[Sanjay Kumar Maithil] Sanshay Aur Nivaran

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Jha Saheb

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Mar 4, 2012, 3:03:46 AM3/4/12
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संशय

बरिसक बाद गे भेटलें बुच्ची

कोना बिसरलें तअरे तअर

कोहनी तोर लगय सीना पर

मोन तोहर की कत्थिक गअर

तन केर छाछ नैन केर माछ

तिलकोर अधर ऊपर-ऊपर

जे कंप-कंपी एहि चैतक दिन

भीतर जी में की चैल रहल

अनुरोध-विरोध कथे छोऊ भिन्न

मेघ सुखल किया लट छोऊ खिन्न

ई छटपट्टी के कारण की

तूंही कहि दे निवारण की

निवारण

प्रेमक बोझ सहल नहि जाय

मेलक जी कहल नहि जाय

इन्टरनेट नहि काज कअ रहल

तें विचित्र हम अहाँ बुझाय

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Posted By Jha Saheb to Sanjay Kumar Maithil at 3/04/2012 01:33:00 PM
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