हंद सहत्य क इतहस एक महत्वपूर्ण वषय है, ज हंद सहत्य के वकस, प्रकर, प्रवृत्त, प्रमुख कव और लेखकं, रत-कल, आधुनकत, समज-संस्कृत, भष-शैल, समक्ष-सद्धंत आद के बरे में जनकर प्रदन करत है हंद सहत्य क इतहस लखने के लए कई वद्वनं ने अपने यगदन दए हैं, में से एक हैं ड. नगेन्द्र
ड. नगेन्द्र क पूर नम नरेश कुमर है, ज 1926 में मुरदनगर, मेरठ (उत्तर प्रदेश) में पैद हुए उन्हंने 1952 में कुमरनंद के सहसंपदक के रूप में समक्ष-लेखन क शुरुआत क, 1954 में हंदुस्तन में समकलन हंद सहत्य क समक्ष-संपदन कय, 1956 में हंदुस्तन में हंद समक्ष क संपदन कय, 1960 में सहत्य-संस्थन, कश हन्दू वश्व-वधलय में हंद समक्ष क संपदन करते हुए हंद समक्ष के प्र. रमेश-कुमर के सह-संपदक हुए, 1962 में हमल-प्रकशन, लखनऊ में हमल के संपदक हुए, 1964 में सहत्य-संस्थन, कश हन्दू वश्व-वधलय में हमल के प्र. रमेश-कुमर के सह-संपदक हुए, 1966 में हंद सहत्य क इतहस क प्रथम संस्करण प्रकशत हुआ, 1970 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क प्रथम संस्करण प्रकशत हुआ, 1972 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क दूसर संस्करण प्रकशत हुआ, 1974 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क तसर संस्करण प्रकशत हुआ, 1976 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क चथ संस्करण प्रकशत हुआ, 1978 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क पँचव संस्करण प्रकशत हुआ, 1980 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क छठ संस्करण प्रकशत हुआ, 1982 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क सतव संस्करण प्रकशत हुआ, 1984 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क आठव संस्करण प्रकशत हुआ, 1986 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क नंव संस्करण प्रकशत हुआ, 1988 में हंद सहत्य क बृहत इतहस क दसव संस्करण प्रकशत हुआ, 1990 में हंद समक्ष के प्र. रमेश-कुमर के मृत्युपरन्त प्र. नरेश-कुमर (नगेन्द्र) हंद समक्ष के मुख्य-संपदक हुए, 1992 में ह में आपके लए लेख क जर रखने क कशश करूंग
हंद सहत्य क बृहत इतहस ड. नगेन्द्र क सर्वधक प्रसद्ध और प्रभवशल ग्रन्थ है, ज हंद सहत्य के समस्त पहलुओं क व्यपक रूप से समेटत है इस ग्रन्थ में हंद सहत्य के आरंभ से लेखन के समकलन कल तक क वस्तृत और वश्लेषणत्मक परचय प्रस्तुत कय गय है इसमें हंद सहत्य के प्रमुख प्रकर, प्रमुख प्रवृत्त, प्रमुख कव्य-प्रकर, प्रमुख सहत्य-संस्थएं, प्रमुख समक्ष-संस्थएं, प्रमुख समक्ष-सद्धंत, प्रमुख समक्षक, प्रमुख कव, प्रमुख लेखक, प्रमुख रचनएं, प्रमुख पुरस्कर आद क संक्षप्त परन्तु संपूर्ण परचय मलत है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य क न महत्वपूर्ण कल-क्रमं में वभजत करके परचत करय गय है, ज हैं: (1) प्रचन-कल (500-1200), (2) मध्य-कल (1200-1800), (3) नव-कल (1800-1918), (4) न:संतन-कल (1918-1936), (5) न:संतनत्तर-कल (1936-1947), (6) न:संतनत्तरत्तर-कल (1947-1960), (7) लेखन-कल (1960-1975), (8) लेखन-पर-कल (1975-1990), (9) लेखन-समकलन-कल (1990-2023)
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हर कल के अंतर्गत हंद सहत्य के प्रमुख पहलुओं, प्रमुख प्रत अब मैं लेख क जर रखत हूं
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हर कल के अंतर्गत हंद सहत्य के प्रमुख पहलुओं, प्रमुख प्रतभओं, प्रमुख रचनओं, प्रमुख समक्ष-सद्धंतं, प्रमुख समक्ष-संस्थओं, प्रमुख समक्ष-परप्रेक्ष्यं, प्रमुख समक्ष-प्रक्रयओं, प्रमुख समक्ष-परणमं, प्रमुख समक्ष-समस्यओं, प्रमुख समक्ष-सुझवं आद क परचय, परप्रेक्ष्य, परणम, समक्ष और मूल्यंकन कय गय है इस ग्रन्थ में हंद सहत्य के सन्दर्य, सत्य, प्रेम, करुण, वर, रद्र, भक्त, शृंगर, हस्य, करुण, वभत्स, भयनक, अद्भुत आद रसं क भ प्रतपदन कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख कल-सन्दर्य-सद्धंत के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) नट्य-सन्दर्य-सद्धंत (Bharata Muni), (2) कव्य-सन्दर्य-सद्धंत (Anandavardhana), (3) रस-सन्दर्य-सद्धंत (Abhinavagupta), (4) रत-सन्दर्य-सद्धंत (Vamana), (5) ध्वन-सन्दर्य-सद्धंत (Anandavardhana), (6) लक-सन्दर्य-सद्धंत (Premchand), (7) प्रगत-सन्दर्य-सद्धंत (Nirala), (8) वकस-सन्दर्य-सद्धंत (Bachchan), (9) वशेषत-सन्दर्य-सद्धंत (Dinkar), (10) ववेचन-सन्दर्य-सद्धंत (Nagendra) आद इन सद्धंतं के अनुसर हंद सहत्य के कल-सन्दर्य क मपदंड नर्धरत कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख समकलन प्रवृत्त के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) प्रगत-प्रवृत, (2) प्रज-प्रवृत, (3) प्रकृत-प्रवृत, (4) प्रेम-प्रवृत, (5) प्रकल्प-प्रवृत, (6) प्रकल्पत्तर-प्रवृत, (7) प्रकल्पत्तरत्तर-प्रवृत, (8) प्रकल्पंमुक्त-प्रवृत, (9) प्रकल्पंमुक्तंमुक्त-प्रवृत, (10) प्रकल्पंमुक्तंमुक्तंमुक्त-प्रवृत आद इन प्रवृत्तयं के अनुसर हंद सहत्य के समकलन वकस क चत्रण कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख समकलन समस्य के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) भष-समस्य, (2) शैल-समस्य, (3) रस-समस्य, (4) रत-समस्य, (5) ध्वन-समस्य, (6) लक-समस्य, (7) प्रगत-समस्य, (8) प्रज-समस्य, (9) प्रकृत-समस्य, (10) प्रेम-समस्य आद इन समस्यओं के करण, प्रकर, प्रभव, समधन आद क वश्लेषण कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख समकलन सुझव के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) भष-सुझव, (2) शैल-सुझव, (3) रस-सुझव, (4) रत-सुझव, (5) ध्वन-सुझव, (6) लक-सुझव, (7) प्रगत-सुझव, (8) प्रज-सुझव, (9) प्रकृत-सुझव, (10) प्रेम-सुझव आद इन सुझवं के मूल, उद्देश्य, परणम, महत्त्व, परप्रेक्ष्य, परप्रेक्ष्त, परप्रेक्ष्त, परप्रेक्ष्तंमुक्त, परप्रेक्ष्तंमुक्तंमुक्त, परप्रेक्ष्तंमुक्तंमुक्तंमुक्त आद क परचय कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख समकलन समस्य के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) भष-समस्य, (2) शैल-समस्य, (3) रस-समस्य, (4) रत-समस्य, (5) ध्वन-समस्य, (6) लक-समस्य, (7) प्रगत-समस्य, (8) प्रज-समस्य, (9) प्रकृत-समस्य, (10) प्रेम-समस्य आद इन समस्यओं के करण, प्रकर, प्रभव, समधन आद क वश्लेषण कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हंद सहत्य के प्रमुख समकलन सुझव के बरे में भ प्रकश कय गय है, ज हैं: (1) भष-सुझव, (2) शैल-सुझव, (3) रस-सुझव, (4) रत-सुझव, (5) ध्वन-सुझव, (6) लक-सुझव, (7) प्रगत-सुझव, (8) प्रज-सुझव, (9) प्रकृत-सुझव, (10) प्रेम-सुझव आद इन सुझवं के मूल, उद्देश्य, परणम, महत्त्व, परप्रेक्ष्य, परप्रेक्ष्त, परप्रेक्ष्त, परप्रेक्ष्तंमुक्त, परप्रेक्ष्तंमुक्तंमुक्त, परप्रेक्ष्तंमुक्तंमुक्तंमुक्त आद क परचय कय गय है
हंद सहत्य क बृहत इतहस में हं
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