मैथिलपुत्र
unread,Feb 15, 2012, 2:07:57 AM2/15/12Sign in to reply to author
Sign in to forward
You do not have permission to delete messages in this group
Either email addresses are anonymous for this group or you need the view member email addresses permission to view the original message
to मैथिलपुत्र
इ मात्र विडंबना कहु वा कोनो अभिशाप, जे राजनितिक आजादी मिललाक ६५ वर्ष
बादो हम मिथिलाबासी अपन सोच कए जाति-पाति सँ ऊपर नहि उठा प रहल छी |
मात्र राजनितिक आजादी एही कारने जे, राजनितिक रूप सँ हम स्वतन्त्र छी
परञ्च आर्थिक रूप सँ हम एखनो पराधीन छी | आर्थिक पराधीनता | अर्थात हम
अपन इच्छानुसार खर्च नहि कय सकै छी, मने धनक अभाब | हमर मोन होइए अपन
बच्चा कए कॉन्वेंट स्कूल में पढाबी मुदा नहि पढ़ा सकै छी, इ थिक आर्थिक
पराधीनता | हमर मोन होइए नीक मकान में रही मुदा नहि किन सकै छी, इ थिक
आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए हमरो लग मोटर साईकिल, कार हुए, हमरो
कनियाँ-बच्चा नीक कपड़ा पहिरथि मुदा नहि, इ थिक आर्थिक पराधीनता |
स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो आर्थिक पराधीनता किएक ?
की हमरा लग बिद्या कम अछि ?
की हम कोनो राजनेता नहि बनेलहुँ ?
की हम प्राकृतिक रूपेण उपेक्षित छी ?
उपरोक्त सब बात गलती अछि | विद्या में हम केकरो सँ कम नहि छी | राजनीती
कए खेती अपने खेत में होइए | प्राकृतिक कृपा अपन धरती पर पूर्ण रूपेण अछि
|
तखन किएक ? किएक हम स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो, आर्थिक पराधीनताक जीबन
जिबैक लेल बेबस छी |
एखनो बच्चा कए चोकलेट नहि आनि हम कहैत छीयै, दाँत खराप भय जेतौ | कमी
चोकलेट में नहि, कमी हमर जेबी में अछि |
आ इ आर्थिक पराधीनताक एक मात्र कारन अछि, हम मिथिला बासिक सोचब तरीका |
आजुक युग में जहिखन मनुख चान-तारा पर अपन पैर राखि चुकल अछि, हम मिथिला
बासी एखन तक जाति-पाति कए सोचि सँ ऊपर उठै हेतु तैयार नहि छी |
बाभन-सोलकन्ह कए नाम पर बिबाद | अगरा-पिछरा कए नाम पर बिबाद | ऊँच-नीच कए
नाम पर बिबाद |
कोनो काज कए लय क आगु बढ़ू, जेकरा नापसन्द भेल, जाति-पाति कए नाम पर बबाल
खड़ा कय देत | आ इ कोनो अशिक्षित नहि बहुत पढ़ल-लिखल वर्गों सँ नहि दूर
भय रहल अछि | शिक्षित माननीयव्यक्ति सब चाहे कोनो जातिक्र हुएथ, अपन-अपन
जाति कए झंडा लय क आगु आबि जाएत छथि |
यदि हम स्वं व अपन मिथिला समाज कए विकसित व विकासशील देखए चाहै छी त जाति-
पाति कए झंझट सँ निकलि क एक जुट भय आगु बढ़य परत |
एक संगे चलै में मतभेद स्वभाबिक छै आ ओकरा दुर केनाई निदान्त आबश्यक छै |
मुदा ओई मतभेद में जाति कए बिच में नहि आनि क व्यक्तिगत आलोचना, समालोचना
करबाचाहि |
की कोनो गोट सफल व्यक्ति कए ओकर जाति कए नाम सँ जानल जाई छै ? नै, त
सफलता कए सीढ़ी पर चलै लेल जाति-पातिक सहारा किएक |
इ जाति-पातिक रस्ता किछु मुठी भरि राजनेताक चालि छैन | हुनकर बात मानि त
हम सब अपन विकास छोरि जाति-पाति में लरैत रहि आ ओ दुस्त राज करैत हमरा सब
कए सोधति रहत |
*** जगदानंद झा 'मनु'