Sanskrit subhashitam

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K.N.RAMESH

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Aug 17, 2018, 3:44:57 AM8/17/18
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Courtesy: Sri.Trilokinath 
*ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ जयमहादेव ॥*

पन्थामनुचरेम सूर्यचन्द्रमसाविव । पुनर्ददताध्नता जानता सं गमेमहि ॥    
     (ऋग्वेद ५|५१|१५|)

💐अर्थ  :- हम सूर्य और चन्द्रमा की भांति कल्याण-युक्त मार्ग पर चलते रहें। दानी, अहिंसाकारी,ज्ञानी जनों तथा परमात्मा से मेल कर सदा सुख प्राप्त करें। 
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*सूर्यदेवः चन्द्रदेवः च विश्वं प्रकाशेते ।*
*एतौ जगतः हिताय हि सदा द्योतेते ।*
*सूर्यचन्द्रौ शुभकर्तरि मार्गे चलतः ।*

*सूर्यचन्द्रवत् वयम् अपि कल्याणेन युते पथि चलन्तः भवाम ।*
*दानिनः अहिंसाकारिणः ज्ञानिनः परमात्मानं च मिलित्वा सदा सुखं लभामहै ।*
*परमात्मनः कृपया वयम् अपि दानिनः अहिंसकाः ज्ञानिनः च भवाम ।*

*🌹🌹 सर्वेषां सुमङ्गलं भूयात् 🌹🌹*
*" जयतु संस्कृतम् ॥ जयतु भारतम् ॥"*

K.N.RAMESH

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Aug 17, 2018, 3:47:25 AM8/17/18
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⛳🌞 विदग्धा वाक् ⛳

*शुष्कवैरं न कुर्वीत गोशृङ्गस्येव भक्षणम्।*
*दन्ताश्च परिमृज्यन्ते रसश्चापि न लभ्यते॥*
--नित्यनीतिः २२०

शुष्कवैरं न कुर्वीत गोशृङ्गस्य इव भक्षणम्। दन्ताः च परिमृज्यन्ते रसः च अपि न लभ्यते॥

शुष्कवैरं न कुर्वीत। (तत्) गोशृङ्गस्य भक्षणम् इव। (तेन) दन्ताः च परिमृज्यन्ते, रसः च अपि न लभ्यते॥

व्यर्थ कठोर बैर नहीं करना चाहिए। (ऐसा करना) गाय के सींग को खाने (का प्रयास) के समान होता है। (उससे) दाँत दुखते हैं, और रस भी नहीं मिलता।

Sterile enmity is not to be indulged in. It is like chewing the horn of a cow. It pains the teeth and gums but produces no juice.

--Subhashitha Samputa, Bharatiya Vidya Bhavan
🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺

K.N.RAMESH

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Aug 23, 2018, 4:47:43 AM8/23/18
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आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मण: |
क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य काल: पिबति तद्रसम् ||
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
Whatever you have to return back to others or whichever work has to be done by you, please do it in the expected time only (Don't delay too much). If you don't do this in time (You do it late) then the importance of that work vanishes
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
जो कुछ लेना है अथवा कर्तव्य समजकर करना है, यदि उसे समय पर ही नहीं किया तो समय उस बात का स्वारस्य शोषित कर लेता है।

🌺🌺🌺॥जय सच्चिदानन्द:॥🌺🌺🌺

K.N.RAMESH

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Aug 31, 2018, 7:20:13 AM8/31/18
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*अस्ति पुत्रो वशे यस्य भृत्यो भार्या तथैव च |*
*अभावे सति संतोषः स्वर्गस्थोSसौ महीतले ||*
🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰🔰

जिस व्यक्ति के पुत्र  (संतान) उसके बश में  हों  (आज्ञाकारी हों ) तथा वैसे ही उसके नौकर तथा स्त्री भी आज्ञाकारी हों, तो ऐसा व्यक्ति अनेक अभावों के होते  हुए भी  यदि संतोषी प्रवृत्ति का हो तो उस के लिये यह  पृथ्वी ही स्वर्ग के समान सुखदायक है |
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
*A person whose sons and  similarly his servants and his wife  are under his control (obedient to him), and if  he remains content and happy in spite of facing various types of shortages in his daily life, then for him there is the bliss of the Heaven on this  Earth itself.*
🌹🌸🌷🙏🙏🙏🙏🌷🌸🌹

K.N.RAMESH

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Sep 3, 2018, 8:03:15 AM9/3/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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   " *सामान्यनीतिः* "  ( १७९ )
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    *श्लोक*----
   " को लाभो  गुणिसंगमः किमसुखं  प्राज्ञैतरैः  संगतिः
     का  हानिः  समयच्युतिर्निपुणता का  धर्मतत्त्वे  रतिः।
    कः  शूरो  विजेतेन्द्रियः  प्रियतमा  यानुव्रता  किं  धनं 
     विद्या  किं  सुखमप्रवासगमनं  राज्यं  किमाज्ञाफलम् ।। ( नीतिशतकम् )
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    *अर्थ*----
  सच्चा  लाभ  कौनसा ? गुणीजनों  की सङ्गति।  सच्चा दुःख  कौनसा ? मूर्खों  का सहवास ।  बडी  हानी  कौनसी ? समय  निकल  जाना ।
   या  आयी  हुई  संधी  का  लाभ  उठा  न  सकना ।  सच्चा  नैपुण्य  कौनसा ?  धर्मविषयी  प्रिती ।  सच्चा  शूर कौन ?  जिसने  इन्द्रियों पर  विजय  पा  ली  है  वह ।  सच्ची  पत्नी  किसे  कहना  चाहिये ?  जो  हमेशा  पति  का  अनुगमन  करती  है  वह ।  सच्चा  धन  कौनसा ?  विद्या ।
   सच्चा  सुख  कौनसा ?  प्रवास  को  ना  जाना ।  सच्चा  राज्य  कौनसा ? जहाँ  पर  राजाज्ञा  का  पालन  होता  है ।
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   *गूढ़ार्थ*---- 
यहाँ  पर  बाकी  सब  तो  सुभाषितकार  ने   सही  बताये  है  पर  सच्चा  सुख  कौनसा ?  प्रवास  को  न  जाना ।  यह  जरा  विपरित  लगता  है  न?
  तो  इसका  उत्तर  यह  है  कि -- चारो  आश्रमों  में  से  गृहस्थाश्रम  में  प्रवास  सबसे  कम  करना  चाहिये  ऐसा  सङ्केत  है ।  ब्रह्मचारी  और  संन्यासाश्रम  में   सबसे  ज्यादा  प्रवास  करने  के  लिये  कहा  गया  है  और वानप्रस्थाश्रम  में  तपस्या  का  महत्व  है । गृहस्थाश्रम  में  पञ्चमहायज्ञों का  पालन  करते  हुए  स्थैर्य  का  महत्व  अधिक  है ।
बाकी  तो  सब  पढ़कर  ही  समझ  में  आता  है ।
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  *卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Sep 6, 2018, 7:33:36 AM9/6/18
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*सत्यस्य वचनं श्रेयः,*
      *सत्यादपि हितं वदेत्।*
*यद्भूतहितमत्यन्तं ,*
     *एतत् सत्यं मतं मम ॥* 
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 भावार्थ 👉 *यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है, तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए,  जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही वास्तव में सत्य है।*
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*Although it is good to speak the truth, however, that truth should be spoken only, which is the welfare of the people. In my opinion then what is the welfare of everyone is actually true.*
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*आपका आज का दिन मंगलमय हो।*

*🙏🌹🚩सुप्रभातम्🚩🌹🙏*

K.N.RAMESH

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Sep 14, 2018, 2:51:09 AM9/14/18
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|| *ॐ* ||
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   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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   " *संतमहिमा* ( १८३ )
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   *श्लोक*----
     " गङ्गा पापं , शशी  तापं ,  दैन्यं  कल्पतरुस्तथा ।
       पापं तापं च  दैन्यं  घ्रन्ति  सन्तो  महाशयाः ।। "
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   *अर्थ*----
   गङ्गा  पाप , चन्द्र  ताप  और  कल्पतरु  दैन्य  हरण  करते  है ।
   किन्तु  सन्त  यह  तीनों  भी  नष्ट  करते  है ।
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*गूढ़ार्थ*-----
   गङ्गा  स्नान  करने से  पाप हरण  होता है ।  चन्द्र  के  शीतल  किरणों  से  शरीर  का  ताप  नष्ट  होता  है  और  कल्पतरु  के  सानिध्य  में  दैन्य  ( शारिरीक  और  मानसिक और आर्थिक भी ) नष्ट  होता  है । लेकीन  एक  संत  का  सहवास  ही  हमे  यह  तीनों  चीजें  देता  है । संतसंगती  का  महिमा  सचमुच  अगाध  है  जो  वाणी  से  वर्णन  नही  कर  सकते ।
   संत ज्ञानेश्वर,  संत तुकाराम , समर्थ  रामदास स्वामी , रामकृष्ण परमहंस आदि  संतो ने   अपने  शिष्यों  का  जीवन  श्रेष्ठतम  बना  दिया  था ।
  ऐसे  संतों  को  ह्रदय  से ---👏👏👏👏👏
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Sep 17, 2018, 6:27:02 AM9/17/18
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||ॐ||(१८२ )
"स्त्री  विनश्यति  रूपेण  ब्राह्मणो  राजसेवया।
गावो  दूरप्रचारेण  हिरण्यं  लोभलिप्सया"।।
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अर्थ--" सुन्दर  रूप  के  कारण  स्त्री  का  नाश  होता  है, राजा  की  सेवा  करने  से  ब्राह्मण  का  नाश  होता  है । घास  चरते  वक्त  यदि  गाय  भटक  जाती  है  तो वह  नष्ट हो  जाती  है  वैसे  ही  बार  बार  लोभ  धरने  से  सोना   नष्ट  हो  जाता  है"।
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*************
यहाँ  पे सुभाषितकार  ने  स्पष्ट  रूप  से  कहा  है  की  स्त्री  का  सुन्दर  होना  उसके  नाश  का  कारण  बनता  है , उदा. में  हम  सीता  तथा  द्रौपदी  को  देख  सकते  है।
ब्राह्मण  अगर  कर्तव्य  से  च्युत  हो  गया  और  वह  राजा  की  सेवा  में  लग  गया  तो  सत्य  को  भूलकर  कार्य  करता  है, यहाँ  पर  हमे  न्यायमूर्ति  रामशास्त्री  प्रभुणे  का  आदर्श  रखना  चाहिये  या  फिर  समर्थ  रामदासस्वामी।
गाय  अगर  घास  के  मोह  मे  अपने  कबिले  से  बिछड़  जाती  है  तो  कोई  जानवर  जरूर  उसे  खा  लेता  है ,यहाँ  पर  एकता  का महत्व  बताया  गया  है।
और  आखरी  पंक्ति  मे  अति  लोभ या  तृष्णा  सभी कुछ  नष्ट  कर  देती  है  यही  बताया  है  जो  हमे  आज  भी  ध्यान  रखना  चाहिए ।
सुभाषित  हमारी  संस्कृति  वह  धरोहर  है  जो  कम  शब्दों  में  बड़ा  गहन  अर्थ  बताती है।
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卐卐ॐॐ卐卐
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश   टोणगांवकर 

K.N.RAMESH

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Sep 18, 2018, 4:57:16 AM9/18/18
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|| *ॐ* ||
     " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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  " *धीप्रशंसा* " ( १८४ )
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  *श्लोक*----
    " हस्ती स्थूलतराः स  चाङ्कुशवशः किं हस्तितुल्योऽङ्कुशः?
       दीपे  प्रज्वलते विनश्यति  तमः किं  दीपतुल्यं  तमः ? ।।
      वज्रेणाभिहताः पतन्ति  गिरयः किं  वज्रतुल्यो  गिरिः ?
     बुद्धिर्यस्य  गरीयसी  स  बलवान्  स्थूलेषु  कः  प्रत्ययः ? ।। "
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   *अर्थ*----
    इतना  बडा  हाथी  पर  वो  एक  छोटेसे  अंकुश से  काबू में  आता है , क्या अंकुश  हाथी  से  बडा  है ?
   दिया  अंधेरे  का  नाश  करता  है ,पर  क्या  दिया  का  स्वरूप  अंधेरे  इतना  विस्तीर्ण है ?
   वज्र  महापर्वत  को  धराशायी  करता  है , पर  क्या वज्र  पर्वत  जितना  थोडी  ही  है न ?
  जिसकी  बुद्धि बडी  वही  बलवान  होता  है, सिर्फ  बडे  आकार  को  क्या  देखना ?
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*गूढ़ार्थ*----
   बुद्धि  की  महिमा  यहाँ  पर  सुभाषितकार  ने  हमे  बतायी  है। किसी  बडी  चीज़  को  काबू  में  लाने  के  लिये  उतनी  बड़ी  चीज  की  हमे आवश्यकता  नही  होती ।  एक  छोटी सी  चीज  के साथ  अच्छी  बुद्धि  चाहिए  बस। " बुद्धिर्यस्य  बलं  तस्य " ।  यही  सही  है ।
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  *卐卐ॐॐ卐卐*
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 डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Sep 27, 2018, 6:19:44 AM9/27/18
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|| *ॐ* ||
     " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *पातु वः* " ( २०५ )
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    *श्लोक*----
   " युगपत्स्वगण्डचुम्बनलोलौ  पितरौ  निरीक्ष्य  हेरम्बः।
    तन्मुखमेलनकुतुकी  स्वाननमपनीय  परिहसन्  पायात् ।। "
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    *अर्थ*----
   गणपति  के  कपोल  का  चुम्बन  लेने  की  इच्छा  एक  ही  क्षण  को  शिव-- पार्वती  को  हुई  और  यह  बात  गणपति  के  ध्यान  में  आयी । 
जब  शिव-- पार्वती  कपोल  चूमने  के  लिये  झुके  तब  धीरे  से  गणपति  ने  अपना  मुंह  पीछे  हटा  लिया  तब  क्या  हुआ  होगा  यह  आप  ही  सोचिए ।  ऐसा  बुद्धिनायक  गणपति  आप  सब  की  रक्षा  करे।
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*गूढ़ार्थ*----
  जगन्नपितरौ  और  बुद्धिनायक  गणेश  के  उपर  कितनी  सुंदरता  से  सुभाषितकार  ने  मानवीयता  आरोपित  की  है  न ?  ऐसा  लगता  है  एक  सुखी  कुटुंब  में  या  हमारे  परिचित  कुटुंब  में  यह  घटना  घट  रही  है।
लेकीन  यह  तो  जगन्नपितरौ  और  बुद्धिनायक  गणेश  की  बात  हो  रही  है। गणेश  बुद्धिनायक  है  इसलिये  उसे  अपने  माता --पिता  के  मन  की उसको  चूमने  की  बात  समझ  गयी  इसलिये  उसको  शरारत  सुझी और  जब  शिव--पार्वती  उसको  चूमने  के  लिये  झुके  तब  वह  धीरे  से  पीछे  सरक  गया  और  फिर  जो  घटा उसे  देखकर  गणपति  शररात  से  हंसने  लगा । है  न  मजेदार ?
ऐसा  हंसनेवाला  बाल  गणेश  आप  सब  की  रक्षा  करे ।
महाराष्ट्र  का  सब से  बडा  त्यौहार  गणेशोत्सव  की  आप  सभी  को  ह्रदय  से  शुभकामनाएं ।
  बुद्धिनायक  गणेश  महाराष्ट्र  का  कुलदैवत  है और  आई  तुळजाभवानी  महाराष्ट्र  की  कुलस्वामीनी ।  👏👏👏👏👏
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Sep 28, 2018, 7:05:25 AM9/28/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *कवयःप्रशस्ति* " ( १९३ )
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   *श्लोक*------
 "  यस्याः चोरः चिकुरनिकरः कर्णपूरो मयूरः
     भास्त्रो हासः कविकुलगुरु  कालिदास  विलासः ।
     हर्षो  हर्षः ह्रदयवसतिः  पञ्चबाणः  तु  बाणः
      केषां  नैषा  कथय  कविता  कामिनी  कौतुकाय ?
              ( जयदेव--- प्रसन्नराघवतारक  )
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     *अर्थ*----
   चोर  नामक  कवी  जिसका  केशकलाप , मयूर  कवी  यह  जिसका  कर्णभूषण, भास  कवी  जिसका  हास्य, कविकुलातील  श्रेष्ठ  ऐसा  कालिदास उसका  विलास, ( मतलब  शोभा ),  कवी  हर्ष  यह  जिसका  हर्ष है ,  बाण  कवी  उसके  ह्रदय  में  रहनेवाला  मदन  है ।
    ऐसा  कवितारूपी  सुन्दरी  का  किसको  कौतुक  नही  होगा ?
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    *गूढ़ार्थ*----
   सुभाषितकार  ने  एक  ही  श्लोक  में  संस्कृत  के  प्रसिद्ध  कवियों  का  गुणवर्णन  किया है ।  जो  पढने  के  साथ  ही  ज्ञानवर्धक  भी है ।
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    *卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Oct 1, 2018, 4:34:36 AM10/1/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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   " *सामान्यनिति* " ( १९२ )
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    *श्लोक*----
   " न जातु कामात् , न भयात्  न  लोभात् ।
    धर्मं  त्यजेत्  जीवितस्य  अपि  हेतोः ।।
    नित्यो  धर्मः  सुखदुःखे  तु  अनित्ये  ।
     जीवो  नित्यः  हेतुः अस्य  तु  अनित्य ।।  ( महाभारत पर्व  १८ )
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   *अर्थ*----
    विषयभोग  के  लिये  या  भय  के  कारण  अथवा  लोभ  के  कारण  अथवा  जीव  बचाने  के  लिये  भी  धर्म  नही  छोड़ना  चाहिए ।  क्यों  कि  धर्म  नित्य  है ; किन्तु  सुख  और  दुःख  अनित्य  है ।  जीव ( आत्मा )  नित्य  है  ; किन्तु  उसका  हेतु  देहप्राप्ती  का  कारण  माया  अनित्य  है ।
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*गूढ़ार्थ*----
   यह  महाभारत  का  आखरी  का  साररूप  श्लोक  है ।  जिसमे  एक  ही  श्लोक  में  धर्म  और  आत्मा  का  नित्यत्व  बताया  गया  है ।
  वैसे  भी  महाभारत  में  भाई - भाई  के  युद्ध  के  साथ  ही  बहुत सी  ज्ञानात्मक  बाते  भी  आयी  है ।
रामायण  में  आदर्शवाद  और  महाभारत  में  वास्तववाद  ही  है।
दोनों  ही  हमारे  संस्कृति  की  बहुमुल्य  धरोहर  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Oct 5, 2018, 7:59:31 AM10/5/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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      " *विषयनीति* " ( २०१ )
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    *श्लोक*----
    " सहवर्धितयोर्नास्ति  सम्बन्धः  प्राणकाययोः ।
     पुत्रमित्रकलत्रेषु  सम्बन्धित्वकथैव  का ? ।। "
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   *अर्थ*-----
    प्रत्यक्ष  प्राण  और  देह  एकसाथ  ( एकजीवता ) या  एकत्र बढकर  भी, 
    मृत्यु  के  पश्चात  उनका  सम्बन्ध  नही  रहता ।  फिर  भी  मनुष्य  पुत्र , मित्र ,  पत्नी के  साथ  जो  सम्बन्ध  रहता  है  उसकी  तो  क्या  बात करनी  चाहिए ?
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     *गूढ़ार्थ*-----
प्राण  और  देह  एकसाथ  और  एकत्र  रहने  बाद  भी  और  साथ  में  बढकर  भी  मृत्यु  के  पश्चात  उनका  कोई  सम्बन्ध  नही  रहता और  मनुष्य पुत्र  , मित्र,  पत्नी  इनके  साथ  जन्म-जन्मांतर  के  सम्बन्ध  स्थापित  करने  का  प्रयत्न  करता  है।  यह  सम्बन्ध  चिरकाल  तो  बिलकुल  ही  नही  किन्तु  प्राण  और  देह  मतलब  मनुष्य  के  आयु  इतने  तो  भी  दीर्घकाल कैसे  टिकेंगे ? 
   सुभाषितकार ने  हमारी  आंखों  में  अञ्जन  ही  डाला  है । हम  हमारे  रिश्तों  पर कितने  इतराते  है ।  यह  मेरा  मित्र  यह  मेरा  परिवार ।
   किन्तु  सब  कुछ  कमलपत्ते पर  गिरे  हुए  बुंद  के  समान  ही  है।
स्थायी और  चिरकाल  कुछ  भी  तो  नही ।
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K.N.RAMESH

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Oct 9, 2018, 5:17:54 AM10/9/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *सामान्यनीति* " ( १९६ )
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   *श्लोक*---
   " यथा  नद्यः  स्यन्दमानाः  समुद्रे  अस्तं गच्छन्ति  नामरूपे  विहाय ।
     तथा  विद्वान  नामरुपाद्  विमुक्तः  परात्परं  पुरुषम्  उपैति  दिव्यम् ।। "
             ( मुण्डकोपनिषद्  ३• २• ८ )
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   *अर्थ*----
   जिस  तरह  से  नदियां  अपना  नाम  और  रूप  छोडके  समुद्र  में  विलीन  हो  जाती  है , उसी  तरह विद्वान  ( आत्मज्ञानी )  मनुष्य  अपना  नाम  और  रूप  इससे  मुक्त  होकर  श्रेष्ठ ऐसे  दिव्य  पुरुष  के  पास  पोहचता है।
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  *गूढ़ार्थ*----
  उपनिषद  का  वाक्य  सुभाषितकार  ने  यहाँ  पर  सुभाषित  के  तौर  पर  दिया  है ।  अर्थात  इसमें  बहुत  गहन  अर्थ  तो  है ही।  विद्वान  को  आत्मज्ञान  कब  होगा ?  जब  वह  अपना  अहंभाव  छोडेगा । उसके  बाद   ही  उसे  श्रेष्ठतर  दिव्य  पुरुष  मतलब  परमात्मा  की  प्राप्ति  संभव  है ।
   और  ऐसे  ही  आत्मज्ञानी  पुरुष  करते  है।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Oct 11, 2018, 4:57:11 AM10/11/18
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*बुधाग्रे न गुणान् ब्रूयात् साधु वेत्ति यत: स्वयम्*
*मूर्खाग्रेपि च न ब्रूयाद्धुधप्रोक्तं न वेत्ति स:।।*
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*अपने गुण बुद्धिमान मनुष्य को न बतायें, वह उन्हें अपने आप जान लेगा!और अपने गुण बुद्धिहीन (मूर्ख) मनुष्य को तो कतई न बतायें, वह उन्हें समझ नही सकेगा!*
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*Do not tell your qualities to the wise man, he will know them by himself, and do not tell his qualities to the foolish (foolish) man, he can not understand them!*

K.N.RAMESH

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Oct 15, 2018, 4:20:30 AM10/15/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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     " *कवयःप्रशंसा*" ( २०२ )
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  *श्लोक*----
   "  कवीश्वराणां  वचसां  निनादै --
     र्नदन्ति  विद्यानिधयो  न  चान्ये ।
    चन्द्रोपला  एव  करैर्हिमांशो--
    र्मध्ये  शिलानां  सरसा भवन्ति  ।। "
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*अर्थ*----
   महान  कवियों  के  वाणी  के  पडसाद , सुविद्य  अंतःकरण में  ही  उठते  है ; इतर  लोगों  के  नही ।  पत्थरों  की  राशी  में  अकेला  चन्द्रकान्त  मणि  ही  चन्द्र  का  किरण  उसपर  पडने  के  बाद  चमक  उठता  है ।
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*गूढ़ार्थ*----
   कवी  को   सुविद्य  और  रसिक  श्रोता  प्राप्त  होना  बडा  ही  सौभाग्यकारक  होता  है ।  खचाखच  भरे  प्रेक्षागृह  में  एखाद  ही  श्रोता  सुविद्य  होता  है ; जो  कवी  की  वाणी  सुनने  के  बाद या  उसकी  कविता  पढने  के  बाद  द्रवीभूत  हो  उठता  है और  वही  अन्तः करण  से  कविता  की  प्रशंसा  करता  है । बाकी  सब  तो  पत्थरों  की राशी  के  समान  होते है।  जिनको  कवीरूपी  चन्द्रकिरणों  से  कोई  फरक  नही  पडता ।
  चन्द्रमणि  तो  एकाध  ही  रहता  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Oct 16, 2018, 4:44:00 AM10/16/18
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||ॐ||
"सुभाषित  रसास्वाद"(२०७ )
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" विद्याप्रशंसा"
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श्लोक--
"विद्या  शस्त्रं  च  शास्त्रं  च  द्वे  विद्ये   प्रतिपत्तये।
आद्या  हास्याय  वृद्धत्वे  द्वितीयाद्रियते  सदा"।।(हितोपदेशः नारायण  पंडित)
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अर्थ-- शस्त्र  और  शास्त्र   दोनों  ही  विद्या  है ।  और  दोनो ही  ज्ञान  तथा  सन्मान  देती  है।  यह  सच  है  किन्तु  दोनो  में  भेद  ऐसा  है  कि  वृद्धावस्था  में  शस्त्रविद्या  लोगों  के  उपहास  का  और  टीका  का पात्र  बनती  है किन्तु  शास्त्र  विद्या(ज्ञान)  की  प्रतिष्ठा  वृद्धावस्था  के  कारण  अधिकाधिक  वृद्धिंगत  होती  है।
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गूढ़ार्थ--" कोई  भी  विद्या  सिखने  का  एक  निश्चित  समय  होता  है  और  उसके  अभ्यास  का  भी  वृद्धावस्था  में  अपने  से  वज़नदार  शस्त्र  उठोओगे  तो  लोग  उपहास  करेंगे  ही  किन्तु  शास्त्र  रूपी  ज्ञान  विद्या  आपको  वृद्धावस्था  में  ज्यादा  प्रसिद्धि  देगी  उसकी  आभा  आपको  गौरवान्वित  करेगी।"
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卐卐ॐॐ卐卐
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K.N.RAMESH

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Oct 19, 2018, 4:44:07 AM10/19/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *वृत्तिनीति* " ( २१० )
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   *श्लोक*----
" संतप्तायसि  संस्थितस्य  पयसः  नाम  अपि  न  श्रुयते ।
    मुक्ताकारतया  तद्  एव  नलिनीपत्रस्थितं  दृश्यते ।।
    अन्तःसागरशुक्ति  कुक्षि--पतितं  तद्  मौक्तिकं  जायते ।
   प्रायेण  अधम-मध्यम-उत्तमजुषाम्  एवंविधाः  वृत्तयः ।। "
            ( भर्तृहरि  नीतिशतक  )
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   *अर्थ*---
  बहुत  गरम  तवे  पर  अगर  पानी का  बूँद   गिर  गया तो  वह  भांप  बनकर  उड  जाता  है , उसका  नामो-निशान  मिट  जाता  है। वही  पानी  का  बूँद कमल  के  पत्ते  पर  गिर  गया  तो  मोती  जैसा  दिखता  है ।  और वही  पानी  की बूँद  अगर  समुद्र  के  सिप  में  गिर  गयी  तो  उससे  मोती  निर्माण  होता  है ।  नीच , मध्यम , उत्तम  सहवास  की   यह  बहुशः  अवस्था  है ।
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  *गूढ़ार्थ*----
 पानी  की  बूँद  की  तरह  ही  मनुष्य  के  सहवास  में  आनेवाले  व्यक्ति  की अवस्था  होती  है ।  नीच  व्यक्ति  तवे  पर  गिरे  पानी  के  बूंद  की  तरह  होता  है ,  जिसके  साथ  रहेगा  उसे  भी  नष्ट  कर  देगा ।  मध्यम  व्यक्ति  कमल  पर  गिरे  बूँद  के  समान  मोती  की  तरह  चमकता  तो  है  पर  जैसे पत्ते  पर गिरा  बूँद  हाथ  लगाने  के  बाद  नष्ट  हो  जाता  है  वैसे  ही  मध्यम  व्यक्ति  संकट  आने  पर  भाग  खडा  होता  है ।  उत्तम  व्यक्ति  सिप  की  मोती  की  तरह  होता  है  जो  हमेशा  खरा  ही  उतरता  है । 
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K.N.RAMESH

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Oct 22, 2018, 4:48:43 AM10/22/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *भ्रमरान्योक्ति* " ( २०९ )
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      *श्लोक*----
   " अपनीतपरिमलान्तरकथे  पदं  न्यस्तदेवतरु  कुसुमे ।
      पुष्पान्तरेऽपि  गन्तुं  वाञ्च्छासि  चेद्  भ्रमर  धन्योऽसि ।। "
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   *अर्थ*-----
    हे  भ्रमरा !  अरे  त्रिखण्ड  में  किसी  भी  पुष्पगन्ध  से  जिसका  परिमल  श्रेष्ठ  है ,  ऐसे  देवतरु--कल्पतरू  के  फुलपर  अपने  पैर  धीरे से  टेकने  के  बाद  और  उसमें  जो  मकरंद   है  उसका  आस्वाद  लेने  के  बाद  भी  तुम  दूसरे  सामान्य  फूलों  की  ओर  जाते  हो ? धन्य  है  हे भ्रमर  आपकी !     
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   *गूढ़ार्थ*-----
   यहाँ  पर  भ्रमर  यह  रसिक  वृत्ति  का  प्रतीक  है ,  कल्पवृक्ष  श्रेष्ठतम  गोष्टी  का  निदर्शक  है ।  एकाध  अप्रतिम  कलाकृती  का  आस्वाद  लेने  के  बाद  अगर  निकृष्ट  दर्जे  की  कलाकृती  की  तरफ  मन  झुका  या  उसके  लिये  जी  जान  लगा  दिया  तो  क्या  होगा ? उसकी  वृत्ति  इस  मधुकर  जैसी  ही  तो  कही  जायेगी  न ?  महाकवी  कालिदास  का  शाकुन्तल  पढने  के  बाद  यदि  कोई  निकृष्ट  दर्जे  का  पुस्तक  पढेगा  तो  कितना  कमनसीब  है  उस  वाचक  का ,  जिसको  ऐसी  इच्छा  हुई।
जीवन  के  हर  क्षेत्र  में  इस  प्रकार  के  हीन  अभिरुची  के  उदाहरण  मिल  जायेंगे,  मनोरंजन  क्षेत्र,  खाद्यपदार्थ ,  वेशभूषा , मैत्री ,  कलाकृती ,  सजावट  इत्यादि  हर  क्षेत्र  में  यह  नियम  लागू  होता  है ।
सुभाषितकार   ने   भ्रमर  को  लेकर  यह  अन्योक्ति  लिखी  है  फिर  भी वह  दिखाना चाहता  है  ऐसे   हीन  अभिरुचि  वाले  लोग  ही  है ।   
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K.N.RAMESH

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Oct 22, 2018, 5:03:04 AM10/22/18
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|| *ॐ* ||
      " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *सामान्यनीति* " ( १९७ )
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    *श्लोक*---
    " द्वयक्षरस तु भवेन् मृत्युस् त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् ।
      ममं इतिच भवेन मृत्युर ' न मम ' इतिचशाश्वतम् ।। " 
         ( महाभारत शांतिपर्व अ. १३ )
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   *अर्थ*----
  महाभारत के युद्ध के बाद शोकग्रस्त होकर वन में जाने का विचार करनेवाले युधिष्ठिर को सहदेव कह रहा है -----
  " मृत्यु यह दो अक्षरी है और शाश्वत ब्रह्म तीन अक्षरी है ।
   " मम " मेरा कहा तो मृत्यु ही है और मेरा कुछ भी नही ऐसा कहा तो वह शाश्वत ब्रह्म है -- वही अमरत्व है ।
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    *गूढ़ार्थ*------
   जब मनुष्य मम कहने लगता है तब उसकी मृत्यु ही हो जाती है क्यों कि वह स्वार्थी बन जाता है । किन्तु मेरा कुछ भी नही यहाँ पर यह भाव जब उसके मन में जागता है तब वह शाश्वत ब्रह्म को अनायस ही प्राप्त करता है । क्यों कि तब वह स्वार्थत्याग करके अनायस ही अमरत्व को प्राप्त करता है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर 
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Oct 23, 2018, 4:43:38 AM10/23/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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   " *कर्तृत्व* " ( २११ )
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   *श्लोक*----
  " सुशीलो  मातृपुण्येन  पितृपुण्येन  पण्डितः ।
   दातृत्व  वंशपुण्येन  आत्मपुण्येन  सभाग्यतः ।। "
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   *अर्थ*-----
    मां  के  पुण्य  से  सुशीलता  प्राप्त  होती  है ।  पिता  के पुण्य  से विद्वत्ता।
   कुल  के  पुण्य  से  दातृत्व  प्राप्त  होता  है  और  खुद  के  कर्तव्य  से  सद्भाग्य  प्राप्त  होता  है ।  
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   *गूढ़ार्थ*----
   मां  कितनी  सुशील  है  इस  पर  ही  अपत्य  को  सुशीलता  मिलती  है।
   पिता  की  विद्वत्ता  ही  अपत्य  में   आती  है  और  घराने  का  ही  दातृत्व  अपत्य  प्राप्त  करता  है  लेकीन  यह  सब  प्राप्त  होने  के  बाद  भी  खुद  का  कर्तृत्व  अत्यावश्यक  है  और  उसके  लिये  अच्छे  कर्मों  की  जरूरत  है ।  कर्म  अच्छे  तो  पुण्य  अच्छा  और  तो  ही  सद्भाग्य  प्राप्ती संभव  होगी ।  मतलब  घराने  का  सबकुछ  मिलने  के  बाद  भी  खुद  की  पहचान  बनाने  के  लिये  कर्तृत्व  आवश्यक  है ।
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K.N.RAMESH

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Oct 23, 2018, 4:49:49 AM10/23/18
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💐🌺🌸🌷💐🌺🌸🌷💐
*अनन्तशास्त्र बहुलाश्वविद्या *
*अल्पं च कालोबहुविघ्नता च ।*
 *आसारभूतं तदुपासनीयं*
   *हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥*

        शास्त्र अनेक हैं, विद्याएं अनेक हैं, किन्तु मनुष्य का जीवन बहुत छोटा है, उसमें भी अनेक विघ्न हैं ।
      इसलिए जैसे हंस मिले हुए दूध और पानी में से दूध पि लेता है और पानी को छोड़ देता है उसी तरह काम की बातें ग्रहण कर लो तथा बाकी छोड़ दो।
🙏🏻💐🙏🏻 *आपका आज का दिन परम् प्रसन्नता से परिपूर्ण रहे, ऐसी शुभकामना *🙏🏻💐🌺🌸🌷💐🌺🌸🌷💐🌺

K.N.RAMESH

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Oct 26, 2018, 5:00:58 AM10/26/18
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💐🌺🌸🌷💐🌺🌸🌷💐
*सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।*
*सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥*

सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नही । इस लिए, तू धर्मपरायण बन । 

K.N.RAMESH

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Oct 26, 2018, 5:01:27 AM10/26/18
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धिक्तस्यजन्म यः पित्रा लोके विज्ञायते नरः ।
यत्पुत्रात्ख्यातिमभ्येति तस्य जनम् सुजन्मनः।।
मार्कण्डेय पुराणम् ( सुभाषितम्)


தந்தையினால் உலகிற்கு  எந்த மகன் (பெருமை) அறியப்பட்டால் அது தவிர்க்க வேண்டியதாகும்.. அது அதமமாகும்..
மகனால் எந்த தந்தை ( பெருமை) அறியப்படுகின்றானோ
அவனுடைய ஜன்மமே உத்தமஜன்மமாகும்.

నాన్న వల్ల ఏ ఒక కొడుకు కీర్తిని పొంఫుతాడో గుర్తింపబడుతాడీ వాడి జన్మ దిక్కారు చెయ్య వలసిన జన్మము.
కొడుకు వల్ల ఏ తండ్రి గుర్తింపబడుతాడో ఆ జన్మే సుజన్మము..

Fie upon the birth of the man
Who is known in the world through his father. The birth is ( praiseworthy) of that the well-born who gets known through his son

K.N.RAMESH

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Oct 26, 2018, 5:05:27 AM10/26/18
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*यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।*
*न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥*
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 भावार्थ : *विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्ठा करते हैं की वे यथाशक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं ।*
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*The wise and intelligent people always try, that they do the same thing as they do and they do so and do not neglect anything by treating it as trivial, they are real knowledgeable.*
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*आपका आज का दिन मंगलमय रहे।*

K.N.RAMESH

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Oct 26, 2018, 5:06:20 AM10/26/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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    " *तत्त्वज्ञाननीति* " ( २१७ )
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   *श्लोक*----
    " आचार्यात्  पादमेकं  स्यात्  पादं  सब्रह्मचारिभिः ।
    पादं  तु  मेधया  ज्ञेयं  शेषं  कालेन  पच्यते ।। "
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   *अर्थ*----
  शिक्षण  का  पाव ( १/४ ) हिस्सा  आचार्य  से  प्राप्त  होता  है । पाव ( १/४ ) हिस्सा  वर्गबन्धु के साथ  चर्चा से  प्राप्त  होता है । पाव ( १/४ ) हिस्सा खुद  की  बुद्धि  के  द्वारा  प्राप्त  होता  है ।  और  बचा  हुआ  खुद  के  अनुभव  से  प्राप्त  होता  है ।
--------------------------------------------------------------------------------------
   *गूढ़ार्थ*----
  एखादी  विद्या  सिखते  वक्त  अभ्यास  के  अलावा  भी  उसे  आत्मसात  करने  की  प्रक्रिया होती  है ।  केवल  वाचन -- श्रवण  से  वह  आत्मसात  नही  होती और  उसपर  प्रभुत्व  भी  नही  आता ।  उसमें  पूर्णत्व  आने  के  लिये  काल का  , बुद्धि  का और  इतर  भी  सहभाग  आवश्यक  है ।
  सुभाषितकार ने  यहाँ  पर  यही  बताया  है ,  शिष्य  को  वर्ग  में  केवल  २५% ही  फायदा  होता  है , मतलब  विषय  समझता  है ।  बाकी  २५% अपने  सहकारीयों के  साथ  चर्चा  करके  होता  है और  फिर  उस  अभ्यास  की  बैठक  पक्की  हो  जाती  है ।  मतलब  अब  तक  आधा  काम  हो  गया  और  अब  खुद  की  बुद्धि  के द्वारा  उसमें  के  बारकियां  समझनी  पडती  है ।  तब  विषय  ७५% पुरा  होता  है  उसकी  व्याप्ति  समझती  है  और  आखिर  में  अनुभूति  अत्यावश्यक  होती  है उसके  बिना  कोई  विषय  को  पूर्णत्व प्राप्त  नही  होता  इसलिये  कालांतर  से  अनुभव  लेने  के  बाद  विषय  पूरा  और  पक्का  होता  है ।
  विषय  आत्मसात  करने  के  लिये  वाचन , मनन , चिन्तन  और  अनुभव  अत्यावश्यक  है ।
  डाँक्टर  , वकील  वगैरे  लोग  प्रत्यक्ष  मामले  जबतक  सुलझाते  नही  तबतक  उनको  पुरा  ज्ञान  प्राप्त  नही  होता । 
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Oct 29, 2018, 4:48:14 AM10/29/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *तत्त्वज्ञाननीति* " ( २१८ )
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    *श्लोक*----
   " बहुसुप्तः बहुभुक्तः मुखरश्च  निन्दकः 
    गर्विष्ठः  गतं  शोचतः निजदुःख  निवेदकः ।
       अकारण  विरोधकश्च  गतवैभवे  निमग्नः 
      जाड्यः  आरामप्रियः  दशैते  मूर्ख  लक्षणाः ।। "
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  *अर्थ*---
  बहुत  सोनेवाला , बहुत  खानेवाला , बहुत  बोलनेवाला , दुसरे  की निन्दा  करनेवाला , गर्विष्ठ, गये  हुए  का  शोक  करनेवाला , अपना  दुःख  जाहीर  करनेवाला ,  अकारण  विरोध  करनेवाला , गतवैभव  में  ही  रममाण  होनेवाला , मतिमंद ,  आलसी  यह  दस  मूर्खों  के  लक्षण  है ।
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  *गूढ़ार्थ*-----
  जनरीती  को  छोडकर  बर्ताव  करनेवाला हमेशा  ही  लोगों  की  टीका  का  लक्ष्य  बन  जाता  है ।  ऐसे  लोग  हमेशा  ही  खुद  के  बर्ताव  से  खुद  का  और  दुसरे  का  नुकसान  ही  करते  है ।  मनुष्य  ने  यह  दोष  दूर  करने  का  हमेशा  ही  प्रयत्न  करना  चाहिए  ऐसा  ही  सुभाषितकार  यहाँ  पर  सूचित  कर  रहा  है । श्री. समर्थ  रामदास  स्वामीजी  ने  तो  १५० के  उपर  मूर्खों  के  लक्षण  बताये  है ।  और  उन  लक्षणों  का  त्याग  करके  खुद  का  व्यक्तित्व  सुधारने  के  लिये  कहा  है ।
  इस  सुभाषित  में  जो मूर्खों  की  लक्षणे  दी  है  वह  सर्वपरिचित  ही  है ।
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K.N.RAMESH

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Oct 29, 2018, 4:48:38 AM10/29/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
---------------------------------------------------------------------------------------
    " *व्यवहारनीति* " ( २१९ )
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   *श्लोक*-----
   " एकाकिना  तपो  द्वाभ्यां  पठनं  गायनं  त्रिभिः ।
    चतुर्भिर्गमनं  क्षेत्रं  पंचिभिर्बहुर्भिः  रणम्  ।। "
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   *अर्थ*----
  तप  अकेले ने  ही  करना  चाहिये, अभ्यास  दो  व्यक्तियों  ने  करना  चाहिए , गाने  के  लिये  तीन  लोग  चाहिए ।  प्रवास  करने  के  लिये  चार  व्यक्ति  का  होना  जरूरी  है तो  खेती  करने  के  लिये  पांच  व्यक्तियों  की  आवश्यकता  होती  है  तो  युद्ध  के  लिये बहुत  सारे  लोगों  ने  जाना  चाहिए ।
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  *गूढ़ार्थ*-----
  किस  कार्य  के  लिये  कितने  लोगों  की  आवश्यकता  होती  है  यह  सुभाषितकार  ने  यहाँ  पर  लिखा  है ।
जप --तप , ध्यान  अकेले  ने  ही  करना  चाहिये  तो  ही  मन  एकाग्र  होता  है , वहाँ  पर  किसी  दूसरें  के साहय्यता की  आवश्यकता  ही  नही  होती ।
अभ्यास  दो  लोगों  ने  मिलकर  किया  तो  अनुकूल  रहता  है , एक  को  नही  समझा  तो  दूसरा  बता  सकता  है , और  एक  दूसरे  को  पूछ कर  अभ्यास ( उजळणी )  हो  जाता  है । गायन  के  लिये  तीन  लोगों  की  आवश्यकता  होती है , एक  गानेवाला  और  उसकी  साथ  करने  के  लिये  दो  लोग  क्यों कि  उससे  सूर , लय  से  समा  बंध  जाता  है । प्रवास  के  लिये  चार  लोग  चाहिए  ऐसा  सुभाषितकार  बता  रहा  है , यह  तब  की  बात  हो  रही  है  जब  कोई  प्रवासी  साधन  उपलब्ध  नही  थे ।  इसलिये  भोजन  बनाना ,  पानी  लाना , सुरक्षितता  आदि  सब  के  लिये  कुछ  लोगों  की  आवश्यकता  होती  थी  तो  चार  लोग  साथ  चल  दिये  तो  अच्छा  होता  था ।  खेती  के  लिये  पांच  लोगों  की  आवश्यकता  बतायी  गयी  है , खेती  के  साथ  जानवरों  की  भी  देखभाल  करनी  पडती  है , साथ  में  कटाई, बीज  बोना   और  भी  बहुत  काम  होते  है, उसके  लिये  कम से  कम  पांच  लोग  तो  चाहिए  ही  न ।  रण  में  जाते  वक्त  तो  बहुत  लोग  चाहिये  ही  चाहिए  क्यों  कि  वहाँ  पर  तो सभी  कार्यों  के  लिये  लोगों  की  आवश्यकता  होती है  । वहाँ  पर  अनगिनित  लोग  रहे  तो ही अच्छा ।
शत्रु से  हमारे  सैनिक  ज्यादा  होगे  तो  ही  हम  युद्ध  जीत  सकेंगे ।
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Oct 30, 2018, 4:30:14 AM10/30/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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   " *तत्त्वज्ञाननीति* " ( २२१ )
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   *श्लोक*----
  " एकस्य   कर्मं  संविक्ष्य  करोति  अन्योऽपि  गर्हितम्  ।
  गतानुगतिको  लोकाः  न  लोकाः  पारमार्थिकः ।। "
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   *अर्थ*----
एक  ने  किया  हुआ  कार्य  देखकर  दूसरा  भी  वही  दोषास्पद  कार्य  आंख  झांक कर  करता  है ।  गतानुगतिक ( अंधानुकरण  करनेवाले )  लोग  दूसरे  का  हेतु  समझ  नही  सकते ।
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*गूढ़ार्थ*-----
  भगवान  ने  मनुष्य  को  बुद्धि  दी  है , लेकीन  मनुष्य  अपनी  स्वतन्त्र  बुद्धि  का  कम  ही  उपयोग  करता  है ।  हर  एक  चीज़  के  पिछे  कोई ना  कोई  कार्यकारणभाव  आवश्यक  होता  है ,  और  वह  समझना  अत्यंत  आवश्यक  है ।  जिसको  कोई  आधार  नही  वह कार्य  नही करना  चाहिए।
अध्यात्म  में  और  कर्मकाण्ड  में  लिप्त  लोग  कारण  या  अर्थ  समझे  बिना  औपचारिक  क्रिया  करते  रहते  है , जैसे -- एक  ने  गलत  पूजा  की  क्रिया  तो  या  फिर  गलत  उच्चारण  किया  तो  पीछे वाले  भी  वैसा  ही  कार्य  करते  है । कार्य  का  हेतु प्रथम  समझना  चाहिए ।  
    और  अंधानुकरण  का  त्याग  करना  चाहिए ।  सुभाषितकार  ने  वही  समझाना  का  प्रयत्न  किया  है  की -- ' न  लोका  पारमार्थिकाः ' मतलब  दुसरे  का  हेतु  और   कारण  समझना अत्यंत  आवश्यक  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Nov 1, 2018, 5:05:36 AM11/1/18
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⛳🌞 विदग्धा वाक् ⛳

*हरेः पादाहतिः श्लाघ्या न श्लाघ्यं खररोहणम्।*
*निन्दापि विदुषा युक्ता न युक्तो मूर्खसंस्तवः ॥*
--सुभाषितरत्नभाण्डागारः पु. ४५.२२

हरेः पादाहतिः श्लाध्या न श्लाध्यं खर-रोहणम्। निन्दा अपि विदुषा युक्ता न युक्तः मूर्ख-संस्तवः ॥

हरेः पादाहतिः श्लाध्या (भवति)। खर-रोहणं श्लाध्यं न भवति। विदुषा निन्दा अपि युक्ता (अस्ति)। मूर्ख-संस्तवः (तु) न युक्तः (अस्ति)॥

घोड़े के पैर की लात (खाना) भी प्रशंसनीय है, पर गधे पर सवारी करना सराहनीय नहीं। विद्वान के द्वारा डाँट (खाना) भी योग्य है। पर मूर्ख द्वारा स्तुति किया जाना भी अयोग्य है।

It is better to be knocked by a horse than to ride a donkey. The condemnation of a scholar is better than the praise of an idiot.

--Subhashitha Samputa, Bharatiya Vidya Bhavan
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K.N.RAMESH

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Nov 2, 2018, 4:53:40 AM11/2/18
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|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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   " *पातुवः* " ( २२३ )
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*श्लोक*----
  " राज्यं  येन  पटान्तलग्नतृणकं  त्यक्तं  गुरोराज्ञया 
    पाथेयं  परिगृह्य  कार्मृकुवरं  घोरं  वनं  प्रस्थितः ।
   स्वाधीनः  शशिमौलिचापविषये  प्राप्तो  न  वै  विक्रियां 
   पायाद्वः स बिभिषणाग्रजनिहा  रामाभिधानो  हरिः ।। " 
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  *अर्थ*---
  उत्तरीय  के  कोने  को  लगे  हुए  तृण  को  जैसे  झटक  कर  मनुष्य  आगे  बढता  है  ठीक  उसी  तरह  की  सहजता  से  उसने  पिता  की  आज्ञा  से  राज्य  छोडा ।  और  शिदोरी  की  तौर  पर  अपना  कोदण्ड  धनुष्य ही  लेकर  जो  वन  में  जाने  के  लिये  निकला , साथ  में  पत्नी  होकर  भी  जो  क्षणभर  भी  विकारवश  नही  हुआ ।  ऐसा  बिभिषण  का  ज्येष्ठ  भाई  रावण  को  मारनेवाला  श्रीराम  नाम का  विष्णु / सिंह  आपकी  रक्षा  करे ।
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*गूढ़ार्थ*-----
  तृण  हटाने  की  सहजता  से  श्रीराम  ने  अपना  राज्य  पित्राज्ञा   से  छोडा  और  धन -धान्य  आदि  कुछ  भी  साथ  ले  जाने  की  बजाय  केवल  और  केवल  अपना  कोदण्ड  धनुष्य  साथ  लिया ।  साथ  में  पत्नी  सीता  होने  के  बाद  भी  जो  विकारवश  नही  हुआ  और  जिसने  पराक्रम  से  रावण  जैसे  दैत्य  को  मारा  ऐसा  पुरुषोत्तम /  नरोत्तम  आदर्श  श्रीराम  जो  विष्णु  का  ७ वा  अवतार  माना  गया  है ; जो  युद्ध भूमि  में  प्रत्यक्ष  सिंह  ही  है  ऐसा  श्रीराम  सबकी  रक्षा करे । 👏👏👏👏👏👏
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K.N.RAMESH

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Nov 2, 2018, 5:00:31 AM11/2/18
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|| *ॐ* ||
     " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *अन्तरालापाः* " ( २२६ )
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    *श्लोक*---
" का पाण्डुपत्नी  गृहभूषणं  किं  को  रामशत्रुः किमगस्त्यजन्म ।
  कः सूर्यपुत्रो विपरीतपृच्छा ,  कुन्तीसुतो  रावणकुम्भकर्णः ।। "
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  *अर्थ*----
  पंडू  की  पत्नी  कौन ?  गृह  का  अंलंकार  कौनसा ? राम  का  शत्रु  कौन ? अगस्त्य  का  जन्म  कहाँ  हुआ  है ? सूर्य  का  पुत्र  कौन ? रावण और कुम्भकर्ण  यह  कुन्ती  के  पुत्र  थे । 
-----------------------------------------------------------------------------------
*गूढ़ार्थ*----
  प्रश्न  और  उसके  उत्तर ।  
  पण्डु  पत्नी -- कुन्ती । घर  का  भूषण -- पुत्र ( सुत ) ।  राम  का  शत्रु -- रावण ।  अगस्त्य  मुनी  का  जन्म --- कुम्भ ।  सूर्य  का  पुत्र  -- कर्ण ।
यह  है  यह  है  प्रश्नों  के  उत्तर  लेकीन  चौथे  और  आखिरी  पंक्ति का  अर्थ  भलता  ही  निकल  रहा  है , वह यह  कुन्ती  के  पुत्र  रावण  और कुम्भकर्ण  है ।  लेकीन  एक प्रश्न  पढने  के  बाद  उसका  उत्तर  आखरी  पंक्ति  में  क्रम से  दिये  गये  है  तब *अन्तरालापाः* की  उकल  हो  जाती  है । यही  संस्कृत  भाषा  का वैभव ।
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K.N.RAMESH

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Nov 8, 2018, 4:50:26 AM11/8/18
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|| *ॐ* || 
    " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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     " *परमार्थनीति* " ( २३१ )
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     *श्लोक*-----
    " अग्निर्देवो  द्विजातीनां ,  मुनीनां  ह्रदि  दैवतम् ।
      प्रतिमा  स्वल्पबुद्धीनां ,  सर्वत्र  समदर्शिनाम्  " ।।
    ------------------------------------------------------------------------------------
   *अर्थ*----
   जिनका  उपनयन  संस्कार  हुआ  है  उनका  आराध्य दैवत  अग्नी  ही  रहता  है ।  तपस्वीयों  का  दैवत  उनके  ह्रदय  में  ही  स्थित  होता  है ,  सामान्य  बुद्धि  के  लोगों  की  मूर्ति  ही  देवता  होती  है ।  और  भूतमात्र  में  समानभाव  माननेवाले  का  सब  चराचर  में , अणुरेणु  में  , सब  सृष्टि  को  व्याप्त देवता  होती  है ।  उनकी  ईश्वरकल्पना  ही  विश्वव्याप्त  होती  है ।
-------------------------------------------------------------------------------------
  *गूढ़ार्थ*-----
   कितना  सुन्दर  अध्यात्म  में  पोहचे  हुए  व्यक्ति  का  वर्णन  सुभाषितकार  ने  किया  है  न ?  छोटे से  उम्र  में जब  उपनयनसंस्कार  होता  है  तब  से  लेकर  गृहस्थजीवन में  अग्नी  और  मूर्तिपूजा  का  ही  महत्व  होता  है  क्यों  अग्नीपूजा  के  साथ  ही  पञ्चयज्ञ  और  मूर्तिपूजा  गृहस्थाश्रम  में  आवश्यक  होती  है ।  और  सामान्य  लोग  तो  मूर्तिपूजा  के  द्वारा  सगुण उपासना  ही  करते  है ।  जो  तपस्वी  होते  है  उन्हे  मूर्तिपूजा  की  आवश्यकता  ही  नही  होती  उनका  परमेश्वर  तो  ह्रदय में  ही  स्थित  होता  है  जो  कहीं  पर  भी  अपनी  मानसपूजा  कर  लेते  है ।  और  जो  जीवन्मुक्त  हो  जाते  है  उन्हे  किसी  साधन  की  आवश्यकता  ही  नही  होती  है क्यों  कि  वह  तो  चराचर  में  ही  भगवान  को  देखते  है  और  उनकी  ईश्वर  की  संकल्पना  ही  विश्वव्याप्त  होती  है ।
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डाॅ.  वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /  नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Nov 9, 2018, 3:35:42 AM11/9/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
  -------------------------------------------------------------------------------------
  " *वैद्यनीति* " ( २३२ )
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    *श्लोक*----
  " वैद्यानां  शारदी  माता ,  पिताच  कुसुमाकरः ।
   यमदंष्ट्रा  स्वसा  प्रोक्ता ,  हितभुड्मितभुग्रिपुः " ।।
--------------------------------------------------------------------------------------
  *अर्थ*----
  शरद ऋतु  यह  वैद्य  की  माता  है  और  वसंत ऋतु  यह  पिता  है ।
   तो  मृत्यु  का  दांत  यह  बहन  मानी  जाती  है  और  हितकारक   और  तोलनाप  कर  खाने  वाला  यह  वैद्य  का  शत्रु  माना  गया  है ।
--------------------------------------------------------------------------------------
*गूढ़ार्थ*----
  शरद  ऋतु  वैद्य  की  माता  है  क्यों  कि  शरद  ऋतु  में  ठंड  बढ  जाने  से  बहुत  लोग  बिमार  हो  जाते  है  और  उन्हे  वैद्य  के  पास  जाना  पडता  है  इसलिये  शरद ऋतु  माता  के  समान  वैद्य  की  चिन्ता  करता  है ।  वसंत ऋतु  तो  निरोगी  माना  जाता  है  किन्तु  तब  धुप  बढने  लगती  है  और  ठंड  भी  रहती  है  तो  कफप्रकृती  वालों  को  वैद्य  के  पास  जाना  पडता  है । पिता  के  समान  ही  वसंत ऋतु  कभी  ठंड  और  कभी  गर्म  रहता है।
  अगर  रोगी  मृत्यु  को  प्राप्त  हो  गया  तो  वह  वैद्य  के  बहन  समान  हो  जाता  है क्यों  जैसी  बहन  ससुराल  चली  जाती  है  तो  वह  परायी  हो  जाती  है  वैसे  ही रोगी  एकबार  मृत्यु  को  प्राप्त  हो  गया  तो  वह  फिर  वैद्य  के  पास  लौटकर  नही  आता  ।  और  आख़िर  मे  जो  मितभुक  और  हितभुक  है  वह  तो  कभी  वैद्य  के  पास  जायेगा  ही  नही  तो  वह  सबसे  बडा  वैद्य  का  शत्रु  होता  है ।
समाज  पर  आधारित  वैद्य  का  व्यवसाय  ऋतु  पर  भी  आधारित  होता  है ।  इसपर  और  भी  मत  अपेक्षित  है ।
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K.N.RAMESH

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Nov 14, 2018, 3:52:21 AM11/14/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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   " *सज्जनप्रशंसा* " ( २३९ )
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    *श्लोक*----
  " क्षारो  वारिनिधिः कलङ्ककलुषश्चन्द्रो  रविस्तापकृत्
     पर्जन्यश्चपलाश्रयोऽभ्रपटलादृश्यः  सुवर्णाचलः ।
     शून्यं  व्योम  रसा  द्विजिह्वविधृता  स्वर्धामधेनुः  पशुः
      काष्ठं  कल्पतरुर्दृषत्सुरमणिस्तत्केन  साम्यं सताम्  ।। "
---------------------------------------------------------------------------------------
    *अर्थ*----
  सज्जनों  के  साथ  बराबरी  कर  सकेंगे  ऐसी  एक  भी  वस्तु  इस  जग  में  है  क्या ?  उनको  समुद्र  कहेंगे  तो  वह  खारा  है ।  चन्द्र  कहेंगे  तो  उसपर  दाग  है ।  सूर्य  कहेंगे  तो  वह  तीव्र  धूप  के  कारण  ताप  देता  है ।  उनको  मेघ  की  उपमा  देंगे  तो  उसमें  चञ्चल  ऐसी  बिजली  आश्रय  से  रहती  है। सज्जनों  की  तुलना  मेरूपर्वत  से  करेंगे  तो  वह  मेघसमूह  के  कारण  अदृश्य  है ।  आकाश  कहेंगे  तो  वहाँ  शून्य  के  अलावा  क्या  है ?  भूमी  कहेंगे  तो  उसे सापने ( शेषनाग )  ने   धारण  कर  रखा  है ।  स्वर्ग  के  कामधेनु  से  उनकी  तुलना  करेंगे  तो  आख़िर  वह  पशु  ही  है !  कल्पवृक्ष  कहेंगे  तो  वह  भी  आखिर  लकड़ी  ही  है  ना !  चिन्तामणी  बोलेंगे  तो  वह  भी  आखिर  दगड  ही  ठहरा !  
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*गूढ़ार्थ*----
  उपर  सब  का  क्या  मतितार्थ   निकलता  है ?  सुभाषितकार  हमे  क्या  कहना  चाह  रहा  है ?  तो  सुभाषितकार   हमे  यह  कह  रहा  है की --
सज्जन  लोगों  की  तुलना  विश्व  के  किसी  चीज़  से  नही  हो  सकती ।
सज्जन  अपने  आप  में  ही  श्रेष्ठ  होते  है ।  एक  भी   वस्तु  की  उपमा  सज्जन  को  नही  दे  सकते ।
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K.N.RAMESH

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Nov 15, 2018, 3:46:25 AM11/15/18
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|| *ॐ* ||
       " *सुभाषितरसास्वादः* "
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       " *तत्त्वज्ञाननीति* " ( २४० )
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*श्लोक*---
जले  तैलं  खले  गुह्यं  पात्रे  दानं  मनागपि ।
प्राज्ञे  शास्त्रं  स्वयं  याति  विस्तारं  वस्तुशक्तितः "।।
--------------------------------------------------------------------
*अर्थ*----
पानी  में  तेल ,  दुष्ट  के  पास  गुप्त  गोष्ट ,  योग्य  जगह  दान ,  प्रज्ञावंत  के  पास  बोला  हुआ  शास्त्र  यह  वस्तुशक्ति  के  कारण इनका  स्वतः  ही   विस्तार  हो  जाता  है ।
-------------------------------------------------------------------------------
*गूढ़ार्थ*-----
तेल  जैसा  ही  पानी  में  गिरता  है  वैसा  ही  वह  फैलना  शुरू  हो  जाता  है ।  किन्तु  अगर  घी  पानी  में  गिर  जाता  है  तो  सिधा  बर्तन  में  नीचे  जाकर  बैठ  जाता  है ।  किसी  दुष्ट  को  महत्वपूर्ण  बात  समझ  जाती  है  तो  वह  बात  जरूर  फैला  ही  देता  है ।  योग्य  जगह  पर  दान  दिया  तो  वह  सबको  पता  चल  ही  जाता  है ।और  प्रज्ञावान  व्यक्ति  के  साथ  शास्त्र की  बाते  की  तो  वह  ज्ञान  अनेक  लोगों  तक  पोहच  जाता  है ।
बिना  श्रम  की  ही यह  बाते  हो  जाती  है ।
इसलिए  सुभाषितकार हमे  नसीहत  दे  रहे  है  कि---दान  हमेशा  सत्पात्री देना  चाहिए ।  चर्चा  हमेशा  प्रज्ञावंत  के  साथ  करनी  चाहिए  और  गुपित  कभी  भी  दुष्ट  व्यक्ति  को  बताना  नही  चाहिए ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Nov 20, 2018, 3:14:16 AM11/20/18
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|| *ॐ* ||
                                       " *सुभाषितरसास्वादः* "
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                   " *दैवाख्यानम्* " ( *भाग्याविषयी*) (२४४)
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*श्लोक*-----
"  धनानि   भूमौ  पशवश्च  गोष्ठे 
       भार्या  गृहद्वारि  जनाः  स्मशाने ।
     देहश्चितायां   परलोकमार्गे
              कर्मानुगो  गच्छति  जीव  एकः "।। (  *भर्तृहरिशतकत्रयम्* )
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*अर्थ*-----
मनुष्य  यह  जग  छोडकर  जाते  समय  उसके  पिछे  कुछ  भी  जाता  नही है ।  धन  जमीन में  ही  गड़ा रह  जाता  है ,  गायें और  भेड़  गऊशाला में  रह जाते  है ।  पत्नी  घर  के  दरवाजे (  देहली )  तक  ही  साथ  देती  है।और  बाकी  लोग  स्मशान  तक  साथ  आते  है ।  इतना  ही  नही  हमारा  देह  भी  चिता तक  ही साथ  देता  है ।  परलोक  के  मार्ग पर  जीव  अकेला  ही  चला  जाता  है ।  उस  मार्ग  पर  केवल  और  केवल  उसके  कर्म  ही  साथ  देते  है ।
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*गूढ़ार्थ*-----
जीवन  का  अंतिम  सत्य  सुभाषितकार  ने  कथन  किया  है । परलोक  के  मार्ग  पर  जीव  अकेला  ही  आगे  चलता  है  लेकीन  उसके  अच्छे- बुरे  कर्म  ही  उसके  पिछे  आते  है ।  इसलिए  लोगों  अच्छे  कर्म  करिए  क्यों कि  वही  दैव ( भाग्य )  बनकर  आपके  साथ  चलेंगे ।  
कितना  गहन  अर्थ  यहाँ  पर  छिपा  है  न ?
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Nov 20, 2018, 3:17:18 AM11/20/18
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|| *ॐ* ||
     " *सुभाषितरसास्वादः* "
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     " *जीवितसाफल्यम्* " ( जीवन की सार्थकता ) ( २४९ )
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*श्लोक*---
  " यस्यिज्जीवति  जीवन्ति  बहवः  स  तु  जीवति ।
     काकोऽपि  किं  न  कुरुते  चञ्चा  उदरपूरणम्  " ।।
   ( भर्तृहरि  सु. सं. ) 
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*अर्थ*----
जिसके  जिने  के  कारण   अनेक  लोग  जिते  है ।  वही  व्यक्ति  सच  में  जीवन  जिता  है ।  खुद  के लिए  कोई  भी  जीता  पर इसमें  क्या  विशेष?
कौवा  भी  अपनी  चोंच  से  अपना  पेट  भरता  ही  है।
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*गूढ़ार्थ*----
यहाँ  कौए के  माध्यम से  सुभाषितकार  हमे  बता  रहा  है  कि  अपना  पेट  तो  इधर उधर  चोंच  मारके  कौआ  भी  भर  ही लेता  है।
क्या मनुष्य का  जीवन  ऐसा होना चाहिये?  दूसरो  की  भी  जो  मदद  करता  है या  जिसके  जिने  से  बहुत लोगों  की  जिंदगी  संवर  जाती   वही  आदमी  का  जीवन  सफल  होता  है ।
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K.N.RAMESH

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Nov 22, 2018, 4:28:00 AM11/22/18
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|| *ॐ* ||
   " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *घरट्टअन्योक्ति* " (  २५२ )
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   *श्लोक*---
  रे  रे  घरट्ट !  मा  रोदीः !  कं  कं  न  भ्रामयन्त्यमूः ! ।
    कटाक्षेपमात्रेण ;  कराकृष्टस्य  का  कथा ?  ।।  "
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   *अर्थ*---
  घरट्ट  चक्की  (  जात )  मत  रोओं  यह  जो  स्त्री  है  यह  किस  किस  को  नही  घुमाती  है ? 
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*गूढ़ार्थ*---
  पीसते  समय  पुरातन  काल  की  हाथचक्की  घू घूं  ऐसा  ध्वनी  करती है।
  इसपर  सुभाषितकार  ने  स्त्रियों  के  आकर्षण  का  प्रभाव  आरोपित  किया  है ।  सुभाषितकार  चक्की  को  कह  रहा  है  रो  मत  अपने  हाथ  से  यह  स्त्री  किस  किस  को  नही  घुमाती  है ?  किस  किसीको   तो  वह  केवल  नेत्रकटाक्ष  से  ही  घायल  कर  देती  है । (  मतलब  नचाती  है )
  फिर  जिसको  हाथ  से  घुमाती  है  उनकी  कथा  तुमसे  अलग  थोडी  ही  होगी ? 
किञ्चित  व्यंग्यपूर्ण  हास्योक्ती  यहाँ  पर  अन्योक्ति  द्वारा  सुभाषितकार  ने  सूचित  की  है ।
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   *卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /  नागपुर  महाराष्ट्र 
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K.N.RAMESH

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Nov 22, 2018, 4:28:11 AM11/22/18
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|| *ॐ* ||
              " *सुभाषितरसास्वादः* "
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           " *सामान्यनीति* " ( २५४ )
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*श्लोक*----
   " चित्तमिंद्रियसेनायाः  नायकं  तज्जयात्  जयः ।
     उपानह  गूढ  पादस्य  ननु  चर्मावृता  एव  भूः" ।।
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*अर्थ*----
इंद्रियों  के  समूह  का  नायक  मतलब  चित्त ( मन ) ।  उसको  अगर  जीत  लिया  तो  इंद्रियविजय  प्राप्त  होता  है ।  जिसने  पादत्राण  पहन  लिया  है  उसके  लिये  पूरी  पृथ्वी  ही  चमडे  से  ढकी  हुई  जैसी  है ।
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*गूढ़ार्थ*--------
अपना  काम  कम  शक्ति  में  करना  यह  कौशल्य  और  हुशारी  है ।
वृक्ष  के  मूल  की  तरफ  ध्यान   दिया और  पानी  डाला तो  बुंधा , पत्तियां ,  शाखायें , फुल  और  फल  इन  सब  को  ही  उसका  भाग  मिलता  है ।
इसलिए  सुभाषितकार  बता  रहे  है  कि  शरीर  में  भी  एक  एक  इंद्रिय  पर  विजय  पाना  अत्यंत  दुष्कर  कार्य  है । और  इंद्रियाँ  मन  के  अधीन  होती  है ,  इसलिए  अगर  मन  पर  विजय  पाओगे तो  इंद्रियों  पर  काबू  करना  आसान  हो  जाता  है ।  यहाँ  पर  उदाहरण  के तौर  पर  बता  रहे  है  कि पैरों के संरक्षण  के लिए  पूरी  पृथ्वी  चमडे  से  ढक नही  सकते  उससे  अच्छा  हम  पादत्राण पहन  ले  तो  हमारा  कार्य  आसान  हो  जाता  है । 
मूल  प्रश्न  ही  हमने  आसान  कर  दिया  तो  उपाय  सुलभता  से  कर  सकते  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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Nov 26, 2018, 4:01:27 AM11/26/18
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Nov 26, 2018, 4:01:51 AM11/26/18
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|| *ॐ* ||
              " *सुभाषितरसास्वादः* "
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             " *लक्षणनीति* " (२५५ )
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*श्लोक*----
    "  मधुपा  मधुं ,  वृक्षफलं,  तृणे  धान्यं  ग्रहणम् ।
      अनिवार्यं ,  साधयेत्  विनाक्रौर्य॔  दत्वा  रक्षणक्रमः "।।
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*अर्थ*----
 मधमाशी  से  मध , वृक्ष  से  फल और  तृण  से  धान्य  यह  लेना  ही  पडता  है ।  पर  यह  सब  लेते  समय  उनको  संरक्षण  देकर  और  क्रूरता ना  करते  हुए  लेना  श्रेयस्कर  होता  है ।
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*गूढ़ार्थ*-----
' जीवो  जीवस्य  जीवनम् '  यही  सृष्टि  का  न्याय  है ।  प्रत्येक  मनुष्य  को  जीने  के लिए  अन्न  लगता  ही  है ,  और  उसके  लिए  प्राणिसृष्टि  वनस्पतीसृष्टि  पे  मुख्यतः  अवलंबून  है ।  जो  अनिवार्य  है  वह  लेना  ही  पडता  है  यह  निर्विवाद  है ।  किन्तु  वह  लेते  वक्त  जिनसे  हम  ले  रहे  है  उनका  संरक्षण  करना  आवश्यक  है  उनसे  खिंचके  या  बल  से  नही  लेना  चाहिए ।  सुभाषितकार  ने  सृष्टि  का  ऋण  मानने  का पाठ  हमे  पढाया  है । पर्यावरण की  रक्षा  तो  आजकल  अति  आवश्यक  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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K.N.RAMESH

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Nov 26, 2018, 4:03:19 AM11/26/18
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*आप और आपके परिवार को  धनतेरस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* 

*माँ लक्ष्मी जी की कृपा आपके ऊपर सदैव बनी रहे*
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*कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाद् दूर्वाऽपि गोरोमतः,*
*पङ्कात्तामरसं शशांक उदधेरिन्दीवरं गोमयात्।*
*काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना,*
*प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना।।*
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*किडो से रेशम ,पथ्थर से सुवर्ण, गोरोम से दूर्वा, पङ्क से कमल, समुद्र से चन्द्रमा, गोबर से नीलकमल, काष्ठ से अग्नि, सर्प के फण से मणि, औऱ गोपित्त से गोरोचन की उत्पत्ति होती है। अतः यह स्पष्ट है कि गुणि व्यक्ति अपने गुणों के विकास से ही प्रसिद्धि को प्राप्त करता है, ना की जन्म से।।*
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*Gordhan is derived from the silk from the pine, the stone from the golden gold, the dome from Gorom, the lotus to the loin, the moon from sea, the dung to the nilkamal, the fire from the wood, the gem from the snake's funnel, and the snake. Therefore, it is clear that the virtuous person achieves fame only by the development of his qualities, not by birth.*
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K.N.RAMESH

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Nov 30, 2018, 4:35:41 AM11/30/18
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|| *ॐ*  ||
                " *सुभाषितरसास्वादः* "
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            " *चाणाक्यनीति* " ( २५९ )
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*श्लोक*----
    " चला  लक्ष्मीश्चलाः  प्राणाश्चले  जीवितमंदिरे ।
      चलाचले  च  संसारे  धर्म  एको  हि  निश्चलः " ।।
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*अर्थ*-----
इस  जग  में  लक्ष्मी  मतलब  धन  चंचल  है ।  हमारा  आयुष्य  और  प्राण  भी  चंचल  है ।  यह  सब  क्षणभंगुर  है ।  क्षण  में  नष्ट  होनेवाले  इस  संसार  केवल  एक  धर्म  ही  स्थिर  और  अविनाशी  है ।
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*गूढ़ार्थ*----
कितना  सही  और  सार्थक  सुभाषित  है  यह ।  पैसा  तो  हमेशा  ही  आता  जाता  रहता  है ।  हमारा  देह  और  प्राण  तो  कब  जायेंगे  इसका  किसीको  भी  अंदाजा  नही ।  किसीको  भी  अपनी  मृत्यु  पता  नही  चलती  है ।  यह  जगत  में  केवल  जिस  धर्म  में  हम  जन्मे  जिसका  नाम  हमे  मिला  और  जिस  धर्म  में  मरने  के  बाद  हमारा  अंतिम  संस्कार  किया  जायेगा  वही  धर्म  स्थिर  और  अविनाशी  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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Dec 3, 2018, 3:51:17 AM12/3/18
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|| ॐ ||   ( पुनश्च हरिॐ )
              " सुभाषितरसास्वादः "
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            " वाग्ववर्णनम् " (२६०)
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श्लोक-----
" गानाब्धेस्तु  परं  पारं  नोपेयाय  सरस्वती ।
  अतो  निमज्जनभयात्तुम्बीं  वहति  वक्षसि " ।।
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अर्थ---
   गान विद्या  एक  अपारसागर  है ।  वाणी  और  गानविद्या  की  देवी  सरस्वती- उसको  भी  यह  गानसागर  तैर  कर  जाना  अशक्य  लगा । इसलिए  इस  सागर  में  डूबने  के  भय  से  ही  उसने    कुमडे ( भोपळा )  की  वीणा  हाथ  में  ग्रहण  करके  रखी  है ।  
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गूढार्थ--
सुभाषितकार  की  उत्तुंग  प्रतिभा  यहाँ  देखने  को  मिलती  है ।  गानदेवी  सरस्वती  भी  गाने  के  सागर  का  किनारा  नही  जानती  इतना  वह  अपार  है  और  इसी  भय से  उसने  कुमडेधारी  वीणा  अपने  हाथ  में  धारण  की  है  कि  कहीं  वह  इस  गानसागर  में  खुद  ही  न  डूब  जाये ।
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卐卐ॐॐ卐卐
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Dec 3, 2018, 4:04:03 AM12/3/18
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|| *ॐ* ||
              " *सुभाषितरसास्वादः* "
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          " *कलिमहिमा* " ( २६५ )
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*श्लोक*----
   " परान्नेन  मुखं  दग्धं  हस्तौ  दग्धौ  प्रतिग्रहात् ।
     परस्त्रीभिर्मनो  दग्धं  कुतः शापः  कलौ  युगे " ।। ( वृद्धचाणक्यशतकम् )
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*अर्थ*----
    इस  कलियुग  में  परान्नसेवन  करके  लोगों  का  मुख  जल  गया  है ।
दान  ले ले   कर  सब  लोगों  के  हाथों  में  छाले  पड  गये  है ।
और  परस्त्री  के  चिन्तन  से  सबका  मन  भी  जल  गया  है ।
इस  कलियुग  को  किसका  शाप  लग  गया  है  पता  नही ।
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*गूढ़ार्थ*----
कितना  भीषण  वास्तव  सुभाषितकार  ने  हमे  बताया  है ।
आज  लोग  घर  में  कम  बाहर  ज्यादा  भोजन  करने  लगे  है ।
परान्न  की  तो  संकल्पना  ही  नष्ट  हो  गयी  है ।
दान  देना  कोई  नही  चाहता  किन्तु  लोनरूपी  दान  हर  कोई  चाहता  है।
और  परस्त्री  मातेसमान  यह  उक्ति  तो  कब की  नष्ट  होकर  किसी  पुराने  जमाने  की  लगने  लगी  है । 
सुभाषितकार  ने  हमे  आयना  ही  दिखाया  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे / नागपुर  महाराष्ट्र 
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Dec 4, 2018, 4:35:06 AM12/4/18
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|| ॐ ||
   " सुभाषितरसास्वादः "
---------------------------------------------------------------------------------------
   " सामान्यनीति " ( २६२ )
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श्लोक---
    शुश्रूषा ,  श्रवणं  चैव , ग्रहणं ,  धारणं  तथा ।
    ऊहापोहो, अर्थविज्ञानं ,  तत्त्वज्ञानं  च  धीगुणाः ।।
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अर्थ---
   सेवा ,  श्रवण , ग्रहण करना ,  स्मरण  में  रखना ,  तर्क , वितर्क ( ऊह ) सिद्धान्त ,  निश्चय ( अपोहा ) ,  अर्थज्ञान , और  तत्त्वज्ञान  यह  बुद्धि  के  आठ  अंग  है ।  
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गूढ़ार्थ---
  सुभाषितकार ने  बुद्धि  के  अंग  बताते  हुए  कहा  है  कि --
  सेवाभाव  मतलब  नम्रता  अगर  आप  में  है  तो  आप  किसिसे  भी  ज्ञानग्रहण  कर  सकते  हो और  आप  उद्धट  हो  तो  कोई  आप  के  पास भी  भटकेगा  नही  इसलिये सेवा  यह  बुद्धि  का  प्रथम  लक्षण  बताया  है।
  अच्छा  श्रोता  होकर  श्रवण  भक्ति  करनी  चाहिए ।  जो  श्रवण  किया  वह  ग्रहण  भी  करके  रखना  चाहिए  और  बाद  में  वह  स्मरण  में  भी  रखना  चाहिए।  उसको  बार  बार  याद  करके  शंका  निरसन  करके  तर्क वितर्क  भी  करना  चाहिये ।  फिर  उसे  अभ्यास  करके  निश्चय  स्वरूप  स्विकारना   चाहिए । आखिर  में  अर्थज्ञान  और  तत्त्वज्ञान  भी  आना  ही  चाहिये  सच  में  जिसे नीर-क्षीर  विवेक  आ  गया  उसकी  ही  बुद्धि  परिपक्व  कहालेगी ।  सुभाषितकार  ने  हमे सरलता  से  बुद्धि  के  आठ  अंग  बतलायें  है ।
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卐卐ॐॐ卐卐
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K.N.RAMESH

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Dec 10, 2018, 4:02:29 AM12/10/18
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|| *ॐ* ||
       " *सुभाषितरसास्वादः* " 
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     " *स्तुतिनीति* " ( २६७ )
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   *श्लोक*------
     " अद्यापि  दुर्निवारं  स्तुतिकन्या  वहति  कौमारम् ।
         सद्भ्यो  न  रोचते  साऽसन्तोऽप्यस्यै  न  रोचन्ते  ।।
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    *अर्थ*-----
  स्तुति  नाम  की  एक  उपवर  कन्या  है ;  उसके  विवाह  के  लिए  बहुत  प्रयत्न  किये  गये ।  सृष्टि  के  प्रारंभ  से  आजतक  प्रयत्न  किये  गये ।
  पर  उसका  विवाह  अभी तक  नही  हुआ वह  अपरिहार्यता  से  अभी  तक  कुंवारी  ही  है । क्यों  कि  सज्जन  लोगों  को  वह  पसंद  नही  और  दुर्जन  उसे  पसंद  नही । ( ऐसा  सतत  चल  रहा  है )
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    *गूढ़ार्थ*----
    सुभाषितकार  ने  कितने  सुन्दर  तरीके  से  मनुष्य  प्रवृत्ति  पर  भाष्य  किया  है ।  और  मनुष्य  की  यह  प्रवृत्ति  सृष्टि  के  प्रारंभ  से  ही  है ।
स्तुति  पसंद  रावण  और  दुर्योधन  हमे  पता  ही  है ।  जिन्हे  स्तुति  पसंद  नही  वह  सज्जन  उसे  देखते  भी  नही  और  जो  दुर्जन  लोग  स्तुति  को  पसंद  करते  है  उन्हे  स्तुति  पसंद  नही  करती ।
श्रीरामदास  स्वामी  ने  भी  मूर्खों  के  लक्षणों  में  लिखा  ही कि ------
   " आत्मस्तुती  करतो  तो  एक  मूर्ख " । 
   सुभाषितकार ने  मनुष्य  स्वभाव  का  मानसशास्त्र  यहाँ   पर बहुत सुन्दर  तरीके से  वर्णित  किया  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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 डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  / नागपुर  महाराष्ट्र 
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