एकता की मजबूत कड़ी - अपनी राष्ट्रभाषा

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Praneet Sushil

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Mar 5, 2009, 2:43:09 AM3/5/09
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 एकता की मजबूत कड़ी - अपनी राष्ट्रभाषा
एकता की मजबूत कड़ी परदेस में रहते हुए अपने देश को देखने-समझने की कई बार नई दृष्टि मिलती है। अमेरिका में कई अच्छी चीजें हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है वहां के लोगों की राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय चेतना। उनकी यह भावना हमें अपनी स्थिति पर सोचने के लिए विवश और प्रेरित करती है। राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके लिए सजग रूप से प्रयास करना पड़ता है और जिसमें बुद्धिजीवियों और नेतृत्व वर्ग की बड़ी भूमिका होती है। हमारा नेतृत्व और अभिजन वर्ग कभी भी इसके लिए बहुत गंभीर नहीं रहा। उसकी दृष्टि हमेशा संकीर्ण रही। हमारी राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों में एक है हमारे देश में अनेक भाषाओं का होना। महात्मा गांधी, तिलक, सुभाष चंद्र बोस आदि स्वाधीनता संग्राम के महानायकों ने समझ लिया था कि देश की एकता तब तक नहींहो सकती है जब तक वाणी या भाषा की एकता न हो जाए। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, स्पेन, जापान, चीन आदि देशों में एक मुख्य भाषा है जिसने पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। यह सुविधा अपने देश में नहीं है। हम बहुरंगी भाषा-संस्कृति वाले देश हैं, जो कई बार हमारी सीमा बन जाती है और राष्ट्रीय एकात्मकता नहीं हो पाती है। इसका बहुत अच्छा उदाहरण अमेरिका में दिखता है। जब विभिन्न देशों के लोग आपस में मिलते हैं तो वे अपनी राष्ट्र भाषाओं में बात करते हैं। हम भारतीय उन विरले लोगों में हैं जो विदेश में भी परस्पर अपनी राष्ट्रभाषा में न बात कर अंग्रेजी में बात करते हैं और दूसरों की नजर में हास्यास्पद और नीचे हो जाते हैं। विदेशी लोग सोचते हैं कि प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का दावा करने वाले इस देश के पास क्या अपनी कोई भाषा नही है? आजादी के साठ साल के बाद भी हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को वह स्थान क्यों नहीं दिला पाए हैं जिसकी वह हकदार है? ऐसा क्यों है, इसको समझने के लिए हमें अपने देश की अब तक की भाषा नीति को समझना होगा। जब 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था, तब इसने भाषा-शिक्षा के लिए संघ सरकार से एक नीति निर्धारित करने के लिए कहा। इसके तहत आल इंडिया एजूकेशन काउंसिल की स्थापना की गई, जिसने सितंबर 1956 में अपनी अनुसंशाएं सौंप दी। इस रपट में त्रि-भाषा का फार्मूला सुझाया गया। इसके अनुसार हर राज्य में सेकेंडरी स्तर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा (जिसमें दक्षिण भारतीय भाषाओं को वरीयता दी जाए), गैर-हिंदी भाषी राज्यों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जानी चाहिए। मुख्यमंत्रियों की एक कांफ्रेंस में इसे स्वीकार भी लिया गया। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस त्रि-भाषा फार्मूला को अपनाने की बात की गई। 1986 की शिक्षा नीति और फिर 1992 में भारतीय संसद की कार्ययोजना में भी इसे शामिल किया गया, पर इसका पूरी तरह से तरह से क्रियान्वयन नहीं हो पाया। राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केंद्र सरकार ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकी, दूसरी तरफ राज्यों की उदासीनता की वजह से यह योजना एक तरह से ठंडे बस्ते में रह गई। एक जनवरी, 2000 को नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फार स्कूल एजूकेशन ने इस त्रि-भाषा फार्मूले पर विचार करते हुए यह रेखांकित किया कि कुछ राज्यों ने सिर्फ द्वि-भाषा नीति ही अपनाई तो कुछ ने आधुनिक भारतीय भाषा की जगह क्लासिकल भाषाओं जैसे संस्कृत या अरबी को अपनाया। कुछ बोर्डो और संस्थाओं ने तो हिंदी की जगह फ्रेंच या जर्मन भाषा तक को अनुमति दे दी। इस तरह यह नीति जो एक अच्छी और सुविचारित नीति थी और जो देश को एक सूत्र में बांध सकती थी, केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कागजों तक ही सीमित रह गई। इसमें गैर हिंदी भाषी राज्यों की अपेक्षा हिंदी भाषी राज्यों के नेतृत्व और अभिजन वर्ग की ज्यादा जिम्मेदारी थी। आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के राज्यों में बड़ी संख्या में छात्र हिंदी पढ़ते थे, लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमें भी किसी अन्य राज्य की भाषा सीख लेनी चाहिए। अगर हम अपनी प्यारी हिंदी को सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं तो हमें अन्य राज्यों की मानसिकता का भी ख्याल रखना होगा। गैर हिंदी भाषियों के इस तर्क और भय को कि इससे हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, हम उन राज्यों की भाषा सीखकर दूर कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता की चिंता किसको है? कुछ लोगों का यह तर्क कि तीन-तीन भाषाएं सीखना एक मुश्किल कार्य होगा, सही नहीं है, क्योंकि आजादी के आरंभिक वर्षो में दक्षिण के छात्र तीन भाषाएं बिना किसी खास कठिनाई के सीख रहे थे। आज भी केरल जैसे राज्य उदाहरण हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग मलयालम और अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी सीखते और जानते हैं। हिंदी-इतर राज्य अपने को अलग-थलग महसूस करते हैं और हमें शंका की दृष्टि से देखते हैं। अगर हम भी कोई दक्षिण भारतीय या अन्य भाषा सीखते तो वे सहर्ष हिंदी सीखने को तैयार होते और हिंदी सच्चे अर्थो में राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होती। इसके बल पर हमारी राष्ट्रीय एकता और भी मजबूत होती। यूरोपीय यूनियन की आधिकारिक भाषा नीति है कि अपने देश की भाषा के अलावा कोई दो अन्य विदेशी भाषा सीखना भी जरूरी है। इससे यूरोप की एकता मजबूत हो रही है। जब एक देश के लोग दूसरे देशों की भाषा सीख सकते हैं तो अपने देश की एकता के लिए इस नियम को लागू न करना राष्ट्रहित की अनदेखी ही कही जाएगी। अमेरिका जैसे अंग्रेजी वाले देश में स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर एक विदेशी भाषा सीखना अनिवार्य है। उसके बिना डिग्री नहीं मिल सकती है, लेकिन क्या हिंदी भाषी नेतृत्व और अभिजन वर्ग अपनी हिंदी को उसका हक दिलाने के लिए कोई पहल करने के लिए तैयार है?
 
निरंजन कुमार
(लेखक कैलिफोर्निया विवि में प्राध्यापक हैं)
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