शुल्व सूत्र हिंदू धार्मिक दस्तावेज़ों का एक संग्रह है, जिसे 800 BCE के बीच 200 BCE लिखा गया। यह पुस्तके गणितीय रुप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई विद्वानों का विश्वास है कि ये गणित की सबसे पुरानी पुस्तके हैं। इन पुस्तको मे बहुत से गणितीय सिद्धांत है जो कि हमे बताते है कि प्राचीन भारत में गणित अन्य प्राचीन संस्कृति से भी ज़्यादा अग्रिम था। यहाँ तक कि शुल्व सूत्र में लिखे कुछ प्रमेयो का यूरोपियो द्वारा कई शताब्दियों के बाद आविष्कार किया जा सका।
प्राचीन संस्कृतियों में गणित का प्रारंभिक विकास धार्मिक प्रथाओं और त्योहारो के कारण आवश्यक हो गया था। लोगों को बलि या पूजा के कृत्यों के लिए और कुछ त्योहारों के शुभ समय के सटीक गणना की आवश्यकता थी। उन्हे सूरज और चाँद की उदय और अस्त होने, और सौर और चन्द्र ग्रहण की घटनाओं के सही समय के ज्ञान की भी आवश्यकता थी। इन सभी के लिये खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है, अर्थात गणित, तल और गोलीय ज्यामिति और त्रिकोणमिति का सही ज्ञान,और संभवतः सरल खगोलीय उपकरणों के निर्माण का भी ज्ञान आवश्यक था। प्रारंभिक चरण में गणित मुख्य रूप से दो व्यापक परंपराओं मे विकसित हुआ- ज्यामितीय और अंकगणित, बीजगणित के मूलभूत विकास सहित। पुरा-यूनानी प्राचीन सभ्यताओं मे, यह भारत ही है कि जहाँ हम गणित की इन दोनों महान धाराओ पर मजबूत जोर देखते है। अन्य प्राचीन सभ्यताओं जैसे बेबीलोन और मिस्र ने मुख्य रूप से अंकीय गणनाओ मे प्रगति की थी।
वेदांग ज्योतिष मे कहा गया है- “वेदा हि यज्ञार्थयभिप्रवृत्ता “ अर्थात् वेद भी यज्ञों के लिए प्रवृत्त हुए। यज्ञों के लिए भिन्न – भिन्न आकार प्रकार की वेदियां बनाने की आवश्यकता पड़ी जैसे- वर्गाकार, वृत्ताकार, अर्द्धवृत्ताकार, आयताकार, त्रिभुजाकार आदि। ये यज्ञ-कुण्ड प्रतीकात्मक रुप से बहुत महत्वपूर्ण थे, एवं इन्हे परिशुद्धता (accuracy) के साथ बनाना आवश्यक था। इन यज्ञ कुण्डों के निर्माण मे विभिन्न प्रकार के अभिकल्पो (designs) का प्रयोग किया जाता था। जैसे, किसी अभिकल्प में बाज को अपने घुमावदार पंखो के साथ उड़ते दिखाया गया है, किसी अभिकल्प में रथ के पहिये को दिखाया गया है, तो किसी अभिकल्प में कछुए को उसके सिर एवं पैर फैलाये हुए दिखाया गया है। जहाँ उपरोक्त अग्नि-कुण्डो का दैनिक पूजाओं के कृत्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहीं कुछ अभिलषित वस्तुओं को प्राप्ति के लिए अधिक विस्तृत बलिदान या पूजाएं भी थी। विशिष्ट अग्नि-कुण्ड देवताओ से विशिष्ट उपहारो के साथ सम्बन्धित थे। उदाहरण के लिए, ” जिसे स्वर्ग की इच्छा है, उसके लिए एक बाज के रूप में अग्नि-कुण्ड”, “एक कछुए के रूप में अग्नि-कुण्ड का ब्राह्मण की दुनिया को जीतने के इच्छुक द्वारा का निर्माण किया जाना है” और “जो वर्तमान और भविष्य के शत्रुओं को नष्ट करना चाहते हैं उसे तिर्यग्वर्ग अग्नि-कुण्ड निर्माण करना चाहिए”। [ref:- Plofker, Kim (2007) p. 387़. इन “आग्नि-कुण्डो” के निर्माण करने के लिए कई संदर्भ ऋग्वेद संहिता में उपलब्ध हैं। इस वेदियों के निर्माण का विज्ञान तैत्तरीय संहिता और तैत्तरीय ब्राह्मण में अधिक विस्तार मे है।
मिट्टी के ईंटो से निर्मित यह वेदिया आकृति और आकार में बहुत जटिल है, और प्राय: गणितीय सूत्रो का उपयोग आवश्यक होता था। एक सामान्य उदाहरण एक वर्ग के आकार की एक वेदी (या उसका खंड) बनाना, जिसका क्षेत्रफल किसी वृत्तीय वेदी के बराबर हो, (ऐसा गणित, जिसने गणितज्ञो को वर्षो से परेशान किया)।इस के लिए उन्हे pi का अनुमान, प्रक्रियाओं की गणना, और सटीक निर्माण विधियों की आवश्यकता थी। इन प्रक्रियाओं के लिये त्रिकोण, वर्ग और आयत के गुणो, समरुप आकृतियो के गुणो, वृत्त को वर्ग बनाने तथा इसके विलोम, वर्ग को वृत्त बनाने (अर्थात् वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाने तथा इसके विलोम) जैसी समस्याओ के हल का अच्छा ज्ञान आवश्यक है।
भारतीय गणितज्ञो ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है, जो शुल्व सूत्र के रूप में जाना जाता है। केवल सात शुल्व सूत्र को वर्तमान में जाना जाता है। इन्हे बोधायन (Bodhayana), आपस्तम्ब (Apasthamba), कात्यायन (Katyayana), मानव (Manava), मैत्रियन (Maitrayana), वाराह (Varaha) और वधुला (Vadhula )के नाम से जाना जाता है उन ऋषियो या साधुओ के बाद जिन्होने उन्हें लिखा था। कात्यायन सूत्र वेदों के उस भाग से है, जिसे शुक्ल तजुर्वेद (Shukla Tajurveda) कहते है। जबकि अन्य सभी कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda) से लिये गये है। बोधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन सूत्र गणितीय बिंदु से महत्वपूर्ण हैं। मैत्रियन मानव सूत्रो के समान है। एक अन्य शुल्व सूत्र हिरण्यकशिन भी पाया गया है, जो आपस्तम्ब सूत्र के समान है।
शुल्व सूत्रो से कुछ जटिल ज्यामितीय निर्माण के नीचे सूचीबद्ध हैं।
1. किसी दिए गए वर्ग के अपवर्त्य के बराबर वर्ग की रचना करना
2. किसी वर्ग के अपवर्तक के बराबर वर्ग की रचना करना
3. दो विभिन्न वर्गों के योग के बराबर वर्ग की रचना करना
4. दो विभिन्न वर्गों के अंतर के बराबर वर्ग की रचना करना
5. आयत के बराबर वर्ग की रचना करना
6. वर्ग के बराबर आयत की रचना करना
7. वर्ग के बराबर त्रिभुज की रचना करना
8. वृत्त के बराबर वर्ग की रचना करना तथा इसका विपरीत
9. भुजाये ज्ञात होने पर आयत की रचना करना
10. किसी दी हुई रेखा पर वर्ग की रचना करना
11. दो भुजाओ और उनके झुकाव दिए रहने पर समांतर चतुर्भुज की रचना करना और इसी प्रकार की अन्य रचनाये एवं रुपान्तरण
ऊपरोक्त केवल कुछ उदाहरण हैं। असल में शुल्व-सूत्र बहुत से जटिल गणितीय निर्माणो से भरे पड़े हैं।
भारतीय गणित के इतिहास पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि “शुल्व काल” या “वेदांग ज्योतिषकाल” (1000BC से 500BC) मे ही रेखागणित की नींव पड चुकी थी। उस काल मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता था, जैसे- शुल्व-गणित, शुल्व-विज्ञान, रज्जु-गणित, रज्जु-संख्यान, रज्जु-क्षेत्रगणित, क्षेत्र समास, क्षेत्र व्यवहार, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, और भूमिति नामो से व्यक्त किया गया है। शुल्व का अर्थ है रज्जु या रस्सी। अत: वह विज्ञान या गणित जो शुल्व की सहायता लेकर विकसित किया गया, उसे शुल्व-विज्ञान या शुल्व-गणित का नाम दिया गया। शुल्व का पर्यायवाची रज्जु होने के कारण इसे रज्जु-गणित भी कहा गया है, जो आगे चल कर रेखागणित मे परिणत हो गया। शुल्व का दूसरा अर्थ यज्ञीय कार्य भी है। चूकि विभिन्न प्रकार की यज्ञ वेदियो के निर्माण मे रज्जु की सहायता से पृथ्वी पर अभीष्ट दूरीयाँ मापने के अतिरिक्त कृ्षि योग्य भूमि की माप भी की जाती थी, इसीलिये इस्की सहायता से विकसित गणित का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति, तथा भूमिति भी पड़ गया। क्षेत्र, ज्या, भू, का एक ही अर्थ है- भूमि, तथा, मिति का अर्थ है, मापन। अत गणित की इस शाखा का नाम क्षेत्रमिति, ज्यामिति या भूमिति अत्यन्त सार्थक है।
शुल्व-सूत्र वैदिक अवधि से भारतीय गणित का ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं। इस सूत्रो के समय का अनुमान अन्य वैदिक ग्रंथों की शब्दावली के साथ उनके व्याकरण और शब्दावली की तुलना करके किया गया हैं। सबसे पुराना शुल्व-सूत्र बोधायन द्वारा 800 BCE से 600 BCE के आसपास लिखा गया , और सभी सूत्रों की अवधि 800 BCE से 200BCE अनुमान किया गया है लिखा गया था। हालांकि यह वेदों की उत्पत्ति के थोड़ा बाद का समय है,परन्तु इसमें लिखे सिद्धांत वैदिक सभ्यता से पूर्व के है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि शुल्व सूत्र के लेखको ने वेदियों कि उन रचना विधियों को केवल लिखा है जो कि , जो कि प्राचीन काल से ही निर्दिष्ट रूप में थे। वे उन वेदियों के मूल रचनाकार नहीं है।
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