संतों की शरारत

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Krishna G Misra

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Jun 20, 2015, 2:46:34 AM6/20/15
to KRISHNA FELLOWSHIP, Durgashanker Nagda, ummedsingh baid, Dileep Mridul, ANIL KUMAR Sharma

संतों की शरारत

June 20, 2015 at 12:03pm

मेरे एक मित्र हैं जिन्हें भगवत गीता पर जगह जगह जा कर लेक्चर देने का बहुत शौक है। उन्होने मुझे कहा कि वे पूरे भारत या विश्व में यही करने के लिए जाना चाहते हैं। मैंने उन्हें बड़े प्यार से हतोत्साहित किया कि वे इसे न करें। किन्तु, उनका जवाब था कि मैं तो करूंगा ही। मुझे उनकी यह जिद बहुत अच्छी लगी और मैंने उन्हें इस कामयाबी के लिये मेरी शुभ कामनाएँ दीं। 

 

मैंने उनसे कहा कि उन्हें यह अच्छी तरह से पता है कि, भगवत गीता में भगवान कहते हैं कि सभी प्राणियों में मैं ही हूँ । और, जो मुझ अव्यक्त को सभी व्यक्त रूप में देखता है वही सत्य देखता है। इसका अर्थ यह है कि जो भी हमें दिख रहे हैं वे सभी भगवान ही हैं जो अपनी ही इच्छा से अलग अलग रूप से इस संसार में हैं। भगवान यह भी कहते हैं कि मैं छल इतनी होशियारी से करता हूँ जिससे संसार में स्थित मुझ सत्य को कोई पहिचान नहीं सकता। 

 

हर एक व्यक्ति का संसार में रहना  दरअसल भगवान की निद्रा अवस्था  में स्वप्न की स्थिति है।  उस सपने में कोई अपने को भारत का प्रधान मंत्री बने हुये देखता है कोई आतंकवादी या कोई व्यवसायी, कोई गरीब  और कोई कुछ और। भगवान, अच्छे से सो रहे हैं और सपने (संसार) का मन चाहा आनंद ले रहे हैं।

 

अब, मेरे मित्र जब उनको भगवत गीता का प्रवचन देंगे तब क्या होगा? भगवान भला क्या सोचेगें? भगवान अचानक नींद से जग जाएंगे। और, मेरे मित्र से पूंछेगे कि क्या आवश्यकता थी कि फालतू में मुझे जगा दिया? मैं अच्छा भला सो रहा था और संसार का स्वप्न देख रहा था। तुम क्या समझते हो कि क्या मैं (या कोई भी) आत्मा के उस सत्य से अनभिज्ञ हूँ? 

 

मेरे मित्र का भगवत गीता का प्रवचन एक तरह की शरारत है । शरारत इस लिये, कि वे सोते हुये निद्रामग्न भगवान को बार बार जगाने की कोशिश करते हैं, जबकि भगवान अलसाये हुये अपनी मन की चादर को वापस खींच कर ओढ़ लेते हैं। वे नहीं चाहते कि उनका सुंदर और मनोहक स्वप्न भंग हो जाय। 

 

मेरे मित्र जो भगवत गीता का प्रवचन करने के लिये आमादा हैं उनकी पूंछ, केवल दुखी, दरिद्र (असंतुष्ट, भले ही वे अरबपति हों) या चिंतक लोगों में बहुत है। इसका सरल सा कारण यह है कि वे सभी अपने दुश्स्वप्न से बहुत दुखी हैं और वे किसी तरह उस मानसिक निद्रा से जग जाएँ जिससे उन्हें उन स्वप्न से छुट्टी मिल सके।

 

मैंने उस मित्र को सलाह दी कि वे भगवत गीता के प्रवचन को सत्संग न कह कर शरारत कहें। "संतों की शरारत" उन भगवनों को निद्रा से जगाने के लिये है जो अपनी इच्छा से सो तो गये  हैं किन्तु, उन्हे अपने  स्वप्न पर कोई नियंत्रण नहीं रहा।  और, कोई उन्हें जगा दे तो उनको अच्छा लगेगा। 

 

उन सभी शरारती संतों, सूफी और सन्यासियों को मेरा बारंबार प्रणाम। 

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