कुछ दिनों से एक प्राण जो मुझे प्रिय हैं और जिन्हें मैं ब्रह्म विचार कहता हूँ, मेरे मन में आये हैं। और, क्योंकि उनका घर मेरे ही विशाल मन में कहीं है वे प्रायः आते जाते रहते हैं। उन से होने वाले सत्संग का कुछ वर्णन जो मेरे लेखनी और बुद्धि द्वारा संभव है, उसे लिखने की इच्छा हुयी है जो मेरे मित्र नारद (ब्रह्म विचार) की स्वीकृति में है। उसी का यह एक संस्मरण है।
आज मैं जहां हूँ वह कोलकाता में बहुमंजली इमारत के 16 मंजिल है, जहां का बरान्दा खुले आकाश में है सारा शहर दिखता है। बरसात की शुरुआत हो चुकी है। विशाल इमारत से टकरा कर हवा ऊपर की ओर से भागती है जिसके कारण, सबसे ऊपर की मंजिल पर वायु का वेग आँधी की तरह रहता है। गर्मी और उमस हवाएँ वहाँ रहने नहीं दे सकतीं। वह अवस्था जहां ऊपर आकाश, तीव्रता से बहती हुयी हवा, वातावरण में शांति, नीचे पृथ्वी, चारों ओर छत पर फैली हरियाली, इन का मन पर प्रभाव, चिंतन के लिए स्वाभाविक है।
मित्र जिनका नाम साधक है, मेरे साथ बैठे हुये हैं। उस वातावरण में कुछ बातें हो रहीं थीं और वहाँ की बहती हुयी वायु के अनुसार ही, वे विचार भी उच्च धरातल से हैं। वहाँ, देखने को कुछ भी नहीं, सिर्फ आकाश ही आकाश है। आकाश को निरंतर देखते रहने से वही आनंद मिलता है जैसे किसी आदिवासी को जंगल और नदियों में मिलता है, या निर्लिप्त संत को संसार में, और बच्चे को घर-परिवार में। इसका कारण यह है कि वह सभी का है और किसी का भी नहीं। शहर में या कार्य स्थल पर यह कभी नहीं हो सकता क्योंकि वहाँ जो दिखता है वह किसी न किसी का होता है, और इस बंधन के कारण सभी को अपने परिचय और छोटे-छोटे सीमा (जिसे अहंकार कहते हैं) की आवश्यकता होती है। सामान्य जीवन में अहंकार का यही बंधन ही रोग का कारण है क्योंकि उन्हें आकाश के दर्शन का लाभ प्राप्त नहीं होता।
आकाश, संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है अक्षर या जिसकी सीमा न हो या क्षय न हो। अन्तरिक्ष, आकाश ही है। समुद भी आकाश का ही एक उदाहरण है। समय भी आकाश ही एक दूसरा उदाहरण है क्योंकि हम खत्म तो हो जाते हैं, समय नहीं। इसी तरह, मन भी आकाश है। मन दरअसल आकाश का सही परिचय है, बाकी उसी के निकट उदाहरण हैं।
मैं और मेरे मित्र एक टक उस असीमित आकाश को देख रहे थे। उसमें कभी सूर्य का प्रकाश था और कभी नहीं, अचानक वह कभी बादलों से भर जाता, और कभी उसी में से जल की हल्की हल्की फुहार निकलने लगती। उसी में, अनगिनित तारे भी हैं। अनंत को साक्षात देखने का यह अनुभव, मुझे समाधि में ले गया। उसी समाधि में, असीमित मन जो आकाश के रूप में प्रत्यक्ष है, अपने आप प्रकट हो गया।
उस आकाश में उन असंख्य तारा मण्डल में कहीं एक छोटा सा तारा जिसे पृथ्वी कहते हैं वह भी है। और वह उसमें, निराधार लटक रहा है। उसी पृथ्वी में कोलकाता शहर और उसमें बनी एक सोलह मंजिल की इमारत में, उसी विस्तृत आकाश को देखता हुआ, मैं । मैं कौन? वह जो आकाश की अनंत विस्तार और उसमें समाहित दृश्यों को देखता है या, वह जो उसी आकाश में कहीं किसी सूक्ष्म स्थान किसी इमारत की छत पर बैठा है। एक दृष्टा है और एक दृश्य है।
दृष्टा और दृश्य क्या अलग अलग हैं? और यदि वे अलग नहीं हैं, तो वे एक दूसरे को देख कैसे रहे हैं? यह चिंतन हमें वहाँ ले जाता है जहां रामकृष्ण या विवेकानंद हैं। इसका अर्थ बताया जाना भी संभव नहीं है। अर्थात जो दिखता है वही अपने आप को भी देखता है। जब दृश्य और दृष्टा एक ही हैं तब जो दिखता है या अनंत सीमा में कहीं न कहीं देखा जा सकता है, वे दोनों एक ही हैं। देखने वाला यदि न हो, तब दृश्य भी नहीं होगा। दृश्य और दृष्टा का यह भेद, या दो होना, केवल आकाश या मन के कारण ही है।
समान्यतः सांसरिक या सीमित मन हमें भ्रमित करता रहता है कि जो दिखता है और जो देखने वाला है, वे दोनों अलग अलग हैं। जबकि वही मन, जब आकाश की तरह अनंत या सीमा रहित हो जाता है तब यह पता चलता है कि जिस संसार में मैं हूँ और वह पृथ्वी जिस आकाश (या मन) में निराधार लटकी हुयी है उसका दृष्टा या जनक मैं ही हूँ। मैं अपने आप (दृष्टा और दृश्य) से ही उस मन में बातें कर रहा था। यही सम्यक स्थिति समाधि है। मन या आकाश में सब कुछ है इस लिए वह कभी स्थिर नहीं रहता किन्तु दृष्टा और दृश्य का यह पारस्परिक ज्ञान या समाधि की अवस्था में आत्मज्ञान स्थिर रहता है।
उसी आकाश में मेरे मित्र के साथ ही एक आदिवासी मनुष्य रहते थे। वे 18 वर्ष के थे और उनकी प्रतिभा अद्भुत थी। उसी पेंथहाउस में उन्होने हनुमान का 15 फुट लंबा चित्र सीमेंट और प्लास्टर से बनाया था। कला की उनको कोई शिक्षा कभी नहीं मिली। उन्हें पैसे-रुपए की कोई समझ नहीं है क्योंकि वे मिदनापुर के जंगल में रहते थे जहां उसकी आवश्यकता न थी। आदिवासी व्यक्ति, असीमित या अनंत प्रकृति (मन या आकाश) से सदैव जुड़ा रहता है इसलिए उसकी समाधि स्वाभाविक होती है। उनका चेहरा सौम्य, और आंखे गहरी और शांत थीं। उनका पुकारे जाने का नाम पथिक था। उनका दर्शन, उन संभावनाओं का दर्शन था जो शांत मन की स्वाभाविक क्षमता है।
पथिक से मैंने पूछा कि वे हनुमान को कैसे जानते हैं? हनुमान का वह अनदेखा चित्र कहाँ से उनको दिखा। पथिक ने मृदु शब्दों में मुझे बताया कि उनके मन में वह चित्र अपने आप ही बन गया और फिर हाथ या किसी भी अंग से कैसे भी वह उसे बना सकते थे। पथिक केवल दृष्टा या दृश्य ही न थे वे उस दृश्य (या स्वयं दृष्टा) का सृजन भी कर सकते थे क्योंकि वे मन को देखना जान गये। आकाश या मन जब तक बंटा हुया है तब तक समाधि हो नहीं सकती। सृजन अर्थात दृश्य का मन में स्वाभाविक निर्माण तभी हो सकता है। वह वनवासी पथिक या कोई भी महानतम वैज्ञानिक या संत इसी सिद्धान्त के उदाहरण हैं।
फिर, मैंने यह सोचा कि प्रकृति ही वह कारण है जिससे जीव का मन असीमित हो सकता है। यह सच नहीं। परिस्थिति कैसी भी हो, यदि मन शांत हो जाय तब दृष्टा और दृश्य एक हो जाते हैं, और उसी को अद्वैत समाधि कहते हैं। वह, जब और जो चाहे कर सकता है। समस्त संसार और प्रकृति उसी का अपना शरीर है।
कृष्ण गोपाल मिश्र
कोलकाता