(मेरा नाम तुलसी है, मैं राम का गुलाम हूँ, जिसको जो मन कहे कहता हूँ,
मांग के खाता हूँ, मस्जिद में रहता हूँ, न किसी से लेना, न किसी को
देना.)
-तुलसीदास, (विनय चरितावली)
तुलसीदास, राम के परमभक्त थे. उन्होंने अपनी रचनाये, संस्कृत में नहीं,
साधारण लोगों में प्रचलित अवधी भाषा में की, जिससे वो सब लोगों तक पहुचे.
इसी कारण उस समय के ब्राह्मण उनकी गिनती अपने बीच नहीं करते थे. तुलसीदास
ब्राह्मणों द्वारा मंदिर से निकाले जाने के बाद अयोध्या की एक मस्जिद में
रहते थे.
- पुस्तक "झूठ और सच" से (राम पुनियानी)
-विवेक
"हिंदी कवियों की दृष्टी सांप्रदायिक थी या नहीं, इसका अंतिम प्रमाण
गोसाई तुलसीदास की रामायण में खोजा जा सकता है. रामायण हिन्दू-संस्कृति
का महाग्रंथ है. इस महाकाव्य में लघभग छह हज़ार वर्षों के प्रघाढ़ हिन्दू-
चिंतन का सार समाया हुआ है और इस ग्रन्थ का सम्मान भी वैसा ही है जैसा
सम्मान बाइबिल और कुरान का देखा जाता है. किन्तु, ऐसे धार्मिक काव्य में
भी हम अरबी-फ़ारसी शब्दों के निः संकोच प्रयोग अनेक स्थानों पर पाते हैं
जोकि इस बात का प्रमाण हैं कि गोसाईंजी में भाषा को लेकर साम्प्रदायिकता
की गंध तक नहीं थी. यह ठीक है कि अरबी-फारसी शब्द गोसाईंजी ने बहुत कम
लिए हैं, किन्तु उतने शब्दों से ही यह प्रमाणित हो जाता है कि अरबी-फारसी
शब्दों से उन्हें घृणा नहीं थी.
तुलसीदास जिस भाषा में लिख रहे थे, वह अत्यंत समर्थ और सक्षम भाषा थी.
इसलिए ये सोचना नितांत भूल है कि अरबी और फारसी शब्द उन्होंने इसलिए
ग्रहण किये कि हिंदी में उनके पर्याय नहीं थे. तुलसीदास चाहते तो अरबी-
फ़ारसी शब्दों का बहिष्कार बड़ी आसानी से कर सकते थे. किन्तु बहिष्कार की
नीति किसी भी विधायक कलाकार की नहीं होती, इसीलिए अरबी और फारसी के जो
शब्द तुलसी की कल्पना के सामने उपस्थित हुए, महाकवि ने उनकी सेवा
स्वीकार की. अरबी और फ़ारसी के सान्निध्य से हिंदी में एक नयी शक्ति
उत्पन्न हो रही थी, एक नया प्रवाह आ रहा था. भाषा के इस नवीन रूप को
तुलसीदास ने अपनी रचना में स्थान दिया.
भाषा की शक्ति कठिन नहीं, आसान शब्दों के प्रयोग से निखरती है. भाषा का
सोंदर्य तब बढ़ता है, जब लेखक उन सभी शब्दों को सहानुभूति से देखता है जो
जनता की जीभ पर चढ़े हुए हों."
On Apr 21, 5:53 pm, Lokesh sadrani <lokeshsadr...@gmail.com> wrote:
> आपने बहुत अच्छी बात बताई विवेक भाई. तुलसीदास जब रामचरितमानस आम लोगो की भाषा
> मे लिख रहे थे तब ब्राह्मणों ने उनका विरोध किया था. पर जब रामचरितमानस
> सर्वसाधारण के द्वारा अच्छे प्रतिसाद के साथ स्वीकार कर लिया गया. तब धीरे धीरे
> फिर से तुलसीदास और रामचरितमानस का ब्रह्मनिकरण होने लगा.
> इसे कुछ इस तरह से मै देखता हूँ "घर का एक भाई अगर क्रन्तिकारी हो कर किसी ऐसी
> राह पर निकल पड़े जो परिवार के अन्य सदस्य को मान्य न हो तो उस क्रन्तिकारी
> सदस्य का पुरजोर विरोध होगा. और अगर वो असफल रहा तो कोई बात नहीं पर अगर वो
> सफल हो गया तो उसके ऐसा कर पाने का श्रेय पाने की होड़ मच जायेगी. ब्राह्मण
> इस काम मे पारंगत रहे है हमारे यहाँ.
> तुलसीदास के ब्रह्मनिकरण मे ये बात भुला दी गई के वो मस्जिद मे रह चुके थे. और
> उस पर कोई कविता भी लिखी थी.
>
> Lokesh
>
> 2009/4/21 vkm <vkme...@gmail.com>
राम और उनके जीवन से जुडी घटनाएं या कहानियां भी ऐसे ही ना जाने कितने
विविध समाजों और समय-कालों में समाज में जो मूल्य रहे हैं, उन्हें सामने
रखती हैं. मेरी समझ से तो अगर अलग-अलग समाजों में रहने वाले लोगों ने राम
से प्रेरित होकर, उन्ही के माध्यम से अपने समाजों का ब्यौरा दिया. क्या
आपको पता है, इस तरह से कितनी रामयाणें बन गयीं? ३०० से भी ज्यादा.
google पर ramanujam essay on ramayana करके सर्च कीजिये, आपको पुख्ता
जानकारी मिलेगी.
कवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी अपनी किताब "भारतीय संस्कृति के चार
अध्याय" में ऐसे कुछ उधाहरण दिए हैं, वो मैं आप लोगों से बांटना
चाहूँगा.
(पेज न. १४२, आखिरी पैरा)
रामकथा के विषय में जैन और बौद्ध पुरानो में कितनी ही अद्भुत बातों का
समावेश मिलता है. उदाहरण के लिए, दशरथ जातक में सीता राम की बहन बताई गयी
है और यह भी उल्लेख आया है कि लंका से लौटने पर राम ने सीता के साथ विवाह
किया. पउम्चरिय में दशरथ के तीन नहीं, चार रानियाँ थी, ऐसा उल्लेख है,
चौथी का नाम सुप्रभा था. इसमें राम के एक और नाम पद्म भी मिलता है.
पउम्चरिय में यह भी कथा है कि हनुमान जब सीता की खोज करते हुए लंका गए,
तब उन्होंने वहां, वज्रमुख की कन्या लंकासुन्दरी से विवाह किया.
गुणभद्र की राम-कथा (उत्तर-पुराण) में राम की माता का नाम सुबाला मिलता
हैं. दशरथ जातक और उत्तर-पुराण में यह भी लिखा हुआ है कि दशरथ वाराणसी के
राजा थे, किन्तु उत्तर-पुराण में एक और उल्लेख मिलता हैं कि उन्होंने
अपनी राजधानी साकेतपुरी में बनाई थी. इन विचित्रतायों को देखकर यह नहीं
समझना चाहिए कि ये कथाएं वाल्मीकि-रामायण से पूर्व की हैं और वाल्मीकि ने
इनका परिष्कार करके अपनी राम-कथा लिखी. वाल्मीकि रामायण इन सबसे प्राचीन
हैं.
(पेज न. १४३, आखिरी पैरा)
वैदिक, बौद्ध और जैन पुराणों में जो कथाएँ मिलती हैं, उनमे तो कितनी ही
एक ही कथा कि विभिन्न विकास हैं. सभी जातियों की संस्कृतियाँ का समन्वय
ज्यों-ज्यों बढ़ा, त्यों-त्यों विभिन्न कथाएँ भी. एक दूसरे से मिलकर नया
रूप लेने लगीं और जो कथाएँ पहले एक रूप में थी, उनमे वैविध्य आ गया (पर
इस वैविध्य के और भी कारण होते हैं, ये कभी और बताऊँगा, जब महाभारत के
बारे में लिखूंगा - विवेक). विशेषतः रामकथा पर तो केवल भारत ही नहीं,
सिंहल, स्याम, तिब्बत, हिंदेशिया, बाली, जावा, सुमात्रा आदि द्वीपों में
बसने वाली जनता का प्रभाव भी दृष्टीगोचर होता है.
आदिवासी कथा के अनुसार, गिलहरी के पीठ पर जो तीन रेखाएं हैं, वे रामचंद्र
के द्वारा खींची गयीं हैं. क्योंकि गिलहरी ने उन्हें मार्ग बताया था.
तेलगु (द्विपाद) रामायण के अनुसार, लक्ष्मण जब राम के साथ वन जाने लगे तो
उन्होंने निद्रा देवी से दो वरदान प्राप्त किये- एक तो उर्मिला के लिए
चौदह वर्ष के नींद और अपने लिए वनवास के अंत तक जागरण.
सिंहली कथा में बाली, हनुमान का स्थान लेता है, वह लंका का दहन करके सीता
को राम के पास ले जाता है. कश्मीरी रामायण के अनुसार सीता का जन्म
मंदोदरी (रावण की पत्नी ) के गर्भ से हुआ था. खोतानी रामायण (पूर्वी
तुर्किस्तान में प्रचलित) के अनुसार जब राम युद्ध में मूर्छित हुए तब
उनकी चिक्त्षा के लिए सुषेण नहीं, प्रत्युत, बौध्ध वैध को बुलाया गया था.
तथा आहत रावण का वध नहीं किया जाता है.
स्याम्देश में प्रचलित रामायण "राम कियेन " में हनुमान की बहुत सी
प्रेम लीलायों का वर्णन मिलता है. प्रभा, नागकन्या, सुवार्न्मछा और
अप्सरा वानिकी के अतरिक्त, वे मंदोदरी के साथ भी क्रीडा करते हैं. स्याम
में ही प्रचलित राम-जातक में राम तथा रावण चचेरे भाई माने गए हैं.
पुराणों की महाकथायों में ये जो विविधता मिलती है, उनकी ऐतिहासिकता चाहे
जो भी हो किन्तु यह सत्ये है कि वे अनेक जातियों और जनपदों की रूचियों के
कारण ही बढ़ी हैं. और यह भी हुआ है कि जिस लेखक को अपने सम्प्रदाय के
समर्थन में जो कथा अनुकूल लगी, उसने उसी कथा को प्रमुखता दे डाली अथवा
कुछ फेर-फार करके अपने मत के अनुकूल बना लिया."
-रामधारी सिंह दिनकर
आप लोगों की प्रतिक्रिया वाँछित है .
विवेक
On Apr 22, 11:46 am, Lokesh sadrani <lokeshsadr...@gmail.com> wrote:
> वनवास कब ख़तम होगा? हे राम उठा ले रे बाबा.
>
> 2009/4/21 vkm <vkme...@gmail.com>
> ...
>
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शायद लोगों को ये याद दिलाने की ज़रुरत है कि ये वो भू-भाग है, जिसके लिए
कहा गया है
कोस कोस में बदले पानी,
चार कोस में बदले वाणी.
या उल्टा?? खैर जो भी....
-विवेक
On Apr 22, 12:40 pm, debashish bose <dbose...@gmail.com> wrote:
> agar aap jante nahin hain to aap ko batana chahunga desh ke alag alag kone
> me alag alag boli hain ji jo padhe likhe log turant ashudh bloke tut padte
> hain ...sare eastern india.... me baba go ebang maa re ...jaise shabd ka
> prayog kya jaata hain ... unfortunately log jab "sikshit samaj" me ate hain
> to baki logo ke hasi majak ke dar se (jaise ki is case me) apna boli chupana
> chahte hain
>
> Bye
> D
>
> ...
>
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बात रामचरितमानस की चल रही है, तो सोचा मैंने कि कुछ और जानकारी भी आप
Amen.
Nirmali
> 2009/4/22 vkm <vkme...@gmail.com>
> ...
>
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विवेक
> ...
>
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बहुत अच्छी बात कही अमर भाई.
विवेक
On Apr 22, 5:51 pm, nirmali <nirma...@gmail.com> wrote:
> > I am happy that we have these multiple narratives and I am sure
> > these will live on against all the odds and against all those 'misguided'
> > attempts at homgenisting our beautifully plural world.
>
>
Dear friends,
Variability has been as much an important feature of language and has
not been a hindrance in communication. India is one of the best
example of the case. This is something most of the sociolinguists
would agree to.
Even accepting the functional utility of a standard language the
question of power cannot be ignored here. Whose language gets picked
up as 'the standard language' out of immense varieties is an important
question to ask.
Uniform language was not always considered natural. Its use has been
of fairly recent origin. It happened when small city states and other
political units gave way to the emergence of nation states in Europe
and capitalist mode of large scale production became the norm.
Benedict Anderson's book 'Imagined Communities' is a much acclaimed
and interesting account of how linguistic nations of Europe emerged
and provided a model to the rest of the world.
All one can say is what is considered natural or normal changes with
time and is never free from the power dynamics.
Nirmali
On Apr 23, 11:32 am, Suddhasheel Bharatiya GHOSH
<suddhash...@gmail.com> wrote:
> यह वाक्य अत्यंत स्पष्ट है, इस पर कोई अधिक स्पष्टीकरण देने की कोई आवश्यकता
> नहीं है.
>
> 2009/4/23 Amarjeet Nayak <n.amarj...@gmail.com>