मिथिला राज्य निर्माण यात्रा-आगे क्या ?
हरेक राजनीतिक घटना पर नजर रखना जरूरी है । मोदी का भाजपा के केंद्रीय क्षितिज में स्थापित होने की प्रक्रिया और निर्णय का मिथिलांचल से क्या सरोकार है ? मोदी को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गठित चुनाव समिति का मुखिया घोषित किया गया है । अब मोदीजी क्या रणनीति अपनाते हैं यह गौर करने वाली बात है । एक बात तो स्पष्ट है - मोदी द्वारा चुनाव की कमान सँभालते ही मुसलमान समुदाय उस उम्मीदवार को जिताने के लिए वोट करेगा जो भाजपा को हराएगा । उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, बंगाल, हरयाणा जैसे राज्य जहाँ भाजपा और कोंग्रेस रेस में नहीं हैं वहां तो मामला पहले की तरह रहेगा परन्तु अन्य राज्यों में ऐसा ही होने वाला है ।
बिहार में लालू का मुसलमान-यादव वोट बैंक था जो अब नितीश कुमार के पैंतरों के कारण दरक सा गया है । नितीश ने विकास का हव्वा भी खड़ा किया (मोदी की तर्ज पर ) और जातियों के नए समीकरण भी बनाये । इसके बाद भाजपा का वोट बैंक । इस रणनीति ने लालूजी को आठ सालों से दिन-रात तारे देखने पर मजबूर कर दिया है । अब बिहार पुनः राजनीतिक रूप से लालू के युग में जाने को अग्रसर है जहाँ जदयू, भाजपा, आरजेडी, कोंग्रेस अपने-अपने तरीके से लड़ेंगे । ऐसे में जदयू, भाजपा और आरजेडी सम्माननीय संख्याबल के साथ विधान सभा में प्रवेश करेंगी । परन्तु सरकार का गठन फिर खिचडी की तर्ज पर होगा । कोंग्रेस अभी तक लालूजी को वह भाव नहीं दे रही जबकि करीब-करीब सभी विवादित मुद्दों पर लालूजी कोंग्रेस को कोंग्रीसियों से अधिक सहयोग देते रहे हैं । कोंग्रेस इस स्थिति में भी नहीं रहेगी कि बीस - पचीस संख्या लेकर सरकार में कोई महत्वपूर्ण योग दे । यही कारण है कि लालूजी ब्राह्मणों को रिझाने में लगे हैं ।
ऐसा महाराजगंज लोकसभा चुनाव में स्पष्ट दिखा भी है । ब्राह्मण महासभा बिहार के सुभाष पाण्डेय और उनकी टीम ने महाराजगंज लोकसभा चुनाव में निःशर्त समर्थन देकर और काम कर राजद के उमीदवार को बहुमत से जीतने में सहयोग किया । यदि ब्राह्मणों का ऐसा ही समर्थन राजद को पूरे बिहार में मिल जाए तो राजद को भारी बहुमत से सरकार बनाने से कोई नहि रोक सकता ।
ब्राह्मणों का समर्थन मिले कैसे ?
मायावती की तर्ज पर लालूजी किसी ब्राह्मण को प्रोमोट कर सकते हैं । रघुनाथ झा जैसे नेता अपनी पारी खेल चुके हैं । उनके पास वह ऊर्जा रही नहीं कि घर-घर जाकर ब्राह्मणों को रिझा सकें और संतुष्ट कर सकें कि लालू सरकार में उन्हें वो इज्जत मिलेगा जिसके वे हकदार हैं । इसके लिए कोई युवा चेहरा चाहिए साथ ही इस बात का भरोसा कि सरकार में उन्हें पूरी सहभागिता दी जायेगी ।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसपर वह काम कर सकते हैं । मिथिला राज्य आन्दोलन गाँव-गाँव पहुँच रहा है । धीरे-धीरे यह गली-गली पहुंचेगा । जिसदिन ऐसा हो गया सारी जातीयता ख़त्म हो जायेगी । आन्दोलनकारियों के बीच से निकले नेता मिथिलांचल की सीटों पर कब्ज़ा कर लेंगे और स्थापित पार्टियों के सारे समीकरण धरे के धरे रह जायेंगे । तेलंगाना की तर्ज पर मिथिलांचल में उन्हें न मूंग मिलेगी न मसूर । परन्तु लालूजी के लिए राज्य का समर्थन करना असंभव सा काम है । इन्ही तर्कों के साथ नितीश कुमार भी मिथिला राज्य के समर्थन में आगे नहीं आ सकते । दोनों का अभी तक का व्यवहार मिथिलांचल के विरुद्ध ही रहा है ।
मिथिलांचल यह देखकर कुपित हैं कि विकास के जो थोड़े प्रयास हो रहे हैं वे गंगा के उस पार ही हो रहे हैं । सच्चाई यही है कि गंगा के उस पार के पटना, गया, नवादा, जहानाबाद, बक्सर और भोजपुर जैसे जिले दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, समस्तीपुर, बेगुसराय, मधेपुरा और सुपौल जैसे जिलों से विकास के सभी पैमानों में आगे हैं । शिक्षा, कृषि, उद्योग, सरकारी सहायता जैसे विषय मानो बिहार में इन्ही जिलों के लिए बने हो । प्रशासन के अधिकांश मलाईदार जगहों पर उसी क्षेत्र के लोग पदस्थापित हैं ।
मिथिलांचल निकलने के बाद बिहार हरयाणा से थोडा सा बड़ा राज्य रह जाएगा और मिथिला एक बड़े राज्य के रूप में उभरेगा जिसमे क्षेत्रीय पार्टियाँ मुख्य दल के रूप में उभरेंगी । यहाँ लालू और नितीश जैसों का सफाया हो जाएगा । इसलिए वे मिथिला राज्य के समर्थन में कभी भी नहीं आ सकते ।
भाजपा और कोंग्रेस तब तक मिथिला राज्य की मांग को खुले रूप से समर्थन नहीं देंगे जबतक यह मांग जोर नहीं पकडती । अभी समर्थन देकर वह मगध को खोना नहीं चाहेंगे ।
अभी यह आन्दोलन भी बचपने में है तो समर्थन देने या नहीं देने के बारे में चुप रहने से वे यथास्थिति बनाए रख सकते हैं ।
जब तक जनांदोलन सत्ता न हिलाए सत्तासीनों की नीद नहीं खुलती । इसलिए अब जरूरी हो गया है कि मिथिला राज्य आन्दोलन एकत्रित रूप से लड़ा जाए । एक समन्वित समिति हो जिसमे सभी लडाका साथ हों । व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को किनारे किया जाए । जिसमे योग्यता, सामर्थ्य, जज्बा और समय हो वह स्वतः सर्वमान्य होगा । नेता कभी भी बनाये नहीं जाते वे आन्दोलनों से तप कर निकलते हैं । रेडीमेड नेता क्रांति नहीं ला सकते । मिथिलांचल को अभी भी ऐसे नेता की खोज है । बहुत लोग छोटे-मोटे संगठन बना कर मिथिला राज्य के प्रयास में हैं । एकदम सही समय है कि वे एक हो जाएँ । आन्दोलन को तेज करें । अपने पसीने की गर्मी से सत्ता की दीवारों को लाल कर दें । जरुरत हो तो खून भी बहे, बसें भी जलें, कुर्सियां भी टूटें, चक्का जाम हो, पटरियां उखड़ें, जेल भरे । और यह सब बंद तब हो जब मिथिला राज्य मिले ।
शेष अगले अंक में .........................आपका संजय झा (9213000762-Faridabad )