दुख का सुख

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Krishna G Misra

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May 8, 2015, 2:35:09 AM5/8/15
to Durgashanker Nagda, KRISHNA FELLOWSHIP, Shiv Mangru

दुख का सुख

May 8, 2015 at 11:42am

 आज मेरे मित्र ने मुझे बताया कि उत्तर प्रदेश में जिस स्थान पर मैं जा रहा हूँ वहाँ ट्रेन नहीं जाती और सड़क इतनी खराब है कि 40 किलोमीटर चलने से अच्छे अच्छे बीमार हो जाते हैं। मुझे यह सुन कर अच्छा लगा क्योंकि मुझे उस सुख के अनुभव का अवसर मिलने वाला है जिसे साधारण भाषा में दुख कहते हैं। इसके पहिले भी मैंने दुख के सुख का अवसर लिया है जो अद्भुत थे।

 

दुख या पीड़ा, ध्यान का एक अद्भुत साधन है क्योंकि आत्मा तब मन की कल्पना या भूत/भविष्य की योजना नहीं बनाती बल्कि वह तटस्थ हो कर उन अप्रत्याशित घटनाओं को देखती है जबकि उसका मन निश्चिंत या स्थिर रहता है। यह एक नट का रस्सी पर चलने जैसा अनुभव है। ठीक एक वर्ष पहिले मैं अलाहाबाद ट्रेन से गया था और वह भी अनारक्षित और जनरल क्लास में। गर्मी इतनी अधिक थी कि कई लीटर पानी पी गया। जाना आवश्यक इस लिए था कि मेरी माँ की मृत्यु हो गयी थी, और उनके शरीर को देखने का यह अंतिम अवसर था। इस ध्यान के साथ, और उस ट्रेन में उपस्थित उस क्षणिक समाज में वह अद्भुत प्रेम और अपनापन देखने को मिला, जिसे मैंने अपने व्यावसायिक जीवन के समाज में कभी नहीं पाया। मैंने पाया कि जनरल क्लास में चलने वाले सभी व्यक्ति अद्भुत ध्यानावस्था में रहते हैं क्योंकि वे बहुत दिनों बाद अपने घर जा रहे होते हैं, और यही कारण है कि उन पर दुख या कष्ट का कोई असर नहीं पड़ता। गर्मी और स्थान की कमी और असहाय अवस्था में प्रेम ही एक सबसे सस्ता और निर्भय मार्ग है। यही ध्यान की वह अवस्था है जब शरीर छूटने का भी कोई दुख नहीं होता।

 

जब मैं छोटा था तब वर्ष में एक या दो बार, अपनी माँ से मिलने और साथ रहने,  अपने जंगल के निकट के गाँव में पैदल जाता था जहां वे रहतीं थीं।  तब पैदल चलते, हर क्षण जितना ही मैं निकट पहुंचता था उतना ही अधिक मुझे आनंद आता था। 15 किलोमीटर का पैदल रास्ता जो छोटी छोटी नदी नालों और झड़ियों और आम के बाग और स्थान स्थान पर बने गाँव-कुओं, से भरी थी उनसे खुशी बढ़ती रहती थी, और कोई भी कठिनाई, कभी उत्साह कम करने का काम नहीं कर सकी। पीपल का वह पेड़ जिस देख कर मुझे अपने घर और उसमें मेरी माँ का ध्यान होता था वह वृक्ष आज भी मेरे मन में स्थित तीर्थ स्थान है। वह पेड़, अब भौतिक रूप में नहीं रहा। 

 

अभी कुछ वर्ष पहिले, मैं अपने गुरु के स्थान पर अकेले जा रहा था। वहाँ जाने का कोई सामाजिक साधन नहीं है। या, है किन्तु पहिले से मुझे वह ज्ञात न था। मैंने पैदल ही जाने का सोचा। वह निर्जन स्थान था। घनी झड़ियों के बीच, बिना रास्ते, चलना मेरा पैदाइशी शौक था क्योंकि मेरा जन्म जंगल में है। मैंने उन घनी झड़ियों के बीच चलना आरंभ किया किन्तु मुझे कांटे लग रहे थे। अब मैं अकेला था और दुख का अनुभव केवल तब होता है जब उसे देखने वाला कोई हो। जब कोई देखने वाला कोई न हो तब दुख करने से क्या लाभ?

 

तब मुझे अपने गुरु का चिंतन होने लगा जो घने और निर्जन जंगल के बीच रहते थे। उनको मैंने कभी नहीं देखा किन्तु उनका जीवन परिचय पढ़ा जिसे स्वामी अदगदानंद जी ने लिखा है। फिर मैंने, श्री राम के वन में जाने और काँटों के बीच चलने का अनुभव किया। इस अनुभव से अब जो काँटों के बीच चलने का मुझे जो आनंद हुआ उसका वर्णन संभव नहीं है। वह दूरी जो लगभग 4 किलोमीटर की थी पूरी हो गयी और मैं ठीक रास्ते पर आ गया। मैं, अब तक उस दुख के सुख का अनुभव भूल नहीं पा रहा हूँ।

 

फक्टोरि में लोग काम करते हैं। उनको कष्ट होता है। किन्तु उन्हें उस दुख का सुख मिलता है क्योंकि वे उस पैसे से अपने बच्चों के लिए साधन जुटाते हैं। उनका ध्यान काम करने से मिले दुख से अधिक, उस सुख पर है जो उनका परिवारिक प्रेम है। मुझे उन मजदूरों के दुख के सुख के इस अनुभव से सहानुभूति होती है और अनुभव मुझे भी मिल जाता है। बड़े बड़े अधिकारी उनसे ईर्षा इस लिए करते हैं क्योंकि उनको उनसे सहानुभूति नहीं होती और वे सुख के दुख में जीते जीते , मानसिक रोगी और अपराधी बन बैठते हैं। सरकारी अधिकारी या नेता आदि यही सफेदपोश अपराधी है।

 

फाइव स्टार होटल में रहते हुये जो सुख है उसका दुख और अकेले निर्जन और झड़ियों के बीच शांत मन में चिंतन करने में प्राप्त दुख के सुख में यह भिन्नता स्पष्ट है। मैंने सोचा कि जब व्यावसायिक कार्य से मैं चलता हूँ या जिन स्थान पर रहता हूँ वे शारीरिक सुख देते हैं किन्तु उस सुख का मन पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। जबकि, दुख के सुख का असर दीर्घकालिक है। 

 

दुख के सुख का अनुभव केवल तभी हो सकता है जब ध्यान की अवस्था हो। जहां किसी का किसी से मिलने की चाहत हो या अकेले पन की निश्चिंत अवस्था हो। जब रिक्त होना अच्छा लगे और मन किसी अपेक्षा के बंधन से मुक्त हो जाय तब यही मोक्ष है।


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