डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
हिन्दी की उपभाषाओं में शायद बीते कल और आने वाले कल के लिए पृथक् शब्द होंगे । जैसे - मगही में बीते कल के लिए कल्ह (या "कल्हे") और आने वाले कल के लिए बिहान (या "बिहने") शब्द का प्रयोग होता है ।
---नारायण प्रसाद
2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
वास्तव में, यह देख के हैरानी होती है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही
शब्द का प्रयोग करना कितनी बड़ी कमी है भाषा में, और उससे बड़ी हैरानी की बात है कि
हम आज भी इस प्रकार के शब्दों के लिए अलग अलग शब्द नहीं बना रहे हैं और प्रयोग नहीं
कर रहे हैं, उनको प्रचलित नहीं कर रहे हैं।
गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले
कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।
रावत
> *माज़ी * बीते कल के लिये
माज़ी अतीत है, जो past के लिए व्यापक शब्द है न कि yesterday के लिए
ऐसे ही एक अर्थ में रफ़्ता प्रयोग होता है जिसका अर्थ वैसे तो धीमा slow होता है परंतु
उसको पीछे छूट गए (शायद धीमे चलने की वजह से) के अर्थ में प्रयोग किया जाता है जैसे
सदा-ए-रफ़्ता = पीछे छूट गए लोगों की आवाज़ या विचार मतलब अतीत के विचार
> *मुस्तक़बिल* आने वाले कल के लिये
मुस्तक़बिल भविष्य है, जो future के लिए व्यापक शब्द है न कि tomorrow के लिए। ऐसा
ही एक शब्द फ़र्दा है।
रावत
>
> राजेन्द्र स्वर्णकार
> *शस्वरं* <http://shabdswarrang.blogspot.com>
> ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> 2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com <mailto:esw...@gmail.com>>
>
> डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
> उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
>
>
> 2010/8/15 Baljit Basi <balji...@yahoo.com
> <mailto:balji...@yahoo.com>>
बहुत बढ़िया मुद्दा उठाया बासी जी,
वास्तव में, यह देख के हैरानी होती है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही शब्द का प्रयोग करना कितनी बड़ी कमी है भाषा में, और उससे बड़ी हैरानी की बात है कि हम आज भी इस प्रकार के शब्दों के लिए अलग अलग शब्द नहीं बना रहे हैं और प्रयोग नहीं कर रहे हैं, उनको प्रचलित नहीं कर रहे हैं।
गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।
रावत
On 8/16/2010 3:54 AM India Time, _Baljit Basi_ wrote:
भाषा कई बार कितनी कंजूसी करती है, जान कर हैरानी होती है. कई महत्वहीन
शब्दों के लिये कई कई समानार्थक शब्द होते हैं लेकिन कई अति ज़रूरी
संकल्पों के लिए यहाँ, हमें अलग अलग से शब्द चाहिए होते हैं, वहां एक ही
शब्द से काम चला लिया जाता है. बीते हुए दिन और आने वाले दिन के लिए एक
ही शब्द है, 'कल'. बेशक सन्दर्भ से हम समझ जाते हैं कि आने वाले अथवा
बीते हुए दिन की बात की जा रही है, लेकिन फिर भी प्रशन उठता है ऐसी कौन
सी मजबूरी है कि अलग अलग शब्द बने नहीं, या प्रचलत नहीं हुए. पंजाबी में
आने वाले कल के लिए 'भलके' शब्द चलता रहा है खास तौर पर गाओं में जैसे
'मैं भलके दिल्ली जाऊंगा' लेकिन कोई मानसिक/ सामाजिक प्रतिरोधक शक्ती है
जो इस शब्द को चलने नहीं दे रही और यह 'भलक' शब्द हमारी शब्दावली से निकल
रहा है. लोग कल से ही काम चलाना चाहते हैं. पुरानी पंजाबी में 'भलके'
शब्द का अर्थ प्रात:काल होता था जैसे: भलके उठि पराहुणा मेरै घरि
आवउ(गुरू नानक ; मैं सुबह जल्दी उठता हूँ तो पवित्र मेहमान मेरे घर आता
है.) 'भलके' का अर्थ नित्य भी है जैसे, भलके थुक पवै नित दाड़ी( गुरु
अर्जन; आदमी की दाड़ी पर रोज़ थूका जाता है.) . भलके का अर्थ विकसत हो कर
आने वाला कल बन गया परंतू आज क़ी पीडी इसे स्वीकार नहीं कर रही. ऐसा
क्यों होता है?
बलजीत बासी
> १६ अगस्त २०१० ९:४३ पूर्वाह्न को, V S Rawat <vsr...@gmail.com
> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:
>
>
> गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले
> कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।
>
>
> बताया तो ऊपर आने वाले कल के लिये 'भ्वला' है
जी, देखा। वो मेल मैंने पिछली मेल पर उत्तर भेजने के बाद देखी थी। धन्यवाद
ब्यालि yesterday
भ्वाल tomorrow
मुझे आश्चर्य और प्रसन्नता हुई कि इस सूचि में गढ़वाली भाषा के शब्दों को जानने वाले भी
कई लोग हैं।
रावत
'भ्वला' भी भोर का ही स्थानीय रूप प्रतीत होता है । बिहान भी कुछ इसी अर्थ में आता है ।
2010/8/16 ePandit | ई-पण्डित sharma...@gmail.com
बताया तो ऊपर आने वाले कल के लिये 'भ्वला' है
----- Original Message -----From: ई-स्वामीSent: Monday, August 16, 2010 8:05 AMSubject: Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल
----- Original Message -----From: ई-स्वामीSent: Monday, August 16, 2010 8:05 AMSubject: Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल
१६ अगस्त २०१० ९:३१ पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:हिन्दी की उपभाषाओं में शायद बीते कल और आने वाले कल के लिए पृथक् शब्द होंगे । जैसे - मगही में बीते कल के लिए कल्ह (या "कल्हे") और आने वाले कल के लिए बिहान (या "बिहने") शब्द का प्रयोग होता है ।
---नारायण प्रसाद
सहमत, गढ़वाली में बीते कल के लिये 'ब्याली' तथा आने वाले कल के लिये 'भ्वला'
2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
--
Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
If u can't beat them, join them.
ePandit: http://epandit.shrish.in/
On 16 अग, 03:32, Bodhi Sattva <abod...@gmail.com> wrote:
> शब्द चर्चा अच्छी चल रही है
> मुझे लगता है कि कल वह दिन है जो आज नहीं है। जो या तो बीत गया हो या आने वाला
> हो।
> हिंदी कविता में भविष्य और भूत दोनों के लिए आगे शब्द का प्रयोग होता रहा है।
>
> भए, जे अहहिं, जे होइहईं आगे-तुलसीदास
>
> आगे चना गुरु मातु दए सो लए तुम चाबि हमें नहिं दीने
>
> फिर
> आगे-आगे देखिए होता है क्या
> इसे साफ देख सकते हैं कि आगे न कल का आगे था न आने वाला है बस वाक्य प्रयोग
> से तय होगा। क्यों कि कल की ही तरह आगे वह है जो वर्तमान नहीं है। ऐसे ही कल भी
> वह है जो आज नहीं है।
> कल के प्रयोग भी देखे जा सकते हैं-
>
> कल का सपना बहुत सुहाना था,
> ये उदासी न कल रही होगी- दुष्यंत
>
> कल चौदवीं की रात थी- इंशा
> न जाने कल क्या होगा।
> माली आवत देख के कल्हियाँ करी पुकार,
> फूलै-फूलै चुन लई काल्ह हमारी बार- कबीर
> काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब-कबीर
> अवध में
> एकदम अगली सुबह- बिहान है
>
> On 8/16/10, Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com> wrote:
>
>
>
>
>
>
>
> > फ़ारसी में बीते कल के लिए दीरोज़, आज के इमरोज़ और आने वाले कल के फ़र्दा शब्द
> > हैं।
>
> > ----- Original Message -----
> > *From:* ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
> > *To:* shabdc...@googlegroups.com
> > *Sent:* Monday, August 16, 2010 8:05 AM
> > *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल
>
> > डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व:
> > हैं.
> > उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
>
> > 2010/8/15 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>
>
> >> भाषा कई बार कितनी कंजूसी करती है, जान कर हैरानी होती है. कई महत्वहीन
> >> शब्दों के लिये कई कई समानार्थक शब्द होते हैं लेकिन कई अति ज़रूरी
> >> संकल्पों के लिए यहाँ, हमें अलग अलग से शब्द चाहिए होते हैं, वहां एक ही
> >> शब्द से काम चला लिया जाता है. बीते हुए दिन और आने वाले दिन के लिए एक
> >> ही शब्द है, 'कल'. बेशक सन्दर्भ से हम समझ जाते हैं कि आने वाले अथवा
> >> बीते हुए दिन की बात की जा रही है, लेकिन फिर भी प्रशन उठता है ऐसी कौन
> >> सी मजबूरी है कि अलग अलग शब्द बने नहीं, या प्रचलत नहीं हुए. पंजाबी में
> >> आने वाले कल के लिए 'भलके' शब्द चलता रहा है खास तौर पर गाओं में जैसे
> >> 'मैं भलके दिल्ली जाऊंगा' लेकिन कोई मानसिक/ सामाजिक प्रतिरोधक शक्ती है
> >> जो इस शब्द को चलने नहीं दे रही और यह 'भलक' शब्द हमारी शब्दावली से निकल
> >> रहा है. लोग कल से ही काम चलाना चाहते हैं. पुरानी पंजाबी में 'भलके'
> >> शब्द का अर्थ प्रात:काल होता था जैसे: भलके उठि पराहुणा मेरै घरि
> >> आवउ(गुरू नानक ; मैं सुबह जल्दी उठता हूँ तो पवित्र मेहमान मेरे घर आता
> >> है.) 'भलके' का अर्थ नित्य भी है जैसे, भलके थुक पवै नित दाड़ी( गुरु
> >> अर्जन; आदमी की दाड़ी पर रोज़ थूका जाता है.) . भलके का अर्थ विकसत हो कर
> >> आने वाला कल बन गया परंतू आज क़ी पीडी इसे स्वीकार नहीं कर रही. ऐसा
> >> क्यों होता है?
> >> बलजीत बासी
>
> > --
> >http://hindini.com
> >http://hindini.com/eswami
>
> --
> Dr. Bodhisatva, mumbai
> 0-9820212573- उद्धृत पाठ छिपाएँ -
>
> उद्धृत पाठ दिखाए
> भोजपुरी में भी आने वाले कल के लिए 'बिहान' या 'बेहने' पर्युक्त होता है और बीते हुए कल के
> लिए 'काल्ह' या 'कल्हियाँ'.
>
यदि बीते हुए कल के लिए 'काल्ह' होता है, तब तो ___दासजी ने सही ही संदेश दिया आज
की पीढ़ी की मानसिकता के हिसाब से, काल्ह करे सो आज कर (जो कल कर लेना चाहिए
था, उसको आज करो।)
--
रावत
> फ़ारसी में बीते कल के लिए दीरोज़, आज के इमरोज़ और आने वाले कल के फ़र्दा शब्द हैं।
हाँ इमरोज़ तो टूडे के लिए है।
मैं फ़र्दा को भविष्य फ़्यूचर समझता था, बताने के लिए धन्यवाद कि फ़र्दा टूमारो के लिए है।
दीरोज़ पहली बार सुना। क्या किसी को कोई गद्य या पद्य पता है जिसमें इस शब्द का
प्रयोग हुआ हो।
धन्यवाद
रावत
फरोज़ कोई शहर में हनोज़ ना मिला,
तुझसा न मिला हमें शहरोज़ कोई और.
*
फ़र्दा( साहिर लुधियानवी) :
कौन जाने मेरी इम्रोज़ का फ़र्दा क्या है
क़ुबर्तें बढ़ के पशेमान भी हो जाती है दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं
नज़रें
देखते देखते अंजान भी हो जाती है.
Baljit Basi
बेहतरीन चर्चा. गौरतलब ये है कि अरबी फारसी से हिंदी ने इतना सब कुछ लिया तो फीरोज / इमरोज/ फर्दा ने क्या बिगाड़ा था?क्या किसी को कल/ कल में सचमुच कभी घपला हुआ ?
बात पंगे लेने या कमी निकालने की नहीं है. जब संस्कृत में कल के लिए दो शब्द थे तो हिन्दी में भी होते तो अच्छा होता, बस. और जिम्मेदारी तो लिखाड़ लोगों की है.
बात पंगे लेने या कमी निकालने की नहीं है. जब संस्कृत में कल के लिए दो शब्द थे तो हिन्दी में भी होते तो अच्छा होता, बस. और जिम्मेदारी तो लिखाड़ लोगों की है.
इमानदारी से कहूं तो मुझे कभी भी कल और कल में कोई बडा कनफ़्यूजन नही हुआ, चूंकि संदर्भ से काल का पता चल जाता है.
लेकिन मैं कनफ़्यूज करने वाले वाक्य जबरदस्ती बना कर आपको सिद्ध कर सकता हूं कि कनफ़्यूजन पैदा करना कितना आसान हो सकता है -
१) एक केस ऐसा चाहिये जिसमें कालबोधक कुछ ना हो तो प्रस्तुत है -
अब कल की बात करें?
गुज़रे कल की या आने वाले कल की?
२) उसने मुझे कहा था कि वो कल आएगी!
मतलब जिस दिन कहा था उसके अगले दिन? या कि जब मैंने उसके कहने का जिक्र किया उसके अगले दिन?
यदी सटीक रूप से कहना हो तो यूं कहना चाहिए -
कह रही थी कि वो तो अगले ही दिन आ जाएगी. (या अन्यथा)
उसने कहा था कि वो तो अब कल आने वाली है.
वैसे ऐसे पंगे प्रकारान्त से अन्य भाषाओं मे भी लिये जा सकते हैं.2010/8/16 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>
बेहतरीन चर्चा. गौरतलब ये है कि अरबी फारसी से हिंदी ने इतना सब कुछ लिया तो फीरोज / इमरोज/ फर्दा ने क्या बिगाड़ा था?क्या किसी को कल/ कल में सचमुच कभी घपला हुआ ?