कष्टों से रुष्ट हो वह सुखी हो गया
एकांगी व्यक्ति से बहुमुखी हो गया
तू अपना है, तू कभी ना पराया था
लोकतंत्र में काफिर वे जिसने हमें लड़ाया था
हमदर्द जब शैतान बन लूटते हैं
तब दिल दर्द, धड़कन शोले बन फूटते हैं
मेरे गाँव हर साल बाढ़ आया करती
हम सपने जोड़ते, वह उन्हें बहाया करती
भूकंप तो कामायनी का रूप लेकर आता है
रूप वीभत्स उसका जो एक-दूजे को लड़ाता है
वह मेरा दोस्त ना हिन्दू था ना मुस्लिम
वह अनाथ था उसे जाति का पता नहीं
यूं हीं अनाथालय में पलकर बड़ा हुआ
किसको पूजूँ यही सोचता खड़ा हुआ
टी वी पर देखा उसकी निःशांत लाश थी
धमाकों में यूं उड़ा, उसे मुंबई की तलाश थी
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Posted By Jha Saheb to
Sanjay Kumar Maithil at 7/19/2011 08:15:00 PM