Fwd: यह सब कैसे ठीक होगा? गृहस्थ क्या करें?

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ajay sahai

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Oct 20, 2021, 10:56:41 PM10/20/21
to sarv...@googlegroups.com, Avyakta | अव्यक्त

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From: avyakta | अव्यक्त <babav...@gmail.com>
Date: Thu, 21 Oct 2021, 08:23
Subject: यह सब कैसे ठीक होगा? गृहस्थ क्या करें?
To: ajay sahai <eleve...@gmail.com>


विनोबा ने कहा था—

“जो लोग अपना, शासन और सेवा का भार चंद प्रतिनिधियों पर सौपेंगे, धर्माचरण और चिंतन की जिम्मेवारी चंद लोगों पर सौपेंगे, वे बिल्कुल निस्सार होंगे। उनके जीवन में कोई प्राणतत्व नहीं रहेगा।”
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निरंकुश सत्ता चाहे राजनेताओं की हो, या महंतों-मठाधीशों की हो या केवल धनसंग्रह से प्रेरित पूंजीपतियों की, उसमें हमारा और समाज का ही प्रतिबिंब ही दिखता है।

हमें अपनी ही तरह का राजनेता मिलता है। अपनी ही तरह के महंतों, मठाधीशों के प्रति मूढ़ आस्था बनती है। हमने यदि केवल क्षुद्र लोभ-लाभ को ही प्रतिष्ठा दे रखी हो, तो पूंजीपति भी वैसा ही मिलता है।

बल्कि खुद सेर हों, तो सवा सेर मिलता है और भारी पड़ता है, महंगा पड़ता है।

एक को टैक्स देकर निश्चिंत हो जाते हैं। दूसरे को मूढ़-आस्था के वश चंदा-चढ़ावा, संतान और शरीर तक सुपुर्द कर देते हैं। तीसरे के बारे में यह देखकर प्रसन्न होते हैं कि वह दुनिया के खरबपतियों से होड़ कर देश का मान बढ़ा रहा है।

शासन, सेवा, धर्माचरण और उद्यमिता का ठेका चंद लोगों को सौंप कर बैठ गए हैं, और अपने उद्धार की उम्मीद लगाए बैठे हैं। यह कैसा भोलापन है!

इस गलतफहमी में नहीं रहना है कि यदि हम दूर-दूर से भी इनमें से किसी का हिस्सा हैं, लाभार्थी हैं, तो हम और हमारी संतानें इससे बच जाएंगीं।

स्वयं पर, परिवार पर, समाज पर बहुत काम करने की जरूरत है। हमें देखना होगा कि हमने अपने जीवन में, अपने परिवारों में किन इच्छाओं को, किन तरीकों को मान-सम्मान दे रखा है।

हम जो हैं, जहाँ भी हैं, जिस हाल में भी हैं, हमें अपने स्वत्व पर, अपने स्वराज पर काम करने की जरूरत है। हम गृहस्थ अपनी जिम्मेवारी, अपना आचरण, अपनी जीवन-चर्या अपने हाथों में लें। सत्यनिष्ठा, सादगी, संयम, सेवा और सदाचरण से न डिगें, तो ही यह सब ठीक होगा।

बाकी सब बुद्धिविलास, वाणीविलास है। पल भर को यह सब पढ़कर बुरा भी लगे, तो भी ठंडे दिमाग से सोचना है।

इतने शोर-कोलाहल के बीच यह सामान्य अपेक्षा करना भी यदि आशावाद कहा जाए, तो ऐसे आशावादी जीवन-प्रयोगों में बड़ा आनंद है। जब तक सुंदर जीवन-प्रयोगों में नहीं उतरेंगे तब तक इसे जानने का दावा नहीं कर सकते।

गांधीजी कहते थे कि व्रतनिष्ठ और सत्यनिष्ठ जीवन प्रयोगों में उतरे बिना ही यदि कोई अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का दावा करता है, तो उसका वह दावा सही नहीं है। उसे अपने दावों की सीमाओं का पता भी तभी चलेगा, जब वह ऐसे सत्य के प्रयोगों में उतरेगा।

सबके प्रति प्रेम, सबके प्रति आदर, सबसे केवल मधुर विनती, मनुहार। 🙏

~अव्यक्त, २१ अक्तूबर, २०२१
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