- Institute of democracy and electroral assistance के अनुसार, दुनियाभर के अनेक देशों में मतदान करना अनिवार्य है
- NCRWC ने एक रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव में मतदान का कर्तव्य और शासन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी को धारा 51 ए में सम्मिलित करना चाहिए।
मई 2007 में उत्तर प्रदेश के गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र में 2.42 लाख में से केवल 1.1 लाख मतदाताओं ने ही मताधिकार का प्रयोग किया। बहुकोणीय मुकाबले में 29,993 वोट पाने वाला कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार चुनाव जीत गया। यह कुल मतों का मात्र 7.5 प्रतिशत है।
इसी चुनाव में देवरिया में 3.49 लाख मतदाताओं में से कुल 40 फीसदी ने वोट डाले। यह भी बहुकोणीय मुकाबला था, जिसमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार ने महज 7.3 प्रतिशत वोट हासिल कर बाजी मार ली।
वाराणसी कैंट क्षेत्र में केवल 8.2 प्रतिशत वाट हासिल कर भारतीय जनता पार्टी सीट निकाल ले गई।
पिछले एक दशक के दौरान लोकसभा और विधानसभाओं चुनावों में इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण देखने को मिले। इससे पता चलता है कि प्रतिनिधित्व व्यवस्था भयानक रूप से विकृत हो गई है और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत- बहुमत की राय की जीत की जमकर अवहेलना हो रही है। अब समय आ गया है कि हम 1952 में पहले आम चुनाव से जारी एफपीटीपी (First-Past-the-Post) व्यवस्था की प्रभावोत्पादकता की पड़ताल करें। इस व्यवस्था में दोष केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। यही ढर्रा उन तमाम राज्यों में देखने को मिलता है जहां बहुकोणीय मुकाबले होते हैं।
Uttar Pradesh results
2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का विश्लेषण इस विचार की पुष्टि करता है कि वर्तमान चुनाव व्यवस्था विफल हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्रों में से केवल 14 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां से जीतने वाले उम्मीदवार को कुल मतदान के 50 प्रतिशत या इससे अधिक मत मिले यानी 389 उम्मीदवार अपने विधानसभा क्षेत्र के अल्पमत पाकर भी विधानसभा में पहुंच गए।
Karnataka results
कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटों में से 175 सीटों पर विजयी उम्मीदवार 50 प्रतिशत से कम मत हासिल कर पाए।
भारत में चुनाव व्यवस्था के पूरी तरह विफल होने के अनेक कारण हैं। उल्लेखनीय पहलुओं में मतदाताओं की उदासीनता, लोकतंत्र और राजनीति को लेकर बढ़ती हताशा, पिछले 25 सालों में क्षेत्रीय और जातिवादी दलों के उभरने के परिणामस्वरूप प्रजातंत्र के विखंडन और चुनाव में जीत का द्वार नजदीक होना आदि शामिल हैं। लगभग सभी राज्यों में विभिन्न दलों के बीच त्रिकोणीय या चतुर्कोणीय मुकाबले होने के कारण खंडित जनादेश मिलने लगा है, जो प्रतिनिधित्वकारी लोकतंत्र के तमाम दावों को ध्वस्त कर देता है।
1996 के बाद के देश भर के चुनावी आंकड़े जनता की इच्छा और चुनावी जीत के बीच के अंतर्विरोध के ऐसे ही उदाहरणों से भरे पड़े हैं। निर्वाचकों(Voters) में से कुल 40-50 प्रतिशत ही मतदान करते हैं और इनमें भी चार-पांच राजनीतिक दलों में इनकी निष्ठा बंट जाती है। चुनाव क्षेत्र के कुल वोटों का 10 से 20 प्रतिशत हासिल करके ही उम्मीदवार चुनाव जीत जाते हैं। परिणामस्वरूप हम चुनाव में कुल मतदाताओं में से बहुसंख्यकों के जनादेश का लेशमात्र विचार भी फलीभूत होता हुआ नहीं देख पाते। यह हमेशा से एक रहस्य बना हुआ है। अब तक जो होता रहा है, उसे वास्तव में अल्पसंख्यकों की वरीयता ही कहा जा सकता है। हालांकि, अल्पसंख्यक वोटों की नाव में सवार होकर चुनावी नैया पार करने के बढ़ते साक्ष्यों के बावजूद, इस दोषपूर्ण व्यवस्था से लाभान्वित होने वाले राजनेता इस रोग की जड़ काटने के इच्छुक नजर नहीं आते। किंतु वे तमाम लोग जो भारत में सही अर्थो में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के पक्षधर हैं, इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए कानूनी उपाय तलाशते रहते हैं। अनेक समाधानों में से मेरी निगाह में सबसे आकर्षक उपाय है- अनिवार्य मतदान।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को गहराई और सार्थकता प्रदान करने की दिशा में यह पहला कदम है। इस विचार में कुछ भी मौलिकता या नवीनता नहीं है। किसी न किसी रूप में यह विचार 33 देशों में क्रियान्वित (implemented) किया जा रहा है। इनमें कुछ देशों में तो यह एक सदी से भी पहले से लागू है। आईडीईए (Institute of democracy and electroral assistance) के अनुसार, दुनियाभर के अनेक देशों में मतदान करना अनिवार्य है। इनमें से प्रमुख हैं बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, अर्र्जेटीना, आस्टि्रया, साइप्रस, पेरू, ग्रीस और बोलीविया। 1892 में मतदान को अनिवार्य कर बेल्जियम ने इस दिशा में पहला कदम उठाया। 1924 में आस्ट्रेलिया ने इसे लागू किया। अनिवार्य मतदान के संबंध में हमें इन तमाम देशों में लागू कानूनी प्रावधानों का अध्ययन कर भारतीय स्थितियों के अनुकूल प्रावधान तैयार करने चाहिए। इस नियम का उल्लंघन करने वालों पर लगाया जाने वाला जुर्माना हर देश में अलग-अलग है।
उदाहरण के लिए,
आस्ट्रेलिया में मतदान से विमुख रहने वालों पर 20 से 50 डालर का जुर्माना लगाया जाता है। जो लोग जुर्माना अदा नहीं करते, उन्हें जेल की
हवा खानी पड़ सकती है।
स्विट्जरलैंड, आस्टि्रया, साइप्रस और पेरू में भी मतदान से गैरहाजिर रहने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है।
बेल्जियम में चुनाव से अनुपस्थिति की गलती दोहराए जाने पर नागरिकों को मतदान अधिकारों से वंचित भी किया जा सकता है।
सिंगापुर में जो लोग वोट नहीं डालते उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाता है। फिर से मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में काफी
दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
बोलीविया में मतदान में भाग न लेने पर वेतन कट जाता है जबकि ग्रीस में मतदान से मुंह चुराने वाले लोगों को पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में कड़ी शर्तो का पालन करना पड़ता है।
भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों से संबंधित धारा में अनिवार्य मतदान का प्रावधान शामिल करना होगा। चुनाव में मतदान को मौलिक कर्तव्यों में शामिल किया जाना चाहिए। मतदान का अधिकार मतदान का कर्तव्य भी बनना चाहिए। एनसीआरडब्ल्यूसी (National Commission to Review the working of the Constitution) ने इस प्रकार की अनुशंसा की है। एनसीआरडब्ल्यूसी ने एक रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव में मतदान का कर्तव्य और शासन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी को धारा 51 ए में सम्मिलित करना चाहिए। कम वोटों के सहारे जीत हासिल करने वाले राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे प्रावधान के विरोध में की जाने वाली अडंगेबाजी ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को शर्मसार कर दिया है। हम भारत की लोकतांत्रिक यात्रा को तभी विश्वसनीयता प्रदान कर सकते हैं, जब मतदान को अनिवार्य करने के दुश्कर किंतु अपरिहार्य फैसले को लागू करें। अगर हम इसमें असफल हो जाते हैं और अपने नागरिकों को मतदान की अवमानना करने की छूट देना बंद नहीं करते तो लोकतंत्र विरोधी ताकतें इसी तरह से चुनाव का मखौल उड़ाती रहेंगी, जैसाकि इस समय हो भी रहा है। अगर यह जारी रहा, तो इससे भारत में बचे-खुचे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का भी अंत हो जाएगा।
- A. SuryaPrakash, Author is a senior column writer of Dainik Jagaran