कृपाण

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Baljit Basi

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May 25, 2011, 8:19:04 AM5/25/11
to शब्द चर्चा
कृपाण (तलवार) की क्या निरुक्ति हो सकती है?

narayan prasad

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May 25, 2011, 8:38:47 AM5/25/11
to shabdc...@googlegroups.com
तारानाथ वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार -
कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम् ।

---नारायण प्रसाद

2011/5/25 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Baljit Basi

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May 25, 2011, 9:27:21 AM5/25/11
to शब्द चर्चा
कृपया इसकी व्याख्या कीजिये . हो सके तो किसी पुराणी संस्कृत/हिंदी लिखत
से उद्धरण दीजिये. मैं अपनी बात बाद में करूंगा.

On 25 मई, 08:38, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> तारानाथ वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार -
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम् ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>

> 2011/5/25 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>
>
>
> > कृपाण (तलवार) की क्या निरुक्ति हो सकती है?- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए

Baljit Basi

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May 27, 2011, 7:57:44 PM5/27/11
to शब्द चर्चा
अच्छा होता जानकार संतजन कुछ व्याख्या कर देते. मैंने कई जगह अंग्रेजी
harvest का रिश्ता 'कृपाण' से पढ़ा तो Online Etymology Dictionary में
चेक किया. वहां इसकी प्रविष्टि इस प्रकार है:
harvest (n)- O.E. hærfest "autumn, period between August and
November," from P.Gmc. *harbitas (cf. O.S. hervist, O.Fris., Du.
herfst, Ger. Herbst "autumn," O.N. haust "harvest"), from PIE *kerp-
"to gather, pluck, harvest" (cf. Skt. krpana- "sword," krpani
"shears;" Gk. karpos "fruit," karpizomai "make harvest of;" L. carpere
"to cut, divide, pluck;" Lith. kerpu "cut;" M.Ir. cerbaim "cut").
उम्मीद है अब कुछ सुनने को मिलेगा.


On 25 मई, 08:38, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:

> तारानाथ वाचस्पत्यम् कोश के अनुसार -
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम् ।
>
> ---नारायण प्रसाद
>

Abhay Tiwari

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May 28, 2011, 4:18:30 AM5/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
मोनियर विलियम्स में कृप के दो अर्थ दिए हैं-
१. कृप: देखने में सुन्दर, सौन्दर्य, भव्य
२. कृप: शोक करना, दुख मनाना, विलाप करना, याचना करना, दया करना, क्षीण होना

कृप से सम्बन्धित शब्द हैं:
कृपण = कंजूस (हमेशा रोते रहने वाला) रोने के अर्थ में
कृपया = याचना के साथ, याचना के अर्थ में
कृपा = दया , दया के अर्थ में
कृपालु -दयालु, दया ही
और कृपाण = ?

अब यदि पहले अर्थ से कृपाण को जोड़कर देखा जाय तो जो चमकदार और भव्य है वह कृपाण
है.. और यदि दूसरा अर्थ लिया जाय तो क्या अर्थ बनेगा? रुलाने वाली? कमज़ोर कर
देने वाली?

औनलाइन एटिमौलिजी डिक्शनरी में ये एन्ट्री मौजूद तो है मगर हारवेस्ट से इसका
कोई रिश्ता बनता दिखता तो नहीं.. ?

Abhay Tiwari

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May 28, 2011, 6:19:40 AM5/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर दें तो बड़ी मेहरबानी हो:  "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्"

narayan prasad

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May 28, 2011, 2:14:38 PM5/28/11
to shabdc...@googlegroups.com
कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्

कृपा = दया
नुद् = (1) धकेलना, धक्का देना (2) उकसाना, प्रोत्साहित करना (3) हटाना, भगा देना (4) फेंकना, डालना, भेजना

संज्ञायां (= संज्ञायाम्) = संज्ञा में (in the formation of noun)

कृपां नुदति = (जो) दया-माया को हटा देता है ।

उपर्युक्त अर्थ में कृपाण शब्द कृपा में तद्धित प्रत्यय ड (= ड् + अ) लगाने से निष्पन्न होता है ।

ड प्रत्यय का केवल अ ही निष्पन्न शब्द में प्रयुक्त होता है । इसमें डकार एक विशेष कार्य के बारे में इंगित करता है और वह है - जिसमें यह ड प्रत्यय लगता है उसके "टि" का लोप होता है ।
टि = किसी शब्द का वह अंश जो उसके अन्तिम अच् (= स्वर, vowel) से आरम्भ करके अन्तिम वर्ण तक प्राप्त होता है ।
उदाहरण - नुद् ( = न् + उ + द् ) का टि "उद्" ।
कृपा + नुद् + ड ---> कृपा + न् + अ ---> कृपा + न ---> कृपाण ।

यहाँ नकार का णकार कैसे हो जाता है इसके लिए विस्तृत विवेचन यहाँ उपलब्ध है -

णत्व विधान

नोटः यदि आपको यह सन्देश junk दिखे तो character encoding को यूनिकोड में बदल लें ।

--- नारायण प्रसाद
 

2011/5/28 Abhay Tiwari <abha...@gmail.com>

आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति"

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May 29, 2011, 12:44:57 AM5/29/11
to shabdc...@googlegroups.com
नारायण जी ने बहुत अच्छी व्याख्या कर दी. धन्यवाद !

2011/5/28 narayan prasad <hin...@gmail.com>



--
http://feministpoems.blogspot.com
http://feminist-poems-articles.blogspot.com
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Abhay Tiwari

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May 29, 2011, 1:47:04 AM5/29/11
to shabdc...@googlegroups.com
शुक्रिया नारायण जी।
और आराधना से माफ़ी (ग़फ़लत में उसका नाम अनुराधा लिख गया :/)
उम्मीद है बासी जी की मुश्किल कुछ आसान हुई होगी!
 
----- Original Message -----
Sent: Sunday, May 29, 2011 10:14 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] कृपाण

Baljit Basi

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May 29, 2011, 5:13:47 AM5/29/11
to शब्द चर्चा
समय रहम ना आए." लेकिन मुझे कृपाण की यह व्याख्या कभी संतुष्टिजनक नहीं
लगी. काटने वाली चीज़ को कृपा से जोड़ना कुछ अजीब सा लगता है.
बात दरअसल यह है कि जैसे आप सब जानते ही होंगे कि सिख धर्म की रहत
मर्यादा में पांच क( ककार) धारने का आदेश है जिस में केश, कड़ा, कंघा,
कच्छा और कृपान शामिल हैं. भारत में सदियों से रह रहे सिखों को कृपान की
महान कोष में बताई व्याख्या से कोई भय नहीं है. लेकिन पश्चिमी देशों में
सार्वजनक सथानों पर कृपान धारण करने में उनको कानूनों का साह्मना करना
पड़ता है जो इसको एक हथियार समझते हुए इस पर पाबंदी लगाते हैं. अब इन
देशों में सिख नेतायों ने कृपान (कृपाण) की परिभाषा बदल डाली है जो
कोर्टों में भी पेश की जाती है और जिस का खूब परचार भी होता है. वह
परिभाषा महान कोष से बिलकुल उल्ट है अर्थात किरपान = कृपा+आन . भाव यह कि
किरपान बिना किसी जातपात, धर्म आदि के भेद भाव से मानव जाती की आन शान के
लिए रहम का काम करती है. मुझे यह सबी व्याख्याओं से दिक्कत है और मैं
इसकी खोज में था. मुझे कई जगह अंगरेजी harvest का रिश्ता कृपा से होने
के संकेत मिले. जैसे मैं पहले बता चूका हूँ Online Etymology Dictionary
में यह संबंध बड़े युक्तीयुक्त ढंग से जोड़ा गया है और एक भारोपी मूल
'करप' की भी स्थापना की गयी है जिस का मतलब संग्रह करना, तोडना, काटना
है. हार्वेस्ट में कटाई ही तो होती है. पंजाबी में इसको वाढी कहते हैं
जो वढना (काटना) से बना है. फसल भी कटी हुई चीज़ ही है. कृपाण का काम भी
काटना ही है. संत जन इस भारोपी मूल की तरफ ध्यान दें. पंजाबी में एक
'कप्प' शब्द है जिस का मतलब काटना है. यह 'करप' से बना हो सकता है.
संस्कृत सर्प (सांप) पंजाबी में 'सप्प' बन गया. गुरबानी में यह शब्द
काटने के अर्थों में कई बार आया है, "जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु कपि
उतारि" (फरीद) अर्थात जो सर परमात्मा के आगे नहीं झुकते वह सर काट दो.
पंजाब में एक राजा सिरकप की दंतकथा मशहूर है जो भक्त पूरण के साथ जुडी
हुई है. यहाँ सिरकप का ऐसा नाम इस लिए पड़ा क्योंकि वह हर एक का सर काट
देता था. पकिस्तान में सिरकप नाम से एक जगह का नाम है यहाँ शायद इस राजे
का संबंध था.

>     2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>       भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर दें तो बड़ी मेहरबानी हो:  "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्"
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Baljit Basi

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May 29, 2011, 5:16:12 AM5/29/11
to शब्द चर्चा

कुछ रह गया था, दुबारा देता हूँ:
कष्ट करने के लिए मैं नारायण और अभय जी का धन्यवादी हूँ. मोनियर
विलियम्स से मैं गुज़र चूका था लेकिन उसकी बात स्पष्ट नहीं है. आप्टे भी
देखा था और वहां इस की व्याख्या तारानाथ वाचस्पत्यम् जैसी ही थी लेकिन
ज्यादा समझ नहीं आ रही थी. वैसे ऐसी ही व्याख्या पंजाबी के एक पुराने सिख
महान कोष में दे रखी है, " जो कृपा को फेंक दे, जिस को चलाते समय रहम ना

>     2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>       भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर दें तो बड़ी मेहरबानी हो:  "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्"
>
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अजित वडनेरकर

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May 29, 2011, 5:58:08 AM5/29/11
to shabdc...@googlegroups.com
मैं बासी जी के साथ हूँ। कृप् धातु से ही कृपाण का रिश्ता तार्किक नज़र आता है। शब्दों का सफर में कई बार यह बात आ चुकी है कि
हमारी तमाम शब्दावली का मूल आदि-संस्कृति के क्रियाकलाप रहे हैं जो मूलतः कृषि संस्कृति से जुड़े रहे हैं। इसके बाद लेन-देन, बाजार आदि की शब्दावली
विकसित हुई। तब तक बन चुके शब्दों में अर्थ विस्तार की प्रवृत्ति विकसित हुई।

फिलहाल व्यस्त हूँ मगर इस चर्चा में इतना कह पाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।

2011/5/29 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



--


अजित

http://shabdavali.blogspot.com/
मोबाइल-09425012329

Baljit Basi

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May 29, 2011, 6:37:26 AM5/29/11
to शब्द चर्चा
शुक्रिया अजित जी, मैं आपकी टिप्पणी की इंतजार में था. अब मैं और खोजने
का हौसला करूंगा.

On 29 मई, 05:58, अजित वडनेरकर <wadnerkar.a...@gmail.com> wrote:
> मैं बासी जी के साथ हूँ। कृप् धातु से ही कृपाण का रिश्ता तार्किक नज़र आता है।
> शब्दों का सफर में कई बार यह बात आ चुकी है कि
> हमारी तमाम शब्दावली का मूल आदि-संस्कृति के क्रियाकलाप रहे हैं जो मूलतः कृषि
> संस्कृति से जुड़े रहे हैं। इसके बाद लेन-देन, बाजार आदि की शब्दावली
> विकसित हुई। तब तक बन चुके शब्दों में अर्थ विस्तार की प्रवृत्ति विकसित हुई।
>
> फिलहाल व्यस्त हूँ मगर इस चर्चा में इतना कह पाने से खुद को रोक नहीं पा रहा
> हूँ।
>

> 2011/5/29 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>

> > >  http://draradhana.wordpress.com-उद्धृत पाठ छिपाएँ -


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> > > उद्धृत पाठ दिखाए
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narayan prasad

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May 30, 2011, 1:05:54 AM5/30/11
to shabdc...@googlegroups.com
<< लेकिन पश्चिमी देशों में सार्वजनक सथानों पर कृपान  धारण करने में उनको कानूनों का साह्मना  करना पड़ता है जो इसको एक हथियार समझते हुए इस पर पाबंदी लगाते हैं.>>
 
क्या सिख धर्म के अनुसार कृपाण हथियार नहीं है ?

---नारायण प्रसाद

2011/5/29 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

Baljit Basi

unread,
May 30, 2011, 6:30:10 AM5/30/11
to शब्द चर्चा
कृपान हथियार तो है लेकिन कहा जा रहा है कि जब यह एक ककार के तौर पर धारण
किया जाता है तो यह मात्र एक चिह्न है जो सिख को अन्याय के खिलाफ लड़ने
की याद दिलाता है. गात्रे में डाल कर धारण की जाने वाली एक बहुत ही
छोटे आकार (इसका साइज़ निश्चित नहीं) किरपान हथियार नहीं रहती. एक दशम
ग्रन्थ, है जिस के बारे में जबरदस्त विवाद है कि यह गुरू गोबिंद सिंह की
रचना है कि नहीं. उसमे एक रचना 'शस्त्रमाला ' है जिस में शस्त्रों के नाम
गिनाये गए हैं जिन की पूजा करनी चाहिए- किरपान उन में से एक है. रचना के
कुछ अंश देता हूँ:
असि किरपान खंडो खडग तुपक तबर अरु तीर
सैफ सिरोही सैहथी यहै हमारे पीर
तीर तुही सैथी तुही तुही तबर तरवार
नाम तिहारो जो जपै भए सिधु बव पार

On 28 मई, 14:14, narayan prasad <hin...@gmail.com> wrote:
> कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां णत्वम्
>
> कृपा = दया
> नुद् = (1) धकेलना, धक्का देना (2) उकसाना, प्रोत्साहित करना (3) हटाना, भगा
> देना (4) फेंकना, डालना, भेजना
>
> संज्ञायां (= संज्ञायाम्) = संज्ञा में (in the formation of noun)
>
> कृपां नुदति = (जो) दया-माया को हटा देता है ।
>
> उपर्युक्त अर्थ में कृपाण शब्द कृपा में तद्धित प्रत्यय ड (= ड् + अ) लगाने से
> निष्पन्न होता है ।
>
> ड प्रत्यय का केवल अ ही निष्पन्न शब्द में प्रयुक्त होता है । इसमें डकार एक
> विशेष कार्य के बारे में इंगित करता है और वह है - जिसमें यह ड प्रत्यय लगता है
> उसके "टि" का लोप होता है ।
> टि = किसी शब्द का वह अंश जो उसके अन्तिम अच् (= स्वर, vowel) से आरम्भ करके
> अन्तिम वर्ण तक प्राप्त होता है ।
> उदाहरण - नुद् ( = न् + उ + द् ) का टि "उद्" ।
> कृपा + नुद् + ड ---> कृपा + न् + अ ---> कृपा + न ---> कृपाण ।
>
> यहाँ नकार का णकार कैसे हो जाता है इसके लिए विस्तृत विवेचन यहाँ उपलब्ध है -
>

> णत्व विधान <http://groups.yahoo.com/group/Hindi-Forum/message/1753>


>
> नोटः यदि आपको यह सन्देश junk दिखे तो character encoding को यूनिकोड में बदल
> लें ।
>
> --- नारायण प्रसाद
>

> 2011/5/28 Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com>


>
>
>
> >  भई नारायण जी या अनुराधा या दूसरे संस्कृत जानने वाले इस वाक्य का अनुवाद कर
> > दें तो बड़ी मेहरबानी हो:  "कृपाणः = कृपां नुदति - नुद् + ड संज्ञायां

> > णत्वम्"- उद्धृत पाठ छिपाएँ -

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