Praneet Sushil
unread,Apr 9, 2009, 7:54:59 AM4/9/09Sign in to reply to author
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दोषपूर्ण चुनावी प्रक्रिया लंबे समय तक लोकतांत्रिक राज्य में रहने के बाद अब यह आवाज उठने लगी है कि लोकतंत्र के रास्ते के पहले कदम यानी चुनावी प्रक्रिया में सुधार किए जाएं। इसकी सबसे महत्वपूर्ण वजह यह है कि इस पहले चरण में ही दोष होने के कारण पूरी व्यवस्था पर आंच आ रही है। हालांकि सुधार के जिन पहलुओं की बात इस समय की जा रही है वे कितने सफल होंगे, इस पर विचार करना जरूरी है।
मूल सवाल यह है कि निर्वाचन का उद्देश्य क्या है? निर्वाचन का उद्देश्य है किसी को चुनना। कौन सही है और कौन गलत, यह आपको अपने वोट से साबित करना है। इसलिए चुनाव सुधार के जो भी कदम उठाए जाएं वे इस बात को ध्यान में रखकर उठाए जाएं कि निर्वाचन का मूल उद्देश्य बरकरार रहे। आजकल चुनाव सुधार के जिस प्रयास पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वह है निगेटिव वोटिंग।
पहली बात तो ये कि यह शब्द ही नकारात्मक है। चुनाव का उद्देश्य तो किसी को चुनना होता है। आपने अपना मत किसी एक को दिया तो दूसरे सभी के लिए वह वैसे ही नकारात्मक हो गया। दूसरे उपर्युक्त में से कोई नहीं का जो प्रावधान है वह एक प्रकार से निगेटिव वोटिंग का ही एक रूप है। अगर आप मतदान के दिन जाकर कहें कि इनमें से कोई भी प्रत्याशी योग्य नहीं है तो इसका मतलब क्या होगा? पोलिंग बूथ पर कोई आदमी क्यों जाता है या ले जाया जाता है? बेशक, वोट देने के लिए। जो लोग चुनाव के दिन मतदान करने घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं वे तो वैसे ही नकारात्मक वोटिंग कर रहे हैं। जो लोग इस बात के पक्षधर हों कि कोई भी प्रत्याशी ठीक नहीं है वे मिलकर अपना कोई प्रत्याशी खड़ा कर लें। तब निगेटिव वोटिंग की नौबत ही नहीं आएगी।
दूसरा सुधार राइट टू रिकॉल भी हमारी व्यवस्था में नितांत अव्यावहारिक है। हमारी निर्वाचन व्यवस्था का अर्थ है कि जिस भी उम्मीदवार को सबसे अधिक मत मिले उसे चुना हुआ माना जाए। यह जरूरी नहीं कि उसे बहुमत का समर्थन मिला हो। जहां इतने पंजीकृत दल हों, इतने प्रत्याशी हों, वहां कोई प्रत्याशी पांच-छह प्रतिशत मत पाकर भी विजयी हो सकता है। संविधान आयोग में हमने 2002 में एक अध्ययन किया, जिसमें लोकसभा के तीन और विधानसभा के तीन चुनावों के अध्ययन किए गए। नतीजा यह निकला कि जो लोग जीत कर आते हैं उनमें से 70 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनके विरोध में मत अधिक हैं, पक्ष में कम। ऐसे लोग भी जनता के प्रतिनिधि बनकर सामने आ रहे हैं। तो अब जब 70 प्रतिशत लोग जिसके खिलाफ हैं वह भी जीत रहा है तो उसे क्या रिकाल करेंगे? प्रत्याशी वोट बैंक बनाते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि जिस निर्वाचन क्षेत्र में 15 प्रतिशत लोग एक ही जाति-बिरादरी के हों वहां कोई भी उम्मीदवार 90 प्रतिशत सुनिश्चित हो सकता है कि वह उस जाति के सहारे चुनाव जीत जाएगा। राजनीति में जो निपुण होता है वह इसी पर केंद्रित होकर चुनाव लड़ता है, उसे किसी और मुद्दे की जरूरत ही नहीं। इन्हीं प्रयासों के बीच एक और मुद्दा जो आजकल चर्चा में है वह यह कि अगर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई राजनीतिक गठबंधन बने तो वह चुनाव के पहले बने या चुनाव के बाद। अगर चुनाव के पूर्व कुछ दलों के बीच चुनावी गठबंधन बनता है तो सामाजिक और राजनीतिक, दोनों ही स्तरों पर इसका औचित्य नजर आता है। ऐसे हालात में सामान्यत: यह संदेश जाता है कि विभिन्न दल एकसमान कार्यक्रम और समझ के साथ जनता के सामने जा रहे हैं। तब उन्हें इसी आधार पर जनादेश भी मिलता है, लेकिन जब यही दल, जो पहले अलग-अलग रहते हैं, चुनाव प्रचार के दौरान एक-दूसरे से भिड़ते हैं, आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करते हैं, चुनाव के बाद एक-दूसरे के साथ आते हैं यह जनता के साथ धोखाधड़ी ही होती है। अगर आप चुनाव के बाद फिर उसी दल से समझौता कर लेते हैं जिसकी कल तक आलोचना कर रहे थे तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि आपने जनता को गुमराह किया है।
Subash Kashyap - लेखक लोकसभा के पूर्व महासचिव हैं