प्रिय महोदय/महोदया,
हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने परिवर्तित जीन खाद्य सामग्री पर प्रस्तावित विनियमों को सार्वजानिक विमर्श के लिए जारी किया है. इस पर 15 जनवरी तक प्रतिक्रिया आमंत्रित हैं. अग्रेषित मेल में मेरे द्वारा regul...@fssai.gov.in को भेजी प्रतिक्रया संलग्न है. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा जारी प्रतावित विनियम निम्न लिंक पर उपलब्ध हैं. आप से अनुरोध है कि समय रहते अपने भोजन को सुरक्षित रखने के उपाय करें एवं अपनी राय प्राधिकरण को 15 जनवरी से पहले भेज दें. इस विषय पर एक ऑनलाइन अपील भी ( https://www.change.org/p/i-urge-fssaiindia-please-act-now-to-stop-gm-foods-from-entering-indian-kitchens-officeof-mm-gmfreefood ) अगर सहमत हों तो इस पर भी हस्ताक्षर ज़रूर करें. प्रस्तावित विनियम निम्न लिंक पर उपलब्ध है:
https://www.fssai.gov.in/upload/uploadfiles/files/Draft_Notification_GM_Food_17_11_2021.pdf
सेवा में
मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ), भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई)
विषय : एफएसएसएआई द्वारा 15 नवंबर 2021 को परिवर्तित जीन खाद्य सामग्री पर अधिसूचित प्रस्तावित विनियमों पर एक नागरिक की प्रतिक्रिया
प्रिय महोदय/महोदया,
परिवर्तित/संशोधित जीन खाद्य सामग्री बाबत एफएसएसएआई द्वारा प्रस्तावित विनियम जो एफएसएसएआई ने 15 नवंबर 2021 को सार्वजनिक टिप्पणियों और फीडबैक के लिए प्रकाशित किए हैं पर एक नागरिक के तौर पर मेरी प्रतिक्रिया निम्न है:
1. संशोधित जीन खाद्य सामग्री एक असामन्य खाद्य सामग्री है. इस के परिणाम घातक एवं दूरगामी हो सकते हैं. इस लिए ही पूरी दुनिया में इस के नियमन के लिए विशिष्ट नियम बनाए गए हैं एवं जैविक खेती में तो इन के प्रयोग का निषेध है. इस लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि इन के दीर्घावधि प्रयोग के प्रभावों के कड़े एवं स्वतन्त्र परीक्षणों एवं तत्पश्चात इन परीक्षणों के पारदर्शी एवं सार्वजनिक मूल्यांकन में सुरक्षित एवं आवश्यक साबित होने के बाद ही संशोधित जीन खाद्य सामग्री संलग्न खाद्य पदार्थों के प्रयोग की अनुमति दी जानी चाहिए.
2. उपरोक्त प्रक्रिया से अनुमति मिलने के बावजूद भी ऐसे खाद्य पदार्थों की सतत निगरानी की जानी चाहिए.
3. इस के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर उपभोक्ता को प्रयोग से पहले पता होना चाहिए कि जो खाद्य सामग्री वह प्रयोग करने जा रहा है उस में परिवर्तित जीन से उत्पन्न/तैयार सामग्री का प्रयोग किया गया है.
4. दुर्भाग्य से आप द्वारा प्रस्तावित विनियमों में उपरोक्त सभी बिन्दुओं की अनदेखी की गई है. मसलन जब कि वर्तमान प्रद्योगिकी 0.01% (फार्म 1 कालम 8 का उपखंड 8) तक संशोधित जीन सामग्री की उपस्थिति को पकड़ सकती है, प्रस्तावित नियमों में केवल 1% या अधिक (धारा 7) संशोधित जीन सामग्री के उपयोग होने पर ही इस का उल्लेख करना अनिवार्य किया गया है. इस का अर्थ है कि तकनीकी रूप से जिस स्तर तक संशोधित जीन सामग्री के प्रयोग की पहचान संभव है, उस से 100 गुना ऐसी सामग्री को नज़रंदाज़ करने की अनुमति देना प्रस्तावित है. यह बिलकुल अनुचित है. इस के अलावा दिक्कत यह है कि अमीर देशों की बनिस्बत भारत में अधिकांश खाद्य सामग्री की बिक्री खुले रूप में की जाती है न कि डब्बाबंद रूप में. इस लिए संशोधित जीन सामग्री के उपयोग का उल्लेख करना अनिवार्य होने के बावज़ूद अधिकांश परिस्थितियों में उपभोक्ता अँधेरे में रह कर, बिना विचारपूर्वक विचार के संशोधित जीन सामग्री का प्रयोग करने को अभिशप्त हो जायेंगे.
5. फार्म 2 के कालम 6 से स्पष्ट प्रतीत होता है कि संशोधित जीन उत्पाद सम्मिलित खाद्य पदार्थों के सुरक्षा परिक्षण करने के आप ने अपने कोई स्वतंत्र मापदंड स्थापित नहीं किये हैं एवं आप का निर्णय अन्य देशों द्वारा लिए गए निर्णयों के आधार पर होगा. यह हमें कतई स्वीकार्य नहीं हैं. विशेष तौर से इस लिए क्योंकि भारत की खाद्य पदार्थों की बिक्री एवं उपभोग की परिस्थितियाँ अमीर देशों से बिलकुल अलग हैं.
6. संशोधित जीन उत्पाद सम्मिलित खाद्य पदार्थों के नियमन की व्यवस्था कम से कम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत आने वाली जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के तहत स्थापित मापदंडों जितनी कड़ी तो होने ही चाहिए. बल्कि संशोधित जीन उत्पादों के प्रयोग से तैयार खाद्य पदार्थों का नियमन तो जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति की प्रक्रियाओं से भी कड़ा होना चाहिए क्योंकि जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति की प्रक्रियाओं में गहरी खामियां पाई गई हैं जिस के चलते अधिकांश राज्यों ने अपने यहाँ संशोधित जीन प्रद्योगिकी बीजों इत्यादि की अनुमति नहीं दी है. इस के लिए प्राधिकरण को अपनी स्वतंत्र क्षमता एवं संसाधन विकसित करने चाहिए.
7. धारा 4 के उपखंड 9 से स्पष्ट प्रतीत होता है कि एक बार अनुमति मिलने के बाद संशोधित जीन सामग्री के प्रयोग से तैयार खाद्य सामग्री पर निगरानी का काम खाद्य उद्योग पर ही छोड़ दिया गया है और आप की ओर से अपने स्तर पर इस की लगातार निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं की गई है.
उपरोक्त कारणों से आप द्वारा जारी प्रस्तावित नियमन व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है. आप को इन को सुधार कर एक भरोसेमंद व्यवस्था जिस में निर्णय प्रक्रिया में हितों की टकराहट रोकने की व्यवस्था (जिस में केवल संशोधित जीन प्रद्योगिकी के सुरक्षा विशेषज्ञ ही शामिल हों न कि इस प्रद्योगिकी के प्रवर्तक), स्थापित कर के पुन: सार्वजानिक परिक्षण के लिए जारी करना चाहिए.
दुर्भाग्य से अब तक प्रस्तावित नियमन केवल हिन्दी एवं अग्रेज़ी में ही उपलब्ध है जिस के चलते देश की बड़ी आबादी इन पर अपनी विवेकपूर्ण राय देने से वंचित है. इस लिए यह सुनिश्चित किया जाए कि आप का नया प्रस्ताव सभी भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध हो.
प्राधिकरण की ज़िम्मेदारी प्रस्तावित मसविदे को इन्टरनेट पर डालने भर से पूरी नहीं हो जाती. प्राधिकरण को इस बाबत जनता को जागरूक करने के सचेत प्रयास करने चाहिए. इस के अलावा इस मसले पर देश के सभी भागों में जनसुनवाई भी आयोजित की जानी चाहिए.
आशा है आप इस प्रतिक्रिया पर अपनी सुविचारित राय और की गई करवाई से अवगत कराने का कष्ट करेंगे.
सब के लिए सुरक्षित भोजन के आप के अभियान में आप का सहयात्री,
राजेन्द्र चौधरी,
पूर्व प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग,
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,
रोहतक, हरियाणा