Fwd: उन्माद

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seema seksy

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Aug 21, 2010, 3:24:28 AM8/21/10
to anubansal69, meenumalhotra0, rameshkumar agarwal, neelu awasthi_gurgaon_23_rent, darpan sharma, guddiya.saxena, Student Gr, ilovesonia23, javed attar, Ajit Kumar, lukky32, mosa104, neha.tomar0783, pinkbaloons34, anu priya@@@, raj4mistress, stories2010, stories20100, swati_34-F_Jodhpur, seksyseema2010, ramasrey yadav, zeeshan_9mm, zafar353, stori...@yahoo.com, lakshm...@gmail.com, apka...@yahoo.co.in, khushis...@gmail.com, lovel...@rediffmail.com
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From: guddiya <guddiya...@gmail.com>
Date: Wed, 16 Dec 2009 21:59:44 -0800 (PST)
Subject: उन्माद
To: kamsin stories <kamsin-...@googlegroups.com>

उन्माद

उन्माद की कोई सीमा नहीं होती वो तो कोई भी हद पार कर सकता है, किसी भी
गगन चूमती इमारत को एक ही पल मे पार कर सकता है और दुसरे ही पल पूरे आकाश
को. ये तो बिलकुल उस नगर वधु की तरह है जिसकी कोई जात नहीं होती, कोई
धर्म नहीं होता, जो सदा किसी एक की होकर नहीं रहती और जब टूटती बिखरती है
तो कोई उसका नहीं होता और वो अकेले ही सुबक सुबक कर अपने ही घुटनों में
मुह छुपाये अपना दम तोड़ देती है. कमोबेश यही हाल मन मे उठती उमंगो का भी
है, उम्र कोई भी क्यों न हो उमंग के पंख दूर लम्बी होती परर्चाईओं मे भी
अपना साया डूंड ही लेते हैं.


सूरज अभी पूरी तरह ढला नहीं था, हलकी धूप मे दूर होती पर्र्चाईयाँ और
लम्बी होती जा रही थीं. रेगिस्तान की रेत पर चार नंगे पाओं धीमे धीमे
हाथों मे हाथ डाले टहल रहे थे, कभी एक दुसरे की मासूम आँखों मे आंखे डाले
तो कभी एक दुसरे की बाँहों मे बाहें डाले किसी कुशल प्रेमी की तरह बढते
जा रहे थे. दूर रेत के टीले पर बैठी वो छ्र्रहहरे बदन की कमसिन हसीना बस
एक टक उनको ही देखती जा रही थी. उनकी लम्बी होती पर्र्चाईयाँ जब एक होकर
डूबते सूरज को मुह चिदाती तो उसका बदन मे सिरहन दौड़ जाती, उसका तन बदन
कामुकता की अग्नि मे जलने लगता और अपने अकेले होने के एहसास को वो अपने
ही अख्श मे तलाशने लगती. मन कल्पना की किसी उड़ान मे खो जाता और बड़ी बड़ी
हिरनी सी आँखें अपने ही गदराये शारीर को ललचाई नजरो से देखती रहतीं. जैसे
जैसे सूरज सागर मे डूबता गया उसका अल्हड मन भी 'काम' के समुन्दर में गोते
लगाने लगा, कल्पना की उड़ान और ऊँची उठने लगी. वो अपने दोनों पैरो को
फैलाये कभी अपने यौवन को निहारती तो कभी, उन दूर अपनी धुन मे जाते उन
नंगे पैरों को, जैसे अपने गदराये बदन के साथ उनसे किसी लता की तरह लिपट
जाना चाहती हो.

बला की खूबसूरत थी वो, उसकी छोटी सी चोली से लगभग आधे बाहर झांकते उरोजों
पर नन्ही नन्ही चुस्नियाँ बड़ी ही मनमोहक लग रही थीं, कटावदार कमर के
बीचों बीच पेट पर नाभि का वो छेद ऐसे लग रहा था जैसे दूध सा सफ़ेद खिला
हुआ कमल किसी खूबसूरत तराशे हुए सरोवर मे तैर रहा हो. घगरा फैली हुई
टांगो पर घुटनों तक उठ आया था जिसमे से उसकी मादक गोरी टांगों के बीच जघन
पर उग आये काले रेशमी बाल उस धुन्धल्की शाम मे भी साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे
थे, और कुछ तो साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा था पर हाँ बालों के पीछे छुपे धारदार
कटाव का निचला हिस्सा अपने खजाने मे अनमोल रतन छिपे होने का एहसास जरुर
करवा रहा था जिसकी एक झलक पाने के लिए कोई भी राजा अपना राज्य लुटा सकता
था. पर वो बला की खूबसूरत बाला इन सबसे बेखबर एकटक देख रही थी तो बस उन
लम्बी होती परर्चाईओं को जो अलग होकर भी एक ही प्रतीत होती थीं, उन नंगे
पाओं को जो उसकी उमंग से कहीं धीरे चल रहे थे. वो तो उड़ रही थी उस आकाश
मे जहाँ सूरज लगभा डूब ही चूका था.


शायद अब वो कुछ भी नहीं देख पा रही थी. उसके अंगो का कसाव किसी सुखी टहनी
सा और भी अकड़ गया था. उसे लग रहा था जैसे वो चार नंगे पाओं अँधेरे मे
नहीं एक दूसरे मे समां गए हों, उन्हें शाम के धुंधलके ने नहीं यौवन की
गहराईओं ने निगल लिया हो. अनमने मन से वो रेत के उस टीले से उठ गयी, उसकी
गोरी गोरी मदहोश कर देने वाली टांगो को एक झटके से घगरे ने अपने आगोश मे
छुपा लिया. चोली से झांकते स्तनों को चोली खा गयी और फैले हुए मस्त
मनमोहक नितम्ब सिमट कर अँधेरे को मुंह चिडाने लगे. वो धीरे धीरे रेत के
टीले से नीचे उतर आई और एक ठंडी सी आह भरकर बेहोश कर देने वाली
अंगड़ाई,ली, उसका गोरा बदन हवा मे ऐसे लहराने लगा जैसे कोई बेल किसी पेड़
पर चढ़ कर आकाश को छू लेना चाहती हो.

और एक बार फिर गोरा बदन अँधेरे मे अँधेरे से आलिंगन करने लगा. चोली ने
अपनी हमजोली का साथ छोड़ दिया, अँधेरा सकपका गया, कोई उसको दो छोटी छोटी
आँखों से घूर जो रहा था. वो यूँही हाथों को ऊपर उठाये अपने कमसिन बदन को
हवा मे झुलाती लहराती रही और उसके दो गोरे गोरे मदमस्त उरोजों से छोटी
छोटी चूचीयां अँधेरे को मुह चिडाती रहीं. लचीली कमर हवा मे बल खाती रही,
घगरे से झांकते नंगे पाओं रेत को थपथपाते रहे. लगता था जैसे कोई अप्सरा
अँधेरे का श्रृंगार कर पृथ्वी लोक पर उतर आई हो. वो यहीं नहीं रुकी, उन
नंगे पाओं की थाप तो जैसे उसके दिल मे नश्तर बन कर चुभ रही थी, जैसे उसके
दिल मे उसने अपना घर बना लिया था. जैसे उनके पैरो से उड़ती रेत को उसने
अपनी मुट्ठी मे कैद कर लेने की कसम खा रक्खी थी . वो अपने ही कोमल
हथेलिओं से स्तनों पर अकड़ गयी चूचियों को हलके हलके मसलने लगी. वो अंगो
से खिलवाड़ करती रही और अँधेरा आंखे झुकाए अपनी धुंधली मैली चादर से उसे
ढापने की नाकाम कोशिश करते करते हार गया, वो जीत गई, चोली से बहार निकल
आये नशीली गोलाइओ मे अँधेरा भी उसकी मस्ती मे उसी के साथ मस्त हो गया.

उन्माद अपने शबाब पर था और इतराती बलखाती वो बाला अपनी उमंग मे, जवानी
हिचकोले खा रही थी, उसने अपनी हतेलिएओं को और नीचे सरक जाने दिया, अपनी
कामुक पतली कमर तक, और एक ऊँगली से नाभि को टटोलने लगी जैसे यहीं कहीं खो
गए हों वो नंगे पाओं और उनकी एक होती परच्चाइया. मन बड़ा ही चंचल होता
है, एक बार जो ठान ले उसे पाने की धुन मे बड़े से बड़े पहाड़ को भी चुटकी
मे लाँघ जाता है. उसकी हाथों की हथेलिया भी नहीं रुकी, नाभि से सरकते
सरकते घगरे मे कहीं गुम हो गईं. एक हाथ से अपने उरोजों को कभी खींचती कभी
सहलाती दुसरे से अपने जघन पर उग आये घने काले रेशमी बालों से खिलवाड़
करती रही. वो रती का रूप कामदेव को भी रिझा रही थी. न जाने कब घगरे ने
उसका दामन छोड़ दिया, वो कमर से नीचे तक एकदम नंगी अपनी झांगो के बीच
हथेलिओयों मे लेकर रस से सराबोर लपलपाती गुलाब सी कोमल दो पन्खरिओं को
निहारती रही और झुक झुक कर अपना ही रस पीने को बार बार स्तनों मे उग आई
चूसनी को होठों से चबाती रही चूसती रही. तैरती हवा मे रेत के कण उसका
आलिंगन करने लगे. अँधेरा चुपचाप उसके नितम्बो से लिपट गया और बेहोश कर
देने वाली चूतरों के कटाव मे फिर कहीं गुम हो गया. बस शेष कुछ रह गया तो
खासे उभरे हुए गोरे गोरे नितम्बो की मादक गोलाईया और उससे चिपटे उससे
अठेखेलिया करते रेत के कुछ कण. उसके फडफडाते गुलाबी होंठ अपनी ही चूसनी
को निगल गए, उसकी हथेलिया अपनी ही जवानी को टटोलती रही. टाँगे धीरे धीरे
और फैलती गईं, झांगो की मांसपेशिया सिमटने सिकुड़ने लगीं, वो बला की बाला
बल खाती रही और उँगलियाँ धीरे धीरे यौवन की हर दहलीज़ पार करती गईं.
अँधेरा अधखुली आँखों से उसके तराशे हुए रमणीय बदन का अवलोकन करता रहा और
वो खुबसूरत यौवना यौवन की मस्ती मे वासना के समुन्दर मे डूबती चली गयी.
हाथों ने धीरे से चोली की चमचमाती रेशमी डोरी खोल दी और उन्गलिओं ने उसे
रेत पर गिर जाने दिया. अँधेरा नंगे आसमान के नीचे नंगी खड़ी यौवना का गोरा
बदन छुपा नहीं पाया, रेत के कण उसके अंग अंग पर अपना दम तोड़ते रहे और
कामुकता की वो देवी अपने ख़ूबसूरत बदन को निहारती उसपर इतराती रही. जवानी
का संयम टूटने लगा, 'काम' के आवेग मे उसके पैर लड़खडाने लगे, भुर के खुली
पाटों से निकलती आग मे सारा बदन जलने लगा, नितम्ब आगे पीछे सरकने लगे और
हथेलियाँ योनी को पीछे धकलने लगीं, गदराई मांसल झांगे फैलने सिकुड़ने
लगी, रेशमी बालों का फैला समुन्दर सिमट कर स्याह काले फूलों का खुबसूरत
गुलदस्ता बन गया, नितम्ब आगे पीछे होते रहे, हथेली झांगो के बीच फूले
फूले हलके गुलाबी चीड के रौंदने लगी, गीली हो आई जीभ चुचियों को चाटती
रही और फिर ...... फिर ..... पहले एक और फिर दो उँगलियाँ योनी के अन्दर
अपना रास्ता बनाती चली गईं. इधर सांसो की रफ्तार बड़ने लगी तो उधर
उन्गलिओं की. कमर लचकती रही, चूतड हवा मैं अन्दर बहार झूला झूलते रहे.
उंगलिया एक ही लय सुर ताल मे घर्षण का संगीत बजाती रहीं और कभी फैलती कभी
सिकुड़ती भुर की गीली दीवारें उन्हें जोर जोर से दबाती रहीं जैसे कोई
कोल्हू का बैल मशीन मे पीस पीस कर गन्ने का सारा रस निचोड़ लेना चाहता
हो. और फिर....... फिर ..... वही हुआ जो होता आया है.... एक हलके शोर के
साथ उँगलियाँ पूरी तरह भींग गईं...... सोमरस से भी मोहक रस सर्रर्र
सर्रर्र करके खरबूजे की दो फांको से बहार जघन और झांगो पर रिसने लगा,
निचले रेशमी बालों मे चिपचिपाती सफेदी किसी पर्वत श्रृंखला पर बर्फ की
सफ़ेद चादर सी फ़ैल गई..... नितम्बो की गोलाई सिकुड़ने लगी और बल खाती
लचकती कमर अँधेरे मे कहीं गुम हो गयी...... जवानी के उन्माद ने अकेले ही
हाँ बिलकुल अकेले ही रेत पर चलते उन नंगे पाओं को अपने मे समेट लिया था.
निढाल सी वो अप्सरा, वहां वैसे ही बिलकुल नंगी अपने मुह को अपने घुटनों
मे छुपाये तब तक बैठी रही...............

....... जब तक छोटे छोटे चार नन्हे हाथों ने उसे आकर नहीं झकझोरा, ये
उन्ही नंगे पाओं वाले दो बच्चों के हाथ थे जिनको रेत पर चलता देख इस
सुंदरी के उन्माद ने अपनी सारी सीमाए तोड़ आकाश की उचाइयों से टकराकर अपना
सर फोड़ लिया था और उमंग ने दो मासूम बच्चों की एक होती परछईओं को देखकर
उस ठंडे रेतीले टीले पर भी सारे तन बदन को आग की लपटों मे झुलसा दिया
था...... जिसने अफ़सोस.........आखिरकार घुटनों मे ही मुह छुपाये अपना दम
तोड़ दिया था.

--
as u need,

seksyseema / sonia
36dd_27_36 (rounded boobz).

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