Praneet Sushil
unread,Mar 30, 2009, 9:56:07 AM3/30/09Sign in to reply to author
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सुधार का आखिरी अवसर राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण न केवल शांति व्यवस्था के लिए, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी एक बड़ा खतरा है। विचित्र यह है कि सभी पार्टियां इस विषय पर सैद्घांतिक रूप से सहमत हैं और यह मानती हैं कि चुनाव प्रक्रिया में वांछित सुधार होने चाहिए, लेकिन कोई इसके लिए वास्तव में आगे नहीं आ रहा।
पिछली लोकसभा में भी 125 व्यक्ति ऐसे थे जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि थी। ऐसा नहीं कि वह किसी विशेष पार्टी या कुछ क्षेत्रों तक सीमित थे। इस सूची के व्यक्ति 17 अलग-अलग पार्टियों के थे और 17 राज्यों तथा 2 केंद्र शासित प्रदेशों के थे। आने वाली लोकसभा में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही बनेगी, बदतर भी हो सकती है। सबसे बड़ा सुधार जिसकी तात्कालिक आवश्यकता है वह यह है कि जिन व्यक्तियों के विरुद्घ अदालत में गंभीर अपराध संबंधी आरोपों पर चार्ज बनाए गए हैं उन्हें चुनाव लड़ने ही नहीं दिया जाना चाहिए।
अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो शायद कुछ वर्षो में विधानसभाओं और लोकसभा में आपराधिक तत्वों का ही बोलबाला होगा। ऐसी दशा में लोकतंत्र का जो भयावह स्वरूप हमारे सामने होगा उसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। क्या भारत देश भी एक क्रिमिनल स्टेट बन जाएगा? राजनीतिक पार्टियों पर भी कुछ नियम सख्ती से लागू करने की जरूरत है।
यह विडंबना है कि इस देश में राजनीतिक पार्टियों पर कोई नियम या कानून लागू नहीं होता।
उनके पास पैसा कहां से आता है?
उस पैसे को पार्टियां कैसे खर्च करती हैं?
पार्टी के अंदर कितनी डेमोक्रेसी है?
इन बातों की कोई जवाबदेही नहीं है। वैसे भी देखा जाए तो यह कैसा लोकतंत्र है जहां सुरक्षा बलों के साये में चुनाव कराए जाते हैं। आज कोई भी प्रदेश केंद्रीय बलों की सहायता के बिना अपने बूते पर चुनाव कराने की स्थिति में नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में गुंडे, बदमाश सक्रिय हो जाते हैं कि उन पर अंकुश लगाने के लिए भारी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात न किए जाएं तो चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा।
यह लोकतंत्र है या गुंडातंत्र? पिछले वर्षो में एक और बात जो देखने को मिली उससे चिंता और बढ़ जाती है। अभी तक आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति केवल विधानसभा या लोकसभा के सदस्य चुने जाते थे, परंतु अब तो ऐसे व्यक्ति मंत्रिमंडल में भी शामिल किए जाने लगे हैं। जिस दिन गृहमंत्री पद पर कोई अपराधी बैठ जाएगा उस दिन क्या होगा? अगर हमारा लोकतंत्र इसी तरह ढलान पर रहा तो शायद किसी दिन कोई माफिया प्रधानमंत्री भी बन सकता है। हम कहां जा रहे हैं? यह कैसा लोकतंत्र है? हमारे नेता, हमारी पार्टियां आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए तैयार होंगी या नहीं? अभी तक तो कोई सहमति नहीं बनी है और भविष्य के लिए भी कोई शुभ संकेत नहीं है। ऐसी दशा में आम आदमी, जिसकी सभी पार्टियां दुहाई देती हैं, कहां जाएगा? किसका दरवाजा खटखटाएगा? कहां न्याय की गुहार करेगा? यह सब सवाल मष्तिस्क में उठते हैं।
देश के साथ तीन वर्गो ने जो विश्वासघात किया है उसे आने वाली पीढि़यां कभी माफ नहीं करेंगी।
पहला वर्ग है उन नेताओं का है जो अपने स्वार्थ के अलावा और कुछ नहीं देखते। राष्ट्रीय हित और सम्मान से इन्हें कोई सरोकार नहीं है। जिन नेताओं को कुछ सरोकार है उनकी नक्कारखाने में तूती जैसी आवाज होती है।
दूसरा वर्ग है अफसरों का, जिन्होंने नौकरियों को जनसेवा का माध्यम न मानकर स्वार्थ सिद्घि का साधन बना लिया है। आज कितने ही अफसर ऐसे हैं जिनके पास पचासों करोड़ की संपत्ति है, कोई पूछने वाला नहीं है। इन अधिकारियों से साधारण जनता के प्रति किस संवेदनशीलता की अपेक्षा की जा सकती है?
तीसरा वर्ग है उन व्यापारियों का जो अपनी तिजोरियां भरने के लिए हर गलत कार्य करने को तैयार हैं। हर सामान या तो नकली है या उसमें मिलावट है। दवा के बजाय अगर उनको जहर भी देना हो तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती। देश में एक तरफ करोड़पतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ एशियन डेवलपमेंट बैंक के मापदंड के आधार के अनुसार देश की आधी जनता गरीबी रेखा के नीचे है।
राजनीति और अपराध के बीच की रेखा धूमिल हो गई है। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार नेता वर्ग ही है। सत्ता में बने रहने के लिए उसने अपराधियों का सहारा लिया और इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अपराधी स्वयं नेता होते जा रहे हैं। कुछ नेता जो अपराधियों के खिलाफ डंका बजाकर चुनाव लडे़ वे आज अपराधियों को गले लगा रहे हैं। आने वाला चुनाव जनता के लिए आखिरी मौका है। अगर इस चुनाव में सही प्रतिनिधि नहीं चुने गए और केंद्र में सही मायने में लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्घ सरकार नहीं बनी तो जनता और अधिक कष्ट में डूबने के लिए तैयार रहे। देश तो विनाश के गर्त में जाएगा ही।
प्रकाश सिंह - लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी हैं
Youth For Equality