On 25 मई, 08:38, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> तारानाथ वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार -
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम् ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>
> 2011/5/25 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>
>
>
> > कृपाण (तलवार) की क्या निरुक्ति हो सकती है?- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए
On 25 मई, 08:38, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> तारानाथ वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार -
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम् ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>
कृप से सम्बन्धित शब्द हैं:
कृपण = कंजूस (हमेशा रोते रहने वाला) रोने के अर्थ में
कृपया = याचना के साथ, याचना के अर्थ में
कृपा = दया , दया के अर्थ में
कृपालु -दयालु, दया ही
और कृपाण = ?
अब यदि पहले अर्थ से कृपाण को जोड़कर देखा जाय तो जो चमकदार और भव्य है वह कृपाण
है.. और यदि दूसरा अर्थ लिया जाय तो क्या अर्थ बनेगा? रुलाने वाली? कमज़ोर कर
देने वाली?
औनलाइन एटिमौलिजी डिक्शनरी में ये एन्ट्री मौजूद तो है मगर हारवेस्ट से इसका
कोई रिश्ता बनता दिखता तो नहीं.. ?
----- Original Message -----Sent: Sunday, May 29, 2011 10:14 AMSubject: Re: [शब्द चर्चा] कृपाण
> 2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
> भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर दें तो बड़ी मेहरबानी हो: "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्"
>
> --
> http://feministpoems.blogspot.com
> http://feminist-poems-articles.blogspot.com
> http://draradhana.wordpress.com- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
> 2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
> भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर दें तो बड़ी मेहरबानी हो: "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्"
>
> --
> http://feministpoems.blogspot.com
> http://feminist-poems-articles.blogspot.com

On 29 मई, 05:58, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> मैं बासी जी के साथ हूँ। कृप् धातु से ही कृपाण का रिश्ता तार्किक नज़र आता है।
> शब्दों का सफर में कई बार यह बात आ चुकी है कि
> हमारी तमाम शब्दावली का मूल आदि-संस्कृति के क्रियाकलाप रहे हैं जो मूलतः कृषि
> संस्कृति से जुड़े रहे हैं। इसके बाद लेन-देन, बाजार आदि की शब्दावली
> विकसित हुई। तब तक बन चुके शब्दों में अर्थ विस्तार की प्रवृत्ति विकसित हुई।
>
> फिलहाल व्यस्त हूँ मगर इस चर्चा में इतना कह पाने से खुद को रोक नहीं पा रहा
> हूँ।
>
> 2011/5/29 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
> > > http://draradhana.wordpress.com-उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> > > उद्धृत पाठ दिखाए
>
> --
>
> *
> अजित*http://shabdavali.blogspot.com/
> मोबाइल-09425012329- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
On 28 मई, 14:14, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्
>
> कृपा = दया
> नुद् = (1) धकेलना, धक्का देना (2) उकसाना, प्रोत्साहित करना (3) हटाना, भगा
> देना (4) फेंकना, डालना, भेजना
>
> संज्ञायां (= संज्ञायाम्) = संज्ञा में (in the formation of noun)
>
> कृपां नुदति = (जो) दया-माया को हटा देता है ।
>
> उपर्युक्त अर्थ में कृपाण शब्द कृपा में तद्धित प्रत्यय ड (= ड् + अ) लगाने से
> निष्पन्न होता है ।
>
> ड प्रत्यय का केवल अ ही निष्पन्न शब्द में प्रयुक्त होता है । इसमें डकार एक
> विशेष कार्य के बारे में इंगित करता है और वह है - जिसमें यह ड प्रत्यय लगता है
> उसके "टि" का लोप होता है ।
> टि = किसी शब्द का वह अंश जो उसके अन्तिम अच् (= स्वर, vowel) से आरम्भ करके
> अन्तिम वर्ण तक प्राप्त होता है ।
> उदाहरण - नुद् ( = न् + उ + द् ) का टि "उद्" ।
> कृपा + नुद् + ड ---> कृपा + न् + अ ---> कृपा + न ---> कृपाण ।
>
> यहाँ नकार का णकार कैसे हो जाता है इसके लिए विस्तृत विवेचन यहाँ उपलब्ध है -
>
> णत्व विधान <http://groups.yahoo.com/group/Hindi-Forum/message/1753>
>
> नोटः यदि आपको यह सन्देश junk दिखे तो character encoding को यूनिकोड में बदल
> लें ।
>
> --- नारायण प्रसाद
>
> 2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>
>
>
>
> > भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर
> > दें तो बड़ी मेहरबानी हो: "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां
> > णत्वम्"- उद्धृत पाठ छिपाएँ -