Vedic quotes in sanskrit

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K.N.RAMESH

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Feb 3, 2018, 1:13:43 AM2/3/18
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Courtesy: Sri.Jayesh Upadhyay 
*ओ३म्*


*🌷वैदिक सूक्ति सुधा🌷*


*1) करो यत्र वरिवो बाधिताय ।।*
―ऋ० ६/१८/१४
पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।

*2) अस्य प्रियो जरिता ।।*
―ऋ० ४/१७/१९
भक्त भगवान् का प्यारा है।

*3) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु ।।*
―ऋ० ५/२/६
निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।

*4) वाचा वदामि मधुमद् ।।*
―अ० १/३४/३
मैं वाणी से माधुर्य युक्त ही बोलता हूं।

*5) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन ।।*
―ऋ० १०/१५२/१
ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता न जीत सकता है।

*6) मा भूम निष्टया इव ।।*
―अ० २०/११६/१
हम तुमसे बेगानों की तरह न रहें।

*7) स न पर्षद् अतिद्विषः ।।*
―अ० ६/३४/१
ईश्वर हमें द्वेषों से पृथक् कर दे।

*8) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम् ।।*
―अ० ७/१८/२
जहाँ परमेश्वर की ज्योति है वहां सदा ही कल्याण है।

*9) महे चन त्वामद्रिवः परा शुल्काय देयाम् ।।*
―ऋ० ८/१/५
हे ईश्वर! मैं तुझे किसी कीमत पर भी न छोड़ूं।

*10) अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ।।*
―ऋ० १/९४/४
परमेश्वर हम तेरे मित्र भाव में दुःखी और विनाश वाले न हों।

*11) न रिष्यते त्वावतः सखा ।।*
―ऋ० १/९१/८
ईश्वर! आपका मित्र कभी नष्ट नहीं होता।

*12) मा श्रु तेन विराधिषि ।।*
―अ० १/१/४
मैं कभी वेद शास्त्रों के ज्ञान से वियुक्त न होऊँ।

*13) त्वमस्माकं तव स्मसि ।।*
―ऋ० ८/९२/३२
प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं।

*14) तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योः ।।*
―अ० १०/८/४४
आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।

*15) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।।*
―ऋ० १/१६४/३९
जो उस ब्रह्म को नहीं जानता वह वेद से ही क्या फल प्राप्त करेगा।

*16) तवेद्धि सख्यम स्तृतम् ।।*
―ऋ० १/१५/५
प्रभो! तेरी मैत्री ही सच्ची है।

*17) स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु ।।*
―अ० १/३१/४
हमारे माता और पिता सुखी रहें।

*18) सङ्गच्छध्वम् संवदध्वम् ।।*
―ऋ० १०/१९१/२
मिल कर चलो और मिल कर बोलो।

*19) रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ता अनीनशम् ।।*
―अ० ७/११५/४
पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढ़ावे, पाप की कमाई को मैं नष्ट कर देता हूँ।

*20) मा प्रगाम पथो वयम् ।।*
―अ० १३/१/५९
सन्मार्ग से हम विचलित न हों।

*21) अक्षैर्मा दीव्य ।।*
―ऋ० १०/३४/१३
जुआ मत खेलो।

*22) प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये ।।*
―अ० १९/६२/१
सबका कल्याण सोचो चाहे शूद्र हो चाहे आर्य।

*23) न स सखा यो न ददाति सख्ये ।।*
―ऋ० १०/११७/४
वह मित्र ही क्या जो अपने मित्र को सहायता नहीं देता।

*24) अनागोहत्या वै भीमा ।।*
―अ० १०/१/२९
निरपराध की हिंसा करना बड़ा भयङ्कर है।

*25) मात्र तिष्ठः पराङ्मनाः ।।*
―अ० ८/१/९
यहां पर (संसार में) उदासीन मन से मत रहो।

*26) ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः ।।*
―ऋ० ९/७३/६
सत्य के मार्ग को दुष्कर्मी पार नहीं कर पाते।

*27) अघमस्त्वघकृते ।।*
―अ० १०/१/५
पापी को दुःख ही मिलता है।

*28) न स्तेयमद्मि ।।*―अ० १४/१/५७
मैं चोरी करके कभी भोग न करुँ।

*29) ऋषिर्विप्रः पुर एता जनानाम् ।।*
―ऋ० ९/८७/३
तत्वदर्शी विद्वान् पुरुष ही मनुष्यों का नेता हो।

*30) वदन् ब्रह्मा वदतो वनीयान् ।।*
―ऋ० १०/११७/७
उपदेष्टा ब्राह्मण चुप रहने वाले ब्राह्मण से श्रेष्ठ हैं।

*31) उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।।*
―ऋ० १०/१३७/१
हे विद्वानों! गिरे हुए (पतित) को पुनः उठाओ (ऊँचा करो)।

*32) नाहं विन्दामि कितवस्य भोगम् ।।*
―ऋ० १०/३४/३
मैं जुआरी के लिए भोग (सुख) नहीं देखता।

*33) न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः ।।*
―ऋ० ४/३२/११
बिना स्वयं परिश्रम किये देवों की मैत्री नहीं मिलती है।

*34) अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते ।।*
―ऋ० ९/८३/१
जिसने शरीर को तपाया नहीं वह सुख को नहीं पाता।

*35) रजस्तमो मोपगा मा प्रमेष्टाः ।।*
―अथ० ८/२/१
रजोगुणी व तमोगुणी मत बन ताकि मृत्यु से पीड़ित न हो।

*36) न देवानामति व्रतं शतात्मा च न जीवति ।।*
―ऋ० १०/३३/९
देवताओं के नियम को तोड़कर कोई सौ वर्ष नहीं जी सकता।

*37) तनूपाऽअर्ग्निः पातु दुरितादवद्यात् ।।*
―यजु० ४/१५
ईश्वर हमें निन्दनीय दुराचरण से बचावे।

*38) लोकं कृणोतु साधुया ।।*
―यजु० २३/४३
जनता को सच्चरित्र बनावें।

*39) सत्या मनसो मे अस्तु ।।*
―ऋ० १०/१२८/४
मेरी मन की भावनाएं सच्ची हों।

*40) स्तोतुर्मघवन्काममा पृण ।।*
―ऋ० १/५७/५
भगवान्! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
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