[Sanjay Kumar Maithil] बुढिया लोकतंत्र कहीं रो रही है

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Jha Saheb

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Jul 19, 2011, 12:31:43 PM7/19/11
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रवीशजी झूठ नहीं कहता
आपके कार्यक्रम पसंद हैं

वे दिल ओ दर्द से लिखे होते हैं
उनमे अहसास ओ उमंग भरे होते हैं
 
वे याद दिलाते हैं जिम्मेवारी की
वे लूटते हैं नींद अधिकारी की
 
सत्ता का चैन खो जाता है
कुछ महीनों बाद वह फिर सो जाता है
 
पत्रकार नींद से जगाता है
फिर वक्त उसपे लहराता है
 
फिर मुल्क अंगडाई लेता है
जवानी शहनाई बजाती है
 
फिर हुस्न शर्माए जाती है
पर अपने यहाँ अब और अभी
शर्म बेहया हो गयी है
लोकतंत्र कहीं सो गयी है
 
जाति और धर्मं में बांटकर
बुढिया लोकतंत्र कहीं रो रही है


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Posted By Jha Saheb to Sanjay Kumar Maithil at 7/19/2011 10:01:00 PM
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