हम सभी काम ही करते हैं? काम वह है जिसका कभी अन्त नहीं होता। हम घर बनाते हैं और उसकी रक्षा के लिए काम करने की निरंतर आवश्यकता होती है। घर की आवश्यकता चाहे रहे या न रहे, किन्तु जो घर मैंने बनाया है उसकी रक्षा ही आवश्यकता बन जाती है। शरीर और इंद्रियों की रक्षा भी इसी तरह करनी होती है। भूख चाहे लगे या न लगे, खाना खाना भी काम है। व्यवसाय या नौकरी भी काम ही है। काम अपने आप ही रोज रोज रिपीट होता है इसलिये उसे करने में कोई ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती, और इसी को आराम कहते हैं।
किन्तु जो काम अर्थ पूर्ण होता है उसमें कोई लक्ष्य होता है। लक्ष्य का होना ही काम को अर्थ बना देता है। अर्थ जैसे धन कमाना, या यश कमाना या किसी अन्य लक्ष्य की सफलता की प्राप्ति हेतु प्रयत्न ही अर्थ है। अर्थ की चाह में जीवन का कोई न कोई लक्ष्य तय करना आवश्यक है। लक्ष्य की प्राप्ति पर संतोष या सफलता का भाव प्राप्त होता है किन्तु इसमें कभी आराम नहीं मिलता। अर्थ निरंतर परिवर्तनीय है इसका कारण यह है कि, किसी एक लक्ष्य की पूर्ति के बाद दूसरा लक्ष्य सामने आ जाता है इसलिये, अर्थ कभी काम बन पाता क्योंकि यह रिपीट नहीं होता और नित किसी न किसी नयेपन के कारण, जीवन में आराम नहीं मिलता। जीवन को तब यह अनुभव भी होने लगता है कि संतोष या सफलता का भाव, आराम से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
जिसे अर्थ का ज्ञान होता है उसे काम करने वाले अपने आप मिल जाते हैं। अर्थ, लक्ष्य (goal) है और काम, साधन (means)। उदाहरण के लिये आप को दिल्ली से मुंबई जाना है। जीवन के उस क्षण में, मुंबई का लक्ष्य होना ही आप का अर्थ है। आप टैक्सी ले कर दिल्ली हवाई अड्डे पर जाएंगे। वहाँ लोग आप को बोर्डिंग पास देंगे। हवाई जहाज का चालक उस हवाई जहाज जिस पर आप बैठेंगे उसे मुंबई लायेगा। और फिर, किसी टैक्सी को ले कर आप मुंबई में स्थित अपने लक्ष्य तक आप पहुंचेंगे। जब आप मुंबई पहुँच जायेंगे, तब आप को संतोष का अनुभव होगा। किन्तु, टैक्सी वाले, हवाई जहाज के कर्मचारी जो सदैव वही काम करते हैं उनका काम आप को अपने लक्ष्य तक पहुंचाना है। टैक्सी वाले को अपने आप कहीं नहीं जाना होता। कोई सवारी यदि न आये तब वे बैठे उनका इंतजार करते रहते हैं। क्योंकि वह टैक्सी या हवाई जहाज, एक साधन है। हवाई जहाज का व्यवसाय यदि सवारी न हों तो बंद हो जाता है। साधन एक काम है और जो उन साधनों का उपयोग कर, लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ है उसे अर्थ का ज्ञान है।
इसी तरह नौकरी करने वाले पढे लिखे मजदूर, बड़ी बड़ी डिग्री ले कर बैठे रहते हैं किन्तु वे कभी यह नहीं जान पाते कि वे क्या कर सकते हैं। शिक्षा में बुद्धि का निर्माण इस तरह हो जाता है जिसके कारण उनमें लक्ष्य का चुनाव करने की क्षमता रह ही नहीं जाती। साधन में अपने आप को बदल पाने की क्षमता नहीं होती। कोई वकील, इंजीनीर या चिकित्सक नहीं बन सकता। कोई टैक्सी वाला, हवाई जहाज नहीं चला सकता। यही, काम में आसक्ति या जड़ता या हठ है। अधिकतर, उद्योगपति इस तरह की शिक्षा से बचते हैं। उन्हें अर्थ की चाह होती है काम की नहीं। बिल गेट्स, स्टेव जाब, नरेंद्र मोदी, धीरु भाई अंबानी या संत कबीर, गुरु नानक या तुलसीदास अपने शिक्षा के कारण नहीं जाने जाते।
अर्थ से क्या प्राप्त होता है? सफलता या लक्ष्य प्राप्ति पर होने वाला संतोष। किन्तु अर्थ की मृग मरीचिका क्या लाभ दायक है? होता यह है कि मनुष्य जितनी ऊंचाई पर चढ़ जाता है उसे उतारा जाना उतना ही कठिन है। जब वह व्यक्ति गिरने से डरने लगता है तब वह अपने पास किसी को नहीं आने देता और वह सीढ़ी ही काट देता है जिस पर चढ़ कर वह वहाँ पहुंचा था। यही कारण है कि सफल व्यक्ति बहुत लाचार होता है। उसे अपनी सारी, शक्ति अपनी सफलता की रक्षा के लिये खर्च करनी पड़ती है। और उसके शत्रु बढ़ते ही रहते हैं। उसे नींद नहीं आती और वह सफलता के अकेलापन से टूट जाता है। एक पोलिटिशयन जो मंत्री है उसे बख्तरबंद गाड़ी चाहिये। उसके चारों ओर रक्षा कर्मी लगे रहते हैं। वह अपने ही देश में शत्रुओं से घिरा रहता है। उसे सभी ओर सफलता को बनाये रखने के लिये कठोर नियंत्रण (control) चाहिये ।
सफलता की परिभाषा व्यक्ति स्वयं तय नहीं करता। आप का घर पड़ोसी से बड़ा है तभी आप सफल हैं। इसी तरह, सफलता की परिभाषा शत्रु या वे चुनौतियों तय करतीं है जिसका आपने चुनाव किया है और जिन पर आप को जय पाना है। आपने दिल्ली के केजरीवाल की कहानी अवश्य सुनी होगी। उसने शीला दीक्षित जो कांग्रेस की एक महान नेता थीं उनको परास्त किया, जिससे उनकी ख्याति पूरे भारत में फैल गयी। इसी तरह, सफलता एक तुलना है । किसी चीज का भार नापने के लिये उसे उठाने में लगा बल ही जो पृथ्वी के गुरुत्व बल से शत्रुता (प्रतिकूल बल) है, उस वस्तु का भार है। यदि कोई शत्रु ही न हो तब सफलता की कोई परिभाषा संभव ही नहीं।
अर्थ कभी स्थायी नहीं होता, और सफलता या लक्ष्य जितना ही ऊंचा होगा गिरने की उतनी ही संभावना उतनी ही बढ़ती है। इस तरह शत्रुता या प्रतिस्प्रधा में जीवन असहाय बन जाता है। इस अवस्था को न तो छोडते बनता है और न लेते। इसके लिये कोई वह बल चाहिये जो जीवन को उस सफलता के शीर्ष से गिरने से रोके या धारण कर ले। इसे धर्म कहते हैं। धर्म, प्रकृति के नियम का ज्ञान है। जिस व्यक्ति को यह ज्ञान हो जाय कि उसके सफलता का मूल कारण क्या है, तब वह व्यक्ति कभी असफल नहीं हो सकता। और यदि वह असफल होता भी है तो वह उन कारणों को दूर कर पुनः सफल हो जाएगा। इस अवस्था में उसे सफलता और असफलता दोनों की चिंता नहीं रहती। उसे सफलता से न तो खुशी होती है और न ही असफलता से दुख। इस अवस्था में उसका कोई शत्रु या प्रतिस्प्रधा करने वाला कोई नहीं रहता और वह स्वयं निश्चिंत (freedom from worries, assurance) रहता है। धर्म से भय नष्ट हो जाता है क्योंकि शत्रु ही भय के कारण हैं।
धर्म, व्यक्ति निरपेक्ष है। उसमें कोई पद या व्यक्तित्व या अहंकार नहीं होता। कोई भी व्यक्ति प्रकृति के नियम के ज्ञान और सदुपयोग से किसी भी सफलता को प्राप्त कर सकता है और उन्हीं नियमों के उल्लंघन से पतित भी हो सकता है। धर्म ज्ञान पर आधारित है इसलिये इसके लिये किसी नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं होती। गुरुत्व बल सदैव किसी भारी वस्तु को नीचे खींचता है और इसी ज्ञान से गति का लाभ लिया जा सकता है। इसी तरह, ज्ञान से श्रम की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि प्रकृति अपने बल से ही उन कार्यों को करने लग जाती है। यह बल मनोवैज्ञानिक या भौतिक दोनों ही होते हैं।
धर्म का केवल एक ही लक्ष्य है, समानता। ऊंचाई पर जल ठहर नहीं सकता उसे नीचे की ओर तब तक बहना होगा जब तक जल स्तर समान न हो जायें। गरीब और अमीर में इसी देन लेन इस तरह तब तक चलता है जब तक वे समान नहीं बन जाते। समानता (equality) का यह नियम प्राकृतिक (natural system) है। समानता से ही शत्रुता (सफलता और असफलता ) का भी अंत हो जाता है। शत्रुता के न रहने से सभी निर्भय और निश्चिंत रहते हैं; और प्रकृति स्वयं सभी कार्य कर, श्रम भी मिटा देती है।
निश्चिंत होने से ही प्रेम या अपनापन का भाव जन्म लेता है। अपनापन ही मोक्ष है। यही क्वालिटी है। अहंकार जैसे निश्चिंत होना (धर्म) या सफल होना (अर्थ) या आराम का होना (काम) तब व्यक्तिगत नहीं रहता, बल्कि ये चारों फल सभी को एक समान प्राप्त रहते हैं।