Hindi Article-Types of Hindus

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Dr Ram Puniyani

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Jul 17, 2026, 11:45:30 AM (9 days ago) Jul 17
to Dr Ram Puniyani

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हिन्दुओं की किस्में - बकौल आरएसएस मुखिया

- राम पुनियानी

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत हिन्दू राष्ट्र के विचार को सही ठहराने के लिए तरह-तरह की वैचारिक कलाबाजियां खाते रहते हैं। वे कई बार कह चुके हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग हिन्दू हैं, हमारे पूर्वज एक ही थे आदि। मगर समस्या यह है कि पुराने आरएसएस विचारक यह नजरिया पेश करते रहे हैं कि इस्लाम और ईसाईयत विदेशी धर्म हैं। हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के जनक वी. डी. सावरकर ने हिन्दू को परिभाषित करते हुए कहा था कि हिन्दू वह है जो सिन्धु से लेकर समुद्र तक की भूमि को पवित्र और अपनी पितृभूमि मानता है। द्वितीय सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर का कहना था कि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु हम जर्मनी के मॉडल का अनुसरण करेंगे जहां बहुत बड़ी संख्या में यहूदियों को यातनाएं दी गईं और फिर उन्हें गैस चैम्बरों में भेजकर जर्मन राष्ट्र का निर्माण किया गया। हाल में इसी वक्तव्य के अधिक चिकने-चुपड़े संस्करण भागवत ने सामने रखें हैं।

आरएसएस यह भी कहता रहा है कि हिन्दू दरअसल एक धर्म नहीं वरन् एक जीवनशैली है। यह कथन समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से गलत है, जिसके अनुसार आराध्य, कर्मकांड, पवित्र ग्रंथ, पुरोहित वर्ग आदि धर्म के तत्व माने जाते हैं। हाल में उन्होंने हिन्दुओं का अनोखा वर्गीकरण किया जिसका उद्धेश्य मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त हाशियेपन के एहसास को कम करना था। हिन्दू धर्म की बहुत ही अजीब परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा ‘‘अगर आप भारतीय हैं तो यह प्रकृति (हिन्दू) आप में अंतर्निहित है‘‘। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुसलमान और ईसाई हिंदू राष्ट्र के अविभाज्य अंग हैं। इसके बाद उन्होंने देश के हिंदुओं का चार मुख्य समूहों में वर्गीकरण किया। उन्होंने कहा कि पहले समूह में वे लोग शामिल हैं जो अपनी हिन्दू पहचान को गर्व से घोषित करते हैं। दूसरे समूह में वे लोग हैं जो अपने को हिन्दू मानते हैं लेकिन इसमें उन्हें किसी विशिष्टता का एहसास नहीं होता। भागवत के अनुसार तीसरा समूह उन लोगों का है जो केवल निजी चर्चा में अपनी हिन्दू पहचान का जिक्र करते हैं। चौथे समूह में वे लोग शामिल हैं जो या तो अपनी हिन्दू पहचान को भूल चुके है या जिसे उन्हें विस्मृत करा दिया गया है‘‘

उनके अनुसार स्वाभिमानी हिन्दू कौन हैं? वे जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ढहाया? वे जो मस्जिदों के सामने नाचते हैं और गालियों भरे नारे लगाते हैं? वे जो कावंड़ियों के भेष में सड़कों पर हंगामा करते हैं? हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया लेकिन हमें इसका अनुमान लगाना होगा। बाबासाहेब अम्बेडकर एक हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे लेकिन उन्होंने बाद में मनुस्मृतिजलाई और घोषणा की कि हालांकि वे हिन्दू पैदा हुए हैं, लेकिन वे एक हिन्दू के रूप में नहीं मरेंगे। आरएसएस प्रमुख उन्हें किस वर्ग में रखेंगे? वे भारतीय संविधान को क्या बताएंगे - एक अच्छेहिन्दू द्वारा निर्मित संहिता, या कुछ और? उनकी संस्था ने तो यह कहते हुए संविधान का विरोध किया था कि यह पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है।

वर्तमान में आरएसएस की दुविधा यह है कि मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों और आदिवासियों को आरएसएस से जोड़ने के लिए उसे ईसाईयों और मुसलमानों के बारे में सम्मानजनक ढंग से बात करने की कलाबाजी दिखानी होगी। वैसे भी हिन्दू धर्म को पारिभाषित करना निश्चित ही एक कठिन कार्य है। इसकी कई वजहें हैं। पहली यह है कि हिन्दू धर्म एक पैगम्बर-आधारित धर्म नहीं है। उसकी स्थापना करने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं है। दूसरी वजह यह है कि दुनिया के इस हिस्से में विकसित हुई कई धार्मिक धाराएं, हिन्दू धर्म में समाहित हुई हैं। तीसरी यह कि हिंदू धर्म के कर्मकांडों में इतनी विविधता है कि उन्हें एक रंग में नहीं रंगा जा सकता। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि अलग-अलग कालखंडों में विकसित हुए विचार और परंपराएं आज भी एक साथ इस धर्म का हिस्सा हैं। भगवान सत्यनारायण और संतोशी माता की पूजा होती है और साथ ही सगुण और निर्गुण ईश्वर की अवधारणाएं भी बनी हुई हैं।

हिन्दू धर्म से जुड़ा एक मूलभूत मुद्दा है वर्ण व्यवस्था का धर्म के महत्वपूर्ण पक्षों पर गहरा प्रभाव, सामजिक असमानता को धार्मिक मान्यता और वर्ण व्यवस्था का उसके धर्मग्रंथों और परंपराओं के केन्द्र में होना।

आर्य, जो कई चरणों में भारत आए, पशुपालक और बहुदेववादी थे। शुरूआती काल में वेद लिखे गए, जो उस काल के मूल्यों की एक झलक पेश करने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के बहुत से देवी-देवताओं की बात करतें हैं और बहुदेववाद का अस्तित्व दर्शाते हैं। मनु के नियमसमाज के मार्गनिर्देशी सिद्धांत थे। वैदिक काल के बाद ब्राहम्णवाद का दौर आया। इस काल में समाज का कुलीन वर्ग, सामान्य लोगों से एकदम कट गया। इस दौर में जाति प्रथा के जरिए कुलीन वर्गों के विशिष्ट बने रहने का अत्यंत कुशल तंत्र स्थापित हुआ।

जातिप्रथा को बौद्ध धर्म द्वारा चुनौती दिए जाने से ब्राम्हणवाद एक ऐसे दौर में प्रवेश करने को बाध्य हुआ जिसे हिन्दू धर्म कहा जा सकता है। इस दौर में सामाजिक एवं धार्मिक परंपराओं से समाज के अपेक्षाकृत बड़े वर्ग को जोड़ा गया और सार्वजनिक समारोह एवं कर्मकांड स्थापित किए गए ताकि सामान्य लोगों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोका जा सके। यहां एक ध्यान देने योग्य दिलचस्प बात यह है कि 8वीं शताब्दी तक तथाकथित हिन्दू ग्रंथों में हिन्दूशब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था। यह शब्द पश्चिम एशियाई मुसलमानों के यहां आगमन के साथ अस्तित्व में आया। वे सिन्धु नदी के इस पार रहने वालों को हिन्दू कहते थे। इस तरह हिन्दू शब्द दरअसल एक भौगोलिक इलाके का नाम था। बाद में इस इलाके में विकसित हुए धर्मों को हिन्दू कहा जाने लगा। जाति प्रथा के शिकार लोगों ने धर्मपरिवर्तन करने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने बौद्ध धर्म, इस्लाम, कुछ हद तक ईसाई धर्म और बाद के दौर में सिक्ख धर्म अपनाया।

हिन्दू धर्म के अंदर भी दो धाराएं एक दूसरे के समानांतर चलीं। ब्राहम्णवाद और श्रमणवाद। श्रमणों ने ब्राम्हणों के नियंत्रण का विरोध किया और जाति प्रथा को खारिज किया। वैसे बोलबाला ब्राम्हणवाद का ही रहा लेकिन हिन्दू धर्म की अन्य धाराएं भी कायम रहीं जिनमें तंत्र, भक्ति, शैव, सिद्धांत आदि शामिल थीं। श्रमणों ने वैदिक मूल्यों और नियमों को नहीं माना। जहां ब्राम्हणवाद ने धार्मिक परंपराओं को जाति के आधार पर वर्गीकृत किया वहीं श्रमणवाद ने जाति भेद को खारिज किया। ब्राम्हणवादी हिन्दू धर्म का बोलबाला इसलिए कायम रहा क्योंकि वह शासकों से जुड़ा हुआ था। समय बीतने के साथ नीची जातियों की हिंदू परंपराओं की उपेक्षा कर ब्राम्हणवाद को ही हिन्दू धर्म की मान्यता दी जाने लगी। यह प्रवृत्ति मगध-मौर्य साम्राज्यों द्वारा बौद्ध एवं जैन धर्मों को कुचलने के साथ प्रारंभ हुई। बाद में अंग्रेजों के आगमन के साथ, जो भारतीय समाज को समझना चाहते थे, ब्राम्हणवादी परंपराओं पर आधारित हिन्दू पहचान सभी गैर-मुस्लिमों और गैर-ईसाईयों पर लाद दी गई। वेद एवं अन्य ब्राम्हणवादी ग्रंथों को हिन्दू ग्रंथों की तरह प्रस्तुत किया गया। इससे हिन्दू धर्म की विविधिता ओझल हो गई और ब्राम्हणवाद को ही हिन्दू धर्म की मान्यता मिल गई। इसलिए आज हिन्दू धर्म को ब्राम्हणवादी कर्मकांडों, ग्रंथों एवं ब्राम्हणों के प्रभुत्व से जोड़ा जाता है।

श्री भागवत को हिंदुओं के उनके वर्गीकरण में जाति प्रथा का भी ध्यान रखना चाहिए था। सवाल यह भी है कि अत्यंत विविधतापूर्ण और व्यापक हिन्दू धर्म में भागवत के हिन्दुओं के चार वर्गों को कहां रखा जाएगा। (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)


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