राधा, राधी, राध, राधीय, राधीया, राधेय, राधेयी

143 views
Skip to first unread message

Nityānanda Miśra

unread,
May 9, 2021, 12:33:39 AM5/9/21
to bvpar...@googlegroups.com, नवोन्मेष, sams...@googlegroups.com
एक सज्जन का प्रश्न है—
“मैं वृन्दावन में रहता हूँ। रामानन्द सम्प्रदाय में दीक्षित हूँ। मेरी एक जिज्ञासा है। जैसे राम-कृष्ण-विष्णु के भक्तों को संबोधित करने हेतु शब्द प्रयोग होता है, ‘वैष्णव’। क्या संस्कृत व्याकरण के अनुसार कोई ऐसा शब्द हो सकता है जो इस बात का सूचक हो कि कोई व्यक्ति अनन्य राधा उपासक है? जैसे हरिभक्त को ‘वैष्णव’ शब्द से संबोधित किया जाता है, क्या उसी प्रकार अनन्य राधा उपासकों को ‘राधव’ शब्द से संबोधित किया जा सकता है? यदि ‘राधव’ शब्द व्याकरण अनुसार अनुचित है तो व्याकरण सम्मत कोई शब्द बताने की कृपा करें जिसका अर्थ होता हो राधारानी का उपासक।”
मेरा उत्तर—
पहले ’राधा’ शब्द के अर्थ को समझते हैं। संस्कृत में √राध् धातु के दो अर्थ हैं। एक है “बढ़ना” (“राधँ वृद्धौ”, ११८०, ‘राध्यति’ = “बढ़ता/बढ़ती है”)। और दूसरा है “सिद्ध करना” या “पूर्ण करना” (“राधँ संसिद्धौ”, १२६२, ‘राध्नोति’ = “पूर्ण करता/करती है”)। “राध्यति [कार्याणि] राध्नोति वेति राधा”, अर्थात् “जो बढ़ती है या [कार्यों को] सिद्ध करती है वह है राधा”।
अब ‘वैष्णव’ शब्द के अर्थ को समझते हैं। ‘वैष्णव’ शब्द के दो अर्थ हैं, एक “विष्णुर्देवताऽस्येति वैष्णवः” अर्थात् “विष्णु जिसके देवता हैं वह वैष्णव है”। इस अर्थ में “साऽस्य देवता” (४.२.२४) सूत्र से चातुरर्थिक ‘अण्’ प्रत्यय हुआ है। दूसरा अर्थ है “विष्णोरयमिति वैष्णवः”, अर्थात् “विष्णु का जो है अथवा विष्णु-संबन्धी जो है वह वैष्णव है”। इस अर्थ में “तस्येदम्” (४.३.१२०) सूत्र से शैषिक ‘अण्’ प्रत्यय हुआ है। “तद्धितेष्वचामादेः” (७.२.११७) से आदिवृद्धि (‘वि’ → ‘वै’), “ओर्गुणः” (६.४.१४६) सूत्र से अन्त्य ‘उ’ को ‘ओ’, और “एचोऽयवायावः” (६.१.७८) से अयादि-सन्धि (‘ओ’ + ‘अ’ = ‘अव्’) होने पर ‘विष्णु’ + ‘अण्’ → ‘वैष्णो’ + ‘अ’ → ‘वैष्णव’ शब्द बनता है।
इसी प्रकार शिव, शक्ति, सूर्य, और गणपति के उपासकों के लिए चातुरर्थिक अथवा शैषिक ‘अण्’ प्रत्यय होकर ‘शैव’, ‘शाक्त’, ‘सौर’, ‘गाणपत’ आदि शब्द बनते हैं। ध्यातव्य—“गणपति के उपासक” के लिए अथवा “गणपति के मन्त्र” के लिए ‘गाणपत्य’ शब्द असाधु है, गणपति के उपासक को ‘गाणपत’ ही कहेंगे। सिद्धान्तकौमुदी में “किति च” (७.२.११८) सूत्र पर भट्टोजी दीक्षित ने कहा है “गाणपत्यो मन्त्र इति तु प्रामादिकमेव”। ‘गाणपत्य’ शब्द का अर्थ है “गणपति का कर्म अथवा भाव”। इस अर्थ में “गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च” (५.१.१२४) सूत्र से ‘ष्यञ्’ प्रत्यय प्राप्त होता है। जैसे ‘ब्राह्मण’ का कर्म अथवा भाव ‘ब्राह्मण्य’ होता है (यथा “तपः श्रुतं च योनिश्च त्रयं ब्राह्मण्यकारणम्” इस महाभारत और महाभाष्य की उक्ति में), ‘अधिपति’ का कर्म अथवा भाव ‘आधिपत्य’ होता है, वैसे ‘गणपति’ का कर्म अथवा भाव ‘गाणपत्य’ होता है। प्रकृत सूत्र पर काशिका में ब्राह्मणादिगण में ‘गणपति’ शब्द का स्पष्ट पाठ है।
राधा के उपासक अथवा भक्त को क्या कहेंगे? ‘राधा’ से ‘राधव’ शब्द तो नहीं बन सकता। ‘विष्णु’ शब्द उकारान्त है, अतः ‘अण्’ प्रत्यय होकर गुण और अयादि-सन्धि से ‘वैष्णव’ बनता है। पर ‘राधा’ शब्द उकारान्त ‘राधु’ नहीं है, अतः ‘राधा’ से ‘राधव’ नहीं बनेगा।
“राधा देवताऽस्येति राधः” अर्थात् राधा जिसकी देवता हैं इस अर्थ में ‘राध’ शब्द होगा। पुंलिङ्ग में ‘राध’ और स्त्रीलिङ्ग में ‘राधी’। संस्कृत में वैशाख मास को ‘राध’ कहते हैं। “वैशाखे माधवो राधः” (अमरकोष १.४.१६)। इस श्लोक पर व्याख्यासुधा टीका में कहा है “राधा विशाखा, तद्वती पौर्णमासी राधी, साऽस्मिन्निति राधः”। अर्थात् ‘राधा’ विशाखा नक्षत्र का नाम है, जो राधा (विशाखा) नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा है उसे ‘राधी’ कहते हैं, और ‘राधी’ पूर्णिमा जिस मास में है उसे ‘राध’ कहते हैं। राधा शब्द से “नक्षत्रेण युक्तः कालः” (४.२.३) से चातुरर्थिक ‘अण्’ प्रत्यय करके प्रथम ‘राध’ शब्द बना, उससे स्त्रीलिङ्ग में ‘राधी’ शब्द बना। इस ‘राधी’ शब्द से “साऽस्मिन् पौर्णमासीति संज्ञायाम्” (४.२.२१) सूत्र से पुनः चातुरर्थिक ‘अण्’ प्रत्यय करके ‘राध’ शब्द बना जिसका अर्थ है वैशाख मास। इसी प्रकार “राधा देवताऽस्येति राधः” और “राधा देवताऽस्या इति राधी”। “साऽस्य देवता” (४.२.२४) सूत्र से राधा शब्द से चातुरर्थिक ‘अण्’ प्रत्यय करके पुंलिङ्ग में ‘राध’ और स्त्रीलिङ्ग में ‘राधी’ शब्द उत्पन्न होंगे।
अब “राधा का जो है” उसे क्या कहेंगे? “राधा का” इस अर्थ में ‘राधीय’ (पुंलिङ्ग) और ‘राधीया’ (स्त्रीलिङ्ग) शब्द बनेंगे। “राधाया अयमिति राधीयः” और “राधाया इयमिति राधीया”। इसका कारण है “तस्येदम्” (४.३.१२०) सूत्र से जो शैषिक ‘अण्’ प्रत्यय प्राप्त है उसे “वृद्धाच्छः” (४.२.११४) सूत्र बाधित कर देता है। ‘राधा’ शब्द की ‘वृद्ध’ संज्ञा है अतः शैषिक अर्थ में ‘अण्’ न होकर ‘छ’ प्रत्यय होता है। “आयनेयीनीयियः फढखच्छघां प्रत्ययादीनाम्” (७.१.२) सूत्र से ‘छ’ का ‘ईय’ बनता है और “यस्येति च” (६.४.१४८) सूत्र से ‘राधा’ के अन्त्य आकार का लोप होता है, इस प्रकार ‘राधा’ + ‘छ’ → ‘राध्’ + ‘ईय’ → ‘राधीय’। जैसे ‘मालव’ देश के निवासी को ‘मालवीय’ कहते हैं (“मालवः निवासोऽस्येति मालवीयः”), “सोऽस्य निवासः” (४.३.८९) सूत्र से प्राप्त शैषिक ‘अण्’ को बाधकार “वृद्धाच्छः” (४.२.११४) से ‘छ’ होता है, क्योंकि मालव शब्द की ‘वृद्ध’ संज्ञा है। उसी प्रकार “राधाया अयमिति राधीयः” और “राधाया इयमिति राधीया”।
अन्ततः राधा के पुत्र को क्या कहेंगे? “राधाया अपत्यं पुमानिति राधेयः”। अपत्य अर्थ में राधा शब्द की ‘स्त्री’ संज्ञा होने के कारण “स्त्रीभ्यो ढक्” (४.१.१२०) सूत्र से ‘ढक्’ प्रत्यय प्राप्त होता है। पूर्ववत् “आयनेयीनीयियः फढखच्छघां प्रत्ययादीनाम्” (७.१.२) सूत्र से ‘ढ’ का ‘एय’ होता है और “यस्येति च” (६.४.१४८) सूत्र से ‘राधा’ के अन्त्य आकार का लोप होता है, अतः ‘राधा’ + ‘ढक्’ इस अवस्था में ‘राध्’ + ‘एय’ होकर ‘राधेय’ शब्द बनता है। ‘राधेय’ महाभारत में कर्ण का नाम है यह आप जानते ही हैं।
इस प्रकार—
राधा = जो बढ़ती है या [कार्यों को] सिद्ध करती है, विशाखा नक्षत्र और कृष्णप्रियतमा का नाम
राधी = राधा (विशाखा) नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा
राध = राधी पूर्णिमा जिसमें है वह मास = वैशाख मास का नाम
राध = राधा जिसकी देवता हैं वह पुरुष
राधी = राधा जिसकी देवता हैं वह स्त्री
राधीय = राधा का जो है, वह पुरुष
राधीया = राधा की जो है, वह स्त्री
राधेय = राधा का पुत्र = कर्ण का नाम
राधेयी = राधा की पुत्री
अतः राधोपासक पुरुष को ‘राध’ अथवा ‘राधीय’, और राधोपासक स्त्री को ‘राधी’ अथवा ‘राधीया’ कहेंगे। ‘राधीय’ और ‘राधीया’ शब्द अधिक कर्णप्रिय हैं और अपेक्षाकृत सुगम हैं।
अन्त में इस विमर्श पर आधारित एक श्लोक आपको भेज रहा हूँ—
राधीयः कृष्ण एवास्ति कार्ष्णी राधा तथैव च।
राधाकृष्णौ सदा प्रीतौ राजेतां वो मनोगृहे॥
“कृष्ण ही ‘राधीय’ (=राधा के) हैं, और राधा ही ‘कार्ष्णी’ (=कृष्ण की) हैं। आपके मन-रूपी निवास में राधा-कृष्ण सदा प्रसन्न होकर विराजित हों।”

--
Nityānanda Miśra


Maha Rudradev Mandir

unread,
May 9, 2021, 9:52:05 AM5/9/21
to sams...@googlegroups.com
Namaste Nityanand ji and other members what program to use to type Hindi Sanskrit or keyboard ect

Ravi

--
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "samskrita" group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to samskrita+...@googlegroups.com.
To view this discussion on the web visit https://groups.google.com/d/msgid/samskrita/CAATk%3DrAHyc6Ogs-NUV3gtQrVwrF6Vz7BfHcL4%2BrEoAR1ZHTL%2Bw%40mail.gmail.com.
--
Pundit Ravi

Prakash Raj Pandey

unread,
May 10, 2021, 4:44:12 AM5/10/21
to sams...@googlegroups.com
I use unicode fonts, these days Siddhanta

Vikram Gakhar

unread,
May 11, 2021, 5:01:35 AM5/11/21
to samskrita
नित्यानन्द जी,

विष्णु जिसके देवता हैं इत्यादि अर्थ में वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर और गाणपत के स्त्रीलिङ्ग रूप होंगे?

विक्रम
Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages