व्याकरण-परंपरा

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sanskrit samiti

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Nov 3, 2009, 6:54:14 AM11/3/09
to संस्कृत-समिति
प्रिय
व्याकरण अध्ययन एवं अध्यापन में दो प्रकार की परंपराओं का उल्लेख
मिलता, नव्य एवं प्राचीन|
प्राचीन व्याकरण परम्परा में अष्टाध्यायी क्रम को लेकर चर्चा की जाती
है , एवं नव्यपरम्परा में सिद्धान्त-कौमुदी के क्रम को ध्यान में रखकर
चर्चा होती है| प्रश्न यह है कि
प्राचीन और नव्य दोनो ही परम्पराओ में वर्तमान मे विवादास्पद स्थिति
क्यों है ?
नव्य परम्परा विद्यार्थियो के हित में है या प्राचीन ?
धन्यवाद

Umesh Kumar Singh

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Nov 3, 2009, 1:12:28 PM11/3/09
to sanskri...@googlegroups.com
प्राचीन एवं नव्य के झगड़े में न पड़कर मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव व्यक्त करना चाहूँगा कि सिद्धान्तकौमुदी के पढ़ने से हमें हमेशा रिक्तता का ही अनुभव होता है। खास तौर से तब जब वैदिक स्वरों का प्रश्न होता है। मुझे लगता है कि सिद्धान्तकौमुदी सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के बाहर फुटपथिया दुकानों पर बिकने वाली उन कुञ्जियों की तरह है जिन्हें पढ़कर विद्यार्थी आसानी से परीक्षाओं को पास कर जाते हैं किन्तु शास्त्र से कोई परिचय नहीं होता। पुनः प्रश्न उठता है माहेश्वर सूत्रों के आधार पर इतना वैज्ञानिक और व्यवस्थित व्याकरण का निर्माण करनें वाले  आचार्य पाणिनि सिद्धान्त कौमुदी के क्र्म में सूत्रों को नहीं व्यवस्थित कर सकते थे जो भट्टोजि दीक्षित को करना पड़ा?
जितना परिश्रम हमें सिद्धान्तकौमुदी में अनुवृत्ति को याद रखने में करना पड़ता है, उससे कहीं कम समय और परिश्रम में अष्टाध्यायी पढ़ी जा सकती है। जहाँ तक रही बात विद्यार्थियों के हित की तो हमें हम ध्यान रखना पड़ेगा कि हम कैसे विद्यार्थियों का हित चाहते हैं? सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय की विद्यावारिधि को १५०००/- में लिखानें वालों का या उन शास्त्रप्रेमियों का जिनके कारण सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों का सम्मान जीवित रहता है।


--
Umesh Kumar Singh,Ph.D.
Linguist,
Special Centre for Sanskrit Studies,
Javaharlal Nehru University,Delhi-110067
Phone- 09891672591(Delhi)
      09451135678(varanasi)



sheetal pokar

unread,
Nov 3, 2009, 10:17:26 PM11/3/09
to sanskri...@googlegroups.com
श्रद्धेय सदस्यगण,

उमेश जी ठीक कह रहे हैं | project में काम करते समय भी कदम-कदम पर दोनों प्रकार के विद्यार्थीयों के बीच योग्यता का अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है | पाणीनीय-क्रम का अनुसरण ही कम समय में श्रेष्ठ विद्यार्थी का निर्माण कर सकता है, यह अनुभव-गम्य बात है |

शीतल

2009/11/3 Umesh Kumar Singh <umesh...@gmail.com>

Devanand Shukl

unread,
Nov 3, 2009, 11:40:47 PM11/3/09
to sanskri...@googlegroups.com
आदरणीय उमेश जी
                सिद्धान्त-कौमुदी एवं अष्टाध्यायी के विषय में जो बाते आपने कहीं मैं उनसे सहमत हूँ| परन्तु जहाँ तक विद्यार्थियों का प्रश्न है कि किस प्रकार के, यदि वह सम्पूर्ण पाणिनीय व्याकरण पढ़ना चाहता है तो अष्टाध्यायी क्रम संगत लगता है | परन्तु यदि कोई ऐसा भी है जिसे मात्र कुछ प्रकरण ही पढ़कर सामान्य साहित्य का अध्ययन करना चाहता है तो सिद्धान्त कौमुदी हितकर होगी|
उदाहरण के लिये यदि कोई सन्धि प्रकरण पढ़ना चाहता है तो अष्टाध्यायी में प्रथम सूत्र वृद्धिरादैच् पढ़ा, जो कि संज्ञा सूत्र है परन्तु विधिसूत्र वृद्धिरेचि (६.१.८५) पर है, जो कि बहुत ही आगे है|
                अध्ययन की दृष्टि से दो विधियाँ है : प्रायोगिक विधि
                                                       : सैद्धान्तिक विधि
                प्रायोगिक स्तर पर अध्ययन हेतु सिद्धान्त-कौमुदी क्रम उचित है |
                सैद्धान्तिक स्तर पर अष्टाध्यायी का अपना विशिष्ट स्थान है |
धन्यवाद
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DR. DEVANAND SHUKL


2009/11/3 Umesh Kumar Singh <umesh...@gmail.com>
प्राचीन एवं नव्य के झगड़े में न पड़कर मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव व्यक्त करना चाहूँगा कि सिद्धान्तकौमुदी के पढ़ने से हमें हमेशा रिक्तता का ही अनुभव होता है। खास तौर से तब जब वैदिक स्वरों का प्रश्न होता है। मुझे लगता है कि सिद्धान्तकौमुदी सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के बाहर फुटपथिया दुकानों पर बिकने वाली उन कुञ्जियों की तरह है जिन्हें पढ़कर विद्यार्थी आसानी से परीक्षाओं को पास कर जाते हैं किन्तु शास्त्र से कोई परिचय नहीं होता। पुनः प्रश्न उठता है माहेश्वर सूत्रों के आधार पर इतना वैज्ञानिक और व्यवस्थित व्याकरण का निर्माण करनें वाले  आचार्य पाणिनि सिद्धान्त कौमुदी के क्र्म में सूत्रों को नहीं व्यवस्थित कर सकते थे जो भट्टोजि दीक्षित को करना पड़ा?

hnbhat

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Nov 6, 2009, 1:11:14 AM11/6/09
to संस्कृत-समिति
मान्य उमेशमहाशयाः,

भवतां अष्टाध्यायीक्रमेणाधीतं वा सिद्धान्तकौमुदीक्रमेणाधीतं वा, येन
संस्कृते लेखनं विहाय, हिन्दीभाषया
विचारप्रस्तावेनाष्टाध्यायीक्रमेणाध्ययनस्य प्राधान्यं कल्प्यते?

मया तु सिद्धान्तकौमुदीपठनेनैव संस्कृतभाषा समधिगता, तथापि यद्यपेक्षा,
भाष्यादिग्रन्था अष्टाध्यायीक्रमेण रचिता समालोचनायोपादाय निर्णेतुं
प्रभावमीति मे विश्वासः। व्याकरणशास्त्रस्याध्ययनं लक्ष्यं प्राप्तुं यः
पन्था यस्मै रोचते, स स्वीक्रियते एव। दक्षिणभारते
सिद्धान्तकौमुदीक्रमेणापि व्याकरणमधीयानैः व्याकरणाचार्यैः
विषयनिष्कर्षार्थम्, महाभाष्य, प्रदीपोद्योतादयो ग्रन्थाः समालोच्यन्ते
एव। काशिका, पदमञ्जरीप्रभृतयो ऽपि यथासंभवमुपयोक्ष्यन्त् एवेत्यतो नैतावा
काचिद् हानिरन्यतरस्य क्रमस्य इति चिन्तयामि। अष्टाध्यायीक्रमेणाधीतवतां
कदापि सिद्धान्तकौमुद्यादिग्रन्थप्रतिपादितानां विषयाणां जिज्ञासा चेत्
तत्रापि यत्नः कर्तव्य एव, अन्यथा तत्र प्रतिपाद्यानां शास्त्रार्थाणां
ग्रहणाभावान् न्यूनता अपरिहार्यैव, सर्वथा विषयज्ञानस्य परिनिष्ठा काम्या
एव इत्यत्र वैमत्यं न स्यात्।


इति भवदीयः

On 4 नव, 09:40, Devanand Shukl <dev.sh...@gmail.com> wrote:
> आदरणीय उमेश जी
>                 सिद्धान्त-कौमुदी एवं अष्टाध्यायी के विषय में जो बाते आपने
> कहीं मैं उनसे सहमत हूँ| परन्तु जहाँ तक विद्यार्थियों का प्रश्न है कि किस
> प्रकार के, यदि वह सम्पूर्ण पाणिनीय व्याकरण पढ़ना चाहता है तो अष्टाध्यायी
> क्रम संगत लगता है | परन्तु यदि कोई ऐसा भी है जिसे मात्र कुछ प्रकरण ही पढ़कर
> सामान्य साहित्य का अध्ययन करना चाहता है तो सिद्धान्त कौमुदी हितकर होगी|
> उदाहरण के लिये यदि कोई सन्धि प्रकरण पढ़ना चाहता है तो अष्टाध्यायी में प्रथम
> सूत्र वृद्धिरादैच् पढ़ा, जो कि संज्ञा सूत्र है परन्तु विधिसूत्र वृद्धिरेचि
> (६.१.८५) पर है, जो कि बहुत ही आगे है|
>                 अध्ययन की दृष्टि से दो विधियाँ है : प्रायोगिक विधि
>                                                        : सैद्धान्तिक विधि
>                 प्रायोगिक स्तर पर अध्ययन हेतु सिद्धान्त-कौमुदी क्रम उचित है
> |
>                 सैद्धान्तिक स्तर पर अष्टाध्यायी का अपना विशिष्ट स्थान है |
> धन्यवाद

> ***************************************************************************­******************
> DR. DEVANAND SHUKL
>
> 2009/11/3 Umesh Kumar Singh <umeshvai...@gmail.com>

hnbhat

unread,
Nov 6, 2009, 1:15:57 AM11/6/09
to संस्कृत-समिति
अत्र कारणं तु एवं संभाव्यते -

नैषा शास्त्रगर्हा, किं तु पुरुषगर्जैषा।

यदि शास्त्रे परिनिष्टता न प्राप्यते, केन प्रकारेणाध्ययनेनापि प्रयोजनं
नास्तीत्येव हेतोर्भेदः कल्प्यते पुरुषयत्नस्य।

"शास्त्रेषु निष्ठा सहजः प्रभावः" इति द्वयमपि कार्यसिधौ
प्रयोजकत्वेनोक्तम्। उपेयसिद्धौ उपायाणां भेदस्त्वैच्छिक एव।

इति भवदीयः।


On 4 नव, 08:17, sheetal pokar <sjpo...@gmail.com> wrote:
> श्रद्धेय सदस्यगण,
>
> उमेश जी ठीक कह रहे हैं | project में काम करते समय भी कदम-कदम पर दोनों प्रकार
> के विद्यार्थीयों के बीच योग्यता का अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है | पाणीनीय-क्रम
> का अनुसरण ही कम समय में श्रेष्ठ विद्यार्थी का निर्माण कर सकता है, यह
> अनुभव-गम्य बात है |
>
> शीतल
>

> 2009/11/3 Umesh Kumar Singh <umeshvai...@gmail.com>

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