माननीय श्री अन्ना हजारे का भ्रष्ट्राचार के खिलाफ अनशन कई मायनों में अद्भुत है | क्योंकि यह किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ नहीं है | यह खिलाफ है उस मानसिकता के जो सत्ता को अपने इंतना नजदीक रखना चाहती है जो जब जी चाहे अपने हित के लिए उसे प्रयोग कर सके | यह खिलाफ उन शशि थरूरों के जो विदेश से भ्रश्ताचाल के नए गुर सीखकर आयें हैं | यह खिलाफ है उन हुक्मरानों के जो चाहे स्वयं कितना ही ईमानदार क्यों न हों, परन्तु अपने भ्रष्ट सिपहसालारों को हर परेशानी से मुक्त रखना चाहते हैं | ऐसे सिपहसालार जो अपने भ्रष्ट तरकीबों से अपने आका को सिंहासन से चिपका देखना चाहते हैं |
अन्ना की मांग क्या है ? अन्ना चाहते हैं कि लोकपाल विधेयक को इतना मजबूत बनाया जाए कि सरकार और जनता की भागीदारी भ्रष्टाचार के खिलाफ सामान हो | वैसे, यह भी अपने आप में विरोधाभास से पूरित है | विरोधाभास से पूरित इस हिसाब से है कि इसकी क्या गारंटी है कि गैर सरकारी लोग सरकार के पक्ष में काम नहीं करेंगे | सत्ता के नजदीक रहने की कोशिश बड़े से बड़े साहित्यिंक चिंतकों, सरकारी प्रशासकों और बड़े से बड़े उद्योगपतियों के गले की घंटी बना रहा है | वे सदियों से सशंकित रहे हैं कि उनके वैयक्तिक पक्ष में क्या है | जो लोग अपनी आत्मा के पक्ष में फैसला लेने में सफल रहे वे सफल राजनीतिज्ञ नहीं रह पाए | जो उनके पक्ष में बंद बनाने में कामयाब रहे वे कई गद्दियों को पाने में कामयाब रहे, यह किसी से छिपा नहीं है | \
जहाँ सोनिया गांधी अपने प्रिय और एकलौते पुत्र राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखना रही हैं, वहीँ वह उन लोगों की संरक्षक बनी हुई हैं जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं | शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के परिवार के सदस्य तथा गैर-सदस्य ऐसे कई लोग हैं जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं | कई लोगों की जांच चल रही है | अभी कुछ दिन पहले विकीलिक्स में खुलासा हुआ है कई गैर-आरामदायक सवालों का | स्वयं सोनियाजी इन सवालों का जवाब नहीं देना चाहतीं | न राहुलजी इन सवालों पर कोई जवाब देना चाहते हैं | जवाब देने के लिए कुछ ऐसे अच्छा बोलने वाले नेताओं को थोडा सा बंधा और थोडा सा खुला छोड़ दिया गया है जिन्हें पूरे मामलों की जानकारी भी नहीं होती |
कहतें है कि सत्ता सबसे बड़ी मजबूरी होती है | अगर सत्ता ऐसी मजबूरी होती है तो सचमुच महात्मा गांधी इंसान नहीं थे जिनके पदचिन्हों पर चलने के बारे में कोंग्रेस के तमाम नेता कहते हैं | सोनियाजी ने सत्ता छोडी तब जरूर लग रहा था कि वे सही मायने में बापू के पदचिन्हों पर चल रही हैं | परन्तु यह स्पष्ट है कि उनका यह कदम राहुलजी को एक और हथियार देने की सफल कोशिश थी | कल अपने भाषण में वे इतना तो कह ही सकते हैं कि मेरी माँ ने सत्ता छोड़ा क्योंकि वे सोचती थीं कि हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री भारतीय होना चाहिए | मैं भारतीय हूँ, युवा हूँ, पढ़ा-लिखा हूँ, आपके साथ सालों से आपके हित में जुड़ा हूँ | मैं प्रधामंत्री नहीं बनना चाहता लेकिन हमारा परिवार है जो सिंहासन के सिपाहियों को सीमा में रख सकता है | परन्तु राहुलजी आप और आपकी माताजी दोनों मिलकर भी सिंहासन को भारत के हित में साध नहीं सके | मनमोहन सिंह को खिलौना बनाकर आपने कई दिल तोड़े हैं |
इंदिरा गांधी के बाद सिक्खों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर यह दूसरा मजाक है | सिक्ख मजबूत इरादों वालों और प्रतियोगिता के धनी होते हैं | उन्हें अपनी सफलता से प्यार होता है | अगर सिंहासन पर बैठना उन्हें प्रिय होता तो गुरु गोविन्दसिंहजी मुगलों से मिलकर ऐश करते | जब सवाल अपने धर्मं और समाज का होता है तो जंग लाजिमी होता है | सिक्खों ने सदियों से यही किया है | हमें उनपर गर्व है |
दुःख की बात है मनमोहन सिंहजी ऐसा नहीं कर रहे | वे सोनिया परिवार के घनिष्ठ हैं | असल में सत्ता के भूखे हैं | वे ईमानदार नहीं हैं | वे अच्छे नेता नहीं हैं | हमें नेता चाहिए जो हमें भविष्य में सफलता पूर्वक ले जाए | प्रशासक तो लाखों की संख्याँ में संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास कर वर्षों से देश की सेवा कर रहे हैं | मनमोहन सिंहजी सिर्फ एक खिलौना हैं जिन्हें इतिहास भी इसी रूप में याद रखेगा |
हाल में मनीष तिवारी जो कोंग्रेस के प्रवक्ता हैं उन्होंने कहा कि लोकपाल विधेयक में यदि किसी संशोधन की गुंजाईश है तो हम उसपर विचार करने को तैयार हैं | पहले बात-चीत तो हो | अन्ना बात-चीत को तैयार तो हों | तिवारीजी जब अन्ना ने कई सारे पत्र लिखे तो उनका जवाब क्यों नहीं दिया गया ? न प्रधानमंत्री ने दिया न सोनियाजी ने |
भ्रष्टाचार एक ऐसे मुद्दा है जो कोढ़ में खाज की तरह है | आखिर क्या कारण है कि राष्ट्रकुल खेल के गुनाहगार सुरेश कलमाडी आज भी खुला घूम रहा है | आखिर क्या कारण है कि हसन अली ने जिन तीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के नाम बताये वे अभी तक आम नागरिक को पता नहीं है ? स्विस बैंक में और किन-किन भारतीयों के नाम हैं ? कहीं ऐसी कोशिश तो नहीं है की पहले देख लेते हैं हम तो नहीं फंस रहे |
अन्ना हजारें तमाम भारतीय मानसिक के प्रतीक हैं | फर्क सिर्फ यही है कि उनमे आवाज़ उठाने की हिम्मत है, बांकी भारतीय अपने रोजमर्रा के काम में इतना व्यस्त है कि उसे इन चीजों पर ध्यान देने और आन्दोलन करने की फुर्सत ही नहीं है | हां, वो इस आन्दोलन में अपना एक-दो दिन देकर अपनी भागीरदारी व्यक्त करे तो इसमें शक भी नहीं होना चाहिए | अगर हर एक हिन्दुस्तानी अपना एक-दो दिन भी इस आन्दोलन में दे दे तो आन्दोलन आपके गले की फांस तो बन ही जाएगा | मांग मान क्यों नहीं लेते |
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Posted By Jha Saheb to
The Start-Up Specialist at 4/06/2011 09:11:00 PM