Need of determination of Concious Voting to change the Nation

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Praneet Sushil

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Mar 24, 2009, 7:25:45 AM3/24/09
to yfece...@googlegroups.com, pu...@googlegroups.com, P.k. Singh, vikk...@yahoo.com, prabuddha....@gmail.com, Amit, amitphi...@gmail.com, amit78_...@yahoo.co.in, rajendra99, Birendra Kumar, ACT India
आम चुनावों के निरर्थक साबित हो जाने के खतरे को रेखांकित कर रहे हैं राजीव सचान
 
चुनाव आयोग वरुण गांधी को तो चुनाव मैदान में न उतारने की सलाह दे रहा है, क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने किसी के हाथ काटने, सबक सिखाने आदि की धमकी दी और ऐसा कहकर वैमनस्य फैलाया, लेकिन जिन पर वास्तव में किसी की जान लेने, जानलेवा हमले करने-कराने, दंगा भड़काने, दूसरों की संपत्ति जबरन हथियाने के संगीन आरोप हैं उन्हें वह चुनाव लड़ने से रोक पाने में असमर्थ है?
 
क्या सौ करोड़ से अधिक आबादी और 70 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की इससे बड़ी बेइज्जती और कोई हो सकती है कि मुख्तार अंसारी, अफजल अंसारी, रमाकांत यादव, धनजंय सिंह जैसे बाहुबली तथा कुख्यात छवि वाले दर्जनों लोग चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। ये अति कुख्यात और आम जनता को भयातंकित करने वाले लोग केवल इसलिए चुनाव लड़ने में समर्थ नहीं हैं कि चुनाव आयोग ऐसे लोगों पर अंकुश लगाने के मामले में कागजी शेर है, बल्कि इसलिए हैं कि कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ गरीबों, मजदूरों और न्याय, समानता वगैरह के लिए लड़ाई लड़ाने का बढ़-चढ़ कर दावा करने वाले तमाम क्षेत्रीय दल भी उन्हें चुनाव लड़ने के लिए सादर आमंत्रित कर रहे हैं।
यदि कल को दाऊद इब्राहिम और प्रभाकरण जीवित भारत लाए जा सकें तो परसों से उन्हें भी चुनाव मैदान में उतारने वाले दल आगे आने में संकोच नहीं करेंगे। यदि राजनीतिक दलों में कोई शर्म-संकोच शेष होता तो अबू सलेम, बबलू श्रीवास्तव,अब्दुल नसीर मदनी और बृजेश सिंह जैसे माफिया सरगना चुनाव लड़ने का मन नहीं बना रहे होते।
 
क्या 70 करोड़ से अधिक मतदाताओं की समझदारी का इससे अधिक उपहास उड़ाया जा सकता है कि ऐसे लोगों को सोशल इंजीनियरिंग, सर्वजन, भाईचारा अथवा भटके हुओं को सुधारने की आड़ में प्रत्याशी बनाया जा रहा है?
क्या न्याय और विधि के शासन के खोखलेपन का इससे भद्दा और बेहूदा उदाहरण और कोई हो सकता है कि राज ठाकरे नामक जिस तथाकथित राजनीतिक शख्स ने हजारों उत्तर भारतीयों को मुंबई, नासिक, सतारा आदि शहरों से पलायन के लिए विवश किया और सार्वजनिक रूप से उनकी पिटाई की वह अपने उन तमाम साथियों को चुनाव मैदान में खड़ा करने जा रहा है जिन्हें मुंबई की भाषा में मवाली कहा जा सकता है?
 
इस पर अवश्य गौर करें कि जब मुंबई में उत्तर भारतीय प्रताडि़त हो रहे थे तब राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी थी और हमारे प्रधानमंत्री कह रहे थे कि मैं क्या कर सकता हूं? क्या ऐसे देश में कभी वास्तव में साफ-सुथरे चुनाव हो सकते हैं जहां नामांकन के पहले प्रत्याशियों द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन के हजारों मामले सामने आ जाते हों और जहां राजनीतिक दल चुनाव आयोग की आंखों में धूल झोंकने की फिराक में रहते हों?
 
तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े पैरोकार वे वाम दल हैं जो भारत से अधिक चीन और ईरान के हितों की परवाह करते हैं और जो मजदूरों-किसानों की बात करते हैं, लेकिन नंदीग्राम में उन्हें ही घेर कर मारते हैं। इस पर भी ध्यान दें कि ये वही वाम दल हैं जो औरों को पंथनिरपेक्ष होने-न होने का प्रमाण पत्र देते हैं, लेकिन तस्लीमा नसरीन को कोलकाता में शरण देने से इनकार करते हैं।
 
क्या इससे बड़ा दिवास्वप्न और कोई हो सकता है कि उस देश के लोग अपने यहां ओबामा सरीखे राजनेता के उदय की राह तक रहे हैं जहां के नेता मंत्री क्या, सांसद और विधायक बनते ही लखपति बन जाते हैं और फिर धीरे-धीरे करोड़पति तथा एक झटके में अरबपति? हमारे देश में न जाने कितने ऐसे नेता हैं जो भर्ती, स्थानांतरण, पदोन्नति, सरकारी खरीद में रिश्वत और दलाली खाते हैं अथवा अपने रिश्तेदारों को बड़े-बड़े सरकारी ठेके दिलवाते हैं।
 
क्या ऐसे देश में वोट और वोटर की कोई महत्ता कायम हो सकती है जहां एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल चुनाव बाद यह कहते हुए हाथ मिला लेते हों कि वे राष्ट्रहित में अपने मतभेद भुला रहे हैं, जबकि यथार्थ में यह मेल-पिलाप मनमाफिक मंत्री पद या नोटों से भरे बैग हासिल कर लेने के कारण होता है?
 
क्या वह गठबंधन राजनीति कभी किसी समाज, राष्ट्र का भला कर सकती है जिसमें घटक दल सरकार को धमकाने और ब्लैकमेल करने में कामयाब हो जाते हों तथा सरकार को भी उनके समक्ष समर्पण करने में लाज न आती हो?
 
क्या ऐसे देश में संविधान, लोकतंात्रिक मूल्यों और आदर्र्शो की रक्षा हो सकती है जहां किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए विदेश गए राष्ट्रपति को सोते से जगाया जाता हो?
 
नि:संदेह परिदृश्य बड़ा ही निराशाजनक है, लेकिन इस निराशा भरे माहौल में आशा की एक किरण भी है और वह है नाकारा, निकम्मे, चालबाज, गुंडों, मवालियों, माफिया सरगनाओं और भ्रष्ट तत्वों को वोट न देने की प्रतिज्ञा के रूप में। यदि यह प्रतिज्ञा नहीं ली गई तो जो चुनाव होने जा रहे हैं वे अनावश्यक तो सिद्ध होंगे ही, बेहतर भविष्य की बची-खुची उम्मीदें भी ध्वस्त हो जाएंगी। 2009 के लोकसभा चुनाव हमारी समस्त समस्याओं का समाधान नहींकर सकते, लेकिन यदि समझदारी से वोट दिए जाएं तो वे हमें बेहतर कल की राह अवश्य दिखा सकते हैं।
 
Raajiv Sachaan - Associate Editor of Dainik Jagaran
 
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