मैं पेइंग गेस्ट बनकर एक हफ़्ते पहले ही आया था. घर की मालकिन सुधा जोशी
नाम की एक विधवा महिला थीं. करीब चालीस साल उम्र होगी. कद औसत से
थोड़ा कम,
गेहुआं रंग, काले लम्बे जूड़े में बन्धे बाल जिसमें कई सफ़ेद लटें
दिखने लगी
थीं और आंखों पर चश्मा. शरीर मझोले किस्म का था याने ज्यादा मोटा
भी नहीं और
ज्यादा पतला भी नहीं. <BR>उनकी दो लड़कियां थीं. बड़ी मीनल बीस साल
की एक
सांवली लम्बी दुबली पतली लड़की थी. चेहरा बार बार मुंहासे होने से
थोड़ा खुरदरा
हो गया था और होंठ भी काले काले थे. पर फ़िर भी मीनल के चेहरे पर
बुद्धिमत्ता
की साफ़ झलक दिखती थी. छोटी लड़की सोलह साल की सीमा नाटे कद की थी
इसलिये उम्र
में और छोटी लगती थी. वह भी सांवली थी पर अच्छी चिकनी त्वचा होने
से काफ़ी
आकर्षक दिखती थी.<BR>सुधा भाभी काफ़ी पैसेवाली थी. मुझे पेइंग गेस्ट
सिर्फ़
इसलिये रखा था कि घर में एक पुरुष हो. बड़ा घर था, हरेक को अलग
बेडरूम था, साथ
में दो तीन बड़े कमरे भी खाली थे. मैं तब पैंतीस वर्ष का था और काफ़ी
औरतों के
साथ (और कुछ किशोरों के साथ भी) बहुत कामकर्म कर चुका था. यहां
पूना में अपना
खुद का घर खरीदने तक यहां रुका था. छोटी लड़की सीमा को देखकर कभी
कभी मेरा
लन्ड खड़ा होता था पर कभी यह नहीं सोचा था कि इस घर में इतने मस्त
कामुक दिन
मेरे भाग्य में लिखे हैं. लड़कियां मुझे अंकल कहती थीं और सुधा भाभी
भी मुझे
मेरे पहले नाम अनिल से पुकारने लगी थीं.<BR>मस्ती की शुरुवात एक
सोमवार को
हुई. दोनो लड़कियां स्कूल और कालेज गई थीं. सुधा भाभी किचन में कुछ
काम कर रही
थीं. मैं उस दिन छुट्टी लेकर घर में ही था. मेरी एक चुदाई की किताब
कल से
गायब थी और मैं परेशान था कि कहीं इन लोगों के हाथ न लग जाये.
किताब ढूम्डता
मैं किचन तक आया तो दरवाजा लगा था. अन्दर से सिटकनी बन्द थी. लौटने
ही वाला
था कि अन्दर से मुझे सिसकने की हल्की आवाज आयी. मैने झुककर एक चीर
में से
देखा तो देखता ही रह गया. मेरा लन्ड एकदम कस के खड़ा हो गया. सुधा
भाभी टेबल
के सामने कुर्सी पर बैठी थीं. सामने थाली में लम्बे वाले बैंगन पड़े
थे जिन्हे
काट के वह सब्जी बना रही थी. पर इस समय अपनी साड़ी ऊपर कर के वह एक
बैंगन अपनी
चूत में घुसेड़ कर मुट्ठ मार रही थी. एक हाथ में मेरी गुमी हुई
किताब थी और
उसे चश्मा लगा कर पढ़ते हुए सुधा भाभी के चेहरे से तीव्र वासना छलक
रही थी.
चश्मा पहने हुए हस्तमैथुन करती हुई उस अधेड़ नारी को इस हालत में
देख कर मैं
काफ़ी उत्तेजित हो गया. आखिर कभी सोचा नहीं था कि ऐसी सीधी साधी
दिखने वाली
औरत ऐसी मस्त चुदैल होगी. पहली बार मैने गौर किया कि सुधा भाभी की
नंगी
जांघें बड़ी गोरी गोरी और मांसल थीं और बहुत आकर्षक लग रही थीं. चूत
पर घनी
झांटें थीं और लाल लाल बुर में वह बैंगन तेजी से अन्दर बाहर हो रहा
था. मुझे
यकीन हो गया कि ऊपर से अधेड़ अनाकर्षक दिखने वाली सुधा भाभी असल में
बड़ी मादक
नारी है जिसे चोदने में बड़ा मजा आएगा. भाभी जिस तरह से इतने मोटे
बैंगन से
अपनी बुर चोद रही थी उससे साफ़ था कि उसकी चूत मस्त चुदी हुई और खूब
रस छोड़ने
वाले थी. <A id=more-367></A>सुधा भाभी अब झड़ने के करीब थी और सिसक
सिसक कर
तड़प रही थी. मेरा मन हुआ कि उसी समय जाकर अपना लन्ड उसकी चूत में
डाल दूम पर
दरवाजा अंदर से बंद था. आखिर भाभी हलके से चीखी और झड़ गई. लस्त पड़
कर वह
कुर्सी में ही ढेर हो गयी और बैंगन उनके हाथ से छूट गया. कपकपाती
चूत ने
बैंगन करीब करीब पूरा निगल लिया और एक इंच का डंठल छोड़ वह आठ-नौ
इम्च का
बैंगन पूरा अंदर समा गया. मुझे बड़ा अच्छा लगा क्योकि गहरी और लम्बी
चूत वाली
औरतें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं. उनकी चूत में पीने के लिये खूब रस
होता
है.<BR>सुस्ताने के बाद सुधा भाभी ने बैंगन चूत से निकाला. उनके
चेहरे पर अब
शांति थी. साड़ी ठीक कर के जब उन्होंने चिपचिपे बैंगन को देखा तो वह
मम्द मम्द
मुस्कराने लगीं. मुझे लगा कि उठ कर उसे धोएंगी या फ़ेक देंगी पर
वैसा ही उसे
काट के उन्होंने बाकी सब्जी में मिला दिया. सोचा होगा कि उनकी चूत
का थोड़ा रस
अगर उनका परिवार खा भी लेगा तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. इस बात ने
मुझे पक्का
इशारा कर दिया कि वह महा कामुक औरत है. मैने तो निश्चय कर लिया कि
आज खूब
सब्जी खाऊंगा.<BR>अब मैं सुधा भाभी को फ़ांस कर चोदने के चक्कर में
था. मुझे
मालूम था कि मेरे कहने भर की देर है और चुदाई की प्यासी वह नारी
मेरी बांहों
में आ लिपटेगी. मैने कुछ और तस्वीरों वाली किताबें लाईं और उन्हे
जान बूझ कर
मेरे कमरे में टेबल पर रखा. मुझे पता था कि मेरी अनुपस्थिति में
कमरा ठीक
करने के लिये सुधा भाभी रोज मेरे कमरे में आती थी. दूसरे ही दिन
मौका देखकर
मैं बाहर जाने का बहाना करके वहीं बाथरूम में छुप गया. कुछ ही देर
में भाभी
वहां आई और इधर उधर देखकर कि घर में कोई नहीं है, कमरे का दरवाजा
लगा लिया.
फ़िर वहीं कुरसी में बैठकर चश्मा लगाया और किताबें देखने लगी.
<BR>इस बार मैं
जान बूझकर और गंदी किताबें लाया था. उनमें हर तरह के चित्र थे,
मर्द-औरत,
मर्द-मर्द, औरत-औरत, जानवरों के साथ रति करते स्त्री पुरुष, कमसिन
किशोर और
किशोरियों को भोगते स्त्री पुरुष इत्यादि. देखकर भाभी का चेहरा
शर्म और वासना
से लाल हो गया और वह जांघें रगड़ने लगी. कुछ ही देर में सिसक कर
उसने साड़ी ऊपर
की और किताबें देखती हुई बुर में उंगली डाल कर हस्तमैथुन करने लगी.
<BR>यही
मौका था, मैने ज़िप खोल कर अपना तन्नाया हुआ लन्ड बाहर निकाल लिया
और उसे हाथ
में लेकर बाहर निकल आया. सुधा भाभी मुझे देखकर डर से पथरा गई, उसकी
उंगली
चलना बन्द हो गई, हाथ से किताब गिर पड़ी और सहमी हुई वह मेरी तरफ़
देखने
लगी."अनिल भैया, तुम? " <BR>मैं कुछ न कहकर उसके पास गया, प्यार से
झुककर
भाभी को चूमा और अपनी मोटा लौड़ा उसके हाथ में दे दिया. पास से पता
चलता था कि
भाभी असल में कितनी सुम्दर थी. चिकना चेहरा, गुलाबी कोमल होंठ और
मुलायम रेशम
से बाल. मैने भाभी के कपकपाते गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रखे और
चूमने लगा.
कुछ देर वह डरी रही पर फ़िर उसका साहस बन्धा. <BR>जब उनका ध्यान
अपने हाथ में
पकड़े मस्त ९ इम्च के मोटे ताजे लन्ड पर गया तो मानो उसके शरीर में
बिजली दौड़
गयी. वह भी मुझे चूमने लगी और देखते ही देखते उसकी वासना ने अब
तीव्र रूप ले
लिया. वह चश्मे के नीचे से अपनी आंखें मेरी आंखों में डाल के देखने
लगी और
अपनी जीभ मेरे मुंह में घुसेड़ दी. जल्द ही सुधा भाभी अपना नरम मुंह
खोल कर
मेरा मुंह चूसने लगी और अपने हाथों से मेरे लन्ड को मुठियाने लगी.
उसका हाथ
फ़िर अपनी बुर में चलने लगा. <BR>मैं भी कांओत्तेजना से पागल हो गया
था. भाभी
के मीठे मुंह को चूम कर मुझे लगा कि इस मुंह से क्यों न अपना लन्ड
चुसवाऊम.
"भाभी, लन्ड चूसेंगी?" मैने धीरे से पूछा. भाभी ने सिर्फ़ सिर
हिलाया और मैने
उठ कर खड़े होकर अपना लन्ड उसके हाथ से निकालकर अपने हाथ में ले
लिया. बैठी
हुई भाभी का मुंह मेरे लन्ड के ठीक सामने था. लन्ड का सूजा हुआ
सुपाड़ा सुधा
भाभी के गाल पर रगड़ता हुआ मैं बोला. "भाभी, मुंह खोलिये". उसने
चुपचाप अपना
मुंह खोल दिया और मैने सुपाड़ा सीधा उसके मुंह में घुसेड़ दिया. भाभी
के गाल
फ़ूल गये जैसे कोई सेब मुंह में पूरा भर लिया हो. <BR>"चूसिये भाभी,
लन्ड
चूसिये और मुट्ठ मारना बन्द मत कीजिये, मजा लेती रहिये" भाभी ने
मेरी बात मान
कर मेरे लन्ड को चूसना शुरू कर दिया. जोर जोर से दो उंगलियों से
मुट्ठ मारती
हुई वह अब मेरे लन्ड को निगलने की कोशिश करने लगी. मैने भी लन्ड
उसके मुंह
में धीरे धीरे गहरा पेलना शुरू किया. "लन्ड पूरा निगलिये भाभी, गले
तक उतर
जाने दीजिये, मैं अब आपके मुंह को चोदना शुरू करने वाला हूं,
देखिये क्या मजा
आयेगा." मैने धक्के लगाने शुरू किये और किसी तरह मेरा आधे से
ज्यादा लन्ड
भाभी के गले तक घुस गया. अब मैने हाथ से उसका सिर पकड़ा और लन्ड जोर
से पेलना
शुरू किया. एक दो धक्कों में ही लन्ड जड़ तक उसके हलक में उतर गया.
<BR>सुधा
भाभी का दम घुटने लगा और वह थोड़ी कसमसाई पर मैने उनके गोंगियाने की
परवाह न
करके उनका सिर पकड़ कर जोर जोर से उनके गले को चोदना शुरू कर दिया.
"डरिये
नहीं भाभी, कुछ नहीं होगा, चूसती रहिये और मुट्ठ मारती रहिये, मुझे
अपने गले
को चोदने दीजिये, अभी आपको मस्त मलाई खिलाता हूं." दोनों हाथों में
भाभी का
सिर किसी फ़ुटबाल की तरह पकड़ कर मैं खड़ा खड़ा उसका मुंह चोदने लगा.
<BR>लन्ड अब
भाभी की जीभ और तालू को रगड़ता हुआ उसके गले में अन्दर बाहर हो रहा
था. मुंह
बन्द करके भाभी भी उसे भरसक चूस रही थी. जिस आसानी से अब भाभीने
मेरा पूरा
लन्ड निगल लिया था उससे स्पष्ट था कि भाभी को लन्ड चूसने का काफ़ी
अनुभव था.
अभी भी भाभीने चश्मा पहन रखा था और धक्के मारते समय मेरा पेट उससे
टकरा जाता
था. मुझे बहुत मजा आया और दस मिनट उस मतवाली नारी का मुंह चोदने के
बाद मैं
झड़ गया. <BR>मैने तुरंत लन्ड आधा बाहर खींच कर सिर्फ़ सुपाड़ा भाभी
के मुंह में
रहने दिया. "सुधा भाभी, जीभ पर मेरा वीर्य लीजिये और स्वाद ले लेकर
खाइये,
आपको मजा आ जायेगा, मेरे लन्ड की मलाई खाने को तो लौंडियां तरसती
हैं, आपको
खुद ही खिला रहा हूं" कहकर लन्ड को मैने खूब मुठियाया और गाढे सफ़ेद
वीर्य का
फ़ुहारा भाभी की जीभ पर बरसने लगा. भाभी ने वह चुपचाप निगल लिया,
हां उसका हाथ
अपनी बुर में और तेज चलने लगा. मेरा लन्ड जब सिमट कर शांत हो गया
तो मैने उसे
भाभी के होंठों से खींच कर बाहर निकाल लिया. <BR>बुर में उंगली
चलने की पुच –
पुच – पुच आवाज निकल रही थी. मचली हुई उस बुर की महक भी कमरे मैं
फ़ैल गई थी.
मेरा दिल उस माल को चाटने के लिये मचल उठा. भाभी का हाथ पकड़ कर
मैने खींच
लिया और पास से देखा. उंगलियों पर गीला चिपचिपा सफ़ेद शहद सा लगा
था. मैने
अपने मुंह में लेकर भाभी की उंगलियां चाट लीं. <BR>भाभी अपनी वासना
से भरी
आंखों से मेरे इस कर्म को देखती रह गई. भाभी की बुर का स्वाद जैसा
मैने सोचा
था, वैसा ही मादक निकला, थोड़ा कसैला और खटमिट्ठा. "भाभी, आपकी चूत
चूसूंगा,
आप अपनी जांघें पसार कर आराम से बैठ जाइये." कामवासना में तड़पती
सुधा भाभी
तुरंत अपनी टांगें फ़ैला कर बैठ गई. "चूस लो अनिल भैया, मुझे अब यह
चुदासी सहन
नहीं होती" उसने सिसक कर कराहते हुए कहा. <BR>मैं फ़र्श पर भाभी के
पैरोम के
बीच बैठ गया. आगे सरक कर अपना मुंह उस रसीली चूत पर जमाने के पहले
उसे मन भर
कर बिलकुल पास से देखा. पास से तो उस बुर का जो नजारा था वह देख कर
मेरा अभी
अभी झड़ा लन्ड भी फ़िर तन्नाने लगा. मैने ऐसी रसीली और बड़े बड़े
भगोष्ठों वाली
बुर बहुत कम देखी थीं क्योंकि ऐसी चूत सिर्फ़ उम्र में बड़ी और खूब
चुदी हुई
औरतों की ही होती है. सुधा भाभी की घनी झांटें भी बिलकुल काली और
घुंघराली
थी, मानो किसी छोकरी के सिर के बाल हों. बुर के लाल लाल होंठों को
ठीक से
चूमने के लिये मुझे वह जुल्फ़ें बाजू में करनी पड़ी. चूत के ढीले
ढाले गहरे छेद
में से सफ़ेद चिपचिपा पानी रिस रहा था. <BR>मैने और न रुक कर सीधे
अपने होंठ
जमाकर उस रसीले माल को चूसना शुरू कर दिया. उधर वह महकता गाढा सफ़ेद
शहद मेरे
मुंह में गया और उधर मेरा लौड़ा फ़िर कस कर खड़ा हो गया. जीभ डाल कर
मैने भाभी
की बुर चाटी और जीभ से ही बुर के ऊपरी कोने में उभरे लाल बेर जैसे
क्लिटोरिस
को भी गुदगुदाया. बेरी पर जीभ का लगना था और मानों भाभी पागल हो
गईं और मेरा
सिर अपनी चूत पर दबा कर धक्के मारने लगी. "हाय, हाय, क्या कर रहे
हो अनिल, मर
जाऊंगी रे, रहा नहीं जाता, जीभ डाल डाल कर चूसो ना, झड़ा दो मुझे
प्लीज़."
<BR>मैने मन भर के बुर के उस शहद का पान किया. भाभी को बस झड़ाता
नहीं था और
कगार पर लाकर फ़िर छोड़ देता था क्योंकि जब तक वह मतवाली थी तब तक
उसकी चूत रस
छोड़ती रहेगी, यह मुझे मालूम था. अन्त में जब सुधा भाभी असहनीय
वासना से रोने
लगीं, तो उनपर तरस खा कर मैने अपनी जीभ भाभी के भोसड़े में डाली और
सपासप उस
चूती बुर को अपनी जीभ से चोदने लगा. साथ ही अपने ऊपर के होंठ को
उसके
क्लिटोरिस पर रगड़ने लगा. दो ही मिनट में भाभी एक चीख मारकर ढेर हो
गई. "हा ऽ
य उई ऽ मां ऽ ऽ मर गई ऽ ऽ". अब उसकी बुर ने ऐसा पानी मेरे मुंह में
फ़ेंका
जैसे शहद की शीशी टूट गई हो. पूरा महकता कसैला पानी मैने पिया और
चाट चाट कर
पूरी चूत और जांघें साफ़ कीं. <BR>जब उठा तो सुधा भाभी शरमा कर नीचे
देख रही
थी. "क्यों भाभीजी, अपने इस भैया की सेवा पसंद आई?" "तुम तो बड़े
मझे हुए चोदू
निकले, अनिल, मुझे ऐसा झड़ाया कि सालों में इतना आनन्द किसी ने नहीं
दिया था."
"भाभी, बोलिये, चुदाएंगी? अभी एक घंटा है सीमा को स्कूल से आने
में." "हां,
अनिल, चल जल्दी से चोद डाल, बहुत दिनों की प्यासी हूं लन्ड के
लिये".
<BR>मैने भाभी को उठकर पलंग पर लेटने को कहा. "भाभीजी, आपको नंगा
करने के
लिये समय नहीं है, अभी ऐसे ही चोद डालता हूं, बाद में आपके इस
मांसल शरीर को
मन भर कर देखूंगा." सुधा भाभी अब तक चुदाई की आशा से अपनी साड़ी ऊपर
कर के एक
तकिया अपने नितम्बों के नीचे रख कर लेट गई थी. अपनी जांघें फ़ैला कर
मुझे अपनी
बाहों में खींच कर मुझे बेतहाशा चूमती हुई वह बोली."बस अब चोद डाल
मेरे राजा,
इतना चोद कि मैं बेहोश हो जाऊम" <BR>भाभी की चूत में मैने अपना
तन्नाया हुआ
लन्ड घुसेड़ दिया. उस गीले चिकने ढीले ढाले भोसड़े में लन्ड ऐसा गया
जैसे मक्खन
में छुरी. भाभी पर लेट कर उन्हें चूमता हुआ मैं मस्त सटा सट चोदने
लगा. मैं
एक बार झड़ चुका था इसलिये अपनी वासना पर काबू रखकर आराम से भाभी को
मजा ले ले
कर चोद सकता था. भाभी के गुलाबी होंठों को दांत में पकड़ कर चूसते
हुए मैने
ऐसे हचक हचक के चोदा कि पांच ही मिनट में वह झड़ गई और अपने बन्द
मुंह से
मस्ती में गुनगुनाने लगी. मैने उसे पूरा झड़ जाने दिया और फ़िर जब वह
थोड़ी शांत
हुई तो उसका मुंह छोड़ा. गहरी सांस लेते हुए भाभी तृप्त भावना से
मेरी आंखों
में आंखें डालके मुझे चूमने लगीं. <BR>"भाभी, थोड़ी चुदासी की प्यास
बुझी ना?
अब गप्पें मारते हुए आराम से घंटे भर तक चोदेंगे" मैं अब उसे हौले
हौले लम्बे
जोरदार धक्के लगा लगा कर एक धीमी लय से चोदने लगा. बुर में से
मस्त
फचाक-फचाक-फचाक ऐसी चुदने की आवाज निकलने लगी. "भाभी, यह बताइये कि
आप की चूत
का ऐसा मस्त रसीला भोसड़ा कैसे बना? ऐसा तो मैने सिर्फ़ रंडियों का
या पचास साठ
साल की चुदक्कड़ महिलाओं में ही देखा है." <BR>भाभी मुस्करायी और
फ़िर शरमाते
शरमाते पर बड़े गर्व के साथ उन्होंने अपनी पूरी कहानी सुनाई.
<BR>भाभी को पहली
बार १२ साल की आयु में उनके मामाजी ने चोदा, जिन्होंने पाल पोस कर
भाभी को
बड़ा किया था. उसके बाद मामाजी रोज कई बार कमसिन सुधा भाभी को चोदते
थे. सोलह
साल की आयु में मामा के लड़के के साथ उनकी शादी कर दी गई और फ़िर
अगले कई साल
उनकी दिन रात चुदाई हुई. रात को पति और दिन में मामाजी या ससुर
उनपर चढे रहते
थे. कुछ दिन बाद यह चुदाई बहुत बढ गई क्योंकि सुधा भाभी का पति,
याने उसका
ममेरा भाई अपना बिज़िनेस चलाने के चक्कर में भाभी को कई लोगों से
चुदाने लगा.
<BR>फ़िर उसके पति को समलिंग सम्भोग का चसका लगा. उसके बाद भाभी की
गांड पर
उसका ज्यादा ध्यान जाने लगा. खूबसूरत जवान लड़कों और युवकों को वह
भाभी की चूत
का लालच देकर घर लाता और गांड मारता और मरवाता. साथ साथ भाभी की भी
खूब चुदाई
होती. अगर कोई जवान न मिले तो उसका पति भाभी की ही गांड मार
लेता.<BR>कई बार
तो एक रात में भाभी को दस दस लड़कों ने चोदा. बच्चियां हो जाने के
बाद घर में
यह क्रीड़ा बन्द हो गयी पर अक्सर उसके पति अपने साथ सुधा भाभी को
बाहर ले जाते
और भाभी को अपने मित्रों से चुदवाकर खुद मजा लेते. इस निरन्तर
चुदाई का ही यह
नतीजा था कि भाभी की चूत का मस्त ढीला रसीला भोसड़ा हो गया था. दो
साल पहले
पति की मृत्यु के बाद भाभी ने चुदाई छोड़ दी थी. पर अपनी कामवासना
शांत करने
का सिर्फ़ एक तरीका था उनके पास और वह था मुट्ठ मारना. इसलिये गाजर,
मूली,
बैंगन, केले आदि से भाभी खूब मुट्ठ मारतीं थी. और चूत को बराबर
ढीला करती
रहतीं थीं.<BR>अपनी कहानी सुनाने के बाद भाभी ने मेरे चोदने का मजा
लेते हुआ
पूछा. "अनिल, तुम्हें आखिर मेरी जैसी ढीली भोसड़े वाली चूतें क्यों
पसंद हैं?
नौजवानों को तो टाइट सकरी चूतें ज्यादा पसम्द आती हैं." <BR>मैने
हचक हचक कर
चोदते हुए कहा. "दो कारण हैं सुधा भाभी, एक यह कि ढीली चूत आराम से
काफ़ी देर
चोदी जा सकती है, लन्ड जल्दी झड़ता नहीं इसलिये ज्यादा देर मजा आता
है, साली
सकरी बुर हो तो दो मिनट में लौड़े को अपने घर्षण से झड़ा देती है.
दूसरा कारण
यह है कि ढीली चूतें बहुत रसीली होती हैं, जरा से मजे में चूने
लगती हैं, और
जो बुर के पानी के शौकीन हैं मेरी तरह, उन्हें खूब रस चाटने को
मिलता
है."<BR>हमारी इन बातों से हम दोनों अब मस्त गरम हो गये थे. एक
घंटा भी होने
को आया था. चुदाई का बहुत आनंद हम ले चुके थे. मैने अब हचक हचक कर
उछल उछल कर
कस के सुधा भाभी को चोदना शुरू कर दिया. दस मिनट में जब मैं मस्ती
से
चिल्लाते हुए झड़ा तो भाभी करीब सात आठ बार स्खलित हो चुकीं थीं.
मजा लेने और
सुस्ताने के बाद भाभी ने उठकर कपड़े ठीक किये. "अनिल भैया, अब रोज
चोदोगे ना
मुझे? प्लीज़? बच्चियों के बाहर जाते ही दोपहर को मैं तुंहारे कमरे
में आ जाया
करूंगी." मेरा लन्ड आप के ही लिये है भाभी, पर रात को भी आप चुदाएं
तो मुझे
बड़ी प्रसन्नता होगी आपकी सेवा करने में." "ठीक है, बच्चियों के सो
जाने के
बाद मैं आ जाया करूंगी, पर चुपचाप अंधेरे में ही चोदना
पड़ेगा."<BR>उस दिन से
हमारा कामकर्म मस्त चलने लगा. रोज दिन में जब सीमा और मीनल बाहर
जाते तो मैं
भाभी की चूत चूसता और चोदता. रात को जाग कर मैं भाभी की राह देखता.
करीब एक
बजे वे आतीं थी क्योंकि लड़कियां कभी कभी सोने में बाराह बजा देतीं
थीं.
शनिवार और रविवार को बड़ी तकलीफ़ होती थी क्योंकि दोनो लड़कियां घर
में रहती
थीं. कभी अगर वे सहेलियों के साथ घूमने जातीं, तब हम मौका देख कर
फ़टाफ़ट चुदाई
कर लेते.<BR>भाभी के पूरे नग्न शरीर को मैने दूसरे ही दिन देख लिया
था. भाभी
सफ़ेद काटन की ब्रा और चड्डी पहनतीं थीं. शरीर बड़ा गदराया हुआ और
मांसल था.
झांटों के बाल छोड़ दिये जाएम तो भाभी का बाकी पूरा शरीर बड़ा कोमल
और चिकना
था. फ़ूले हुए मम्मे मुलायम और गुदाज थे. बहुत बड़े भी नहीं और छोटे
भी नहीं,
करीब करीब आमों जितने थे. नरम और पिलपिले होकर थोड़े लटकने लगे थे.
निपल खूब
बड़े बड़े थे, काले जामुनों जैसे. भाभी के अनुसार छोटी सीमा बहुत
दिनों तक,
करीब चार वर्ष की होने तक उनका दूध पीती थी, छोड़ने के लिये तैयार
ही नहीं
होती थी. उसीके चूसने से निपल बड़े हो गये थे.<BR>रात को भाभी सिर्फ़
गाउन पहन
कर आती थी ताकि जल्दी से उतारा जा सके. रात के अम्धेरे में कुछ
दिखता तो नहीं
था, पर मैं टटोल उनकी टांगों के बीच लेट जाता था और पहले घंटे भर
उनकी चूत
चूसता था. मन भर के बुर का रस पीने के बाद मैं फ़िर घंटे भर उन्हें
चोदता.
सुबह तीन के करीब भाभी तृप्त होकर अपना गाउन पहनती और अपने कमरे
में लौट
जातीं. बीच में जब भाभी की मासिक पारी शुरू हुई तो मुझे लगा था कि
अब दो-तीन
दिन नहीं आयेगी. पर बराबर आकर भाभी मेरा लन्ड चूसतीं और मुझे तीन
चार बार झड़ा
कर ही वापस जाती. भाभी कभी कभी मेरी फ़रमाइश पर गाजर या ककड़ी से
मुट्ठ मार कर
दिखातीं. हस्तमैथुन का नजारा दिखकर मुझे पूरा दीवाना करके फ़िर वह
रसभरी
चिपचिपी गाजर या ककड़ी मुझे खिलाई जाती. एक बार रात को भाभी की चूत
चूसी तो
उसमें से मीठा चिपचिपा केला निकला. हम्सते हुए भाभी ने बताया कि
उसने मेरे
कमरे में आने के पहले छिले केले से आधा घंटा मुट्ठ मारी और फ़िर उसे
वैसे ही
बुर में घुसेड़ कर मुझे चखाने को चली आई. केले और चूतरस का वह
मिश्रण मुझे
इतना उत्तेजित कर गया कि उस रात मैने लगातार तीन घम्टे तक सुधा
भाभीका भोसड़ा
चोदा और आखिर सुबह पांच बजे अपने कमरे में जाने दिया. <BR>सिर्फ़ एक
मामले में
सुधा भाभी ने मेरी एक न सुनी. उनको नंगा देखते समय मैने कई बार
उनके मोटे भरे
पूरे चूतड़ देखे थे. उस नरम चिकनी गांड को मारने के लिये मैं मरा जा
रहा था पर
जब भी भाभी से पूछता तो वह साफ़ मना कर देती. सिर्फ़ यह बात छोड़ कर
बाकी सब भोग
मुझे भाभी करातीं थीं. धीरे धीरे मैं सुधा भाभी के अधेड़ मांसल शरीर
का पूरा
दीवाना बन चुका था और वह खुद मेरे मस्त लन्ड की आदी हो गई थी. एक
महीना इसी
मस्ती में गुजर गया. लड़कियों को भी खुछ भनक पड़ गयी क्योंकि एक दो
बार हम पकड़े
ही जाने वाले थे. एक बार भाभी किचन में टेबल के सामने बैठ कर पापड़
बेल रही
थी. टेबल पूरा चादर से ढका था. मुझे भाभी के चूतरस की प्यास लगी और
मैं सीधा
टेबल के नीचे घुस कर उनकी साड़ी उठाकर उस में घुस गया और बुर चूसने
लगा. भाभी
ने साड़ी मेरे शरीर पर डाल दी और मुझे अन्दर छुपा लिया. <BR>सहसा
मीनल वहां आ
गयी, वह कालेज से जल्दी लौट आयी थी. दरवाजे में खड़ी होकर अपनी मां
से वह बात
करती रही, साड़ी और चादर से छुपा होने से मैं उसे दिखा नहीं. "ममी
तुम हांफ़
क्यों रही हो, चेहरा भी तमतमाया हुआ है?" उसने पूछा. मैने बुर
चूसना चालू रखा
और चुदासी की मारी बिचारी भाभी भी अपनी जांघों में मेरा सिर दबा
मेरे मुंह को
हौले हौले चोदती रही और मीनल से बातें भी करती रही. किसी तरह उसने
मीनल को
वहां से भगाया और फ़िर मेरे मुंह में अपना पानी झड़ाकर मेरी प्यास
बुझाई.<BR>भाभी को भोगना मुझे बहुत अच्छा लगता था और अक्सर मैं
आफ़िस से
छुट्टी लेकर जल्दी घर आ जाता था जिससे लड़कियों के घर आने से पहले
भाभी को चोद
सकूम. असल में अब मुझे दोनों लड़कियां भी बहुत अच्छी लगने लगी थीं.
मीनल का
दुबला पतला सांवला शरीर और नन्ही किशोरी सीमा की कमसिन जवानी मुझे
तड़पाने लगी
थी. मैं सोचने लगा कि अगर इन्हें भी चुदासी के जाल में फ़ंसा लूम तो
बस तीन
तीन मस्त शरीर भोगने को मिलेंगे दिन रात.<BR>इसलिये मैने सुधा भाभी
को चुपचाप
लड़कियों को भी इस काम क्रीड़ा में शामिल करने के लिये अनकहे तरीके
से उकसाना
शुरू कर दिया. उन्हें मैं अक्सर मां-बेटी के सम्भोग की कहानियां और
चित्र
लाकर देता. उन्हे एक दो बार ऐसी ब्लू फ़िल्में भी दिखायीं जिनमे
सिर्फ़ मां और
बेटियों की आपसी चुदाई और बुर चूसने को दिखाया गया था. एक बार तो
मैने मजाक
में कह भी दिया कि मेरे आने के पहले भी इस घर में भाभी के लिये बड़ी
मस्ती की
रातें होना चाहियी थीं क्योंकि जहां दो जवान बेटियां और उनकी चुदैल
मां हो
वहां उनके भूखे रहने का प्रश्न ही नहीं उठता था. <BR>मां-बेटियों
के काम
सम्बन्धों के चित्र देख कर भाभी उत्तेजित होने लगी थीं. अब काफ़ी
बार वे जब
प्यार से अपनी बेटियों को गले लगाती तो बहुत देर तक छोड़ती नही थी
और गालों के
साथ साथ कभी कभी जल्दी से उनके होंठ भी चूम लेती थी. मैने देखा कि
लड़कियों को
भी यह अच्छा लगने लगा था.<BR>आखिर एक दिन एक शुक्रवार को भांडा फ़ूट
ही गया.
हुआ यों कि मीनल और सीमा सुबह से ही पिकनिक को गयी थीं. देर रात
आने वाली
थीं. भाभीने फ़ोन करके मुझे आफ़िस से बुला लिया और दोपहर को जब मैं
घर पहुंचा
तो चुदासी से तड़पती सुधा भाभी बिलकुल तैयार थी. घर की चाबी मेरे
पास थी
इसलिये जैसे ही में दरवाजा खोल कर अन्दर पहुंचा, भाभी के बुलाने की
आवाज आई
और मैं उनके कमरे की ओर चल दिया. "अनिल भैया, जल्दी आओ, अब रहा
नहीं जाता."
<BR>मैं अन्दर गया तो देखता हूं कि भाभी मादरजात नंगी होकर पलंग पर
पड़ी थी और
अपनी तीन उंगलियां बुर में घुसेड़ कर हस्त मैथुन कर रही थी. "अनिल
जल्दी आओ,
चोद डालो मुझे, आज दिन भर मालूम नहीं कैसी चुदासी लगी है, मुट्ठ
मारने से
शांत ही नहीं होती. मीनल और सीमा भी अब रात को ही आएंगी तो मुझे आज
दिन भर
हचक हचक कर पूरे जोर से चोद डालो"<BR>मैं भी अपने कपड़े उतार कर
पलंग पर चढ
गया और पहले तो भाभी की उंगलियां चाटने लगा. फ़िर लेट कर उस रिसती
चूत पर मुंह
लगाता हुआ बोला "भाभी, अभी तो चूसने दीजिये, मन भर के इस बुर रानी
का प्रसाद
पा लूम, फ़िर आपको आपकी इच्छानुसार चोद डालूंगा." करीब आधा घंटा
पैने उस
चिपचिपी बुर को चाटा और चूसा और फ़िर क्लिटोरिस को मुंह में लेकर तब
तक चूसा
जब तक भाभी मस्ती से चीखती हुई ढेर नहीं हो गई. झड़ने पर भी उसकी
चुदाने की
प्यास नहीं गयी और वह बार बार मुझसे चोदने को कहती रही. मै भी काफ़ी
बुर का
पानी पी चुका था, अपना लोहे जैसा कड़ा लन्ड लेकर भाभी पर चढ गया और
एक ही बार
में पूरा अन्दर उतार दिया. फ़िर भाभी के शरीर पर लेट कर उन्हें
चूमता हुआ
चोदने लगा. "झड़ना नहीं मेरे राजा भैया, शाम तक लगातार चोदना." भाभी
सिसकते
हुए बोली.<BR>अचानक दरवाजा खुला और सीमा और मीनल अन्दर आईं. पिकनिक
कैंसल
होने से वे जल्दी लौट आयीं थी. हमें पलन्ग पर कुश्ती लड़ते देखकर
पहले तो
स्तब्ध रह गईं और एक दूसरे की ओर देखने लगीं. फ़िर सीमा चहक कर बोली
"हाय
दीदी, तू ठीक कहती थी, अम्मा चुदा रही है अंकल से". मुझे लगा कि
दोनों अब
हल्ला मचाएंगी पर मुझे और भाभी दोनों को चुदाई का इतना मजा आ रहा
था कि हमने
लड़कियों की परवाह न करके चोदना चालू रखा. कुछ देर तक तो दोनों दूर
खड़ी देखती
रहीं, फ़िर चुपचाप पास आकर पलन्ग पर बैठ गयीं और तमाशा देखने लगीं.
दोनो के
चेहरे अब धीरे धीरे कामवासना में डूबते दिख रहे थे. <BR>भाभी की
सिस्कारियों
को सुनकर बड़ी मीनल ने, जो मां की लाड़ली थी, पूछा "अम्मा, दर्द हो
रहा है
क्या, अनिल अंकल को उठने के लिये कहूम?" भाभी ने सिर हिला कर मना
किया "नहीं
बेटी, बहुत मजा आ रहा है, हा ऽ य, कितने जोर से मन लगा कर चोद रहे
हैं मुझे
तेरे अंकल" और उसने लाड़ में मीनल को पास खींच किया. मीनल का चेहरा
अपनी
हथेलियों में भर कर भाभी उसका मुंह चूमने लगीं. मीनल ने भी बड़े
प्यार से भाभी
की आंखों और गालों को चूमा और कहा "मेरी प्यारी अम्मा, कितने दिनों
के बाद
तुझे इतना खुश देखा है, मन भर के चुदा लो मां, हमारी फ़िक्र मत करो"
और फ़िर वह
भाभी को बड़े प्यार से चूमने में लग गई.<BR>उधर छोटी सीमा मेरे
गालों से अपना
गाल सटा कर बैठ गयी और पूछा "क्यों अंकल, कैसी है हमारी अम्मा?"
मैं हचक हचक
कर उस बच्ची की मां को चोदता रहा और बोला "सीमा बेटी, तेरी अम्मा
की चूत इतनी
मादक है कि शराब भी क्या होगी. अभी चोद रहा हूं तो लगता है कि मखमल
की म्यान
को चोद रहा हूं." सीमा ने मेरे होंठों पर अपने प्यारे नाजुक होंठ
रख दिये और
मुझे चूमने लगी. मैने धीरे से भाभी की ओर देखा कि वह इसपर क्या
कहती है. पर
उसे इसमें कुछ गैर नहीं लगा और हमारी ओर प्यार से मुस्कराकर वह फ़िर
अपनी बड़ी
बेटी का चुम्बन लेने लगी. मैने भी अपने होंठों में सीमा के मुलायम
होंठों को
दबा लिया और चूसने लगा. <BR>चुदाई अब पूरे जोरों में थी और कस के
फ़चाक-फ़चाक-फ़चाक कर मेरा लन्ड अन्दर बाहर हो रहा था. बड़ी बेटी अम्मा
के साथ
चूमाचाटी कर रही थी और छोटी बेटी अपनी अम्मा को चोदते मर्द से याने
मुझसे
चुम्बनों का आदान प्रदान कर रही थी. मैने चुम्बन थमा कर कहा
"लड़कियों, देखो
तुम्हारी मम्मी की चूचियां कैसी खड़ी होकर थिरक रही हैं. इसका मतलब
यह है कि
मां को बहुत आनन्द हो रहा है और ये स्तन भी खड़े होकर मांग कर रहे
हैं कि हमें
दबाओ. अगर इन्हे अपने नाजुक हाथों से सहलाओ और मसलो तो मम्मी को
बड़ा मजा
आयेगा." <BR>मीनल ने सीमा से कहा. "चल छोटी, देर मत कर, तू दाहिनी
चूची पकड़,
मैं बायीं दबाती हूं." दोनों ने एक एक स्तन को हाथ में लिया और बड़े
प्यार से
वे अपनी मां के स्तन दबाने लगीं. मेरे साथ सीमा की और भाभी के साथ
मीनल की
चूमा चाटी चलती ही रही. मैं अब हचक हचक कर पूरे जोर से सुधा भाभी
को चोद रहा
था. "भाभी, अब नहीं रहा जाता, आप मन भर के चुद चुकी हैं ना, तो मै
भी झड़ लूम"
<BR>भाभी मस्ती से कराह कर बोली "बस एक बार और अनिल, फ़िर तुम मार
लेना मेरी
बुर जैसे चाहो." मेरे कहने पर लड़कियां जोर जोर से भाभी के निपल
मसलने लगीं और
इस मीठी हरकत को भाभी सह न सकीं और तृप्ति की एक किलकारी मार कर झड़
गईं. मैने
अब घचा घच लन्ड चलाना शुरू कर दिया और दो मिनट में मस्त मुठिया कर
भाभी की
चूत में झड़ गया. मैं पूरा लस्त होकर भाभी के शरीर पर पड़ा पड़ा और
सीमा को
चूमता हुआ इस मीठे स्खलन का लुत्फ़ उठाता रहा जब तक पूरा नहीं झड़
गया.
<BR>लन्ड बाहर निकालकर मैने रूमाल से पोंछा. दोनों लड़कियां बड़ी
ललचायी निगाह
से उसकी तरफ़ देख रही थीं. रूमाल से मैने भाभी की गीली चू रही बुर
भी पोंछी.
भाभी ने अब अपनी दोनों बेटियों को बाहों में भर लिया था और बारी
बारी से
प्यार से चूम रही थीं. चूमते हुए भाभी ने उनसे कहा "मेरी प्यारी
बच्चियों,
अनिल अंकल इतना अच्छा चोदते हैं कि मुझे लगता है इनसे रात दिन
चुदाऊम."
<BR>सीमा ने शैतानी से कहा. "अम्मा, तो कितने दिनों से चुदा रही
हो, हमें भी
तो बताओ?" भाभी ने पूरी कहानी बताई कि कैसे वह पिछले कई दिनों से
मुझसे दिन
रात चुदा रही थी. जब उन्होंने बताया कि चोदने के अलावा कैसे हम एक
दूसरे के
गुप्तांगों को चूस चूस कर रसपान भी करते हैं तो लड़कियों की आंखों
में छाई
मादकता और गहरी हो गयी और उनकी सांसें जोर जोर से चलने लगीं. छोटी
सीमा भाभी
की चूची दबाती हुई बोली. "वाह मम्मी, अकेले अकेले ही मजा लोगी,
हमें भी तो
चुदने दो." सीमा की इस बेशर्म हरकत पर मीनल शरमा गई. "चुप कर सीमा,
अम्मा को
चुदाने दो, हम सिर्फ़ देखा करेंगे" सीमा ने झपट कर अपनी बड़ी बहन के
उरोजों को
हाथ लगाया और दबा कर देखा. "तो दीदी चुदाने के नाम से तेरे निपल
क्यों कड़े हो
गये, बिलकुल कंचे जैसे कड़क लग रहे हैं ?" मीनल और शरमा गयी और इधर
उधर झांकने
लगी. सुधा भाभी पड़े पड़े अपनी बेटियों की नोक झोंक देख कर हंस रही
थी. मुझसे
बोली "ठीक ही तो है, अनिल, बच्चियों को भी मजा मिलना चाहिये."
<BR>मैंने कहा
"इतनी प्यारी सुकुमार लड़कियां हैं भाभी, इन्हें तो मैं बड़े प्यार
से रस ले
लेकर भोगूंगा." सीमा तो खुशी से उछल पड़ी "चलिये अंकल, पहले मुझे
चोदिये" और
अपने कपड़े उतरने लगी. भाभी ने उसे रोका और कहा "अभी नहीं बेटी, दिन
है, कोई आ
जायेगा तो तकलीफ़ होगी, बीच में ही कामकर्म बन्द करना पड़ेगा. सब लोग
आराम कर
लो, रात के खाने के बाद सब बड़े वाले कमरे में, जहां वह बड़ा पलन्ग
है, मिलते
हैं, फ़िर खूब प्यार करेंगे." <BR>लड़कियां अब इतनी गरम हो गई थीं कि
मान ही
नहीं रही थी. सीमा तो गुस्से में पैर पटक पटक कर रोने लगी. मैने
बीच बचाव
करते हुए कहा "भाभी, बड़ी तड़प रही हैं दोनों, ऐसे करते हैं कि मैं
इन दोनों की
जल्दी जल्दी चूत चूस देता हूं. ये भी झड़ जायेंगी और मुझे भी इन
नन्ही कलियों
का रस पीने मिल जायेगा. <BR>भाभी ने हां कर दी. छोटी सीमा ज्यादा
मस्ती में
थी इसलिये मैने उससे शुरू किया. सीमा को चूमता हुआ मैं एक कुर्सी
तक ले गया
और उस पर बिठा कर बोला "सीमा बेटी, कपड़े निकालने का समय नहीं है,
बस अपनी
चड्डी उतार दो और आराम से पैर फ़ैला कर बैठ जाओ." सीमा ने तपाक से
अपनी स्कर्ट
ऊपर की और चड्डी उतार दी. अपने पैर फ़ैला कर अपनी ही बुर को उंगली
से सहलाते
हुए वह बोली "हाय अनिल अंकल, रहा नहीं जाता, जल्दी मेरी बुर चूसिये
ना प्लीज़"
<BR>मैने उसके सामने बैठ कर उसकी चिकनी जांघों में सिर घुसाया तो
उस कमसिन
बुर का नजारा देख कर मुंह में पानी भर आया. बड़ी छोटी छोटी रेशमी
झांटें थीं
और बुर की लाल लकीर बिलकुल गीली थी. मैने उंगलियों से बुर फ़ैलायी
और उस जरा
से नन्हे छेद पर मुंह जमा कर चूसने लगा. बड़ा मस्त मीठा रस था सीमा
की बुर
में. समय न होने से मैने ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की और सीधा अपनी जीभ
से उस कोमल
गुप्तांग को चाटता हुआ मैं कस के उस बच्ची की बुर चूसने लगा.
<BR>सीमा तो
मानों पागल हो गयी. अपनी जांघें खोलने और बन्द करने लगी और मेरे
सिर को पकड़कर
धक्के मारते हुए वह सीत्कारने लगी. "ऊ ऽ मां ऽ, मर गयी मैं, कितना
अच्छा लग
रहा है, हाय अंकल चूसिये ना, और कस के चूसिये, मां ऽ ऽ, अंकल कैसा
कर रहे
हैं, मैं खुशी से मर जाऊंगी, उई मां ऽ ऽ मैं गयी ऽ ऽ" और वह किशोरी
एकदम से
झड़ गयी. सिसक सिसक कर वह अपनी बुर मेरे मुंह पर रगड़ती रही और मैने
मन भर कर
उस कुंवारी चूत का पानी पिया. आखिर जब वह लस्त हो गयी तब मैंने उसे
छोड़ा और
पीछे हट कर फ़र्श पर अपने होंठ चाटते हुए बैठ गया. <BR>"चलो मीनल,
अब तुंहारी
बारी है." भाभी ने आकर हाथ पकड़कर सीमा को उठाया जो जाकर हांफ़ते हुए
पलन्ग पर
लेट गयी और अपनी दीदी की बुर चूसने का तमाशा देखने लगी. मीनल चुप
थी पर उसकी
सांस जोर जोर से चल रही थी. अपनी जांघें वह कस कर एक दूसरे से रगड़
रही थी.
मैं समझ गया कि लड़की झड़ने के करीब है. "भाभी, मीनल की चड्डी
उतारिये और उसे
यहां लाइये." भाभी ने प्यार से उसे डांटा "अरे पगली, उतारती है
अपनी चड्डी
खुद या मै आऊं?" लज्जा से लाल अपने मुंह को झुका कर मीनल ने धीरे
से अपनी
सलवार नीचे की और चड्डी उतारी. फ़िर सलवार को अपने घुटनों में ही
फ़ंसाये हुए
वह चुपचाप आकर कुर्सी पर बैठ गयी. <BR>मैं उसकी चूत पर टूट पड़ा.
मीनल की चूत
सीमा के बिलकुल विपरीत थी. खूब घनी काली झांटें थीं और सांवली
जांघों पर और
पिम्डलियों पर भी काफ़ी बाल थे. मैने झांटें बाजू में कीं तो उसके
सांवले
पपोटों के बीच गुलाबी बुर दिखी जिसमें से चिपचिपा घी जैसा पानी चू
रहा था.
महक बड़ी मतवाली थी. मैने देर न करते हुए अपने होंठ उस गरमागरम बुर
पर जमाये
और चूसने लगा. रस थोड़ा कसैला और खारा था पर बड़ा ही मादक था. मैने
जीभ से रगड
रगड़ कर बुर चूसना शुरू कर दिया. <BR>मेरा अंदाजा ठीक निकला. मीनल
अपनी छोटी
बहन सीमा की चूत चुसती देख कर इतनी उत्तेजित हो चुकी थी कि एक मिनट
भी न ठहर
सकी और एक हल्की चीख के साथ ढेर हो गयी. बुर से मानो रस का फ़ुहारा
छूट पड़ा और
मैं उसे पीने में जुट गया. उधर अति आनन्द से मीनल रो पड़ी और भाभी
ने आकर अपनी
लाड़ली बेटी को बांहों में भर लिया और चूम चूम कर उसे सांत्वना देने
लगीं.
"बहुत अच्छा लगा ना बेटी? अब तो अनिल अंकल हम तीनों को ऐसा ही मजा
देंगे."
<BR>सीमा फ़िर चुसवाने की जिद करने लगी पर अब भाभी ने एक ना सुनी और
उन्हें
जाकर रात की तैयारी करने को कहा. भाभी की बात बड़ी मुश्किल से उन
दोनों
लड़कियों ने मानी, फ़िर हमें एक चुम्बन दे कर दोनों खुशी से अपने
कमरे में भाग
गयीं. भाभी ने पीछे से आवाज दे कर कहा. "नंगी नहीं चली आना, अच्छे
कपड़े पहनकर
आना, अनिल अंकल को भी तो तुंहारे कपड़े धीरे धीरे निकालने का मौका
मिले. वो नई
वाली ब्रेसियर और पैंटी पहन लेना बेटी" <BR>रात का इम्तजार सबको
था. जल्दी
जल्दी खाना खाकर मां बेटियां तैयार होने को चले गये और सुधा भाभी
ने मुझ से
कहा कि आधे घम्टे में आऊम. मैने समझाया कि ज्यादा नटने की जरूरत
नहीं है
क्योंकि कपड़े तो उतारे ही जाने वाले हैं पर लड़कियों ने एक न मानी.
मैं नहाकर
सिर्फ़ जांघिया पहना हुआ जांघिये के इलास्टिक में हाथ डाल कर अपने
खड़े लन्ड को
सहलाता हुआ इम्तजार करने लगा. आधे घम्टे बाद मैं बड़े कमरे में
दाखिल हुआ.
<BR>भाभी और उनकी दोनों कमसिन बेटियां सज धज कर मेरा इम्तजार कर
रही थीं. मैं
उन्हें देखता ही रह गया. भाभी ने काली साड़ी और काला ब्लाउज. पहना
था. उनके
गोरे अंग पर वह बड़ा फ़ब रहा था. काली पतली चोली में से सफ़ेद
ब्रेसियर की झलक
दिख रही थी. मीनल ने भी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और चोली पहनी थी.
सादे रूप
की वह जवान लड़की आज बड़ी आकर्षक लग रही थी. उसने गाढे लाल रंग की
लिपस्टिक लगा
रखी थी जो उसके सांवले होंठों पर जामुनी दिख रही थी. मेकप से उसने
अपने चेहरे
के खुरदरे भाग को छिपाने की काफ़ी कोशिश की थी और बड़ी प्यारी लग रही
थी. छोटी
सीमा तो एक लाल मिनिस्कर्ट में थी. उसकी कमसिन चिकनी टांगें गजब ढा
रही थीं.
<BR>मैने उन्हें बारी बारी से प्यार से चूमा. इतना मीठा चुम्बन
मुझे शायद ही
पहले कभी मिला हो. तीनों जोश में थीं और थोड़ा शरमा भी रही थीं.
मेरे नंगे गठे
बदन को और जांघिये में उठे तम्बू को वे ललचा कर देख रही थीं.
"अंकल, चड्डी
उतार के लन्ड दिखाइये ना." छोटी ने फ़रमाइश की. मैने कहा "लन्ड अब
काम के समय
ही निकलेगा, तब तक वह और मस्त होकर मोटा होता जायेगा जिससे तीन
चूतों को खुश
कर सके." फ़िर मैने भाभी से कहा "चलिये भाभी, अब कपड़े निकालने का
समय आ गया
है, पर ब्रेसियर और चड्डी अभी रहने देते हैं क्योंकि सिर्फ़ ब्रा और
पैंटी में
लिपटी अर्धनग्न औरत जैसी मतवाली चीज़ और कोई नहीं है."
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as u need,
seksyseema / sonia
36dd_27_36 (rounded boobz).