फूस का मकान
उसमे दो जोड़े कपडे की दुकान
उपभोक्ता हैं आठ
नहीं सात, एक बीमार बच्चा है
उसे कपडे नहीं चाहिए
वह माँ के आँचल से काम चला लेगा
माँ का ही दूध पी भूख मिटा लेगा
कमीज जो दो थे
मर्दों ने पहन लिए
शुक्र था कि दो थे
नहीं तो लड़ाई थे, झगडे थे
अब बची दो धोती है
एक बाबा है, वह पहनता लंगोटी है
फैसला हुआ एक हाथ फाड़कर दे दो
अब बच गए लोग छः
सात हाथ की धोती गयी रह
पर दो निकल गए बच्चे
अभी उम्र के हैं कच्चे
अब दो जवान पुरुष देह
और दो जवान स्त्री देह
मुश्किल बड़ी भारी है
सुनते हैं आत्मा अमर है
देह सवारी है
अब इन नग्न सवारियों पर
कौन सी आत्मा चलना चाहेंगी
ये भी लोकतंत्र के पुजारी हैं
इनके भी पी ऍम और सी ऍम आप
आप शौक़ीन इनपर लदे शाप !
बंद करो अट्टहास दिल्ली की आस्तीनों में
जीना पड़ेगा कल तुम्हें भी संगीनों में
जिसका रोम-रोम सर्दी में कांपता है
उसी सर्दी में तुम्हे मारता नहीं हांफता है
खून की गर्मी में जी लेता वह
क्रांती की ज्वाला को पी लेता वह
बच्चों को जिला लेता है यह कह कर
कल हमारा है....कल हमारा है...
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Posted By Jha Saheb to
Sanjay Kumar Maithil at 7/19/2011 09:42:00 AM