कोलकात्ता में रंगमंच

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मारवाड़ी समाज

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Jun 15, 2008, 10:00:27 AM6/15/08
to Marwari Samaj
कोलकाता में हिन्दीभाषी समुदाय बहुत लंबे समय से और बहुत बड़ी तादाद में
निवास करता आया है । यहां हिन्दी नाट्य प्रस्तु्तियों का इतिहास लगभग एक
शताब्दी पुराना है । इसके शुरूआती दौर में तो पारसी शैली के व्यावसायिक
नाटक ही छाए रहे । 1906 में पहली बार मुंशी भृगुनाथ वर्मा के नेतृत्व में
फूलकटरा में हिन्दी नाट्य समिति की स्थापना हुई । यह हिंदी में पहला
गैरव्यावसायिक रंग प्रयास था । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में पं. माधव
शुक्ल के कोलकाता आगमन और भोलानाथ बर्मन के साथ ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की
स्थापना से कोलकाता के हिन्दी रंगमंच को अपेक्षित गति व प्रतिष्ठा मिली
जिसका सतत विकास आज के समर्थ नाट्य आंदोलन में देखा जा सकता है ।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर कंपनियों ने कोलकाता
में पारसी शैली के नाटक प्रदर्शित करने शुरू कर दिए थे । मूनलाइट,
मिनर्वा, कोरिंथियन आदि थियेटरों में व्यावसायिक दृष्टि से सफल नाटक खेले
जाने लगे थे । मनोरंजन करना और पैसा कमाना इनका एकमात्र उद्देश्य था ।
वृहत्तर सामाजिक संदर्भों से इनका कोई गहरा सरोकार नहीं था परंतु भारी
संख्या में आम जनता को रंगमंच की ओर आकर्षित कर लेना इनकी बड़ी सफलता थी
। सरल उर्दू या हिन्दुस्तानी में खेले जाने वाले इन नाटकों की भाषानीति
नारायण प्रसाद ‘बेताब’ के ‘महाभारत’ नाटक के इस उद्धरण द्वारा समझी जा
सकती है :
” न खालिस उर्दू न ठेठ हिन्दी
जबान गोया मिली-जुली हो ।
अलग रहे दूध से न मिसरी,
डली-डली दूध में घुली हो ।।”
किन्तु पारसी नाटकों की प्रवृत्ति बाजारू और रुचि हल्की थी । अभिनय कला
में भी एक तरह का उथलापन था । अतिनाटकीयता के साथ आकस्मिकता और चमत्कार
का संयोग उसे और भी भोंडा बनाता था । किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
यह हमारी रंगयात्रा का प्रारंभिक चरण था और व्यावसायिकता के दबाव के
बावजूद पारसी शैली के कई नाटक तत्कालीन राष्ट्रीय भावनाओं और आकांक्षाओं
को निरूपित करने का खतरा मोल ले रहे थे । हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा
में पारसी नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत लंबे समय तक हिन्दी का
गैरव्यावसायिक रंगमंच भी इनकी शैली से खासा प्रभावित रहा । 1930 तक पारसी
शैली का थियेटर जिंदा रहा। सिनेमा के प्रचलन के बाद स्थाई रूप से इनका
पर्दा गिर गया ।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में व्यावसायिक व शौकिया रंगमंच
समानांतर चलते रहे । देश इस समय नवजागरण की लहर पर सवार था । हिन्दी जाति
के सांस्कृतिक अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट व पं. माधव
शुक्ल जैसे अनेक बुद्धिजीवी और सुसंस्कृत देशवासी पारसी कंपनियों की
लोकरुचि को दूषित करने वाली प्रस्तुतियों से क्षुब्ध थे । धीरोदात्त नायक
दुष्यंत को खेमटेवालियों की तरह कमर मटका कर नाचते और ‘पतरी कमर बल खाय’
गाते हुए देखना इनके लिए असह्य था । ये वे लोग थे जो भाषा और देश दोनों
के लिए चिंतित थे । वे अपनी भाषा में सुसंस्कृत और साहित्यिक अभिरुचि
वाले नाटक खेलना चाहते थे और जनता को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करना चाहते
थे ।
1916 में प्रकाशित महाभारत (पूर्वार्ध) नाटक की भूमिका में शुक्ल जी ने
स्पष्ट लिखा है कि “आजकल पारसी नाटकों का प्रधान्य है । उसके साज-सामान
हाव-भाव बिल्कुल कृत्रिम होते हैं । क्योंकि उनके सारे कार्य अर्थोपार्जन
के उद्देश्य पर ही संबद्ध हैं……।’ परंतु शुक्ल जी यह भी अनुभव कर रहे थे
कि “संपूर्ण परिवर्तन के साथ-साथ नाट्यकला में भी आशातीत परिवर्तन हो रहा
है । दर्शकों की इच्छा भाव और दृष्टि में बहुत अंतर आ गया है । अब लोग
उदारतापूर्वक नाट्यशाला में जाते हैं और बड़े ही उत्सुकता से नाटक देखते
हैं । शिक्षित समाज अब बहुत कम पारसी कंपनियों की ओर झुकता है ।”
राष्ट्रीय जागरण में नाटक की भूमिका के प्रति वे विशेष सजग थे । महाभारत
(पूर्वार्ध) नाटक में कुंती के मुंह से मानो भारत माता स्वयं आह्वान कर
रही है :
”स्वाभिमान नहिं तजो आत्म चिंता नहिं छोड़ो ।
स्वाधिकार हित लड़ो सत्य से मुख नहिं मोड़ो ।।”
1911 में माधव शुक्ल कोलकाता पधारे । ‘हिन्दी नाट्य समिति’ तब भारतेंदु
के नाटक ‘नीलदेवी’ के मंचन की प्रक्रिया में थी । शुक्ल जी के मार्गदर्शन
से 1912 में भारत संगीत समाज के मंच पर ‘नीलदेवी’ का सफल मंचन हुआ । पर
इसी दौरान कुछ मतभेद उभरे और भोलानाथ बर्मन व शुक्ल जी हिन्दी नाट्य
समिति से अलग हो गए । हिन्दी नाट्य समिति ने ‘नीलदेवी’ के अतिरिक्त पं.
राधेश्याम कथावाचक लिखित ‘वीर अभिमन्यु’ का सफल मंचन किया । पहले
प्रदर्शन में ही इतनी धनराशि प्राप्त हुई कि प्रस्तुति का खर्च निकालकर
चार हजार रुपये उड़ीसा के बाढ़पीड़ितों की सहायतार्थ दिए गए . 1920 में
जमुनादास मेहरा ने ‘पाप परिणाम’ नामक नाटक के कई सफल मंचन किए । मेहरा जी
द्वारा निर्देशित ‘भक्त प्रहलाद’ के भी लगभग दस मंचन हुए । इसके अतिरिक्त
‘हिन्दी नाट्य समिति’ के बैनर तले सत्यविजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती
पद्मिनी, सम्राट परीक्षित और स्कूल की लड़की आदि नाटकों के सफल प्रदर्शन
किए गए । 1939 के बाद यह संस्था कुछ विशेष या सार्थक नहीं कर सकी ।
पं. माधव शुक्ल द्वारा ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की स्थापना के साथ हिन्दी
रंगमंच का संबंध देशानुरागी भावनाओं से और प्रगाढ़ हो गया था । शुक्ल जी
नाटकों के द्वारा जागृति लाकर राष्ट्रीय आंदोलन को बल देना चाहते थे ।
परंतु अंग्रेज सरकार 1876 में ‘ड्रामैटिक पफ़ॉर्मेंस बिल’ पास कर चुकी थी
और दीनबंधु मित्र का नाटक ‘नीलदर्पण’ जब्त कर लिया गया था। खाडिलकर का
‘कीचक वध’ और वृंदावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ भी प्रतिबंधित कर दिया
गया था । ऐसे समय में जब परिषद ने राधाकृष्ण दास का नाटक ‘महाराणा
प्रताप’ खेलना चाहा तो अनुमति नहीं दी गई । अत: यह नाटक ‘भामाशाह की
राजभक्ति’ नाम से खेला गया. इसी तरह अंग्रेज सरकार की आंख में धूल झोंककर
‘महाभारत’ नाटक ‘कौरव कलंक’ नाम से व ‘मेवाड़ पतन’ नामक नाटक ‘विश्व
प्रेम’ नाम से खेला गया । इनके अतिरिक्त डी.एल.राय के ‘चंद्रगुप्त’ आदि
नाटक सफलतापूर्वक खेले गए ।
लगभग दो दशकों तक ‘हिन्दी नाट्य परिषद’ की कमान पं. माधव शुक्ल के हाथों
में रही और रंगमंच पर राष्ट्रप्रेम की धारा अप्रतिहत बहती रही । आलम यह
था कि शुक्ल जी के प्रयत्नों से महाकवि निराला जैसे साहित्यकार भी नाट्य
लेखन और अभिनय की ओर प्रवृत्त हुए । पं. माधव शुक्ल के पश्चात परिषद का
नेतृत्व पं. देवव्रत मिश्र व ललित कुमार सिंह ‘नटवर’ ने किया और नूरजहां,
शाहजहां, उस पार, महात्मा ईसा, छत्रसाल व पुनर्मिलन (महानिशा) मंचित किए
। ‘महानिशा’ नाटक का मंचन इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण था कि इसमें
पहली बार स्त्री पात्रों की भूमिकाएं महिला कलाकारों द्वारा ही अभिनीत की
गई थीं । इससे पहले पुरूष कलाकार ही स्त्री पात्रों की भूमिका में आते थे

1931 में कोलकाता से ही नरोत्तम व्यास के संपादन में ललित कला संबंधी
सचित्र साप्ताहिक ‘रंगमंच’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । इसका उददेश्य
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों के रूप में लिखा रहता था :

” हिन्दी माता के पुत्रों में कला-विवेक भाव भर दे
जग में ये भी शीश उठाएं, इतना इनको अवसर दे ।।
क्रम-क्रम से वे सब उठ जाएं, पड़े हुए हैं जो परदे ।
कागज का यह ‘रंगमंच’, पैदा वह रंगमंच कर दे ।।”
पं. माधव शुक्ल के महाभारत (पूर्वार्ध) में भी तो अर्जुन कुछ ऐसा ही
उद्घोष करता है :
“आत्मदशा का ज्ञान नहीं जिस नर के भीतर ।
उसकी भी क्या है मनुष्य में संज्ञा क्षिति पर ।।
“हिन्दी नाट्य परिषद के ही कुछ सदस्यों ने बाद में अलग होकर ‘बजरंग परिषद
और ‘श्री कृष्ण परिषद’ जैसी नाट्य संस्थाएं गठित कीं । ‘बजरंग परिषद’ ने
1939 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन में ‘श्रवण कुमार’
नाटक का मंचन किया जो सफल नहीं रहा। किंतु अगले दिन ‘भक्त प्रहलाद’ नाटक
सफलतापूर्वक खेला गया । बजरंग परिषद द्वारा ‘सिंहनाद’, ‘भयंकर भूत’ और
‘जखमी पंजाब’ नाटक का भी मंचन किया गया । श्रीकृष्ण परिषद तो ‘कृष्ण-
सुदामा’ नामक एक ही नाटक खेल सकी । बड़ाबाजार के ‘अपर इंडिया एसोसिएशन’
नामक क्लब ने ‘दुर्गादास’, ‘राजा हरिशचंद्र’ व ‘मधुर मिलन’ आदि नाटकों का
मंचन किया । 1943 में स्थापित ‘बिड़ला क्लब’ ने 1945 से 1963 के बीच
मिनर्वा, कालिका, कोरिंथियन, स्टार तथा विश्वरूपा आदि थियेटरों में
डी.एल.राय के ‘मेवाड़ पतन’ ‘चंद्रगुप्त’ और ‘उस पार’ नाटकों का और उग्र
के ‘महात्मा ईसा’ नाटक का मंचन किया । 1964 में ‘रुपया बोलता है’ का
प्रदर्शन किया गया ।

1947 में ‘तरुण संघ’ की स्थापना के साथ कोलकाता में नवीन विषयवस्तु वाले
नाटकों का प्रदर्शन प्रारंभ हुआ । क्रमश: पाश्चात्य रंगमंच के तत्वों को
भी जगह मिलनी शुरू हुई । भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, सुशीला भंडारी,
सु्शीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल जैसे ऊर्जस्वी कलाकार कुछ नया व सार्थक
करने की बेचैनी लेकर रंग परिदृश्य पर उभरे । ‘तरुण संघ’ ने विष्णु
प्रभाकर, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, जगदीशचंद्र माथुर व तरुण राय
जैसे लेखकों के नाटक खेले । 1953 में राजेंद्र शर्मा द्वारा स्थापित
संस्था ‘भारत भारती’ ने 1967 में खेले गए नाटक ‘डाउन ट्रेन’ के लिए
इन्हें द्वितीय जनकीमंगल पुरस्कार प्राप्त हुआ ।
22 दिसंबर 1955 को ‘अनामिका’ की स्थापना के साथ कोलकाता के हिन्दी रंगमंच
ने एक नए युग में प्रवेश किया । श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल, मन्नू
भंडारी व तरुण संघ के उनके अन्य साथियों ने मिलकर इस संस्था का गठन किया
। ‘अनामिका’ द्वारा प्रदर्शित कई नाटकों की अनुगूंज पूरे देश में सुनाई
दी । इस संस्था ने पचास से भी अधिक नाटकों, कई एकांकियों व बाल नाटकों का
मंचन किया । घर और बाहर ( रवींद्रनाथ ठाकुर के बांग्ला उपन्यास ‘घरे-
बाइरे’ का प्रतिभा अग्रवाल कृत नाट्य रूपांतर), आर. जी. आनंद के ‘हम
हिंदुस्तानी हैं’, विनोद रस्तोगी के ‘नया हाथ’, मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का
एक दिन’ व ‘लहरों के राजहंस’ व बादल सरकार के नाटकों के मंचन के लिए
अनामिका को खासी लोकप्रियता हासिल हुई । अधिकांश नाटकों का निर्देशन
श्यामानंद जालान,विमल लाठ और डा. प्रतिभा अग्रवाल ने किया । प्रतिभा
अग्रवाल ने नाटकों के अनुवाद व नाट्य रूपांतर करने की दिशा में अत्यंत
स्थायी महत्व का कार्य किया। 1964 में अनामिका ने एक नाट्य महोत्सव का
आयोजन किया । उसमें देश के मशहूर लेखक, निर्देशकों व नाट्य समीक्षकों ने
शिरकत की और उस अवसर पर आयोजित विचारगोष्ठियों में भाग लिया । इस नाट्य
महोत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने किया था व इसमें
थियेटर यूनिट, बंबई ने ‘अंधा युग’, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने
‘राजा ईडिपस’, अनामिका ने ‘छपते-छपते’, मूनलाइट ने ‘सीता बनवास’ व
‘रामलीला नौटंकी’, श्री आर्ट्स क्लब, दिल्ली ने ‘अंडर सेक्रेटरी’ व श्री
नाट्यम, वाराणसी ने ‘गोदान’ का मंचन किया । इसी वर्ष कृष्णाचार्य के
संपादन में ‘हिन्दी नाट्य साहित्य’ का प्रकाशन हुआ । अनामिका को ‘नाट्य
वार्ता’ नामक रंग पत्रिका के प्रकशन का भी श्रेय जाता है ।
1963 से नाटकों के मंचन में सक्रिय ‘संगीत कला मंदिर’ नामक संस्था ने
विभिन्न भाषाओं में पचास से अधिक प्रस्तुतियां की जिनमें ‘एक प्याला
कॉफी’, ‘मृच्छकटिक’, ‘किसी एक फूल का नाम लो’, ‘एक गुलाम बीबी का’ व ‘एक
और द्रोणाचार्य’ प्रमुख हैं । 1976 में इस संस्था ने मोहन राकेश को उनके
नाटक ‘आधे-अधूरे’ के लिए मरणोपरांत पुरस्कृत किया ।
अदाकार नाट्य दल को भी पचास से अधिक प्रस्तु्तियों का श्रेय है । यह दल
‘भूचाल’,'खामोश अदालत जारी है’ व ‘रिश्ते-नाते’ के उत्कृष्ट मंचन के लिए
जाना जाता है । इसके निर्देशक-अभिनेता कृष्ण कुमार राष्ट्रीय छात्रवृत्ति
पाकर अहींद्र चौधरी से अभिनय का पाठ पढ़ने कोलकाता आए थे । अहींद्र चौधरी
तब रवींद्र भारती में अभिनय कला के प्रोफेसर थे ।
अनामिका में अधिक प्रयोगशील व ‘बोल्ड’ नाटकों के मंचन के लिए वांछित
खुलेपन की गुंजाइश न पाकर श्यामानंद जालान ने 1972 में ‘पदातिक’ की
स्थापना की और ‘गीधाड़े’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों को सफलतापूर्वक
खेला ।
‘पदातिक’ को ब्रेश्ट, मोलियर, इब्सन व सैमुअल बैकेट आदि विदेशी नाटककारों
एवं मोहन राकेश, महा्श्वेता देवी,विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, निर्मल
वर्मा व जीपी देशपांडे जैसे भारतीय लेखकों के नाटकों को मंचित करने का
श्रेय प्राप्त है । पदातिक ‘शुतुरमुर्ग’ ‘एवम इंद्रजीत’, ‘आधे-अधूरे’,
‘पगला घोड़ा’ व ‘सखाराम बाइंडर’ की प्रभावोत्पादक प्रस्तुतियों के लिए
ख्यात है ।
श्यामानंद जालान के अतिरिक्त विजय शर्मा और कुणाल पाथी ने पदातिक के
नाटकों का निर्देशन किया है ।

1976 में रंगकर्मी ने कोलकाता के नाट्य परिदृश्य में ‘एंट्री’ ली और सबसे
सक्रिय नाट्यदल के रूप में उभरकर आया । पिछले पच्चीस वर्षों में उषा
गांगुली जैसे समर्पित रंग व्यक्तित्व और संगठनकर्ता के नेतृत्व में
‘महाभोज’, ‘लोक कथा’, ‘होली’, ‘वामा’, ‘कोर्ट मार्शल’, ‘रूदाली’, ‘खोज’ व
‘बेटी आई’ के प्रदर्शन के साथ यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नाट्य
दल के रूप में सराहा जाता है ।
‘हिम्मत माई’ व ‘शोभा यात्रा’ के मंचन के पश्चात उषा गांगुली ने न केवल
एक समर्थ अभिनेत्री और सफल निर्देशक के रूप में वरन विशिष्ट नाट्य
समालोचक एवं व्याख्याकार के रूप में भी अपने को स्थापित किया है । उषा
गांगुली ने हिन्दी रंगमंच को अधिक जनोन्मुख तो बनाया ही, साथ ही बांग्ला
रंगमंच की गौरवशाली परंपरा से गहरे जुड़े बांग्लाभाषी दर्शकों के बीच भी
हिन्दी नाटकों को प्रतिष्ठा प्रदान की । अभी हाल ही में काशीनाथ सिंह की
सुप्रसिद्ध रचना पर ‘काशीनामा’ और मंटो की कहानियों पर आधारित तीन नाटकों
की श्रंखला के सफल मंचन द्वारा उन्होंने अपनी निर्देशकीय क्षमता को
प्रदर्शित किया है ।
कोलकाता की एक शताब्दी से चली आ रही हिन्दी रंग परंपरा के ध्वजवाहक के
रूप में लगभग एक दर्जन नाट्य दल अपनी सक्रियता से इसे पुष्ट कर रहे हैं ।
महेश जायसवाल ने अपने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से हिन्दीभाषी समाज को जन
संस्कृति के वृहत्तर सरोकारों से जोड़ा है । विपरीत परिस्थितियों में भी
प्रताप जायसवाल ने न केवल अपनी टोली ‘अभिनय’ को बचाए रखा, बल्कि ‘मिस्टर
अभिमन्यु’, ‘रावणलीला’ व ‘दुस्समय’ जैसी कई नाट्य प्रस्तु्तियों के
माध्यम से हस्तक्षेप जारी रखा । स्पंदन, लिटिल थैस्पीयन, रंगकृति,
प्रयास, कला सृजन अकादमी, नीलांबर व कलाकार जैसी रंग संस्थाएं लगातार
अपनी उपस्थिति का अहसास कराती रही हैं ।
सामूहिकता और सृजनात्मकता के लिए यह कठिन समय है । नाटक की तो संरचना ही
सामूहिकता और सृजनात्मकता के पायों पर टिकी है । नाटक के होने का अर्थ है
एकांतिकता और बंजरपन का न होना । एक समर्थ नाट्य आंदोलन जीवंत और गतिशील
समाज की पहचान है ।
जिस भाषा में श्यामानंद जालान, प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली जैसे तपे
हुए नाट्य व्यक्तित्व सक्रिय हों, जिसमें नाट्य शोध संस्थान जैसी
अद्वितीय संस्था का अस्तित्व हो, जिसमें आज भी संसाधनों के अभाव के
बावजूद सामूहिकता के बल पर नाटकों का मंचन संभव हो तो गैरजरूरी हताशा का
कोई कारण दिखाई नहीं देता ।
http://samakaal.wordpress.com/2007/04/ [समकाल से साभार]
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