प्रधान मंत्री जी ! पिछले 63 साल से हर साल 26 जनवरी को हमारे देश में गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। ये किस लिए और क्यों मनाया जाता है? मैं आज तक नहीं समझ पाया। हर साल दिखावे के लिए सेना के सारे अस्त्रों और शस्त्रों का प्रदर्शन किया जाता है. हमारे अदने से पड़ोसी मुल्क पाक ने पिछले 64 साल(1948 से अब तक) से हमारी नाक में दम कर रखा है .हमारी 78000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर जबरन कब्ज़ा कर रखा है । विशेष तौर पर 1971 की लड़ाई में बांगलादेश बनने के बाद उसका मकसद हमारे देश को अस्थिर करना है और वो अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब भी रहा है. चाहे 26/11का मुंबई हमला हो, चाहे कारगिल हो, चाहे संसद पर हमला। सीधे युद्ध में तो वो भारत से मुकाबला नहीं कर सकता मगर इस छद्म/अघोषित युद्ध में वो भारत का सिरदर्द बना हुआ है। POK (पाक अधिकृत कश्मीर) से उग्रवाद के ट्रेनिंग कैंप चला रहा है। हम सब जानते हैं, मगर कुछ नहीं कर सकते और अपनी साख नहीं बचा पा रहे हैं। हमें अमेरिका का मुंह देखना पड़ता है। संसद पर हमला होता है और ये गणतंत्र, सम्प्रुभूता संपन्न, देश कुछ नहीं कर सकता। अब तक 10 हजार से ज्यादा भारतीय उसके द्वारा पोषित और प्रायोजित उग्रवाद में अपनी जान खो चुके हैं और ये सिलसिला जारी हैं, बेशक 1965 और 1971 के युद्ध में हमने उसे धूल चटा दी मगर वो आस्तीन का सांप है। हमारे सब से बड़ा दुश्मन दाउद और हाफिज़ सईद वहां बैठे है. सारी दुनियां जानती है, मगर हम कुछ नहीं कर सकते। हमें बार- बार चीख चीख कर कहना पड़ता है कि, कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है. बांगलादेश बनने से हमें क्या मिला? एक और पडोसी दुश्मन पैदा हो गया। जहाँ से लगातार बांगलादेशी घुसपैठ जारी है। हमारी सीमायें सुरक्षित नहीं है. ये घुसपैठिये देश के आम नागरिकों के साथ घुल मिल गए हैं. ये बम धमाके करते हैं, अपराध करते हैं; मगर वोटों की राजनीति के कारण हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि ये हमारे देश के नेताओं का वोट बैंक है. हमारी विदेश नीति क्या हैं ? समझ में नही आता……… बॉर्डर पर क्या हो रहा है यह रक्षा मंत्री को पता नहीं। जब घुसपैठ होती है या हमारी चौकियों पर कब्ज़ा हो जाता है तब पता चलता है। कारगिल में क्या हुआ ? एक गडरिये ने बताया था कि पाकिस्तान ने बंकर बना लिए हैं। हमें अपनी जमीन वापस लेने के लिए अपने सैनिकों की शहादत देनी पड़ी और हम विजय दिवस मना रहे हैं. ये कैसी विजय है? 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत के 1382 सैनिक शहीद हुए, 1696 लापता हुए, 1047 गंभीर रूप से घायल हुए एवं 3968 युद्ध बंदी बना लिए गए। चीन के 80 हज़ार सैनिकों के आगे भारत के मात्र 10 हज़ार सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी और हमें बदनामी झेलनी पड़ी। भारतीय सैनिकों के पास न तो ठण्ड से बचने हेतु बर्फ में पहनने वाले जूते थे और ना ही कपड़े. वास्तव में हमारी तैयारी नहीं थी। हमें अपनी जमीन (अक्साइचिन) छोड़नी पडी। सेना का मनोबल गिरा वो अलग से। हमारे सैनिक आज भी चीन के सामने टिक नहीं पाएंगे. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन ने नेहरु की नीतियों की कड़ी आलॊचना की थी. नेहरूजी ने अपनी गलती तो मानी मगर ये नेहरुजी की गफलत का नतीजा था, जो देश आज भी भुगत रहा है। समय-समय पर सेना के अधिकारियों ने नेहरुजी को चेताया था, मगर नेहरुजी ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और वे मौज -मस्ती में डूबे रहे और विदेशी दौरों पर लगे रहे कहा “मैंने मेनन (रक्षामंत्री) से कह दिया है, वो देख लेंगे.” और हम चीन से हार गए। आज भी चीन हर बात में हेकड़ी दिखाता है। नेहरु जी का "आराम हराम है" और “पंचशील” जैसे नारे और सिद्धांत खोखले साबित हुए; मरते दम तक नेहरुजी को उसका अफ़सोस रहा और इस हार के कारणों की समीक्षा के लिए कई कमिटियाँ बनी और रिपोर्टें आयी, मगर हमने सबक नहीं लिया। आज भी हालात बहुत अच्छे नहीं है। जमीनी हकीकत कुछ और है। सैनिको को सुख सुविधाएं नहीं मिलती। हम नैतिक रूप से चीन का मुकाबला नहीं कर सकते। सेना को ऊँचे मनोबल की जरूरत है, अच्छे हथियारों की जरूरत है। खाली बातों से, खोखले नारो से युद्ध नहीं जीते जाते, देशप्रेम की बातें छलावा है। वो सेना जो किसी भी देश के लिए गर्व की बात होती है, आज वही हमारे शासकों/नीति निर्धारकों द्वारा उपेक्षित है. हमारे सैनिकों को उचित सम्मान और जरूरी सैन्य साजो- सामान नहीं मिलता।क्योंकि वातानुकुलित कमरों में बैठकर झूठी रिपोर्टें बनाने वाले नौकरशाह और सेना के बड़े अधिकारी उनके लिए कुछ छोड़ते हीं नहीं क्योंकि इनका
अपना पेट ही नहीं भरता, हवस पूरी नहीं होती। सेना में जवानों की कमी है और जुगाड़ से रिटायर्ड अधिकारी पुनर्नियुक्ति से अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। टीवी चैनलों पर होने वाली बहस और चर्चाओं में सेना के विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों द्वारा ये साफ़ कहा जाता है कि हमारी सेना के पास चीन का सामना करने के लिए आधुनिक हथियार नहीं है। मगर हम गणतंत्र दिवस मना कर झूठी शेखी बघारते हैं। किस काम के हैं, ये साजो -सामान जो दुश्मन से लोहा न ले सके .
पंजाब के पूर्व गवर्नर सुरेन्द्र नाथ जो 7 अगस्त 1991 से 9 जुलाई 1994 तक पंजाब के राज्यपाल रहे और एक विमान दुर्घटना में परिवार के 9 सदस्यों के साथ उनका निधन हो गया, के घर से 800 करोड़ रूपए मिले , जिस पर केंद्र सरकार ने कभी कोई टिप्पणी नहीं की। ये पैसा उन्हें केंद्र द्वारा दिए गए 4500 करोड़ रुपयों मे से था ,जो उन्हें उग्रवाद रोकने के लिए दिया गया था। ये एक IAS अधिकारी रहे जो सेना के CISF के DG पद पर काबिज रहे और साथ ही UPSC के सदस्य भी रहे हैं । ये हमारे देश के नौकरशाहों और सेना के उच्च अधिकारियों और राज्यपालो का असली चेहरा/चरित्र है .
"जरा याद करो कुर्बानी" क्या इस गीत को केवल एक दिन बजा लेने से ही, हमारा देश के शहीदों के प्रति कर्तव्य पूरा हो जाता है? मीडिया कहता है कि नेहरुजी इस गीत को सुन कर रो पड़े थे। वाह रे मीडिया ! कैसा गणतंत्र है ?
संविधान हमें रोजी रोटी और आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार देता है, मगर हकीकत कुछ और ही है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। जवान मर रहे हैं। एक शास्त्रीजी थे, जिन्होंने नारा दिया था "जय जवान- जय किसान". शायद वही एकमात्र प्रधानमंत्री थे, जिन्हें इस देश में किसानों और जवानों की चिंता थी, बाकी तो सब देश को लूटने में लगे हैं।
संविधान में अंग्रेजी और आरक्षण को केवल 10 वर्षो तक के लिए लागू रखने के बात कही गयी थी, मगर हमारे सत्ता लोलुप नेताओं ने इसे अपना वोट बैंक बना लिया जो आज 65 साल बाद भी जारी हैं जबकि इस का लाभ समाज के केवल कुछ वर्गों को मिला और आज भी गरीबी से तंग आकर लोग सपरिवार आत्महत्या कर रहे हैं। जब कसाब को फांसी दी गयी तो एक बात जो सभी समाचारपत्रों में कही गई थी कि , गरीबी ने कसाब को उग्रवादी बनाया। आज जब हम नक्सलवाद की बात करते हैं, तो ये क्यों भूल जाते हैं कि ये भी इस देश के नागरिक हैं . उनकी जमीनों पर कॉर्पोरेट ने कब्ज़ा कर लिया है और उनकी रोज़ी रोटी छीन ली है। बदले में न उन्हें नौकरी मिली न मुआवजा। इन गरीबों को नक्सलवादी बनाने के लिए कौन जिम्मेवार है? नक्सलवादी क्षेत्रों में सेना और CISF के जवानों को बम से उड़ाया जा रहा है. आज़ादी के 65 साल बाद भी हम आम आदमी को रोजी- रोटी नहीं दे सके और तमाशे करने में लगे रहे। देश को लूटते और लुटाते रहे। मगर संविधान में लिखे पर कभी ध्यान नहीं दिया। यदि इन नक्सलवादियों और कश्मीरियों को आरक्षण का 5 प्रतिशत भी लाभ दिया गया होता तो आज ये भटकते नहीं। हमारे गृह मंत्री धमाको के बाद मीटिंग पर करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, मगर इन बेरोजगारों को आरक्षण का कुछ लाभ/रोजी रोटी देकर समस्या को जड़ से खत्म नहीं करना चाहते। हमारे नेताओं को वोटों की राजनीति से ही फुर्सत नहीं। 65 साल बाद भी आरक्षण के नाम पर जहाँ एक परिवार के कई लोग सरकारी नौकरी का सुख भोग रहे हैं, वहीं कई प्रतिभाशाली युवक बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। ये कैसा गणतंत्र है ?
कॉमनवेल्थ खेलों ने साबित कर दिया के देश को दलाल और ठेकेदार चला रहे हैं , जिन्हें राजसत्ता का संरक्षण मिला हुआ है। लालू ,माया, मुलायम, शिबू सोरेन, अमर सिंह जैसे राजनीतिज्ञ तथा समाजवादी और BSP जैसे सौदेबाजी करनेवाली पार्टियाँ से जुगाड़ कर कांग्रेस देश को चला रही है। राजनेताओं का अपराधीकरण हो गया है और अपराधियों का राजनीतिकरण।
प्रधानमंत्री गृह मंत्री और दूसरे मंत्रियों के खिलाफ लोगो का गुस्सा फूट रहा है . लोग अपने गुस्से का इजहार अपने- अपने तरीके से कर रहे हैं। कोई मंत्रियों पर जूते फेंकता है तो कोई हमला करता है। वहीं कोई सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकाल रहा है। युवा पस्त है, जनता त्रस्त है भ्रष्ट चारी व्यस्त है और नेता मस्त है
आज स्थिति यह है कि दिन भर मेहनत करने के बावजूद भी लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती। दूर दराज के इलाकों में खासकर बिहार के कई पिछड़े इलाकों में लोग चूहे मार कर खा रहे हैं दिल्ली के बाहर दूरदराज के इलाकों में ये आम बात है। लोग घास- फूस की रोटी बना कर खाते हैं ,चूहे मारकर खा रहे है. और भारतीय खद्य निगम लापरवाही से लाखों टन अनाज भंडारण सुविधा ना होने के कारण हर साल सड़ जाता है, दिल्ली की मुख्यमंत्री 600 रूपए की राशि, दिल्ली के 5 सदस्यों के परिवार के लिए राशन- पानी हेतु काफी बताती हैं. वहीं योजना आयोग 32 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले को गरीब नहीं मानता. ये हमारे देश के नेताओं और नौकरशाहों की सोच है, बौद्धिक ज्ञान है। ये शायद हवा में ही उड़ते हैं, इन्हें जमीनी हकीकत का कुछ पता he नहीं । दिल्ली में Police, RTO,MCD, NDMC,DDA, CPWD, Passport Office, Mantralyon ke adhikari,IAs /IPS /IRS एक -एक अधिकारी के पास करोड़ों की काली कमाई है. संविधान में लिखा था की गरीब और अमीर के बीच की खाई का अंतर कम हो, मगर गणतंत्र ने क्या किया? इंदिराजी 16-17 साल राज कर गई ; गरीबी हटाओ का नारा दिया ;मगर गरीबी किसकी हटी? जहाँ गरीब और गरीब हो रहा है वहीं बेईमान और भ्रष्ट धन्नासेठ/धनकुबेर बन रहे हैं .कुर्सी पर बैठा हर शख्स लुटेरा बन गया और देश को लूटकर अमीर बन गया। ये इस देश के अमीरों के सच्चाई है। चाहे वो पोंटी चड्ढा हो, हसन अली हो, मायावती हो, मुलायम हो, चौटाला हो, कोड़ा हो, राजा हो, कलमाड़ी हो, जयललिता प्रतिभा पाटिल हो हर नेता और मन्त्री की ये हक़ीक़त है. नेहरू खानदान के पास कितना पैसा है, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते .
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जनता को गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस और दूसरे त्योहारों पर शुभकामनाएं देकर अपना नैतिक कर्तव्य पूरा कर लेते हैं शुभ कामनाओं से पेट नही भरता पेट भरने के लिए रोटी चाहिए. नीति निर्देशक सिद्धांतों का क्या कभी किसी राज्य ने या केंद्र ने अनुसरण किया है ? कहने को हमारा संविधान दुनियाँ का सबसे बड़ा लिखित संविधान है , मगर दिखावे के लिए। संविधान सभा ने "कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा" के उक्ति को चरितार्थ कर संविधान बना तो दिया मगर ये किस काम का ? शायद संसद में बैठे 50 प्रतिशत लोगों ने तो कभी संविधान पढ़ा भी नहीं। संसद में हर जनसेवक और जनप्रतिनिधि को देशसेवा एवं गोपनीयता की शपथ लेनी पड़ती है ,परन्तु हर शख्स शपथ खाकर देश के साथ गद्दारी कर रहा है, लूट रहा है। चाहे 544 सांसद हो, विधान सभाओं के विधायक हो, 40 लाख केंद्रीय कर्मचारी हो या फिर राज्य सरकारों के कर्मचारी। ये सब इस अव्यवस्था के लिए दोषी हैं और देश के साथ द्रोह कर रहे हैं, गद्दारी कर रहे हैं। शायद इसी लिए नेता जी ने कहा था कि अभी देश लोकतंत्र के लिए तैयार नही है और गाँधी ने इसी लिए आजादी मिलने के बाद कांग्रेस को भंग करने के बात कही थी वो जानते थे के सत्ता में बैठ कर ये सत्ता लोलुप क्या करने वाले हैं
इंग्लैंड में जहाँ कोई लिखित संविधान नहीं है ,हमसे सैकड़ों साल आगे है। नार्वे के सामने हम कहाँ टिकते हैं ? मगर वो हमसे बेहतर और विकसित हैं. हमने संविधान को तमाशा बना दिया. कहने को विभिन्न देशों के अच्छी -अच्छी सभी तत्व इसमें डाल दिए गए, मगर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही अपने पद की मर्यादाओं का ख्याल नहीं रखते; चाहे वो तिवारी हो, राजा हो, चिदम्बरम हो ,ज्ञानी जैल सिंहजी या राज्यपाल बूटा सिंह हों। अंग्रेजों के 1860 में बनाये हुए कानून आज भी जारी है, जो गुलामों के लिए बने थे। उससे पहले राजे- रजवाड़े ऐसे ही कानून से राज करते थे. आज भी वो किसी न किसी तरह सता में काबिज हैं। और जनता तो भेड़, बकरिया की तरह है इस लिये शशी थरूर ने उन्हें (मवेशियों) के संज्ञा दी थी,
4 मार्च 2010 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद में कृपालु महाराज के आश्रम में केवल एक प्लेट, एक कटोरी और 20 रुपये के लिए, उमड़ी भक्तों की भीड़ से मची भगदड़ में 71 से अधिक लोग मारे गए ,वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों चाहे मुलायम सिंह हो या मायावती, के महलों और स्मारकों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यादव जी के लिए तो उनके गाँव में हवाई पट्टी बन जाती हैं। यही है गणतंत्र का असली चरित्र चेहरा .इन समस्याओं के निराकरण के बजाय हम गणतंत्र दिवस मनाने का ढोंग करते हैं। वास्तव में देखा जाय तो ये भी तिरंगे का अपमान है। जब हम संसद में बैठे 544 लोगों को ईमानदार और जिम्मेवार नहीं बना सकते, 40 लाख बाबुओं को कर्तव्यनिष्ठ नहीं बना सकते अथवा सुधार नहीं सकते. फिर आम आदमी से किस चरित्र और ईमानदारी की उम्मीद करे? देश में घोटालों के जांच के लिए आयोग बनते हैं,जाँच चलती है और करोड़ों रुपये खर्च होते है और रिपोर्ट कूड़े में डाल दी जाती है। लिब्राहन आयोग जो अयोध्या कांड के लिए बना था ,उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ? विदेशियों के अंधाधुंध नक़ल करके हमने उनकी सब बुराइयाँ तो ले ली, मगर उनकी एक भी अच्छाई न ले सके। संविधान सभा ने बड़े- बड़े सपने लेकर संविधान बनाया परन्तु संवैधानिक पदों पर बैठे जन प्रतिनिधियों और जनसेवकों ने इसे नकारा कर तमाशा बना दिया.संविधान की प्रस्तावना में क्या लिखा है,ये संसद में बैठे हमारे सांसदों ने शायद ही कभी पढ़ा हो। जिन्हें आज़ादी चाहिए थी, उन्हें मिली नहीं और जिन्हें मिली, उन्हें उसकी कीमत नहीं पता. यही हमारी विडम्बना है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को अपने पद की मर्यादा का ही ख्याल नहीं है। अधिकांश शासक शपथ खाकर देश को लूट रहै है और अपनी अंतरात्मा को मारकर समाजहित और देश हित के खिलाफ काम करता है .
आज़ादी के समय देशकी आबादी केवल 32 करोड़ थी और आज 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे है। अब ये नाटक बंद होना चाहिए. आज हमारे पास मेट्रोमैन श्रीधरन जैसे कितने कर्मठ नौकरशाह या नेता हैं ? जिन्होंने देश के नवनिर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है . यह सोचने की बात है। सभी साधन होते हुए भी हमने देश को नर्क बना दिया, जबकि दृढ़ इच्छाशक्ति वाले दुबई जैसे देशॉ ने विकास की मिसाल कायम की है; जहाँ भारत के बड़े-बड़े अधिकारी सिंगापुर में ट्रेनिंग लेने जाते हैं. दुबई एवं सिंगापुर में प्रशासनिक दक्षता के कारण विकास सर्वाधिक है और अपराध नहीं है। जबकि भारतबर्ष में सभी प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन प्रचुर मात्रा में होने के बाबजूद भी हम इनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। हर कुर्सी पर तिवारी बैठा है,अंजामे गुलिस्ता सामने है।
तिरंगे का सम्मान, संविधान का सम्मान दिल से होना चहिये . गणतंत्र को नाटक बनाना बंद होना चाहिए।
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*लेखक गोपाल प्रसाद स्वतंत्र पत्रकार एवं आर.टी.आई एक्टिविस्ट हैं . *
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