बिहारियों से मिथिला राज्य के समर्थन की उम्मीद क्यों ? हमें अच्छी तरह पता है कि शिक्षा, सामाजिक सौहार्द्र और आर्थिक विकास के हर मोर्चे पर मिथिला तीव्र गति से आगे बढ़ गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों को भी पीछे छोड़ सकता है । असल में समस्त भारत में सोया हुआ शेर कोई है तो मिथिला है । अब यह शेर जाग रहा है तो जंगल में हडकंप तो मचेगा ही । आओ आनंद मनाते है इस हडकंप का । पग-पग अविकास का दंभ झेल रहे बिहारी मुंबई में टैक्सी चलाकर खुश हैं । उन्हें राज ठाकरे की हुंकार पर लालू यादव के पिद्दी-वचन में शान्ति मिलती है । उन्हें नरेन्द्र मोदी की चुनौती पर नितीश की हुड्की अच्छी लगती हैं । आनंद आता है । ऐसे वहशी आनंद को सलाम !
वे कहते हैं हम बिहार को बांटना चाहते हैं । झारखण्ड बंटा था तब जीभ को लगाम लग गयी थी ? वह तो खनिज पदार्थ से संपन्न जगत था । जाने देना पड़ा क्योंकि आपकी औकात से बाहर की बात थी । उन दिनों फेसबुक नहीं था । फोन भी कम थे । पर अडिग आदिवासी झारखण्ड ले कर रहे । “झारखण्ड मेरी लाश पर बनेगा”-लालू यादव ने कहा था । वे भी जीवित हैं (थोड़े मोटे भी हो गए हैं ) और झारखण्ड भी है । वैसे ही हम ढूंढ़ रहे हैं कौन अपनी लाश पर मिथिला बनने की चुनौती देता है ताकि आने वाले वर्षों में हम शान से मिथिला की राजधानी से अपने बिहारी भाइयों से कह सके-थोडा जिम-शिम जाया करो यार !
सवाल बंटवारे का नहीं है । भारत विभिन्नता में एकता का देश है । यहाँ अलग मजहब, अलग मान्यता, अलग रंग, अलग भाषा, तरह-तरह की जाति, संस्कृति के लोग रहते हैं वह भी संविधान सम्मत तरीके से । पूरे भारत में सिर्फ मैथिल है जिसे बड़े ही सुनिओजित तरीके से सांस्कृतिक विनाश की तरफ धकेला गया है । मिथिला के साथ भेद-भाव राजेंद्र प्रसादजी के ज़माने से है । आजाद भारत के पहले मिथिला विरोधी वही थे । निष्पक्ष इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो सांस्कृतिक रूप से चैतन्य लोग जान पर खेल कर भी लिखेंगे कि मैथिली को संवैधानिक मान्यता प्रारंभ में राजेंद्र प्रसाद की वजह से नहीं मिली । वे भोजपुरी को दिलाना चाहते थे । मगर तकनीकी कारणों से नहीं मिला । आज भी नहीं है । कल का पता नहीं । कल भोजपुरी लोग मेहनत कर अपनी लिपि बना लेते है तो स्वागत है । मगर क्या करें इसमें सदियाँ लग जाती हैं ।
सदियों ने जिस संस्कृति को अपने खून और पसीने से सींचा वर्षों ने उसे नाक के पोटे की तरह झटक दिया । ऐसा बिहारी नेता सोचते थे । पर क्या करें मैथिल है कि मानता नहीं । निकल पड़े हैं विकट मैथिल निकट मैथिल के साथ गाँव-गाँव, शहर-शहर, गली-गली लाव-लश्कर के साथ । दर्द और भूख की परवाह किये बगैर । धूप और बारिश को छकाते । हँसते खेलते और गाते । देखो तुम, ऐ बिहारी तुम! अगर तुम हमारे विरुद्ध हो ! मिथिला राज्य बनेगा और जरुर बनेगा । जल्द बनेगा । और हाँ, भ्रम में मत रहना, तुम्हारे ही बिहारी नेता हमारा साथ देंगे इस उम्मीद में की मिथिला उनको वोट करेगा । जरुर देंगे साथ तो दो । साथ ही तो रहे हैं हम सदियों से एक साथ । आगे भी रहेंगे । क्यों जाते हो हजारों किली मीटर दूर पेट के वास्ते । अरे! अपना फिल्मिस्तान अपने यहाँ बनायेंगे । अपना अस ई जेड बनायेंगे । तुम हमारी कम्पनियों में आना, सम्मान मिलेगा । हम तुम्हारी कम्पनियों में जायेंगे । जब तुम दो भाई बंटवारा कर लेते हो तो मिथिला से परेशानी क्यों ?