आज का विषय है विवाह तो हमने पुराणों में पाया की एक ही विवाह है तो उत्सव का आनन्द देता है और साथ ही साथ सुनने में भी आनन्द आता है वो माँ भवानी और पिता महादेव का, तो आनन्द के इस उत्सव पर आप भी आजाये और हम सब मिल के इसका आनन्द मनाये I
पार्वती जी के समीप सप्तऋषि जाते है
और कहते है की महादेव से विवाह का विचार छोड़े दे तो माता कहती है
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
करोडो जन्म यहीं हठ रहेगा की विवाह संभु से होगा अन्यथा कुवारी रहूंगी, मैं नारद के उपदेश को नहीं छोड़ूँगी चाहे महेश आके सौ बार कहे
ये उत्तर सुन कर, सप्त ऋषि बोले
दोहा :
तुम्ह माया भगवान सिव सकल गजत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥81॥
भाव :आप माया है और भगवान शिव है और आप दोनों इस जगत के माता और पिता है और उन्होंने माता को प्रणाम किया और आनन्द मानते हुए वहा से चाले गए
बरातियो की तैयारी
दोहा :
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥91॥
भाव : सभी देवता वाहन और विमान सजाने लगे और शकुन होने लगे, अप्सरा गाने लगी
शिवजी का दूल्हा वाला श्रृंगार
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
भाव : शंकर जी के गण उनका श्रृंगार करते है (चुकी उनके ना माता है न पिता है न भाई है न बहन है तो कौन करेगा श्रृंगार तो महादेव गणों ने ये बाजी मार ली, तो शंकर जी का श्रृंगार उनके गण कैसे करते है तो देखिये ).
भगवान शंकर के सर पर जटाओं का मुकुट है और उसमे सर्प को मौर के पंख की तरह सजाया है (दूल्हा विवाह में एक प्रकार का मुकुट पहनता है और उस पर मौर का पंख लगाया जाता है ताकि सुन्दरता और अधिक लगे परन्तु भगवान शंकर के सिर पर तो पहले से ही जटाओं का मुकुट है जिस में गंगा जी रहती है और सर्प पंख की तरह लहराह होता है)
कानों में और हाथो में, सर्प के कुंडल और कंगन पहने हुए है और शरीर में बिभूति (राख) मली है और छाल पहने हुए है (दुल्हे का नाप का कुंडल और कंकर कहासे लाये तो शिव गणों ने देखा की सर्पो के कुंडल बना बना कर कानों के छेदों में डाल दिए और बाकि को हाथो में बन्ध दिया और सर्पो को बोल दिया की भागना नहीं है जब तक शादी न हो जाये, यू अरे on emergency duty).
अब दुल्हे के मुख का सोंदर्य होता है उनके माथे पर चन्द्रमा और सर पर सुन्दर गंगा जी का निवास है और उनके तीन नेत्र है जनेऊ भी उन्होंने सर्पो का ही पहना हुआ है ( चन्द्रमा अपने सौन्दर्य के साथ है परन्तु आधा है तो और भी सुन्दर दीखता है सर में जटाओं के बीच गंगा जी धूम रही है भगवान शंकर के तीन नेत्र भी है एक बंद रहता है दो सदैव खुले रहते है और शरीर पर जनेऊ भी उन्होंने सर्पो का ही पहनें हुए है )
गले में कालकूट विष भरा है और नरो की मुंड माला पहनी हुई है ये अमंगल वेष है परन्तु मंगल के धाम है (जब समुन्द्र मंथन में विष निकला तो शंकर भगवान ने उसको अपने कंठ में भर लिए था और इसलिए वो नील कंठ कहलाये और उन्होंने मारे हुए लोगो के सरो में से जो मुंड रह जाता है उसकी एक माला बना ली और उसको वो पहनते है यदपि वो अमंगल स्वरूप है तो भी मंगल के धाम है)
उनके हाथो में त्रिशूल और डमरू है और वो अपने वाहन नंदी बैल पर चढ़ गए और बाजे बजने लगे ( त्रिशूल के लिए कहा जाता है “जो तोको काटे बोवे तू वाको बो फूल, तो को फूल का फूल है वो को है त्रिशूल” और हाथो में डमरू बज रहा है तो नंदी बैल को धर्म का प्रतिक है उस पर बैठ के चल पड़े है )
देवताओ का बारात से अलग हो जाना
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
भाव : भगवान शंकर के सौन्दर्य को देखकर देवताओ की पत्निया मुस्कुराती है और व्यंग करती है की वर के लायक दुल्हनी जग में नहीं है और विष्णु जी ब्रह्मा जी और अन्य देव भ्राता अपने वाहन पर चढ़ के बारात पर चले ! देवताओ का समाज हर प्रकार से अतुलनीय है परन्तु ये (बराती) बरात दुल्हे के अनुरूप नहीं है
दोहा
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
भाव : बरातियो में विष्णु जी ने सभी दिक्पालो को हँसते हुए कहा “सब अलग अलग होके चलो अपने समाज के साथ चलो”
चौपाई :
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥1॥
भाव : और बोले की हमारी ये बरात वर के अनुरूप नहीं है क्या अपनी हँसी कराओगे दुसरे नगर जाकर, विष्णु जी वचन के वचन सुन कर देवता मुस्कुराने लगते है और अपनी सेना के साथ अलग हो गए
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥2॥
भाव : भगवान शंकर मन ही मन मुस्कुराते है और कहते है की हरी का मजाक नहीं जाता है
अपने प्यारे के वचन सुन कर (के हम लोग बारात से अलग चलेंगे और बारात के संग नहीं चलेंगे) अपने सेवक भृंगी को बोला की सभी गणों को बुलालो ! हर हर महादेव !
भगवान शंकर का समाज और उनके विवाह के बाराती
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥3॥
भाव : भृंगी ने भगवान शंकर का आदेश सभी शिव गणों को कह सुनाया तो सभी गण ! हर हर महादेव ! कहते हुए वहाँ पहुँच गए और भगवान शंकर के चरणों में शीश नवाया ( और ये आदेश सुना दिया गया की सभी को बारात में चलना है सभी को ये पता नहीं था की भगवान शंकर विवाह करने वाले है जब बरातियो ने कहाँ की हमारा समाज वर के समाज से मेल नहीं खाता है और हम तो अलग से बारात में चलेंगे तो प्रशन बना की यदि वर अकेला चलेगा तो और मजाक बनेगा तो शिव जी ने अपने गणों को आदेश दे दिया की सब तैयारी करके आयेंगे सभी को आज पता चलेगा की बारात में चलना क्या होता है ! हर हर महादेव !) जब शिव गण वहाँ पहुंचे तो शिव जी ने देखा की विभिन्न भेष वाले और विभिन्न सवारियां सजी हुई है और उनकों देख के शिव जी हसने लगे ( अब चलेगा का पता बच्चू ) !
शिव जी के गणों का वर्णन बरातियो के रूप में होता है
कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥4॥
भाव : कोई तो मुख से रहित है और किसी के कई मुख है किसी के पैर ही नहीं है और किसी के बहुत ( दो से अधिक) पैर है किसी के कई (दो से ज्यादा) आखें है और किसी के एक भी आखं नहीं है किसी की देह रिष्टपुष्ट है और किसी की देह ज्जर है (जैसे की किसी को कुपुष्ण का रोग हो). ! हर हर महादेव !
छंद :
तन कीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
भाव : कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता। (अरे ये बारात है या जंगलियो और भुत प्रेतों का जमावड़ा, इतनी भयानक बारात है ये तो मारे हुए जीवौ की खोपडिया हाथ में लिए हुए बारात में फिर रहे है अरे क्या हिमालय में ! धारा 144 लगाने का इरादा है और शरीर में ताजा खून लपेटे हुए है अरे ये क्या है ये ! हर हर महादेव ! है चेहरा तो देखिये कैसा है गधे, कुते, सुआर और सियार जैसा है एक से एक अजूबा है महादेव की बारात में इसे देख के तो अच्छे अच्छे के पैर भी उखड जाये और सामान्य जन की तो बात ही क्या, अरे इन्होने ये भी नहीं सोचा की बारात में बूढ़े लोग होते है, महिलाये होती है, बच्चे भी होते है क्या ये चाहते है की सभी की बलि एक ही दिन चढ़ जाये, और बारात में तो सबसे पहले तो दुल्हे का मुख देखने के लिए कुवारियां द्वार पर खड़ी होती है और एक तो पानी का मटका लिए होती है खिन उसी की खोपड़ी न गिरा दे ये बाराती ! हर हर महादेव !, बवाल मचा के छोड़ेंगे ये तो इन्होने सोच लिया है की बारात तो अब ये अन्दर घुसा ही नहीं पाएंगे )
सोरठा :
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥93॥
भाव : सभी भुत और नाचने गाने वाले नाचते है गाते है देखने में बहुत ही अजीब से दिखते है और बहुत ही विचित्र बोली बोलते है
शिव रात्रि की हार्दिक शुभकामनाये