आज का परिचय,विचार एवं आज के शब्द

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Anil Tripathi

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Apr 2, 2012, 3:44:17 AM4/2/12
to राजभाषा विभाग RajbhashaVibhag - भाषायी कंप्यूटरीकरण, rajbhashaan...@yahoo.com
आज 2 अप्रैल
परिचय एवं सुविचार
केनेथ टायनन
(जन्म: 2 अप्रैल,1927- मृत्यु: 26 जुलाई,1980)
प्रसिद्ध आलोचक केनेथ टायनन का जन्म आज ही के दिन 2 अप्रैल,1927 को
बर्मिंघम में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा किंग एडवर्ड स्कूल से पूर्ण
की। ततप श्चात उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मैगडलेन कॉलेज से
अंग्रेजी विषय में बी.ए. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी ब्रिटिश थियेटर
आलोचक के रूप में ख्याति रही है।
आज हम उनकी जयंती पर उन्हीं के एक विचार का मनन करते हैं।
आज का सुविचार
“आलोचक ऐसा व्यक्ति है जो रास्ता तो जानता है, लेकिन कार चलाना नहीं
जानता।”
“A critic is a man who knows the way but can't drive the car.”

आज के शब्द
Critic – समालोचक, आलोचक, टीकाकार, समीक्षक (संज्ञा)
Condemn - निंदा (प्रशासनिक शब्दावली)

*** राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी नागपुर ***

Anil Tripathi

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Apr 9, 2012, 2:31:01 AM4/9/12
to राजभाषा विभाग RajbhashaVibhag - भाषायी कंप्यूटरीकरण
आज 9 अप्रैल

परिचय एवं सुविचार
महापंडित राहुल सांकृत्यायन
(जन्म- 9 अप्रैल, 1893 - मृत्यु- 14 अप्रैल, 1963)
राहुल सांकृत्यायन को महापंडित की उपाधि दी जाती है वे हिन्दी के एक
प्रमुख साहित्यकार माने जाते हैं । वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा
विश्व-दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान दिया । उन्हें
हिंदी यात्रासहित्य का पितामह भी कहा जाता है। बौद्ध धर्म पर उनका शोध
हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने
तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था । इसके अलावा उन्होंने मध्य-
एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से
बहुत महत्वपूर्ण हैं ।
21 वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को
एक ‘ग्लोबल विलेज’ में परिवर्तित कर दिया हो एवं इण्टरनेट द्वारा ज्ञान
का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक से आपके सामने उपलब्ध होता हो, ऐसे
में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों
मील दूर पहाड़ों व नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों
पर लादकर अपने देश में लाए, बहुत ही रोमांचक प्रतीत होता है। पर ऐसे ही
थे भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति
के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान् पुरूष
राहुल सांकृत्यायन।
राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूलमंत्र ही घुमक्कड़ी अर्थात गतिशीलता रही
है। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहीं वरन् धर्म था। आधुनिक हिन्दी साहित्य
में राहुल सांकृत्यायन एक यात्राकार, इतिहासविद्, तत्वान्वेषी,
युगपरिवर्तनकारी साहित्यकार माने जाते हैं।
राहुल सांकृत्यायन का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गाँव
में आज ही के दिन 9 अप्रैल 1893 को हुआ था। उनके बाल्यकाल का नाम
केदारनाथ पाण्डेय था। उनके पिता गोवर्धन पाण्डेय धार्मिक विचारों वाले
किसान थे। उनकी माता कुलवंती अपने माता-पिता की अकेली पुत्री थीं। दीप
चंद पाठक कुलवंती के छोटे भाई थे। वह अपने माता-पिता के साथ रहती थीं।
बचपन में ही इनकी माता का देहांत हो जाने के कारण इनका लालन-पालन इनके
नाना श्री राम शरण पाठक और नानी ने किया था। 1898 में इन्हे प्राथमिक
शिक्षा हेतु गाँव के ही एक मदरसे में भेजा गया था। तत्कालीन बालविवाह की
परंपरा के अनुसार राहुल जी का विवाह बचपन में कर दिया गया था। यह विवाह
राहुल जी के जीवन की एक संक्रान्तिक घटना थी। जिसके विरोध स्वरूप राहुल
जी ने किशोरावस्था में ही घर त्याग दिया था। घर से भाग कर वे एक मठ में
साधु हो गए। लेकिन अपनी यायावरी स्वभाव के कारण वे वहा भी टिक नही सके।
चौदह वर्ष की अवस्था में वे कलकत्ता आ गए। उनके मन में ज्ञान प्राप्त
करने के प्रति गहरी चाहत थी। इसे पाने के लिए उन्होंने संपूर्ण भारत का
भ्रमण किया।
राहुल जी का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की एक यात्रा थी ऐसा मानना
अतिशोक्ति नहीं होगी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा व बोलियों को सीखा और
इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज व साहित्य का
गूढ़ अध्ययन किया। और अपनी रचानाओं के माध्यम से पाठकों के समक्ष
प्रस्तुत किया। राहुल सांकृत्यायन जी उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन
के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमण
के दौर से गुजर रही थी। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काग्रेस अभी
शैशवावस्था में ही थी। इन सब से राहुल जी काफी प्रभावित हुए एवं अपनी
जिज्ञासु व घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी
सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी व किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से
लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् 1930 में श्रीलंका
जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तब से ही वे ‘रामोदर साधु’
से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी
अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने
उन्हें महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से
महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् 1937 में रूस के लेनिनग्राद में
एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान
ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक
पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास,
निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण व जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन
किया परन्तु उन्होंने अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल
तथ्यान्वेषी व जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों
का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान संस्कृत-
ग्रन्थों, तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों का तो लाहौर यात्रा के
दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म-ग्रन्थों का भी अध्ययन किया।
निश्चितत: राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष,
विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवं दर्शन
के विभिन्न हिस्सों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता अपितु इसे समग्रतः ही
देखना उचित होगा।
राहुल जी ने अपने जीवन काल में अनेक बार विदेश यात्राएं की जिनमें 1932
में यूरोप की यात्रा, तत्‍पश्चात 1935 में जापान, कोरिया, मंचूरिया की भी
यात्रा की। 1937 में मास्को की यात्रा की और वहीं विवाह करने के पश्चात
वहीं रहने लगे। लेकिन किसी कारण से वे 1948 में पुन: भारत लौट आए।
राहुल जी को हिन्दी और हिमालय से बड़ा प्रेम था। वे 1950 में नैनीताल में
अपना आवास बना कर रहने लगे। यहाँ पर उनका विवाह कमला सांकृत्यायन से हुआ।
इसके कुछ बर्षो बाद वे दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में जाकर रहने
लगे ,लेकिन बाद में उन्हें मधुमेह से पीड़ित होने के कारण रूस में इलाज
कराने के लिए भेजा गया। 1963 में सोवियत रूस में लगभग सात महीनो के इलाज
के बावजूद भी उनका स्वास्थ्य ठीक नही हो सका और अंतत: 14 अप्रैल, 1963
को दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में इस महान साहित्यकार का देहांत हो गया।
राहुल जी ने अपने जीवन में जिन काव्य पंक्तियों से प्रेरणा ली आज हम
उन्हीं का पठन करते हैं।

आज का सुविचार
“सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ, जिंदगानी गर रही तो,
नौजवानी फिर कहाँ ?”

आज के शब्द
Intuition – अंतर्ज्ञान, आभास पा लेने की क्रिया, अंतर्दृष्टि (संज्ञा)
कार्यनीति – Strategy (प्रशासनिक शब्दावली)

*

Anil Tripathi

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Apr 10, 2012, 4:04:27 AM4/10/12
to राजभाषा विभाग RajbhashaVibhag - भाषायी कंप्यूटरीकरण
आज 10 अप्रैल

मोरारजी देसाई / Morarji Desai
(जन्म: 29 फरवरी,1896, मृत्यु :10 अप्रैल,1995)
मोराजी देसाई का जन्म 29 फरवरी वर्ष 1896 को गुजरात के वलसाड जिले के एक
छोटे से गाँव भदेली में हुआ था| उनके पिता का नाम रणछोड़ भाई देसाई
भावनगर के रहने वाले थे| वे पेशे से स्कूल में हैंडमास्टर थे| मोरारजी की
शुरूआती पढ़ाई गुजरात में हुई उन्होंने 1912 में वालसाड के बाई अवाबाई
हाईस्कूल से दसवी की परीक्षा पास की और इसके बाद उन्होंने बम्बई के
विल्सन कॉलेज में दाखिला लिया| यहाँ से उन्होंने इंटरमिडीएट की परीक्षा
पास की और 1917 में उन्होंने विज्ञान के विषयों के साथ बी. ए किया| इसके
बाद उन्होंने 1918 में सिविल सेवा की परीक्षा पास की और अहमदाबाद के
डिप्टी कलेक्टर बने| इसके बाद उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और काग्रेस के
सदस्य बन कर स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े| मोरारजी देसाई का गांधी जी
के सिद्धांतों में अटूट विश्वास था| उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन जीया| वे
1937 में बम्बई राज्य के गृहमंत्री बने और इसके बाद वर्ष 1946 में वे
मुंबई के मुख्यमंत्री भी बने इसके बाद वे राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय
राजनीति में आये और वर्ष 1957 में वे केन्द्रीय मंत्री मंडल में
वितमंत्री बने और वर्ष 1967 में वे भारत के उप प्रधानमंत्री बनने के साथ
वित्त मंत्री का पद भी संभालते रहे| 1969 में जब इंदिरा जी ने वित विभाग
अपने पास वापस ले लिया तो मोरारजी ने उप प्रधानमंत्री का पद त्याग दिया|
इसी वर्ष कांग्रस पार्टी दो फाड़ हो गई| मोरारजी अपने गुट के नेता चुने
गये और वे विपक्ष में बैठने लगे| जो विपक्षी प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी
के त्याग पत्र की मांग कर रहे थे उनमे मोरारजी प्रमुख थे| लेकिन इंदिरा
जी ने तत्कालीन राष्टपति की सहमति से इमरजंसी लागू कर दी| इमरजेंसी लगते
ही मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जार्ज
फर्नांडिस जैसे कई नेता में जेल बंद हुए|
परिणामस्वरूप 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी हार का
सामना करना पड़ा| चार दलों ने मिलकर कांग्रेस के विकल्प के रूप में जनता
पार्टी का गठन किया और 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई भारत के चौथे
प्रधानमन्त्री बने|
उन्हें अपनी गांधीवादी जीवन शैली, निभ्रीकता, स्पष्टवादिता और पशुओं
प्रति सहृदयता के लिए जाने जाते हैं। उनकी देश सेवा के लिए 1991 में
'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया| मोरारजी देसाई का 99 वर्ष की अवस्था
में आज ही के दिन 10 अप्रैल 1995 को निधन हो गया| इस अवसर पर आज हम


उन्हीं के एक विचार का मनन करते हैं।

आज का विचार
“जब तक मनुष्य जानवरों का भक्षण करता रहेगा तब तक पशुओं के प्रति
क्रूरता कैसे खत्म हो सकती है?”

“As long as man eats animals how can cruelty to animals be removed.”
-----------०००----------
आज के शब्द
Cruelty – नृशंसता, निर्दयता, हिंसा, निष्ठुरता, क्रूरता, दयाहीनता
(संज्ञा)
धमकाना - Threaten (प्रशासनिक शब्दावली)

विक्रम सिंह

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Apr 10, 2012, 1:38:47 PM4/10/12
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