कविता : राष्ट्र प्रेम
(राष्ट्र प्रेमियों को समर्पित)
वीरकोमल आँचलमें पलते है I
उनके पैर पालने में ही दिखते हैII
जब मातृ धरा में पद रखते है I
उससे पूर्व इसको नमन करते है II
वन्दे मातरम् की ध्वनि गुंजाते है I
अपनेप्राणों को राष्ट्र रक्षा में लगाते हैII
राष्ट्र धर्म को निज स्वार्थ बनाते है I
निज स्वार्थ मानकर सर्वस्व लुटाते हैII
प्रेम बलिदान मातृ भूमि राष्ट्र शब्द जानते है I
शब्दकोष की झोली में अन्य शब्द नहीं पहचानते है II
लेखक : ओदाजी (08/08/2021)
कविता : राष्ट्र प्रेम
(राष्ट्र प्रेमियों को समर्पित)
स्वतंत्र राष्ट्र में उज्जवल भविष्य बनायेगें I
स्वयं आगे होकर राष्ट्र को आगे ले जायेंगे I I
रात दिन दिन रात की माला बनायेंगे I
हर राह में मोती हो ऐसा दीप जलायेंगेI I
हिमालय पर तिरंगा और गगन में धुनी सुनायेंगे I
पड़ोसियों को भी मधुर मिष्ठान खिलायेंगे I I
सत्कार चमत्कार हथियार के भी दर्शन करायेंगे I
पूज्य धरा पर न पद पड़े ऐसा शौर्य दिखायेंगे I I
कविता : राष्ट्र प्रेम
(राष्ट्र प्रेमियों को समर्पित)
स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक गर्व कर I
राष्ट्र धरोहर का पूजन कर I I
स्वतंत्रता प्रेमियों को नमन कर I
उनके बलिदान को नमन कर I I
दिन रात को एक मान कर I
पल पल में जीवन दान कर I I
विपरीत व्यवस्था से लड़ कर I
आगे दिन रात बढ़ कर I I
निज स्वार्थों से ऊपर उठकर I
चैन नीद को त्याग कर I I
अनगिनत संग्रामियों के त्याग पर I
उनके तन मन धन मार्ग पर I I
बहाया रक्त जल मान कर I
भूख प्यास विश्राम त्याग कर I I
राष्ट्र वंदना प्रेम मानकर I
दी स्वतन्त्रता अपना मानकर I I