भाग 1
महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र का प्रकाशन किया। योग एक सत्य है और हर एक सत्य की तरह ही वह भी सदैव ही, सब को उपलब्ध है क्योंकि उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। इसलिये, उसे जान लेने या न जानने से क्या लाभ जब वह बदलता या बदल नहीं सकता। इसी तरह, गुरुत्वाकर्षण प्रकृति का सिद्धान्त है और यह अनादि काल (भास्कराचार्य और न्यूटन के जीवन के पहिले और उनके मृत्यु के उपरांत भी) से है और, यह सत्य सदैव ही रहेगा । किन्तु, गुरुत्व के उस सिद्धान्त को हम ज्ञान के रूप में तब जान सके जब इन वैज्ञानिकों ने गुरुत्व के सूत्र का प्रकाशन किया।
इस उदाहरण से यह सरलता से समझा जा सकता है की गुरुत्व या योग या किसी भी सत्य के सूत्र का "ज्ञान" गुरु से ही हो सकती है, जबकि "सत्य", सनातन और सर्वत्र है। कबीर दास जी कहते हैं कि भगवान जबकि सत्य है और सभी ओर फैला है, किन्तु गुरु जब तक भगवान को दिखाता या समझा नहीं देता, जीव को भगवान के सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता।
गुरु गोविंद दोऊ खड़े का को लगूँ पाँव, बलिहारी गुरु आपनों, गोविंद दियो बताय
ज्ञान के बिना सत्य उसी तरह नहीं दिखता जैसे किसी नेत्रहीन व्यक्ति या उस व्यक्ति जिसे आँख तो है किन्तु उसका उपयोग नहीं आता (या आंखे मूँदे हुये) को सूर्य का सर्वत्र फैला प्रकाश और उसमें दृश्य संसार नहीं दिखता। गंगा के निर्मल जल में रहने वाली मछ्ली भी प्यासी मर जाती है यदि उसे जल का उपयोग नहीं आता और यही गुरु का जीवन में महत्व है। अतः योग जो सत्य है उसका ज्ञान हमें जिसने प्रकाशित करने की कृपा की उन महर्षि पतंजलि को प्रणाम। संसार में हर एक को योग की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य है। योग सत्य है और इसलिये वह पहिले से ही प्राप्त है, बस उसकी देख और समझ हो जाय ... यही सत्य में स्थित हो जाना है।
लाली देखन मैं चली जित देखी तित लाल, जब मैं देखों आपनों मैं खुद पाऊँ लाल।
सत्य का दर्शन होते ही दृष्टि मिल जाती है और सारा भेद खुल जाता है और परस्पर भिन्नता मिट जाती है। देखने वाला और उसका सारा ज्ञान भी उसी सत्य के प्रकाश में उसी तरह समाहित हो जाता है जैसे दीपक का प्रकाश सूर्योदय के प्रकाश में।
भाग 2
सूत्र किसे कहते है? किसी भी गुप्त भेद को खोलने का मार्ग ही सूत्र कहलाता है। खनिक, चोर, वैज्ञानिक या वकील कोई न कोई सूत्र ही ढूंधते हैं क्योंकि उनके जीवन में फैले अंधकार में वही एक संकरा सा मार्ग है। जब प्राणी को कोई भी एक भेद खुल जाता है तब उसी से प्रकाश सर्वत्र फैल जाता है, और वहाँ से सभी भेद एक साथ दिखने लग जाते हैं। यह उसी तरह है जैसे किसी भी फल में निहित हर एक बीज। बीज एक सूत्र है। किसी भी एक बीज से एक पूरा वृक्ष रचित हो जाता है और उसी वृक्ष के असंख्य फलों में असंख्य बीज पुनः उत्पादित होते हैं। रामचरित मानस या भगवत गीता का कोई एक श्लोक ही पढ़ कर समझ लेने से, वेद, उपनिषद और योग सूत्र, ब्रह्म सूत्र आदि, समस्त और सनातन सत्य प्रकाशित हो जाता है, और जिसने भी सूत्र की साधना कर ली उसे, अपने आप ही बिना प्रयत्न सभी श्लोकों के अर्थ दिखने लग जाते हैं।
दीपक में रुई का टुकड़ा जो ज्योति को धारण करता है, वह भी सूत्र ही कहलाता है। यही अध्यात्म (आधा आत्मा या प्रकाश और आधा संसार या अंधकार) है क्योंकि, वह आधा तेल में और आधा तेल से बाहर ज्योति को धारण किए हुये रहता है। उस सूत्र के ज्योति से कितने ही और दीपक जलाए जा सकते हैं। महर्षि या गुरुओं के द्वारा निर्मित सूत्र, ज्ञान के प्रकाश का प्राकृतिक माध्यम है जो सत्य को प्रकाशित करते हैं। सूत्र किसी कार का कोई कम्पोनेंट नहीं है। यदि किसी कार में से क्लच वायर या कार्बुरेटर या कोई छोटा सा भी अंग खराब हो जाय तो, पूरी कार बंद हो जाती है । इसके ठीक विपरीत, ज्ञान का सूत्र वह है जिससे कोई भी बीज या तना या पत्ता, पूरे वृक्ष का निर्माण कर लेता है।
भाग 3
अथ योगानुशासन: । योगश्चित्त वृत्ति निरोध: ॥ ... पतंजलि योग सूत्र
शासन नियंत्रण या बंधन को कहते हैं। किन्तु उस नियंत्रण के कारण जब किसी पर निर्भरता हो जाय तब वही शासन या प्रशासन या विशेष शासन या विशेष बंधन या प्रबंध बन जाता है। इस स्थिति में योग संभव नहीं। यह संसार मन का ही भौतिक रूप है जिसमें निरंतर कुछ न कुछ आता जाता या दिखता, रहता है। और आत्मा उसी अस्थिरता के कारण सुख और दुख के समुद्र में डूबती उतराती रहती है। मन, संगठन, संसार ये सभी नियंत्रण के बिना नहीं रह सकते। परंपरा, काल और समय का बंधन भी एक नियंत्रण ही है इसलिये, काल का शासन या बंधन , एक प्रशासन ही है, अनुशासन नहीं। अनुशासन वह है जो किसी बंधन या निर्भरता या नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त हो। अनु का अर्थ है, स्वयं। और, स्वयं का शासन ही अनुशासन है। स्वतन्त्रता या स्वाधीनता भी इसी के पर्यायवाची शब्द हैं। अनुशासन ही योग का आरंभ है और, योग में आरंभ होते ही उसमें ही समाहित हो जाना है। इसलिये योग में आरंभ होना ही पर्याप्त है क्योंकि वह अनंत सत्य का ही अभिन्न भाग है।
बंधन, प्रबंधन या प्रशासन का त्याग ही, योग है। मन जो अस्थिर है वह बंधन इसलिये भी है क्योंकि उसे स्थिर करने के उद्योग में आत्मा लगी रहती है। उसके इसी व्यस्तता के कारण उसे योग अर्थात आत्म तत्व का ज्ञान नहीं हो पाता। मन, वायु की तरह निरंतर अस्थिर रहता है और उसे स्थिर करना लगभग दुष्कर है। भगवत गीता में भगवान कहते हैं संग दोष विवर्जयेत अर्थात संसार या संगठन जो संग से निर्मित है उसमें निर्भरता होती है अतः मन की अस्थिरता के कारण योग दुष्कर है। जीवात्मा जब मन को जीत लेता है या उसे ठीक ठीक जान लेता है, तब उसके विचलित होने से भी वह चिंतित भी नहीं होता। प्रकृति या मन जो आत्मा की रक्षा करने के लिये उसी तरह चौकन्ना और अस्थिर रहता है जैसे माँ कौशल्या अपने शिशु श्री राम की रक्षा कर रही हों। किन्तु, जब माँ यह जान जाती है की वह शिशु परम आत्मा है, और स्वमेव समर्थ है, तब उस शांत स्वरूप को देख, वह अपने आप ही शांत, निश्चिंत और प्रसन्न हो जाती है। आत्मा का मन और शरीर पर शासन ही अनुशासन है और यह स्थिति ही योग है।
भाग 4
चित्त, चित्र (ड्राइंग, फॉर्म) को कहते हैं। पत्थर को जब एक मूर्ति का रूप दे दिया जाता है तब वही एक चित्र है । हमारा शरीर भी चित्त ही है क्योंकि इसका एक जाना पहिचाना रूप है। चित्त, मानसिक या विचारों से निर्मित भी हो सकते हैं । संसार भी चित्त ही है क्योंकि इसमें हर क्षण वे बनते और बिगड़ते रहते हैं। चित्त में यही प्राकृतिक बदलाव चित्त की वृत्ति है। आज जो हमें प्रिय है वही कल अप्रिय लगने लगे तब यही परिवर्तित मन ही चित्त वृत्ति है। चेतना की स्थिरता नहीं रहने को ही चित्त वृत्ति कहते हैं।
चित्र जिस तरह कागज पर बनता है उसी तरह कोई भी चित्त भी मन के कागज पर बनता है। और मन की अस्थिरता के कारण चित्त भी अस्थिर हो जाता है। जल के सतह पर जैसे कुछ चित्र बने हों वे कब तक टिके रह सकते हैं? जल के बहने के साथ ही वह चित्त भी मिट जाता है। संसार की स्थिति में, मन में चित्त विलीन हो जाता है। इसके विपरीत योग वह स्थिति है जिसमें चित्त में मन विलीन हो जाता है। यह उसी तरह होगा जैसे, जल के सतह पर चित्र के बना हो और देखते देखते वह चित्र तो वैसे का वैसा ही बना रहता है किन्तु सारा जल जिस पर वह चित्र बना हुआ है वह उसी चित्र में समा जाता है। मन उस चित्त में विलीन हो जाता है और वह चित्त उसी तरह अपरिवर्तनीय अवस्था में सदैव ही दिखता है। यही योग है।
देखने और समझने की क्रिया ही योग सूत्र "योगश्चित्त वृत्ति निरोध:" का रहस्य है। एक माँ अपने पुत्र को किस भी अवस्था में, देखते ही पहिचान लेती है। यह क्यों? पुत्र जिसे उसने बचपन में देखा था वही आज बड़ा हो गया और पढ़ लिख गया, उसके पास धन और मान सम्मान है और, फिर वही वृद्ध हो जाता है। माँ को वह पुत्र ही दिखता है उसकी आयु, उसका धन, वैभव या उसकी सामाजिक स्थिति चाहे जैसे भी हों। प्रेम के कारण, माँ का मन पुत्र के चित्त को कभी भूल नहीं सकता और समस्त मन और उसकी विषमतायें, उस पुत्र के याद आने पर या उसे देखने पर तुरंत समाप्त हो जाती हैं। यही चित्त वृत्ति निरोध है। मन का चित्त में विलीन हो जाना ही योग है।
भक्त सदैव ही प्रेम वश, भगवान के चरित्र का चिंतन करते रहते हैं और उनके चित्त की यह अवस्था ही उन्हें योगी बना देती है। उन्हें मन की कोई परवाह नहीं होती। वे यह जानते हैं की मन परिवर्तन शील है किन्तु चित्त की स्थिरता के कारण ही वह मन स्थिर हो सकता है। प्रेम के कारण ही चित्त स्थिर रह सकता है और उस पर मन की अस्थिरता का कोई प्रभाव नहीं होता।