संशय
बरिसक बाद गे भेटलें बुच्ची
कोना बिसरलें तअरे तअर
कोहनी तोर लगय सीना पर
मोन तोहर की कत्थिक गअर
तन केर छाछ नैन केर माछ
तिलकोर अधर ऊपर-ऊपर
जे कंप-कंपी एहि चैतक दिन
भीतर जी में की चैल रहल
अनुरोध-विरोध कथे छोऊ भिन्न
मेघ सुखल किया लट छोऊ खिन्न
ई छटपट्टी के कारण की
तूंही कहि दे निवारण की
निवारण
प्रेमक बोझ सहल नहि जाय
मेलक जी कहल नहि जाय
इन्टरनेट नहि काज कअ रहल
तें विचित्र हम अहाँ बुझाय
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Posted By Jha Saheb to
Sanjay Kumar Maithil at 3/04/2012 01:33:00 PM