अमरकंटक

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Rahul Bhosale

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Jul 11, 2016, 10:46:14 AM7/11/16
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नमस्कार,
                         भारतात नद्या पवित्र मानल्या जातात त्या नुसार प्रत्येक नदीला एक उगम स्थान असते त्याला ही पवित्र तीर्थक्षेत्र गणले जाते. मी अशाच एका नदीच्या अज्ञात अकस्मात उगम स्थानी पोहोचलो त्याचे हे वर्णन प्रवास वर्णन म्हणा हवे तर...
                           मी आणि माझा एक मित्र 'आली लहर की केला कहर ' या उक्तीप्रमाणे  मनात आले की पुढे मागे करायचे नाही त्या कार्याला लगेच सुरुवात करवायची. धमाल अनुभव घ्यायचा नोहेंबर 2009 असेल कार्तिक अमावास्या च्या आदल्या रात्री आमच्या दोघांच्या मनात आले आणि जेवण करून आम्ही निघालो रायपूर रेल्वेस्थांनाकाकडे तिकीट काढले रायपूर ते पेंड्रा रोड रात्री 9 वाजता निघालो होतो पहाटे साडे-तीन चार ला पोहोचलो.स्टेशन वर अंधारच होता 10-20 प्रवासी उतरले  वातावरणात खुप थंडी होती कुत्रे केकाटत होते जवळच बस स्टँड होते पण बस सकाळी पाच ला होती बाजूला भिकारी झोपले होते. रिक्षावाले प्रवाशाची मनधरणी करून भाडे घासघिस चालू होती .काही अंतरावर शेकोटी होती दोन माणसे आणि एक कुत्रा शेकोटीभोवती बसले होते आम्हीही दोघे त्याच्यात सामील झालो आणि गप्पाटपाणा सुरुवात झाली तास कसं निघून गेला कळलेच नाही 

                            शिट्टी वाजली पाच वाजले अमरकंटक ला  जाणारी बस लागली होती 35 किमी अंतर होते परिसर अनभिद्न होता रात्रभर झोपलो नवतो बसमध्ये बसलो अन नकळत झोपी गेलो पण ड्राएव्हर ने ब्रेक दाबला अन पुन्हा जागा झालो गाडी धोपट मार्ग सोडून बिकट वाटेला लागली होती मधून मधून कुठे आहे तेही पाहत होतो गार वारा अंगाला झोंबत होता झोप केंव्हाच उडाली होती अर्ध्या घाटमाथ्यावर आलो होतो आकाशात ललिमा पसरत होती सकाळच्या धुंद वातावरणात जंगली फुलांचा सुवासिक सुगंध आसमानतात पसरला होता वळने घेत गाडी घाटावर चढत होती सूर्याचा लालबुंधा गोला दिसला आणि माझे " पसायदान " सुरू झाले दोन मिनिटे झालीत अन गाडी गिरकी घेत होती आणि धुकयात सूर्य अदृश्य झाला डोळ्याला दिसेल ते पाहत साठवत होतो अखेर प्रवास संपला सगळे उतरू लागलो 

                              धुकायमुळे स्वर्गात गेलायचा अनुभव घेत होतो पण खर स्वर्ग पुढेच होता शांत नितळ तलाव होता त्यान छान पांढरी फुले फुलली  होती  तळवतून वफा निघत होत्या  एतक्या कडक्याच्या थंडीत आम्हाला वाटले पण नवते की इथे कोणी फिरयला येईल पण सगळं परीसर पर्यटकाणी भरला होता सहा वाजले होते लोक नर्मदाकुंडकडे स्नानासाठी जात होत गोमुखातून पाणी पडत होते समोर तीन टप्प्यात कुंड पाण्याने भरलेले होते मित्राला विचारले स्नान करणार काय तो थंडीने गारठला होता तो नाही म्हणाला मला थंड  पाण्यात स्नान कराची सवय लहानपणापासून असल्यामुळे मी कडे काढून नर्मदा कुंड मध्ये  पाय ठेवला अन लगेच काढला खूपच  थंड  पाणी होते पण दुसर्‍याच क्षणी हौदात उडी घेतली या काठावरून त्या काठावर दोन तीन फेर्‍या मारल्या शरीरावर काटे आले  होते स्नान करून बाहेर आलो कपडे घातले तोपर्यंत मित्राने मुखमार्जन करून सभोवताली पाणी फिरवून स्नान केले आणि मग त्या स्वर्गाचे नयनसुख घेत बसलो 

                              विदेशी  पर्यटक मोठे कॅमेरा घेवून कुंडात स्नान करणारे भक्तजण साधू यांचे चित्रण करत होते महिला अगदी दोन चार वर्षाच्या बाळकसाहित सनान करत होत्या हे मला अप्रूप वाटत होते की ती बालके ही हसत मजेत थंड स्नान आनंद घेत होती.  त्या दिवशी कार्तिक अमावास्या होती आणि अशा पवित्र तीर्थस्थणी परमेश्वराने मला आज्ञातपणे घेवून आला होता नर्मडकुंडमधील पवित्र स्नान उरकून आम्ही नर्मदा मंदिराकडे गेलो तिथे पाण्यातून जावून दर्शन घेवून उगंस्थान पाहून तीर्थ लाभ घेवून बाहेर आलो तिथे एक नंदी होता त्याखालून जाडजूड महिला पुरुष मंडळी त्या एवल्याषया जागेतून सहज बाहेत निघत होती मी रांगेतून तिथे पोहचलो आणि हा पुण्यवन आत्मा त्या छोट्या जागेतून सहज बाहेर पडला  फोटो जोडलेला आहे

                          आता ऊन वर आले सात वाजून गेले होते नर्मदा इतर मंदिरांचे दर्शन घेवून काठावर थोडा वेळ ध्यानीस्थ झालो बाहेर जावून गरमागरम चहाचा आस्वाद घेतला आणी इतर पर्यटन स्थळांची विचारपूस केली इथे धुनी पानी,  नर्मदाकुंड और मंदिर,  दूधधारा , कलचुरी काल के मंदिर , सोनमुदा , मां की बगिया  कपिलाधारा धबधबा, कबीर चबूतरा  सर्वोदय जैन मंदिर  श्रीज्‍वालेश्‍वर महादेव आहेत शक्य तिथे भेट दिली यामधील सर्वोदय जैन  मदिराचे काम मोठ्या प्रमानवर चालू होते धुध्धारेच्या धबधब्यात पुन्हा एकदा आनंद लुटला. हॉटेल मध्ये येवून जेवन केले तो पर्यन्त दुयपरचे साडेतीन वाजले होते पुन्हा नर्मदा नदीच्या वळवंटात विविध धार्मिक कार्यक्रम चालू होते त्यांचा आस्वाद लुटत चार्ला गाडीमध्ये बसत पेंदररोडकडे रवाना झालो  अधिक माहिती करता माझे काही फोटोग्राफ्स आणि विकिपेडियावरील अहिती सोबत जोडत आहे काळाच्या ओघात अनेक फोटो ग्राफ्स  हरवले पण जे काही होते सोबत जोडत आहे तुम्हीही नक्की अवशी भेट द्या या स्वर्गाला आणि अनुभवा ....... धन्यवाद .....माझे मित्र सुदेश डेकाटे....यांच्यमुळे ही यात्रा घडली आणि श्री पांडुरंग कुंभार  यांच्या प्रेरणेमुळे हे लिहले त्यांचेही धन्यवाद....!!!

 

अमरकंटक नर्मदा नदीसोन नदी और जोहिला नदी का उदगम स्थान है। यह मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित है। यह हिंदुओं का पवित्र स्थल है। मैकाल की पहाडि़यों में स्थित अमरकंटक मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर जिले का लोकप्रिय हिन्‍दू तीर्थस्‍थल है। समुद्र तल से 1065 मीटर ऊंचे इस स्‍थान पर ही मध्‍य भारत के विंध्य और सतपुड़ा की पहाडि़यों का मेल होता है। चारों ओर से टीक और महुआ के पेड़ो से घिरे अमरकंटक से ही नर्मदा और सोन नदी की उत्‍पत्ति होती है। नर्मदा नदी यहां से पश्चिम की तरफ और सोन नदी पूर्व दिशा में बहती है। यहां के खूबसूरत झरने, पवित्र तालाब, ऊंची पहाडि़यों और शांत वातावरण सैलानियों को मंत्रमुग्‍ध कर देते हैं। प्रकृति प्रेमी और धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को यह स्‍थान काफी पसंद आता है। अमरकंटक का बहुत सी परंपराओं और किवदंतियों से संबंध रहा है। कहा जाता है कि भगवान शिव की पुत्री नर्मदा जीवनदायिनी नदी रूप में यहां से बहती है। माता नर्मदा को समर्पित यहां अनेक मंदिर बने हुए हैं, जिन्‍हें दुर्गा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। अमरकंटक बहुत से आयुर्वेदिक पौधों मे लिए भी प्रसिद्ध है‍, जिन्‍हें किंवदंतियों के अनुसार जीवनदायी गुणों से भरपूर माना जाता है।

मुख्य आकर्षण[संपादित करें]

धुनी पानी[संपादित करें]

अमरकंटक का यह गर्म पानी का झरना है। कहा जाता है कि यह झरना औषधीय गुणों से संपन्‍न है और इसमें स्‍नान करने शरीर के असाध्‍य रोग ठीक हो जाते हैं। दूर-दूर से लोग इस झरने के पवित्र पानी में स्‍नान करने के उद्देश्‍य से आते हैं, ताकि उनके तमाम दुखों का निवारण हो ॐ।

नर्मदाकुंड और मंदिर[संपादित करें]

नर्मदा कुण्ड और मंदिर, नर्मदा नदी का उद्गम यहीं है

नर्मदाकुंड नर्मदा नदी का उदगम स्‍थल है। इसके चारों ओर अनेक मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों में नर्मदा और शिव मंदिर, कार्तिकेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर, अन्‍नपूर्णा मंदिर, गुरू गोरखनाथ मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, वंगेश्‍वर महादेव मंदिर, दुर्गा मंदिर, शिव परिवार, सिद्धेश्‍वर महादेव मंदिर, श्रीराधा कृष्‍ण मंदिर और ग्‍यारह रूद्र मंदिर आदि प्रमुख हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव और उनकी पुत्री नर्मदा यहां निवास करते थे। माना जाता है कि नर्मदा उदगम की उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है, इसीलिए शिव को जटाशंकर कहा जाता है।

दूधधारा[संपादित करें]

अमरकंटक में दूधधारा नाम का यह झरना काफी लो‍कप्रिय है। ऊंचाई से गिरते इसे झरने का जल दूध के समान प्रतीत होता है इसीलिए इसे दूधधारा के नाम से जाना जाता है।

कलचुरी काल के मंदिर[संपादित करें]

नर्मदाकुंड के दक्षिण में कलचुरी काल के प्राचीन मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों को कलचुरी महाराजा कामदेव ने 1042-1072 के दौरान बनवाया था। मछेन्‍द्रथान और पटालेश्‍वर मंदिर इस काल मंदिर निर्माण कला के बेहतरीन उदाहरण हैं।

सोनमुदा[संपादित करें]

सोनमुदा सोन नदी का उदगम स्‍थल है। यहां से घाटी और जंगल से ढ़की पहाडियों के सुंदर दृश्‍य देखे जा सकते हैं। सोनमुदा नर्मदाकुंड से 1.5 किमी. की दूरी पर मैकाल पहाडि़यों के किनारे पर है। सोन नदी 100 फीट ऊंची पहाड़ी से एक झरने के रूप में यहां से गिरती है। सोन नदी की सुनहरी रेत के कारण ही इस नदी को सोन कहा जाता है।

मां की बगिया[संपादित करें]

मां की बगिया माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी-भरी बगिया से स्‍थान से शिव की पुत्री नर्मदा पुष्‍पों को चुनती थी। यहां प्राकृतिक रूप से आम, केले और अन्‍य बहुत से फलों के पेड़ उगे हुए हैं। साथ ही गुलबाकावली और गुलाब के सुंदर पौधे यहां की सुंदरता में बढोतरी करती हैं। यह बगिया नर्मदाकुंड से एक किमी. की दूरी पर है।

कपिलाधारा[संपादित करें]

लगभग 100 फीट की ऊंचाई से गिरने वाला कपिलाधारा झरना बहुत सुंदर और लोकप्रिय है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि कपिल मुनी यहां रहते थे। घने जंगलों, पर्वतों और प्रकृति के सुंदर नजारे यहां से देखे जा सकते हैं। माना जाता है कि कपिल मुनी ने सांख्‍य दर्शन की रचना इसी स्‍थान पर की थी। कपिलाधारा के निकट की कपिलेश्‍वर मंदिर भी बना हुआ है। कपिलाधारा के आसपास अनेक गुफाएं है जहां साधु संत ध्‍यानमग्‍न मुद्रा में देखे जा सकते हैं।

कबीर चबूतरा[संपादित करें]

स्‍थानीय निवासियों और कबीरपंथियों के लिए कबीर चबूतरे का बहुत महत्‍व है। कहा जाता है कि संत कबीर ने कई वर्षों तक इसी चबूतरे पर ध्‍यान लगाया था। कहा जाता है कि इसी स्‍थान पर भक्त कबीर जी और सिक्खों के पहले गुरु श्री गुरु नानकदेव जी मिलते थे। उन्होंने यहां अध्‍यात्‍म व धर्म की बातों के साथ मानव कल्‍याण पर चर्चाएं की। कबीर चबूतरे के निकट ही कबीर झरना भी है। मध्‍य प्रदेश के अनूपपुर और डिंडोरी जिले के साथ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली की सीमाएं यहां मिलती हैं।

सर्वोदय जैन मंदिर[संपादित करें]

यह मंदिर भारत के अद्वितीय मंदिरों में अपना स्‍थान रखता है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में स्‍थापित मूर्ति का वजन 24 टन के करीब है।

श्रीज्‍वालेश्‍वर महादेव[संपादित करें]

श्रीज्‍वालेश्‍वर मंदिर अमरकंटक से 8 किमी. दूर शहडोल रोड पर स्थित है। यह खूबसूरत मंदिर भगवान शिव का समर्पित है। यहीं से अमरकंटक की तीसरी जोहिला नदी की उत्‍पत्ति होती है। विन्‍ध्‍य वैभव के अनुसार भगवान शिव ने यहां स्‍वयं अपने हाथों से शिवलिंग स्‍थापित किया था और मैकाल की पह‍ाडि़यों में असंख्‍य शिवलिंग के रूप में बिखर गए थे। पुराणों में इस स्‍थान को महा रूद्र मेरू कहा गया है। माना जाता है कि भगवान शिव अपनी पत्‍नी पार्वती से साथ इस रमणीय स्‍थान पर निवास करते थे। मंदिर के निकट की सनसेट प्‍वाइंट है।

अमरकंटक की औषधीय वनस्पतियाँ

गम्यता[संपादित करें]

वायु मार्ग- अमरकंटक का निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर में है, जो लगभग 245 किमी.की दूरी पर है।
रेल मार्ग- पेंड्रा रोड अमरकंटक का नजदीकी रेलवे स्‍टेशन है जो लगभग 35 किमी. दूर है। सुविधा के लिहाज से अनूपपुर रेलवे स्‍टेशन अधिक बेहतर है जो अमरकंटक से 72 किमी. दूर है।
सड़क मार्ग- अमरकंटक मध्‍य प्रदेश और निकटवर्ती शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। पेंड्रा रोड, बिलासपुर और शहडोल से यहां के लिए नियमित बसों की व्‍यवस्‍था है।

RAHUL BHOSALE 
UTKARSHA ELECTRONICS & ENERGY ENTERPRISE


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