संसार और आत्म तत्व के बीच का पुल है, अध्यात्म । संसार, शरीर और उसके अहंकार के नशे और आसक्ति से पोषित है। आत्म तत्व, तृप्त है इसलिये वह सर्वथा आनंद की अनुभूति में समाहित है। अध्यात्म, आधा आत्म और आधा संसार में है। इसलिये अध्यात्म वह चौखट या सुरंग है जिसके एक तरफ योग और दूसरे तरफ संसार है।
राम, आत्म तत्व या योग हैं। लंका पति रावण ही संसार हैं। हनुमन या शिव ही अध्यात्म, अर्थात संसार और योग के बीच का मार्ग, है। और सीता ही वह यात्री हैं जो सतोगुणी जीवात्मा संसार द्वारा अप हरण होने के बाद हनुमन (अध्यात्म मार्ग ) के द्वारा राम से मिलने में पुनः सफल हुईं।
इस अध्यात्म मार्ग पर चलना उसी तरह है जैसे बिना टिकट यात्रा। गंतव्य का ज्ञान उस टिकट पर ही लिखा होता है। किन्तु, जब टिकट ही न हो तब यात्री उस गंतव्य के बारे में क्या बताये? वह लोगों से सदैव बचता रहता है कि उसे कोई पहिचान न ले। लोगों को यदि पता हो तो जो कुछ भी उसके पास है उसे लोग इसलिये छीन लेते हैं कि उसके पास कोई यात्रा टिकट जैसे संकल्प या गंतव्य ही नहीं है । यही निष्काम कर्म या बिना टिकट यात्रा है। अब बतायें कि श्री कृष्ण को यदि सांसरिक सकामी लोग यदि चोर या छलिया न कहें तो कहें क्या?
उसके पास अपना कुछ भी नहीं होता। उसका स्वभाव (स्वभाव अध्यात्म उच्चते) ही उसका परिचय है। धीरे धीरे उस 'स्वभाव' में से भाव या लेन देन भी छूट जाता है, और फिर 'स्व' बच रहता है।
अभाव, भाव, स्वभाव और स्व ये चारों भाग उसी अध्यात्म मार्ग के चार चरण हैं। जीवात्मा इस मार्ग पर चलते हुये, जैसे जैसे अंधरे से प्रकाश में आती है, उसका रंग या वर्ण निखरने लगता है।
अभाव और भाव, संसार की संपदा हैं। अभाव, अहंकार की जड़ता है जो उसे भाव (लेन देन, व्यवसाय) में आने से रोकती है। यही छुद्रता या शूद्र वर्ण है।
भाव लेन देन को कहते हैं, और जीवात्मा जिसे सांसरिक गुणों या विषयों का व्यवसाय करना आता है, वही वैश्य वर्ण है।
स्वभाव भी एक तरह का भाव ही है किन्तु यह स्व अर्थात आत्म तत्व से लेन देन या भाव का नाम है। यही स्वाध्याय या अध्यात्म भी है। सांसरिक तीनों गुणों जैसे तम, रज, और सत के क्षय होने की इस स्थिति को क्ष्यत्रिय या क्षत्रिय वर्ण कहते हैं।
स्व अर्थात योग की स्थिति में स्वभाव में से भाव भी नहीं बचता और जीवात्मा, ब्राह्मण वर्ण या परम आत्मा के स्वरूप में स्थित हो जाती है।