जिस जिस को कविता भेजी
उस उस ने जीवन बंद किया
ऐसे किसी शैतानों को
हमने भी जीवन बंद किया
तुम जियो कुछेक और साल
अधिक और क्या मना सकते हैं हम
तुम छाछ-छाछ को मरो
मक्खन के दीप जलाएं हम
कवियों को चूं-चपर समझो
हम तुमको चूं-चपर समझें
तुमने झेलें है काल कई
हम तुमको काल क्यों न समझें
तुम आम आदमी, हम ख़ास नहीं
तुमसे कोई सहवास नहीं
फिर तुमसे कैसी लोभ-ललक
नहीं तुमसे कोई क्षोभ-झलक
कवि अब बदनाम नहीं होता
मरके अब नाम नहीं होता
तुम ठीक जान सम्मान करो
वर्ना अपने घर काम करो
हम भी समर्थ, सुशील हैं अब
कभी नागवार, कुलीन हैं अब
अब संस्थाएं अपना झेलें
हमसे न कहें, कुशल खेलें
मरकर भी गीत न गायें हम
क्यूं सम्मान गंवाएं हम
जीवन को गीत दिया हमने
मधुबन को प्रीत दिया हमने
तेरा प्रतिशोध लिया हमने
जब तेरा कोई न सहारा था
हमने जेल सहे तब थे
जब तेरा कोई न प्यारा था
बस ध्यान रखो-हम भी तुम हैं
कभी तुम हम हैं, कभी हम तुम हैं
आज हम कवि, कल अनुज तेरा
कल अनुज तेरा, कल अनुज मेरा
ऐसे में प्यार बंटा-कर-के
करना चाहो वो कर लो तुम
हम भी पीछे हंट रहे नहीं
करना चाहो संहार करो तुम
हमें नहीं जीवन की खुशी,
नहीं जीवन का कभी क्षोभ रहा
तुम अरीब पति, हम गरीब पति?
नहीं तुमसे कोई लोभ रहा
हम तुमसे ऊपर रहें सदा
हम आम हैं, हम ख़ास हैं
हम बिना प्यार के अश्रु हैं
हम सादा और सहवास हैं
हाँ! सुन लो!! न सुन-ना भी चाहो
कह लो !! ना कहना भी चाहो
वक्त कहाँ दुहराता है
पग पे पग लहराता है
जो देखा वो सामयिक रहा
वो सत्य ना था, ना अभी रहा
आओ पास बतायें हम
जन-जन की व्यथा बताएं हम
तुम तो आने से रहे प्रभो
अब हमें भी तो आज्ञा दे दो