कल आज और कल

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Baljit Basi

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Aug 15, 2010, 6:24:28 PM8/15/10
to शब्द चर्चा

भाषा कई बार कितनी कंजूसी करती है, जान कर हैरानी होती है. कई महत्वहीन
शब्दों के लिये कई कई समानार्थक शब्द होते हैं लेकिन कई अति ज़रूरी
संकल्पों के लिए यहाँ, हमें अलग अलग से शब्द चाहिए होते हैं, वहां एक ही
शब्द से काम चला लिया जाता है. बीते हुए दिन और आने वाले दिन के लिए एक
ही शब्द है, 'कल'. बेशक सन्दर्भ से हम समझ जाते हैं कि आने वाले अथवा
बीते हुए दिन की बात की जा रही है, लेकिन फिर भी प्रशन उठता है ऐसी कौन
सी मजबूरी है कि अलग अलग शब्द बने नहीं, या प्रचलत नहीं हुए. पंजाबी में
आने वाले कल के लिए 'भलके' शब्द चलता रहा है खास तौर पर गाओं में जैसे
'मैं भलके दिल्ली जाऊंगा' लेकिन कोई मानसिक/ सामाजिक प्रतिरोधक शक्ती है
जो इस शब्द को चलने नहीं दे रही और यह 'भलक' शब्द हमारी शब्दावली से निकल
रहा है. लोग कल से ही काम चलाना चाहते हैं. पुरानी पंजाबी में 'भलके'
शब्द का अर्थ प्रात:काल होता था जैसे: भलके उठि पराहुणा मेरै घरि
आवउ(गुरू नानक ; मैं सुबह जल्दी उठता हूँ तो पवित्र मेहमान मेरे घर आता
है.) 'भलके' का अर्थ नित्य भी है जैसे, भलके थुक पवै नित दाड़ी( गुरु
अर्जन; आदमी की दाड़ी पर रोज़ थूका जाता है.) . भलके का अर्थ विकसत हो कर
आने वाला कल बन गया परंतू आज क़ी पीडी इसे स्वीकार नहीं कर रही. ऐसा
क्यों होता है?
बलजीत बासी

ई-स्वामी

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Aug 15, 2010, 10:35:50 PM8/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?


2010/8/15 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>



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Rajendra Swarnkar

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Aug 15, 2010, 11:47:22 PM8/15/10
to shabdc...@googlegroups.com
माज़ी    बीते कल के लिये
मुस्तक़बिल     आने वाले कल के लिये

राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

narayan prasad

unread,
Aug 16, 2010, 12:01:01 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
हिन्दी की उपभाषाओं में शायद बीते कल और आने वाले कल के लिए पृथक् शब्द होंगे । जैसे - मगही में बीते कल के लिए कल्ह (या "कल्हे") और आने वाले कल के लिए बिहान (या "बिहने") शब्द का प्रयोग होता है ।
---नारायण प्रसाद

2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.

ePandit | ई-पण्डित

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Aug 16, 2010, 12:03:04 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com


१६ अगस्त २०१० ९:३१ पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

हिन्दी की उपभाषाओं में शायद बीते कल और आने वाले कल के लिए पृथक् शब्द होंगे । जैसे - मगही में बीते कल के लिए कल्ह (या "कल्हे") और आने वाले कल के लिए बिहान (या "बिहने") शब्द का प्रयोग होता है ।
---नारायण प्रसाद

सहमत, गढ़वाली में बीते कल के लिये 'ब्याली' तथा आने वाले कल के लिये 'भ्वला'
 

2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?



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Shrish Benjwal Sharma (श्रीश बेंजवाल शर्मा)
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V S Rawat

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Aug 16, 2010, 12:13:46 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
बहुत बढ़िया मुद्दा उठाया बासी जी,

वास्तव में, यह देख के हैरानी होती है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही
शब्द का प्रयोग करना कितनी बड़ी कमी है भाषा में, और उससे बड़ी हैरानी की बात है कि
हम आज भी इस प्रकार के शब्दों के लिए अलग अलग शब्द नहीं बना रहे हैं और प्रयोग नहीं
कर रहे हैं, उनको प्रचलित नहीं कर रहे हैं।

गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले
कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।

रावत

V S Rawat

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Aug 16, 2010, 12:18:06 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
On 8/16/2010 9:17 AM India Time, _Rajendra Swarnkar_ wrote:

> *माज़ी * बीते कल के लिये

माज़ी अतीत है, जो past के लिए व्यापक शब्द है न कि yesterday के लिए

ऐसे ही एक अर्थ में रफ़्ता प्रयोग होता है जिसका अर्थ वैसे तो धीमा slow होता है परंतु
उसको पीछे छूट गए (शायद धीमे चलने की वजह से) के अर्थ में प्रयोग किया जाता है जैसे
सदा-ए-रफ़्ता = पीछे छूट गए लोगों की आवाज़ या विचार मतलब अतीत के विचार

> *मुस्तक़बिल* आने वाले कल के लिये

मुस्तक़बिल भविष्य है, जो future के लिए व्यापक शब्द है न कि tomorrow के लिए। ऐसा
ही एक शब्द फ़र्दा है।

रावत

>
> राजेन्द्र स्वर्णकार

> *शस्वरं* <http://shabdswarrang.blogspot.com>
> ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
> 2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com <mailto:esw...@gmail.com>>


>
> डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
> उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
>
>
> 2010/8/15 Baljit Basi <balji...@yahoo.com

> <mailto:balji...@yahoo.com>>

Rajendra Swarnkar

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Aug 16, 2010, 12:32:21 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
दुरुस्त फ़रमाया …
सहमत हूं ।

राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
2010/8/16 V S Rawat <vsr...@gmail.com>

संजय | sanjay

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Aug 16, 2010, 12:41:01 AM8/16/10
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गुजराती में गई-काल )गया कल. (आवती काल) आने वाला कल.

राजस्थानी (सुवा'रः) आने वाला कल (कुछ क्षेत्रों में बोला जाता है)

१६ अगस्त २०१० १०:०२ पूर्वाह्न को, Rajendra Swarnkar <swarnkar...@gmail.com> ने लिखा:



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Rajendra Swarnkar

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Aug 16, 2010, 12:51:54 AM8/16/10
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॰ राजस्थानी (सुवा'रः) आने वाला कल (कुछ क्षेत्रों में बोला जाता है)
संजयजी
सुवारै  सवेरे का ही स्थानीय रूप है ।
इसे अगली भोर या अगले दिन की तरह काम में ज़रूर लेते हैं ,
लेकिन सुवारै / सुवा'रः का अर्थ आने वाला कल नहीं कहा जा सकता ।

राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
2010/8/16 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>

ePandit | ई-पण्डित

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Aug 16, 2010, 1:00:59 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com


१६ अगस्त २०१० ९:४३ पूर्वाह्न को, V S Rawat <vsr...@gmail.com> ने लिखा:

बहुत बढ़िया मुद्दा उठाया बासी जी,

वास्तव में, यह देख के हैरानी होती है कि बीते हुए कल और आने वाले कल के लिए एक ही शब्द का प्रयोग करना कितनी बड़ी कमी है भाषा में, और उससे बड़ी हैरानी की बात है कि हम आज भी इस प्रकार के शब्दों के लिए अलग अलग शब्द नहीं बना रहे हैं और प्रयोग नहीं कर रहे हैं, उनको प्रचलित नहीं कर रहे हैं।

गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।

बताया तो ऊपर आने वाले कल के लिये 'भ्वला' है

रावत


On 8/16/2010 3:54 AM India Time, _Baljit Basi_ wrote:


भाषा कई बार कितनी कंजूसी करती है, जान कर हैरानी होती है. कई महत्वहीन
शब्दों के लिये  कई कई समानार्थक शब्द होते हैं लेकिन कई अति ज़रूरी
संकल्पों के लिए यहाँ, हमें अलग अलग से शब्द चाहिए होते हैं, वहां एक ही
शब्द से काम चला लिया जाता है. बीते हुए दिन  और आने वाले दिन के लिए एक
ही शब्द है, 'कल'. बेशक सन्दर्भ से हम समझ जाते हैं कि  आने वाले अथवा
बीते हुए दिन की बात की जा रही है, लेकिन फिर भी प्रशन उठता है ऐसी कौन
सी मजबूरी है कि अलग अलग शब्द बने नहीं, या प्रचलत नहीं हुए. पंजाबी में
आने वाले कल के लिए 'भलके' शब्द चलता रहा है खास तौर पर गाओं में जैसे
'मैं भलके दिल्ली जाऊंगा' लेकिन कोई मानसिक/ सामाजिक प्रतिरोधक शक्ती  है
जो इस शब्द को चलने नहीं दे रही और यह 'भलक' शब्द हमारी शब्दावली से निकल
रहा है. लोग कल से ही काम चलाना चाहते हैं.  पुरानी पंजाबी में 'भलके'
शब्द का अर्थ प्रात:काल  होता था  जैसे: भलके उठि पराहुणा मेरै घरि
आवउ(गुरू नानक ; मैं  सुबह जल्दी उठता हूँ तो पवित्र मेहमान मेरे घर आता
है.) 'भलके'  का अर्थ नित्य भी है जैसे, भलके थुक पवै नित दाड़ी( गुरु
अर्जन; आदमी की दाड़ी पर रोज़ थूका जाता है.) . भलके का अर्थ विकसत हो कर
आने वाला कल बन गया परंतू आज क़ी पीडी इसे स्वीकार नहीं कर रही. ऐसा
क्यों  होता है?
बलजीत बासी

narayan prasad

unread,
Aug 16, 2010, 1:04:46 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
'भ्वला' भी भोर का ही स्थानीय रूप प्रतीत होता है । बिहान भी कुछ इसी अर्थ में आता है ।

2010/8/16 ePandit | ई-पण्डित sharma...@gmail.com

V S Rawat

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Aug 16, 2010, 1:08:11 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
On 8/16/2010 10:30 AM India Time, _ePandit | ई-पण्डित_ wrote:

> १६ अगस्त २०१० ९:४३ पूर्वाह्न को, V S Rawat <vsr...@gmail.com

> <mailto:vsr...@gmail.com>> ने लिखा:


>
>
> गढ़वाली में बीते हुए कल के लिए ब्यालि या ऐसा ही कोई विशेष शब्द है, शायद आने वाले
> कल के लिए कोई अलग शब्द होगा, यदि किसी को ज्ञात हो तो बताएँ।
>
>
> बताया तो ऊपर आने वाले कल के लिये 'भ्वला' है

जी, देखा। वो मेल मैंने पिछली मेल पर उत्तर भेजने के बाद देखी थी। धन्यवाद

ब्यालि yesterday
भ्वाल tomorrow

मुझे आश्चर्य और प्रसन्नता हुई कि इस सूचि में गढ़वाली भाषा के शब्दों को जानने वाले भी
कई लोग हैं।

रावत

sushrut jalukar

unread,
Aug 16, 2010, 1:47:08 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
मुझे लगता है, ऐसा हर एक भाषा में हो रहा है। मै आप से सहेमत हूँ।  इन लोगों को ऐसा कर के क्या हासिल करनां है, भगवान ही जाने।

सुश्रुत.

2010/8/16 Baljit Basi <balji...@yahoo.com>

संजय | sanjay

unread,
Aug 16, 2010, 2:15:36 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
'कल' की तरह ही भोजन है. पता नहीं चलता सुबह का या शाम का. भारत की अन्य भाषाएं ऐसे मामलों में हिन्दी से ज्यादा समृद्ध है. शायद शब्द अपनाने में हिन्दी संकोची है. राजस्थानी में सुबह के नाश्ते को "सिरावण" व दुपहर के नाश्ते को "दुपारी" (दुपहरी) कहा जाता. सम्भव है शब्दों का अपभ्रशं हुआ हो मगर अर्थ स्पष्ट होता है और व्यापक प्रचलन में भी है.

१६ अगस्त २०१० ११:१७ पूर्वाह्न को, sushrut jalukar <sushrut...@gmail.com> ने लिखा:

ePandit | ई-पण्डित

unread,
Aug 16, 2010, 2:32:01 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com


१६ अगस्त २०१० १०:३४ पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

'भ्वला' भी भोर का ही स्थानीय रूप प्रतीत होता है । बिहान भी कुछ इसी अर्थ में आता है ।

आपकी बात जँचती है क्योंकि 'भ्वला' का ही एक अन्य रुप 'भ्वोल' जो 'भोर' के अधिक निकट है।
 

2010/8/16 ePandit | ई-पण्डित sharma...@gmail.com

बताया तो ऊपर आने वाले कल के लिये 'भ्वला' है

ghughuti basuti

unread,
Aug 16, 2010, 2:37:20 AM8/16/10
to शब्द चर्चा

कुमाउँनी में आने वाले कल के लिए भोल, बीते हुए के लिए ब्याली होता है।
घुघूती बासूती
On Aug 16, 11:32 am, ePandit | ई-पण्डित <sharma.shr...@gmail.com>
wrote:

> १६ अगस्त २०१० १०:३४ पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:
>
> > 'भ्वला' भी भोर का ही स्थानीय रूप प्रतीत होता है । बिहान भी कुछ इसी अर्थ में
> > आता है ।
>
> आपकी बात जँचती है क्योंकि 'भ्वला' का ही एक अन्य रुप 'भ्वोल' जो 'भोर' के अधिक
> निकट है।
>
>
>
> > 2010/8/16 ePandit | ई-पण्डित sharma.shr...@gmail.com

Abhay Tiwari

unread,
Aug 16, 2010, 3:14:08 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
अच्छी चर्चा शुरु हुई है..
मराठी में आने वाले कल के लिए उद्या शब्द है..
शाम के खाने के लिए हिन्दी का एक पुराना शब्द ब्यालू होता था.. अब प्रचलन से बाहर हो गया है..

Abhay Tiwari

unread,
Aug 16, 2010, 3:17:01 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
फ़ारसी में बीते कल के लिए दीरोज़, आज के इमरोज़ और आने वाले कल के फ़र्दा शब्द हैं।
----- Original Message -----
Sent: Monday, August 16, 2010 8:05 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल

Abhay Tiwari

unread,
Aug 16, 2010, 3:20:39 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
अंस्कृत में, आप्टे जी के कोष में, बीते कल के लिए ह्यस् और आने वाले कल के लिए श्वस् दिया है..  
----- Original Message -----
Sent: Monday, August 16, 2010 8:05 AM
Subject: Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल

Bodhi Sattva

unread,
Aug 16, 2010, 3:32:47 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
शब्द चर्चा अच्छी चल रही है
मुझे लगता है कि कल वह दिन है जो आज नहीं है। जो या तो बीत गया हो या आने वाला हो।
हिंदी कविता में भविष्य और भूत दोनों के लिए आगे शब्द का प्रयोग होता रहा है।
 
भए, जे अहहिं, जे होइहईं आगे-तुलसीदास
 
आगे चना गुरु मातु दए सो लए तुम चाबि हमें नहिं दीने
 
फिर 
आगे-आगे देखिए होता है क्या
इसे साफ देख सकते हैं कि आगे न कल का आगे था न आने वाला है बस वाक्य प्रयोग से तय होगा। क्यों कि कल की ही तरह आगे वह है जो वर्तमान नहीं है। ऐसे ही कल भी वह है जो आज नहीं है। 
कल के प्रयोग भी देखे जा सकते हैं-
 
कल का सपना बहुत सुहाना था,
ये उदासी न कल रही होगी- दुष्यंत
 
कल चौदवीं की रात थी- इंशा
न जाने कल क्या होगा। 
माली आवत देख के कल्हियाँ करी पुकार,
फूलै-फूलै चुन लई काल्ह हमारी बार- कबीर
काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब-कबीर
अवध में
एकदम अगली सुबह- बिहान है
--
Dr. Bodhisatva, mumbai
0-9820212573

आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति"

unread,
Aug 16, 2010, 4:55:07 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
भोजपुरी में भी आने वाले कल के लिए 'बिहान' या 'बेहने' पर्युक्त होता है और बीते हुए कल के लिए 'काल्ह' या 'कल्हियाँ'. 

2010/8/16 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>


१६ अगस्त २०१० ९:३१ पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

हिन्दी की उपभाषाओं में शायद बीते कल और आने वाले कल के लिए पृथक् शब्द होंगे । जैसे - मगही में बीते कल के लिए कल्ह (या "कल्हे") और आने वाले कल के लिए बिहान (या "बिहने") शब्द का प्रयोग होता है ।
---नारायण प्रसाद

सहमत, गढ़वाली में बीते कल के लिये 'ब्याली' तथा आने वाले कल के लिये 'भ्वला'
 
2010/8/16 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व: हैं.
उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?



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Baljit Basi

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Aug 16, 2010, 6:55:15 AM8/16/10
to शब्द चर्चा
ऐसा लगता है की हमारी भाषाओँ में सवेर के समानार्थक शब्दों से ही आने
वाले कल का काम लिया जा रहा है. पंजाबी 'भलके' का अर्थ तो सवेर है ही. हो
सकता है यह 'भ्वला' का सुजाति हो. हम आने वाले कल को भी सवेर कह देते
हैं जैसे, 'मैं सवेरे जाऊंगा.' सबेर को 'तड़के' भी कहते हैं और तड़के का
भाव भी आने वाले कल से ले लिया जाता है. यहाँ तक कि अंग्रेज़ी शब्द
tomorrow में भी morrow का मतलब morning अर्थात सबेर है और to का मतलब
on. फिर दोनों शब्द संयुक्त हो कर एक शब्द बन गया. today और tonight भी
ऐसे ही बने है. यहाँ to को हम हिंदी में अनुवाद करें तो tomorrow का मतलब
निकलता है 'सबेर को' . खैर शब्द तो इसी तरह
दुसरे शब्दों से ही बनते हैं. बोधी जी जो बात 'आगे' लगा कर कर रहे हैं वह
'पीछे' लग कर भी हो सक्र्ती है. आने वाला कल आगे है क्योंकि आज उस तरफ
बड़ रहा है. लेकिन बीत गया कल भी आगे है क्योंकि यह तो आज से भी पहल करके
गुजर गया. इसी तरह आने वाला कल पीछे भी है क्योंकि वह आज के बाद यानि
पीछे आएगा. फिर बीत गया कल भी पीछे है क्योंकि उसको तो हम पीछे छोड़ ही
आयें है!
मसला तो यह है कि साहित्यिक भाषा आने वाले कल के लिए अलग शब्द अपनाने से
क्यों शर्माती है ? मेरी मानो, आज से यह मता पास कर दो कि कल से हम आने
वाले कल को 'भलके' कहेंगे.
Baljit Basi

On 16 अग, 03:32, Bodhi Sattva <abod...@gmail.com> wrote:
> शब्द चर्चा अच्छी चल रही है
> मुझे लगता है कि कल वह दिन है जो आज नहीं है। जो या तो बीत गया हो या आने वाला
> हो।
> हिंदी कविता में भविष्य और भूत दोनों के लिए आगे शब्द का प्रयोग होता रहा है।
>
> भए, जे अहहिं, जे होइहईं आगे-तुलसीदास
>
> आगे चना गुरु मातु दए सो लए तुम चाबि हमें नहिं दीने
>
> फिर
> आगे-आगे देखिए होता है क्या
> इसे साफ देख सकते हैं कि आगे न कल का आगे था न आने वाला है बस वाक्य प्रयोग
> से तय होगा। क्यों कि कल की ही तरह आगे वह है जो वर्तमान नहीं है। ऐसे ही कल भी
> वह है जो आज नहीं है।
> कल के प्रयोग भी देखे जा सकते हैं-
>
> कल का सपना बहुत सुहाना था,
> ये उदासी न कल रही होगी- दुष्यंत
>
> कल चौदवीं की रात थी- इंशा
> न जाने कल क्या होगा।
> माली आवत देख के कल्हियाँ करी पुकार,
> फूलै-फूलै चुन लई काल्ह हमारी बार- कबीर
> काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब-कबीर
> अवध में
> एकदम अगली सुबह- बिहान है
>

> On 8/16/10, Abhay Tiwari <abhay...@gmail.com> wrote:
>
>
>
>
>
>
>
> >  फ़ारसी में बीते कल के लिए दीरोज़, आज के इमरोज़ और आने वाले कल के फ़र्दा शब्द
> > हैं।
>
> > ----- Original Message -----

> > *From:* ई-स्वामी <esw...@gmail.com>
> > *To:* shabdc...@googlegroups.com
> > *Sent:* Monday, August 16, 2010 8:05 AM
> > *Subject:* Re: [शब्द चर्चा] कल आज और कल


>
> > डिक्शनरी देखी..संस्कृत में बीते कल के लिये ह्य: और आने वाले कल के लिये श्व:
> > हैं.
> > उर्दू में भी क्या गुज़रे और आने वाले कल के लिये अलग अलग शब्द हैं?
>

> > 2010/8/15 Baljit Basi <baljit_b...@yahoo.com>


>
> >> भाषा कई बार कितनी कंजूसी करती है, जान कर हैरानी होती है. कई महत्वहीन
> >> शब्दों के लिये  कई कई समानार्थक शब्द होते हैं लेकिन कई अति ज़रूरी
> >> संकल्पों के लिए यहाँ, हमें अलग अलग से शब्द चाहिए होते हैं, वहां एक ही
> >> शब्द से काम चला लिया जाता है. बीते हुए दिन  और आने वाले दिन के लिए एक
> >> ही शब्द है, 'कल'. बेशक सन्दर्भ से हम समझ जाते हैं कि  आने वाले अथवा
> >> बीते हुए दिन की बात की जा रही है, लेकिन फिर भी प्रशन उठता है ऐसी कौन
> >> सी मजबूरी है कि अलग अलग शब्द बने नहीं, या प्रचलत नहीं हुए. पंजाबी में
> >> आने वाले कल के लिए 'भलके' शब्द चलता रहा है खास तौर पर गाओं में जैसे
> >> 'मैं भलके दिल्ली जाऊंगा' लेकिन कोई मानसिक/ सामाजिक प्रतिरोधक शक्ती  है
> >> जो इस शब्द को चलने नहीं दे रही और यह 'भलक' शब्द हमारी शब्दावली से निकल
> >> रहा है. लोग कल से ही काम चलाना चाहते हैं.  पुरानी पंजाबी में 'भलके'
> >> शब्द का अर्थ प्रात:काल  होता था  जैसे: भलके उठि पराहुणा मेरै घरि
> >> आवउ(गुरू नानक ; मैं  सुबह जल्दी उठता हूँ तो पवित्र मेहमान मेरे घर आता
> >> है.) 'भलके'  का अर्थ नित्य भी है जैसे, भलके थुक पवै नित दाड़ी( गुरु
> >> अर्जन; आदमी की दाड़ी पर रोज़ थूका जाता है.) . भलके का अर्थ विकसत हो कर
> >> आने वाला कल बन गया परंतू आज क़ी पीडी इसे स्वीकार नहीं कर रही. ऐसा
> >> क्यों  होता है?
> >> बलजीत बासी
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संजय | sanjay

unread,
Aug 16, 2010, 7:02:45 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
समस्या यह है कि 'भलके' ही क्यों कहेंगे? :) तड़के क्यों नहीं?

एक समस्या यह है कि कोई दक्षिण भारतीय भाषाओं को जानने वाला समूह में नहीं, वरना वहाँ के शब्द भी सामने आते और अखिल भारतीय स्वरूप उभरता. हिन्दी में दक्षिण के शब्द आने बहुत जरूरी है.

१६ अगस्त २०१० ४:२५ अपराह्न को, Baljit Basi <balji...@yahoo.com> ने लिखा:

V S Rawat

unread,
Aug 16, 2010, 7:03:04 AM8/16/10
to shabdc...@googlegroups.com
On 8/16/2010 2:25 PM India Time, _आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति"_ wrote:

> भोजपुरी में भी आने वाले कल के लिए 'बिहान' या 'बेहने' पर्युक्त होता है और बीते हुए कल के
> लिए 'काल्ह' या 'कल्हियाँ'.
>

यदि बीते हुए कल के लिए 'काल्ह' होता है, तब तो ___दासजी ने सही ही संदेश दिया आज
की पीढ़ी की मानसिकता के हिसाब से, काल्ह करे सो आज कर (जो कल कर लेना चाहिए
था, उसको आज करो।)

--
रावत

V S Rawat

unread,
Aug 16, 2010, 7:04:28 AM8/16/10
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On 8/16/2010 12:47 PM India Time, _Abhay Tiwari_ wrote:

> फ़ारसी में बीते कल के लिए दीरोज़, आज के इमरोज़ और आने वाले कल के फ़र्दा शब्द हैं।

हाँ इमरोज़ तो टूडे के लिए है।

मैं फ़र्दा को भविष्य फ़्यूचर समझता था, बताने के लिए धन्यवाद कि फ़र्दा टूमारो के लिए है।

दीरोज़ पहली बार सुना। क्या किसी को कोई गद्य या पद्य पता है जिसमें इस शब्द का
प्रयोग हुआ हो।

धन्यवाद
रावत

Baljit Basi

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Aug 16, 2010, 7:47:15 AM8/16/10
to शब्द चर्चा
दीरोज़ (नवजवान शायर बेकस) :
दीरोज़ कोई और मिला इमरोज़ कोई और,
हर मोड़ पर हमको मिला दिलदोज़ कोई और,

फरोज़ कोई शहर में हनोज़ ना मिला,
तुझसा न मिला हमें शहरोज़ कोई और.

*
फ़र्दा( साहिर लुधियानवी) :
कौन जाने मेरी इम्रोज़ का फ़र्दा क्या है
क़ुबर्तें बढ़ के पशेमान भी हो जाती है दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं
नज़रें
देखते देखते अंजान भी हो जाती है.
Baljit Basi

ashutosh kumar

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Aug 16, 2010, 9:18:57 PM8/16/10
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बेहतरीन चर्चा. गौरतलब  ये है कि  अरबी फारसी से हिंदी ने इतना सब कुछ लिया तो फीरोज  / इमरोज/ फर्दा ने क्या बिगाड़ा था?क्या किसी को कल/ कल में सचमुच कभी घपला हुआ ?

ई-स्वामी

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Aug 16, 2010, 10:16:18 PM8/16/10
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इमानदारी से कहूं तो मुझे कभी भी कल और कल में कोई बडा कनफ़्यूजन नही हुआ, चूंकि संदर्भ से काल का पता चल जाता है.
लेकिन मैं कनफ़्यूज करने वाले वाक्य जबरदस्ती बना कर आपको सिद्ध कर सकता हूं कि कनफ़्यूजन पैदा करना कितना आसान हो सकता है -

१)  एक केस ऐसा चाहिये जिसमें कालबोधक कुछ ना हो तो प्रस्तुत है -
अब कल की बात करें?
गुज़रे कल की या आने वाले कल की? 

२) उसने मुझे कहा था कि वो कल आएगी!
मतलब जिस दिन कहा था उसके अगले दिन? या कि जब मैंने उसके कहने का जिक्र किया उसके अगले दिन?
यदी सटीक रूप से कहना हो तो यूं कहना चाहिए -
कह रही थी कि वो तो अगले ही दिन आ जाएगी.  (या अन्यथा)
उसने कहा था कि वो तो अब कल आने वाली है.

वैसे ऐसे पंगे प्रकारान्त से अन्य भाषाओं मे भी लिये जा सकते हैं.


2010/8/16 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>



बेहतरीन चर्चा. गौरतलब  ये है कि  अरबी फारसी से हिंदी ने इतना सब कुछ लिया तो फीरोज  / इमरोज/ फर्दा ने क्या बिगाड़ा था?क्या किसी को कल/ कल में सचमुच कभी घपला हुआ ?

narayan prasad

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Aug 16, 2010, 11:50:21 PM8/16/10
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<<२) उसने मुझे कहा था कि वो कल आएगी! >>

यहाँ किसी प्रकार के भ्रम की बात ही नहीं है ।


<<मतलब जिस दिन कहा था उसके अगले दिन? >>

जी हाँ ।


<<वैसे ऐसे पंगे प्रकारान्त से अन्य भाषाओं मे भी लिये जा सकते हैं. >>

Was the motorist driving by the right side of the road ?

-- नारायण प्रसाद

2010/8/17 ई-स्वामी <esw...@gmail.com>

संजय | sanjay

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Aug 17, 2010, 12:07:41 AM8/17/10
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बात पंगे लेने या कमी निकालने की नहीं है. जब संस्कृत में कल के लिए दो शब्द थे तो हिन्दी में भी होते तो अच्छा होता, बस. और जिम्मेदारी तो लिखाड़ लोगों की है.

१७ अगस्त २०१० ९:२० पूर्वाह्न को, narayan prasad <hin...@gmail.com> ने लिखा:

Pritish Barahath

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Aug 17, 2010, 2:22:44 AM8/17/10
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अब कल की बात करें? 
 
यहाँ प्रसंग पूरा नहीं है इसलिये कन्फूजन है, इस "अब" को पूरा करदें तो कोई भी बता देगा कि किस कल की बात करनी है, वैसे जो कह रहा है और सुन रहा है क्या उनको भी कोई कनफ्यूजन है ?
इससे अच्छा उदाहरण तो कल का अर्थ पूछना ही हो सकता है. या केवल कल बोलें तब कन्फूजन है
 
हिन्दी में ऐसे कितने ही शब्द हैं जो एक से अधिक अर्थ रखते हैं यही भाषा की कमी ही नहीं कभी-कभी उसकी ताकत है और उसका सौंदर्य तो है ही है....
 

<<२) उसने मुझे कहा था कि वो कल आएगी! >>
इस वाक्या का था तो इतना भी स्पष्ट कर रहा है कि वह कल या तो आज है या जा चुका है, आने वाला तो कतई नहीं है, आने वाले कल के लिये इस वाक्य में  था के स्थान पर है आया होता
 
--
Pritish Barahath
Jaipur

ई-स्वामी

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Aug 17, 2010, 11:25:02 AM8/17/10
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बात पंगे लेने या कमी निकालने की नहीं है. जब संस्कृत में कल के लिए दो शब्द थे तो हिन्दी में भी होते तो अच्छा होता, बस. और जिम्मेदारी तो लिखाड़ लोगों की है.
बिल्कुल ठीक! हां  कल के लिये दो शब्द होते तो अच्छा होता लेकिन जिम्मेदाराना लेखन कर के किसी भी संभावित घपले को दूर किया जा सकता है, इसीलिये कहा कि मात्र एक पाईंट प्रूव करने के लिये जबरदस्ती घपलेबाज उदाहरण लाए जा सकते हैं लेकिन वो किसी और भाषा पर भी लागू बात है.
इस तथ्य को भाषा की सीमितता माना जाए या सौंदर्य यह व्यक्तिगत राय का मसला है. मेरी दृष्टी में तो यह सीमितता भी है और सौंदर्य भी.  सौंदर्य कैसे?
चूंकि ये पॉलिसेमी है ( याद आय? और इस लिये जुडवां भी आ सकता है).
कल कल का परसों है! ;-)


2010/8/16 संजय | sanjay <sanjay...@gmail.com>
बात पंगे लेने या कमी निकालने की नहीं है. जब संस्कृत में कल के लिए दो शब्द थे तो हिन्दी में भी होते तो अच्छा होता, बस. और जिम्मेदारी तो लिखाड़ लोगों की है.

ePandit | ई-पण्डित

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Aug 17, 2010, 1:31:58 PM8/17/10
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१७ अगस्त २०१० ७:४६ पूर्वाह्न को, ई-स्वामी <esw...@gmail.com> ने लिखा:

इमानदारी से कहूं तो मुझे कभी भी कल और कल में कोई बडा कनफ़्यूजन नही हुआ, चूंकि संदर्भ से काल का पता चल जाता है.

भई इस कल को OOP के फंक्शन ओवरलोडिंग (जैसे C++ में) की तरह लें, जैसे पैरामीटर (प्रसंग) फंक्शन (कल) को पास करोगे उसी हिसाब से उपयुक्त फंक्शन (बीता हुआ/आने वाला) चलेगा। :)

लेकिन मैं कनफ़्यूज करने वाले वाक्य जबरदस्ती बना कर आपको सिद्ध कर सकता हूं कि कनफ़्यूजन पैदा करना कितना आसान हो सकता है -

१)  एक केस ऐसा चाहिये जिसमें कालबोधक कुछ ना हो तो प्रस्तुत है -
अब कल की बात करें?
गुज़रे कल की या आने वाले कल की? 

२) उसने मुझे कहा था कि वो कल आएगी!
मतलब जिस दिन कहा था उसके अगले दिन? या कि जब मैंने उसके कहने का जिक्र किया उसके अगले दिन?
यदी सटीक रूप से कहना हो तो यूं कहना चाहिए -
कह रही थी कि वो तो अगले ही दिन आ जाएगी.  (या अन्यथा)
उसने कहा था कि वो तो अब कल आने वाली है.

वैसे ऐसे पंगे प्रकारान्त से अन्य भाषाओं मे भी लिये जा सकते हैं.


2010/8/16 ashutosh kumar <ashuv...@gmail.com>



बेहतरीन चर्चा. गौरतलब  ये है कि  अरबी फारसी से हिंदी ने इतना सब कुछ लिया तो फीरोज  / इमरोज/ फर्दा ने क्या बिगाड़ा था?क्या किसी को कल/ कल में सचमुच कभी घपला हुआ ?


Pritish Barahath

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Aug 27, 2010, 5:42:18 AM8/27/10
to shabdc...@googlegroups.com
jal ja
jal la
hal kar
hal chala


 
2010/8/17 ePandit | ई-पण्डित <sharma...@gmail.com>



--
Pritish Barahath
Jaipur
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