प्रजानीति या प्रजातंत्र का अपहरण राजनीति और राजतंत्र ने कैसे और किस तरह किया और भारत में उसके क्या परिणाम अथवा दुष्परिणाम हैं। राजनीति या राजतंत्र से भारत को कैसे बचाएँ?

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Krishna G Misra

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Jan 5, 2016, 5:31:54 AM1/5/16
to Pankaj Gupta, Ajay pandey, Durgashankar Nagda, KRISHNA FELLOWSHIP

प्रजानीति या प्रजातंत्र का अपहरण राजनीति और राजतंत्र ने कैसे और किस तरह किया और भारत में उसके क्या परिणाम अथवा दुष्परिणाम हैं। राजनीति या राजतंत्र से भारत को कैसे बचाएँ?
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प्रजा तंत्र में राजनीति उसी तरह है जैसे किसी घोड़े पर गधा सवार हो। यह प्रजातन्त्र ही है जिसने राजा को रंक बना दिया और महान शासकों का नाम लेने वाला भी कोई न बचा। यह क्या यह आश्चर्य नहीं कि अपराधी और मूर्ख आज जन प्रतिनिधि बने बैठे हैं और वे भारत की प्रजा पर शासन करते हैं।

भारत की प्रजा सनातन काल से अपने उदारता, करुणा और प्रेम से विख्यात है। मुगल, अंग्रेज़, फ्रेंच, पुर्तगाल के चुने हुये ज्ञानी शासक और श्रेष्ठ आतंकी भी इस देश पर कभी राज न कर सके। उनकी तुलना में हमारे चुने हुये लल्लू पंजू प्रतिनिधि बड़े ही लाचार और असुरक्षित हैं। और, मूर्ख होने के कारण, उनमें भ्रष्ट बनने की सीमित क्षमता ही है, इस लिये भारत में राजनीति अभी तक सह्य रही है। राजनीति शब्द के अंत का समय अब आ गया है। इस प्रजानीति शब्द के परिचय होने के साथ ही राज या शासन के विचार और आसुरी संस्थाएं भी मर जायेंगे।

भारत की प्रजा ने संविधान बनाया । संविधान ने भारत की प्रजा को नहीं बनाया। प्रजा ने अपने तात्कालिक संकल्प और साधनों की रूप रेखा को संविधान का नाम दिया। यह संविधान ही भारत की प्रजा नीति का प्रथम पुत्र है।

इस संविधान में कहीं भी राजनीति या पॉलिटिकल पार्टी का नाम नहीं है। किन्तु, परम्पराओं के कारण, संविधान का राजनीति ने अपहरण कर लिया। यही कारण है कि इस व्यवस्था में जन या प्रजा-प्रतिनिधि नहीं रहे बल्कि राजनीति के व्यवसाय में लगे लोगों ने उस पर कब्जा जमा लिया। इस तरह प्रजापुत्र संविधान और राजनीतिक धंधे में लगे जन-प्रतिनिधियों के बीच एक दूरी बन गयी। यही कारण है कि पार्लियामेंट में बने नीति या कानून, समानता और न्याय और प्रजा हित के विकास के बजाय शासन के दंड विधान हैं। इन्हीं अधकचरे और भयानक कानून के डर से भ्रष्टाचार की वृद्धि होने लगी । आश्चर्य है, कि प्रजा को अपने ही तथा कथित जन प्रतिनिधियों (जो दरअसल राजनीति के धंधे बाज थे) द्वारा बनाए जाने वाले कानून को जानने के लिये वकील और लेखाकर की आवश्यकता पड़ने लगी।

इस तरह संसद और सांसद, प्रजा विमुख हो गयी। प्रजा के प्रथम पुत्र संविधान और उसी संविधान का प्रथम पुत्र सांसद या जन प्रतिनिधि राजनीति के लोभ में नाकारा निकल गए।

जब राजनीतिक दल से बने सांसद जिसे संविधान पर हाथ रख कर शपथ लेने के अलावा संविधान का कुछ भी पता नहीं इस देश के राज नेता बन गए। वे तथा कथित जन प्रतिनिधि अपने राजनीतिक आकाओं के हित में लग गये जिनके कृपा से उन्हे पार्टी का टिकट मिला। उन के प्रजा से दगाबाजी या विश्वासघात करने के लाभ हेतु, उन चुने हुये राजनीतिक सांसदों को भष्टाचार का लाइसेन्स मिल गया और वे अब छोटी मोटी चोरियों के लिये स्वतंत्र थे। यह उसी तरह था जैसे अंग्रेज़ सरकार भारतीय राजाओं को अपनी ही जनता पर अत्याचार के लिये खुली छूट देती थी। जबकि, देश को लूटने का कानूनी अधिकार, उन राजनीतिक पार्टियों के व्यवस्थापकों के पास सीमित रह गया। यह देश, राजनीतिक लुटेरों का आखाडा बन गया।

भारत का पार्लियामेंट एक तरह का स्टॉक मार्केट डेमोक्रासी है। जिस राजनैतिक पार्टी में चयनित सांसद की गिनती अधिक होती है वही देश का शासक बना लेता है। बॉम्बे का स्टॉक मार्केट जितना कोलाहल पूर्ण हैं यह पार्लियामेंट उससे कम नहीं। लालची लोग क्या कभी शांत हो सकते हैं? भारत को लूटने का इससे बड़ा खेल कहाँ हो सकता है? भारत और उसकी पूंजी का खरीद फरोख्त, और राजनीतिक रण इस पार्लियामेंट में दिन दहाड़े होता है।

प्रजा के प्रथम पुत्र संविधान और उसी संविधान का प्रथम पुत्र सांसद या जन प्रतिनिधि राजनीति के लोभ में नाकारा निकल गए। उन्ही राजनीतिक धंधे बाजों के पारलीमेंटरी व्यवस्था के न्यायपालिका और कार्यपालिका नाम के दो हाथ हैं। एक उन क़ानूनों का पालन करता है और दूसरा उसकी जनता में व्याख्या । न्यायालय और कार्यपालिका जो पार्लियामेंट में बैठे जनप्रतिनिधियों के द्वारा संविधान के अनुसार बने कानून के पालन और उसकी व्याख्या के लिये बने थे वे अब निरंकुश हैं। उन्हें पता है कि जन प्रतिनिधि सही माने में देश हित नहीं सोचते और वे राजनीतिक पार्टी के नौकर हैं इसलिए उन्हे कानून का अर्थ स्वयं भी नहीं मालूम। इस तरह, न्यायालय और कार्यपालिका, राजनैतिक पार्टियों को ब्लैक मेल करते हुये अपनी छवि, प्रजा को उसी कानून से भयभीत कर बनाती है। भारत के राजनैतिक दल के इस अनैतिक संबंध से न्यायपालिका और कार्यपालिका, देश द्रोह या प्रजा का अहित करने के कानूनी अधिकार से लैस हो जाती है।

जहां से भी भारत का संविधान कापी किया गया था उसमें लिखा है कि 'प्रजा का हित - प्रजा द्वारा'। इस सिद्धान्त की अनदेखी की गयी। भारत का यही दुर्भाग्य है।

क्या हम भारतीय प्रजानीति को नहीं अपना सकते? हमें राज करने वाले नहीं चाहिये। प्रजा तंत्र का राजनीतिक पार्टियों द्वारा अप हरण कितना उचित है?

आगे समय मिलने पर अपने विचार लिखूंगा कि प्रजा नीति और प्रजा तंत्र में व्यवस्था कैसी हो और कैसे बिना शासक या बिना किसी मालिक या नौकर के समाज और देश जिसे भारत कहते हैं बनना संभव है ।


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