 26, 2014, 4:49:46 AM9/26/14
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अति सुन्दर नारायण जी! 

आप के ही नाम का मामला है, एक बार सरल शब्दों में बता दें कि क्या अर्थ सिद्ध हुआ। :)

narayan prasad

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Sep 26, 2014, 8:33:53 AM9/26/14
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<< एक बार सरल शब्दों में बता दें कि क्या अर्थ सिद्ध हुआ। :)>>

मैं तो समझ रहा था कि अजित जी और मेरे द्वारा दिए गए सन्देश से अर्थ बिलकुल स्पष्ट हो गया होगा । खैर, मनुस्मृति में ही दिए गए अर्थ को नीचे उद्धृत कर रहा हूँ ।
"जल को 'नार' कहते हैं, क्योंकि वह नर से उत्पन्न हुआ है । जिसका वह नार प्रथम घर हुआ, उसका नाम नारायण हुआ ।"

मैं आशा करता हूँ कि मैंने जो कुछ कहा है, आपकी समझ में आ गया होगा । (फिल्म "शतरंज के खिलाड़ी" से उद्धृत)

सादर

नारायण प्रसाद

Rajendra Gupta

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Sep 26, 2014, 2:04:46 PM9/26/14
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नारायण और नारायणी दोनों पानी में रहते हैं। नारायणी = नारायण की पत्नी लक्ष्मी।  किन्तु दुर्गा को भी नारायणी क्यों कहा गया? उनका पानी से क्या नाता है। विद्वान जन कृपया मार्गदशन करें। 

राजेंद्र गुप्ता  

अजित वडनेरकर

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Sep 26, 2014, 2:39:30 PM9/26/14
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नारायण समान गुणो वाली इसलिए नारायणी।


-अजित वडनेरकर





  

Baljit Basi

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Sep 26, 2014, 6:23:01 PM9/26/14
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नार  का अर्थ पानी देते हुए मो.वि. लिखते हैं ,"Prob. invented to explain नारायण " इस लिए इसका मौलिक अर्थ आदमी ही लगता है.. यह भारोपी शब्द मालूम होता है जिसका सम्बन्ध ग्रीक घटक Anthropo- से दर्शाया जाता है. Etymology Online में देखें :anthropo- Look up anthropo- at Dictionary.com
before a vowel, anthrop-, word-forming element meaning "pertaining to man or human beings," from comb. form of Greek anthropos "man, human being" (sometimes also including women) from Attic andra (genitive andros), from Greek aner "man" (as opposed to a woman, a god, or a boy), from PIE *ner- (2) "man," also "vigorous, vital, strong" (cognates: Sanskrit nar-, Armenian ayr, Welsh ner).

Anthropos sometimes is explained as a compound of aner and ops (genitive opos) "eye, face;" so literally "he who has the face of a man." The change of -d- to -th- is difficult to explain; perhaps it is from some lost dialectal variant, or the mistaken belief that there was an aspiration sign over the vowel in the second element (as though *-dhropo-), which mistake might have come about by influence of common verbs such as horao "to see."
 नर का अर्थ शतरंज का मुहरा भी है।  फारसी में यह नरद  है जिस का नर शब्द से सम्बन्ध लगता है. अंगरेजी में शतरंज के मुहरे को man भी कहते

Abhay Tiwari

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Sep 27, 2014, 2:06:08 PM9/27/14
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अर्थ स्पष्ट हुआ नारायण जी, धन्यवाद! 

यहाँ पर नर का अर्थ मनुष्य करने से विपरीत अर्थ झलकने लगता है। नर से नार बना यानी जल से आदमी नहीं आदमी से जल पैदा हो रहा है? 

मुझे लगता है कि यहाँ पर नर को नल, नरकुल और नरई के अर्थ में लेना चाहिये- यानी शिराओं वाला कोई तंतु। उस तंतु में बहने वाला द्रव नार और उसके भीतर घूमने वाला यानी सबसे भीतरी तत्व नारायण। नारायण क्षीरसागर में शयन करते हैं। वैसे नारायण की उपस्थिति मनुष्य के ह्रदय में बताई है। और शरीर की सारी शिराओं का केंद्र वही है, कम से कम रक्त वाहिनियों का तो है ही। और अगर अमृत तत्व बहाने वाली सूक्ष्म शिराओं का विचार करें तो भी सूक्ष्मतम शिराओं के सात चक्रों में अनाहत ही केंद्रीय माना जाता है। भक्ति के उदय में भी उसी की भूमिका प्रमुख बताई गई है। तब नर संज्ञक नरई नर संज्ञक मनुष्य का रूपक भी बन जाता है जिसके भीतर नारायण अयण करते हैं। 

मेरी अल्प बुद्धि में जो आया लिख दिया, बाक़ी विद्वजन बताएंगे! 

--

narayan prasad

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Sep 28, 2014, 1:16:54 AM9/28/14
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<<यहाँ पर नर का अर्थ मनुष्य करने से विपरीत अर्थ झलकने लगता है।>>

यहाँ पर नर का प्रयोग परमात्मा अर्थ में हुआ है । विस्तार हेतु दे॰ आप्टे का सं॰-हि॰ कोश ।

--- नारायण प्रसाद

Abhay Tiwari

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Sep 28, 2014, 2:56:11 PM9/28/14
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नर का अर्थ परमात्मा लें तो नारायण का क्या अर्थ लें? 

नारायण परमात्मा का नाम है। नारायण नाम कैसे पड़ा। क्योंकि वे नार में शयन करते हैं। नार क्या है? वो पानी है चंूकि वो नर से पैदा हुआ अतः उसे नार कहते हैं। परमात्मा से पानी पैदा हुआ और उस पानी में अयण करने वाला भी परमात्मा? ये व्युत्पत्ति तो कहीं पहुँची नहीं?! या मैं कुछ समझा नहीं। शंका दूर करें मित्र! 

Abhay Tiwari

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Sep 28, 2014, 4:59:33 PM9/28/14
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मेरे पिछले संदेश के पहले वाक्य में आए शयन के बदले अयण करके पढ़ें, भूल से शयन लिख दिया। 

Abhay Tiwari

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Sep 28, 2014, 5:00:50 PM9/28/14
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पहला नहीं तीसरा वाक्य! 

एक और भूल सुधार

Rajendra Gupta

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Sep 30, 2014, 11:14:32 AM9/30/14
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सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हुए मुझे कुछ निवेदन करना है। जब हम भगवान से संबन्धित शब्दों या पौराणिक, वैदिक शब्दों की चर्चा करते हैं तब प्रायः हमारा आग्रह रहता है कि हम प्राचीन ग्रन्थों में लिखी व्याख्याओं को ब्रह्म वाक्य मान कर उनसे न हटें। हम यह भी पाते हैं कि लगभग प्रत्येक प्राचीन व्याख्या दर्शन शास्त्र पर आधारित है, और आसानी से आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ती। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शब्द पहले बने हों और व्याख्या बाद में आई हो? शायद, शब्द तो आम आदमी की साधारण लौकिक समझ से  बने हों और उनमें भाषा का नैसर्गिक प्रवाह झलकता हो, किन्तु देवी देवताओंके साथ इन शब्दों के संबंध के कारण दार्शनिकों और कथावाचकों ने इन शब्दों को बाद में अलौकिक अर्थ दिये हों! मैं क्षमा चाहता हूँ, और अज्ञानवश कहना चाहता हूँ कि 'हर लेने से हरि'; या 'ह' नामक राक्षस के शत्रु, अतः हरि; या नर = पानी से नारायण, मेरे जैसे आम आदमी की बुद्धि को सहजता से समझ नहीं आते।(इस शब्दचर्चा समूह में हरे/ हरि शब्द पर चर्चा हो चुकी है) 
यहाँ यह बात कहना भी आवश्यक लग रहा है कि संस्कृत भी कभी निरंतर प्रवाहमान और बदलती हुई भाषा थी। वेद, रामायण, महाभारत, पुराण के शब्द अगर अचल होते तो फिर निघंटु, निरुक्त और अन्य कोशों की आवश्यता ही न होती। संस्कृत नहीं जानते हुए भी मैं यह कहने का दुस्साहस कर रहा हूँ कि संस्कृत भाषा उतनी निर्दोष भी नहीं हैं जितना उसका प्रचार किया जाता है। हाँ संस्कृत व्याकरण निर्दोष हो सकता है, किन्तु शब्द तो बदलते रहे हैं।  क्या नारायण जैसे शब्दों पर चर्चा के समय हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि 
(1) पौराणिक कथाओं के पात्र कभी इस धरती पर हमारी ही तरह हाड़ -मांस के मनुष्य रहे होंगे, और जो जीव विज्ञान की दृष्टि से संभव नहीं वह उनके साथ भी नहीं हुआ होगा। न कोई पानी से बना है, न बनेगा। हाँ, पानी के किनारे या पानी के द्वीप में  निवास की बात समझ आती है। (2) हमें इस संभवना को नकारना नहीं चाहिये कि नारायण जैसे शब्द जिस दिन बने उस दिन से अब तक उनके मूल रूप में उच्चारण-भेद के कारण कुछ परिवर्तन भी हुए होंगे (3) प्राचीन ग्रंथो में जब भी किसी भगवान को या कथा के किसी अन्य पात्र को  उसके अनेक नामों में से किसी एक से पुकारा गया है तब-तब वह विशेषण (भगवान के सभी नाम विशेषण ही हैं) उस प्रसंग में एकदम उचित लगता है। (4) पौराणिक कथाएँ मानव सभ्यता के इतिहास में, पहले चरण की कहानियाँ मालूम होती हैं। उस काल में शब्दों की रचना बहुत ही व्यावहारिक तरीके से होनी चाहिए न कि ऊंचे दार्शनिक सिद्धान्त पर। 
इन बिन्दुओं के आलोक में मेरे जैसे आम आदमी की बुद्धि में नारायण के उत्स पर यह विचार आते हैं --

1.  नीर /नार + अयन = नारायण; अगर यह सही है तो आधुनिक काल में इसकी एक रोचक समानता है 

नीर > नईर > नहर > नेहरू ! नहर के किनारे रहने के कारण नेहरू। 

2. नर + राजन = नरराजन > नरयाजन > नरयायन > नारायन > नारायण। 
इस तरह नारायण, नरेश और नरेंद्र पर्यायवाची हुए।    

3.  नी (=नेतृत्व) + राजन = नीराजन > नीरायन > नारायण।
 इस तरह नारायण = नृपेन्द्र, राजेंद्र, सम्राट 

मैंने अपने एक लेख में कुछ पौराणिक/ धार्मिक शब्दों  की सहज और गैर-पारंपरिक व्याख्याओं के प्रयोग किए हैं -- विष्णु, भगवान, क्षीर सागर, शेष नाग, अनंत, पदमनाभम, 'गगन सदृशम', 'मेघ वर्णम',  गॉड,  खुदा, अनाकोंडा, ड्रैगन। इन शब्दों के नए प्रस्तावित अर्थ शायद  यहाँ प्रासंगिक हो।  
    
सभी विद्वानों  को सादर नमस्ते  सहित 
राजेंद्र गुप्ता 

Abhay Tiwari

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Oct 1, 2014, 3:44:46 AM10/1/14
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इस मंच पर बात करने का आशय यही है कि अपनी शंकाओं का समाधान किया जाय। 

और आप की बात पर मेरा यह कहना है कि व्युत्पत्ति के मामले में सुविधाजनक तरह से नहीं चल सकते। जो आपको जंचा वो अर्थ ले लिया, जो आपकी डिज़ायन में फ़िट नहीं हुआ उसे किसी की भूल, दोष या दुराग्रह मानकर अपना मनचाहा अर्थ कर लिया जाय? 

तमाम शब्दों की व्याख्या शास्त्रों मिलती है, आप उन सारी को निरस्त करके अपनी नई व्याख्याएं चलाना चाहते हैं, ज़रूर चलाइये! मैं तो सरकार केवल दिए हुए वाक्य का सही- सही अर्थ करके पहले उस पर विचार करना चाहता हूँ। 

सविनय

Arvind Kumar

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Dec 20, 2015, 12:22:11 AM12/20/15
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एक आनलाइन संस्कृत कोश मेँ मुझे नारायण के निम्न अर्थ मिले---

 

 

नारायण

nArAyaNa

adj.

relating or belonging to nArAyaNa or kRSNa

नारायण

nArAyaNa

m.

son of the original Man

नारायण

nArAyaNa

m.

mystical name of the letter A

नारायण

nArAyaNa

m.

Narayan  [ Vishnu ]

नारायण

nArAyaNa

m.

puruSa-hymn

 

 

 

 

नारायण

nArAyaNa

n.

medic. oil expressed from various plants

नारायण

nArAyaNa

n.

particular medicinal powder

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