पिघलता लोहा
पैर कांप रहे थे, हाथ धीरे धीरे जैसे कुछ टटोल रहे थे, रात अधिक नही बीती
थी, चाँद की हलकी रोशनी मे नहाया एक बूडा कांपता शरीर कुछ भयभीत सा, मानो
पकडे जाने का डर हो, ..... !!!...... सामने वाले घर की बाहर की ओर खुलने
वाली खिड़की को, जो न तो पूरी तरह से खुली ही हुई थी और न ही पूरी तरह से
बंद ही, को खोलने की कोशिश कर रहा था बिना किसी आहट के, बिना कोई शोर
किये.
क्यों इतनी मशक्कत और कोशिश कर रहा है ये बूडा आदमी, आखिर करना क्या
चाहता है वो, चोरी या फिर अन्दर झाँक कर कुछ देखने की कोशिश, कहीं ऐसा तो
नही मै ही गलत समझ रहा हूँ वो खिड़की को खोलने की नही उसे बंद करने की
कोशिस कर रहा हो. इसके पहले की मै इस पहेली को सुलझा पाता उसके कांपते
हाथों ने खिड़की को पूरी तरह से खोल दिया. उस मटमैली रात मे भी उसके
चेहरे पर पड़ी झुर्रियों के बीच जीत की आड़ी तिरछी लकीरें साफ़ साफ़ दिखाई दे
रही थीं ...... चेहरे पर अन्दर तक धंस गयी आँखों मे डर के साथ साथ ख़ुशी
की चमक मै बिलकुल साफ़ साफ़ देख पा रहा था. वो बहुत खुश था ...... हाँ बहुत
ही खुश......चेहरे पर पड़ी डर की काली काली रेखाएं अब धीरे धीरे उत्तेजना
मे हलकी गुलाबी पड़ने लगी थीं. मै उत्सुक था ये जानने के लिए की आखिर क्या
मिल गया है इस बुडापे मे इस बूडे आदमी को खिड़की के खुले पाटों के उस पार
जो ये भय, लोकलाज और मर्यादा की सारी सीमायें तोड़ कर भी किसी नन्हे बालक
सा इतरा रहा था. कौन सा खजाना मिल गया था इसे जो ये बुडापे की दहलीज़ पार
कर उलटे पाँव जवानी के पाले मे आ खडा हुआ था.
और जब मैने खुली खिड़की के पाटों के उस पार देखा तो मुस्कुराये बिना नही
रह सका. कारण समझने मे देर नही लगी क्यों उस बूडे की आतुर आँखों मे डर की
काली परछाइयों की जगह रोशनी की चमकती किरणे चमक रही थीं. क्यों बुडापे मे
जवानी ने उसके लगभग जीर्ण शीर्ण शरीर पर फिर अपनी दस्तक दे दी थी. मेरी
नज़र सीधी उस बिस्तरे पर चली गयी जो ठीक खिड़की के सामने चूँ चीं
चीईन्न्न्न के हलके शोर के साथ धीमे धीमे झूल रहा था मानो कोई बहुत ही
हल्का सा भूचाल आ गया हो. चाँद की हलकी रोशनी मे भी बिस्तर पर मैली सी
चादर साफ़ दिखाई दे रही थी. ये अनुमान आसानी से लगाया जा सकता था की कोई
युगल प्रेमी, प्रेम के सागर मे डूबा, प्रेम के अंतिम पायेदान पर खड़ा
प्रेम का रसपान कर रहा था. बिस्तरे पर हलकी पड़ी सिलवटे साफ़ साफ़ बता रही
थीं कि उन दो अर्ध नग्न युवा प्रेमिओं को कोई जल्दी नही थी और "सिल"
"बट्टे" का पूरे बदन मे सिरहन पैदा कर देने वाला ये खेल अभी शीघ्र समाप्त
होने वाला नही था.
मेरे अंगो का कसाव भी बड़ने लगा और जिज्ञासा भी, जैसे जैसे उन दो युवा
प्रेमिओं के एक एक करके बदन से कपडे अलग होते गए वैसे वैसे बूडे कि आँखों
कि चमक भी बढती गयी. मै भी उसी ओर हो लिया जैसे किसी चोर से उसकी चोरी मे
अपना हिस्सा लेने जा रहा हूँ..... मगर नही....... मेरे तो अंग अंग फड़क
रहे थे उस युगल प्रेमी कि काम क्रीडा का हर वो पल जी लेने को जिसकी दहकती
आग मे बूडे आदमी कि हड्डियाँ जल रहीं थी और मेरी आँखों कि शर्म. मैं तो
उस हलकी अँधेरी हसीन रात का हर वो हसीन पल अपनी टांगों के बीच समेट लेना
चाहता था जिसने उस रात को और भी हसीन बना दिया था. बढते बढते मैं भी वहां
पहुच ही गया जहाँ से छन छन कर चाँद कि किरणे खिड़की की खुली दो पाटों के
पार किसी के प्यार मे अपना भी हिस्सा डूंड रही थीं.
चोरों कि तरह चुपचाप मै बूडे के पीछे जा खड़ा हुआ. मगर उस बूडे को किसी के
होने न होने से क्या फर्क पड़ता, वो तो बस टकटकी लगाए उसी ओर देखता रहा
जहाँ जिस्म पर पड़ती हर सिलवट के साथ चादर पर एक और सिलवट पड़ जाती, जहाँ
चादर पर बढती सिलवटे हल्का हल्का शोर कर रहीं थीं..... शर..र्र्र्र्र्र
शर..र्र्र्र्र्र्र और मधुर आवाज़ मे कोई हसीना बार बार बोल उठती थी
'जोर... र्र्र्र्र्र्र्र्र से प्रीतम और जोर.....र्र्र्र्र्र्र्र से,' और
प्रीतम उसके उभरे हुए उरोजों को सहलाते हुए और जोर...ररर से उन दो काली
काली चुचियों को काटने लगता जो अकड़ कर लाल लाल अंगारे दिख रहीं थीं.
हसीना के बल खाते किसी मनमोहक पहाड़ से नितम्ब खुद अपने भार से ही चादर
मे धंसे जा रहे थे. लचकती कमर किसी फुन्कारती नागिन सी अपना रास्ता खुद
ही काट रही थी. एक अपने हाथों से किसी की बेबाक गोलाइओं को अपनी मुट्ठी
मे पीस रहा था तो दूसरा किसी भयंकर जहरीली सांप के लम्बे फन से शिशिन को
अपनी मुट्ठी मे. एक रसभरी से भी रसीली चुचीओं को चूस चूस कर सदा सदा के
लिए अपनी प्यास भुझाना चाहता था तो दूसरा बड़े से पूरे पाक आये केले को
चाट चाट कर अपनी भूक.
और ....... और फिर एक बार दिल मे नश्तर सी चूभती मधुर आवाज़ ने फिजा मे
संगीत घोल दिया, सिरहन से मेरा लिंग आकाश की ओर मुह किये चाँद से बाते
करने लगा, उस बूडे आदमी की क्या दशा थी मै नही देख पाया, हाँ पतले पड़ गए
होठों से एक ठंडी आह जरुर सुनाई दी, अस्तु......'प्रीतम...म्मम्मम्म' की
आवाज़ भर से ही मेरी आँखों की पुतलियाँ फैलती चली गयी और मै मंत्र मुघ्द
सा सुनता, टकटकी लगाए उसी ओर देखता रहा
.......'प्रीतम..म्म्म्म्म्म्म अपने रसीले होठों से मेरी गुलाब की रसीली
पन्खरिओं को तब तक चूसो जब तक उसमे रस की एक भी बूँद बाकि है, अपनी
लपलपाती जीभ से मेरी प्यासी योनी की दीवारों को तब तक चाटो जब तक उनका
पानी छलछला कर मेरे घने काले बालों की खालिक को छुपा न ले, आओ न
प्रीतम...म्मम्मम्म आओ मेरे मुह को अपनी झांगो मे समेट लो और अपने मुह को
मेरी झांगो मे सदा सदा के लिए दफन कर दो'.....
अचानक आवाज़ थम गई, बहती हुई हवा ने सांस रोक ली, चादर पर पड़ी सिलवटों पर
शर...र्र्र्र्र्र्र्र शर्र्र्र्र. का संगीत बजने लगा और प्रीतम......
प्रीतम दो गदराई झांगो के बीच उल्टा लेट कर उनमे ऐसे डूब गया जैसे कोई
तैराक नदी मे किसी सीप की तलाश मे. अपने हाथों से उसकी पतली खुबसूरत
टांगो को पकड कर थोडा फैलाया और उसके चूतरों को हल्का सा उठा कर उसे अपने
मुंह तक खीच लिया, लपलपाती जीभ भग की खिड़की से खुले दो पाटों के बीच
अपने रास्ते हो ली ..... होंठ उसकी गुलाब की कोमल पन्खरिओं का जीभर कर
रसपान करने लगे, वो मदहोश कर देने वाली हसीना अपने होठों से कभी उसके
निचले बालों को चूमती तो कभी अपनी झांगो के कसाव से उसके गालों को दबाती,
कभी उसकी झागों के जोडों को जीभ से सहलाती तो कभी अपने लम्बे हाथों से
उसकी गर्दन को.
जैसे जैसे चादर की सिलवटे सिकुड़ती जा रहीं थी वैसे वैसे बूडे की दिल की
धडकने भी. मै सन था नदी के उन दो पाटों की तरह जो कभी तो बाड़ के सैलाब से
खुद को संभाल नही पाती और कभी सूखे मे बिन पानी के छटपटाते हुए अपना दम
तोड़ देती हैं. मै तुलना करने लगा, (हाँ और कर भी क्या सकता था!!!!!),
बाहर बूडे के बूडापे और अन्दर जवानी के जोश की, इतना बेमेल भी नही दिख
रहा था सबकुछ. ....खिड़की के अन्दर कोई खुबसूरत बदन आग की गर्मी मे तप
रहा था तो खिड़की के बाहर किसी का बदन चिंगारी बनकर सुलग रहा था......
उधर कोई रसीले स्वर मे अह आह अआहहा ऊऊह्ह्ह्छ उईईए का रसीला गीत गा रहा
था तो इधर कांपती आवाज़ मे कोई "आह" "आह' के शोर का कोई पुराना
रिकॉर्ड... उधर हसीना के ....तपते तंदूर.... पर उसके प्रीतम का ....लोहा
पिघल... रहा था तो इधर बुझती आग मे बूडे का पिघला हुआ सीसा चूर चूर होकर
अपना दम तोड़ रहा था.
और वो बूडा आदमी बुडापे की जंजीरों मे जकड़ा कभी तो बड़ी उत्सुकता से अपने
कमजोर हाथों से लेशमात्र से उभर आये पायजामे को टटोलता और जोर से कुछ
दबाने की कोशिश करता तो कभी उतनी ही जोर से अपनी दोनों हाथों की हथेलिओं
को, जैसे मन ही मन उन्हें कोस रहा हो खाली हाथ लौट आने पर.
और मैं ...... मैं पीछे खडा हुआ 'काम' की आग मे झुलसता उस हसीना के बगल
मे अपने होने का सपना देखता रहा........... न खिड़की के अन्दर ही और न
बाहर ही......... बस बीच मे किसी कटी पतंग की तरह अपनी मंजिल तलाशता.
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seksyseema / sonia
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